@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: प्रोजेक्शन

बुधवार, 4 मार्च 2026

प्रोजेक्शन

पिंजरा और पंखा-47

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
दशहरा गुजर चुका था, दीवाली में बस सत्रह दिन शेष थे. शगुन हर वर्ष दीवाली पर घर गयी थी. पर इस वर्ष वह सोच ही नहीं पा रही थी कि वह जा पाएगी या नहीं. शगुन के मन में विषयों का एक सघन कोहरा छाया हुआ था. अंतिम सेमेस्टर की चुनौतियां पिछले वर्षों से कहीं अधिक तकनीकी और मानसिक थीं. उसे असामान्य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology) की उन परतों को समझना था जहाँ सामान्य और असामान्य के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो जाती है.

दोपहर में वह साइकोलॉजी लैब में 'रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण' (Rorschach Inkblot Test) के कुछ परिणामों का विश्लेषण कर रही थी. यह एक 'प्रोजेक्शन' तकनीक है, जिसमें व्यक्ति स्याही के धब्बों में वही देखता है जो उसके अवचेतन में गहरे बैठा होता है. शगुन ने गौर किया कि कैसे अलग-अलग परिवेश से आई लड़कियाँ उन धब्बों में कभी उड़ते पक्षी देखती हैं, तो कभी बंद पिंजरे.

शाम को होस्टल पहुँची तो आराम के लिए कुछ देर के लिए लेट गयी. तभी उसके फोन की घंटी बज उठी. उसने अनमने ढंग से फोन उठाया, मम्मा का था. आम तौर पर वे इस समय फोन नहीं करतीं. रात को सब काम निपटाने के बाद अपने कमरे में जाकर ही फोन करती हैं. उसने सोचा कुछ तो जरूरी बात है. उसने फोन उठा लिया. "शगुन, इस बार दीवाली की भाई-दूज से अगले दिन अनिल चाचा इन्दौर वाले मेहमानों को खास तौर पर बुलाना चाहते हैं. कह रहे हैं कि तू यहाँ रहेगी तो बात बन जाएगी और उन्हें कच्चा दस्तूर दे सकते हैं."

शगुन तब तक निकल कर छत पर आ चुकी थी. पश्चिम में सूरज डूबने को था. शगुन के मस्तिष्क पटल पर सांख्यिकी के चार्ट उतर आए. अभी बहुत काम बाकी पड़ा था. दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर था. और उसके तुरन्त बाद आखिरी सेमेस्टर शुरू होना था. इस सेमेस्टर की केस स्टडी तैयार नहीं हुई थी जिसे सेमेस्टर के पहले जमा करना था.

“मम्मा, इस सेमेस्टर की केस स्टडी जमा करना है और दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर है, उसकी भी तैयारी करनी होगी. इस दीवाली पर मंडी आना नहीं हो सकेगा.”

"लेकिन बेटा, घर में सब तेरा इंतज़ार कर रहे हैं. चाचा कह रहे थे कि ऐसा बढ़िया लड़का हाथ से निकल जाएगा तो फिर अच्छे रिश्ते ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे.” मम्मा की आवाज़ में वही पुरानी घबराहट थी.

"मम्मा, मेरा करियर ही मेरा सबसे बड़ा मुहूर्त है. मैं दीवाली अवकाश में यहीं हॉस्टल में रहकर अपनी रिसर्च रिपोर्ट पूरी करूँगी और सेमेस्टर की तैयारी भी."

“शगुन, जैसा तू उचित समझे. मेरी खुशी तो तेरे साथ है. पर चाचा पापा से अपने सामने तुझे फोन करवा सकते हैं. तब उनसे क्या बात करनी है, सोच कर रखना.”

“ वह मैं देख लूंगी मम्मा, अब फोन रखती हूँ.”

