@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: ब्रह्मपुत्र की हवाएँ

गुरुवार, 5 मार्च 2026

ब्रह्मपुत्र की हवाएँ

पिंजरा और पंखा-48

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

गुवाहाटी में दीवाली के पहले से ही सुबह की धुंध और गहरी होने लगी थी. पहले सेमेस्टर की परीक्षा के नतीजे आ चुके थे और आयुष ने अपनी जगह 'टॉप-10' में सुरक्षित कर ली थी. लेकिन इस सफलता से अधिक जिस चीज़ ने उसे बदला था, वह था यहाँ का खुला 'इंटरेक्शन'.

उस दोपहर, वह 'कम्प्यूटर सेंटर' में लैब असाइनमेंट पूरा कर रहा था. तभी उसके साथ वाली डेस्क पर ईशा ने अपनी कुर्सी खिसकाई. वह कोलकाता से थी और फिजिक्स की 'ब्राइट' छात्राओं में गिनी जाती थी.

"आयुष, तुमने 'डिस्क्रीट मैथ' वाले लॉजिक गेट्स का असाइनमेंट कर लिया? मुझे उस 'ट्रुथ टेबल' में थोड़ी दिक्कत आ रही है," ईशा ने सहजता से पूछा.

आयुष एक पल के लिए ठिठका. उसके पुराने बोर्डिंग स्कूल में लड़कियाँ केवल 'एनुअल डे' पर दिखती थीं, और घर (रामगंजमंडी) में लड़कियों से बात करने का मतलब था, ‘संदेह की नज़रें’. लेकिन यहाँ ईशा की आँखों में कोई संकोच नहीं था, केवल एक सहपाठी की जिज्ञासा थी.

"हाँ... वो, मैंने कर लिया है. तुम चाहो तो मेरा लॉजिक देख सकती हो," आयुष ने अपना रजिस्टर उसकी ओर बढ़ा दिया.

अगले एक घंटे तक दोनों ने 'बाइनरी लॉजिक' पर चर्चा की. क्लास के बाद वे दोनों कॉफी पीने कैंपस के मशहूर कैंटीन एरिया 'खोका' (Khokha) चले गए. वहाँ ब्रह्मपुत्र की ठंडी हवाएँ सीधे उनके बदन से टकरा रही थीं. आयुष ने देखा, आसपास कई और लड़के-लड़कियाँ समूहों में बैठे थे, हँस रहे थे, बहस कर रहे थे. वहाँ न तो अनिल चाचा का डर था, न ही समाज की 'मर्यादा' वाली घुटन.

ईशा ने कॉफी का घूँट लेते हुए कहा, "तुम्हें पता है आयुष, घर पर सब सोचते हैं कि मैं यहाँ सिर्फ पढ़ रही हूँ, लेकिन यहाँ आकर मुझे अहसास हुआ कि मैं पहली बार 'जी' रही हूँ. कोलकाता में पाबंदियाँ थीं, पर यहाँ हम अपनी पहचान खुद गढ़ते हैं."

आयुष को अपनी दीदी, शगुन की याद आई. उसे महसूस हुआ कि शगुन जिस 'आज़ादी' के लिए बनस्थली विद्यापीठ के परकोटा वाले दायरे में लड़ रही है, वह यहाँ कितनी सहज उपलब्ध है. उसने मन ही मन सोचा— "क्या रामगंजमंडी में कभी ऐसा हो पाएगा? जहाँ शगुन दीदी जैसी किसी लड़की को अपनी शिक्षा के लिए किसी 'मुहूर्त' या 'सगाई' से न लड़ना पड़े?"

रात को हॉस्टल लौटकर आयुष ने ईशा के साथ बिताए समय के बारे में सोचा. यह सिर्फ 'दोस्ती' नहीं थी, यह उसके भीतर की उस ग्रंथि का खुलना था जिसने उसे हमेशा सिखाया था कि स्त्री और पुरुष के बीच केवल 'रिश्ते' या 'दूरी' हो सकती है, 'सहज मित्रता' नहीं.

उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, आज मैंने जाना कि समानता केवल किताबों में नहीं होती, वह व्यवहार में होती है. यहाँ लड़कियां सिर्फ पढ़ नहीं रही हैं, वे नेतृत्व कर रही हैं. मुझे एक नई दोस्त मिली है, ‘ईशा’. उससे बात करके मुझे लगा कि पितृसत्ता का सबसे बड़ा हथियार 'अलगाव' (Separation) है. जब हम साथ मिलकर काम करते हैं, तो डर अपने आप खत्म हो जाता है. आप अपनी लड़ाई जारी रखिए, यहाँ की आबोहवा मेरे भीतर के 'अनिल चाचा' को रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार रही है."

ईमेल भेजकर वह खिड़की के पास खड़ा हो गया. दूर ब्रह्मपुत्र का पानी चाँदनी में चमक रहा था. आयुष अब वह छोटा भाई नहीं रहा था जो केवल आज्ञा मानता था, वह अब एक 'स्वतंत्र-चेता' बन रहा था.

बनस्थली में शगुन का संघर्ष एक अलग स्तर पर था. दीवाली के बाद कैंपस में सन्नाटा था, लेकिन शगुन की मेज़ 'असामान्य मनोविज्ञान' की किताबों और केस स्टडी की फाइलों से अटी पड़ी थी. उसने हॉस्टल मेस की बाई नाथी और उसकी मदद से गाँव की अन्य स्त्रियों के जो इंटरव्यू लिए थे, वे उसके प्रोजेक्ट का आधार बन रहे थे.

उसी शाम मम्मा का फोन आया. "शगुन, अनिल चाचा बहुत नाराज़ हैं. वे कह रहे हैं कि तूने दीवाली पर न आकर उन लोगों का अपमान किया है. अब वे कह रहे हैं कि दिसंबर के अंत में वे खुद वहाँ बनस्थली आएंगे, उस लड़के और उसके परिवार के साथ. वे वहीं सब पक्का करना चाहते हैं."

शगुन का हाथ काँपा, पर आवाज़ नहीं. उसने पास रखे 'टीचिंग असिस्टेंट' (Teaching Assistant) के आवेदन फॉर्म को देखा. डॉ. शास्त्री ने उसे बताया था कि मनोविज्ञान विभाग में दो पद खाली हैं, और शगुन अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सबसे मजबूत दावेदार थी.

"मम्मा, चाचा को कह दीजिएगा कि दिसंबर में मेरे प्रैक्टिकल और फील्ड वर्क की प्रेजेंटेशन है. मुझे किसी से मिलने की फुरसत नहीं होगी. और मैं यह बहाना नहीं बना रही हूँ, स्थिति यही है कि अभी भी मेरी नींद पूरी नहीं होती. वे आए तो बहुत निराश होंगे," शगुन ने स्पष्ट कहा. “चाचा की बेसब्री बहुत डराती है, मम्मा. दिसंबर के बाद केवल तीन-चार माह बचेंगे. क्या वे तब तक नहीं रुक सकते.”

"बेटा, वे नहीं मानेंगे. वे पापा पर बहुत दबाव बना रहे हैं," मम्मा की आवाज़ में डर था.

शगुन ने फोन रखा और डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर चल दी. शायद चाचा समझने लगे हैं कि, ‘यदि उसने बी.एससी. कर लिया तो लड़की हाथ से निकल जाएगी’. उसे पता था कि अब केवल 'ना' कहना काफी नहीं होगा, उसे खुद को आर्थिक रूप से स्वतंत्र साबित करना होगा. उसने ऑफिस जाकर टीचिंग असिस्टेंट के पद के लिए अपना आवेदन जमा किया और साक्षात्कार (Interview) की तैयारी में जुट गई.

उस रात उसने अपनी नई 'संबल' नोटबुक में लिखा, "आयुष गुवाहाटी में उस दुनिया को जीने का आरंभ कर चुका है, जिसे मैं यहाँ कागज़ों पर उतार रही हूँ. हम दोनों के बीच का यह संवाद ही हमारा असली हथियार है. दिसंबर में चाचा तो न आने पाएंगे लेकिन वापस लौटने पर युद्ध अब केवल उसके जीवन को सगाई में बांध देने के खिलाफ नहीं, बल्कि मेरी एक स्वतंत्र पहचान के लिए होगा."

खिड़की के बाहर बनस्थली के हरे वृक्षों के बीच छाया सन्नाटा और दूर गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र की लहरों को छूकर उठती हवाएँ, दोनों एक ही संकल्प से जुड़े थे.

... क्रमशः 

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