अगले दिन लैब पहुँच कर उसने सांख्यिकी (Statistics) के चार्टों को देखा. उन्हें तैयार कर लेने के बाद उसे सेमेस्टर की तैयारी में जुटना था. सेमेस्टर खत्म होते ही फाइनल सेमेस्टर के चार मुख्य पेपरों की तैयारी के साथ-साथ फील्ड वर्क और केस स्टडी का काम भी था. परामर्श मनोविज्ञान (Counselling Psychology) की इंटर्नशिप और ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर की केस रिपोर्ट बनानी थी. उसे यह सब पूरे करने था. पिछले चार सेमेस्टरों में अर्जित अंकों के आधार पर उसकी स्थिति यह थी कि उसने इन सबके लिए मेहनत की तो वह विद्यापीठ की मनोविज्ञान की सबसे बेहतर छात्रा होकर स्वर्ण पदक अर्जित कर सकती थी. परिवार-समाज की ओर से आ रही बाधाओं से पार पाने के लिए उसे यह जरूरी लगता था. एक सांख्यिकी चार्ट पूरा करने के बाद वह डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर बढ़ गई. डॉ. शास्त्री उसके प्रोजेक्ट, "पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं की मानसिक स्थिति: एक केस स्टडी" के डेटा का मिलान कर रहे थे.

शगुन ने पूछा, "सर, क्या मेरा यह डेटा पर्याप्त है?"

डॉ. शास्त्री ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और बोले, "डेटा तो प्रभावशाली है और पर्याप्त भी शगुन, लेकिन क्या तुमने गौर किया कि तुम्हारी केस स्टडीज में 'कंडीशंड रिस्पांस' (Conditioned Response) कितना गहरा है? ये स्त्रियाँ अपनी बेड़ियों को ही अपना गहना मानने लगी हैं. मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) कहते हैं, जहाँ व्यक्ति यह मान लेता है कि वह अपनी स्थिति बदल ही नहीं सकता. क्या तुम इसे अपने जीवन के यथार्थ में चुनौती देने के लिए तैयार हो? अकादमिक सत्य और व्यक्तिगत साहस के बीच की खाई बहुत गहरी होती है."

शगुन को अहसास हुआ कि उसका प्रोजेक्ट केवल एक डिग्री के लिए नहीं, बल्कि खुद को उस 'लर्नड हेल्पलेसनेस' से बाहर निकालने की प्रक्रिया है.

उसी रात उसने आयुष को ईमेल किया. आयुष गुवाहाटी में अपने पहले सेमेस्टर की लैब रिपोर्ट्स में व्यस्त था. उसने अपने जवाब में लिखा:

"दीदी, आपकी हिम्मत देखकर मुझे भी ताकत मिलती है. यहाँ मेरी पहली दीवाली है और अवकाश केवल एक सप्ताह का, चार दिन आने जाने में टूटेंगे. तीन दिन के लिए कैम्पस से कोई भी घर नहीं जा रहा है. सब यहीं दीवाली मनाने की सोच रहे हैं. मैं हर हालत में घर नहीं जा रहा हूँ. हम दोनों अपनी-अपनी 'वर्कशॉप' में खुद को घिस कर माँज रहे हैं. आप फिक्र मत करो, मैं पापा को अलग से फोन करके समझा दूंगा कि आपकी अनुसंधान परियोजना (Research Project) कितनी गंभीर है. सगाई का दबाव फिलहाल टल जाएगा. आगे की फिर आगे देखेंगे."

दीवाली की रात रामगंजमंडी में दीये जले, आतिशबाजी भी हुई, लेकिन गुप्ता निवास में एक असहज सन्नाटा पसरा रहा. अनिल चाचा पूरी दीवाली अपना चेहरा गुस्से से लाल किए रहे. "पढ़ाई या बहाना? अब ये मनोवैज्ञानिक परीक्षण तय करेंगे कि सगाई कब होगी?" गुप्ताजी चुप रहे, पर उनकी आँखों में शगुन के प्रति एक अनजाना सम्मान और समाज के प्रति एक गहरा डर साथ-साथ तैर रहे थे.

शगुन ने अपनी नई नोटबुक, अपनी नयी 'संबल' को खोला और लिखा: "स्वतंत्रता का पहला कदम 'ना' कहना सीखना है, और दूसरा कदम उस 'ना' को तर्क और योग्यता से सिद्ध करना है."
... क्रमशः

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