'लघुकथा'
कोटा से बाराँ जाने वाली सड़क पर 50 किलोमीटर दूर बसे अंता कस्बे में भँवर का बचपन बीता. वहाँ घरों की बनावट कस्बे का माहौल ही ऐसा था कि मर्दानगी के लिए अलग से कोई पाठशाला नहीं खोलनी पड़ती थी; वह तो वहाँ की हवा और मर्दों की बैठकों के धुएँ में रची-बसी थी. भँवर ने बचपन से देखा कि घर के बड़े 'हुकम' उचारते थे और औरतों के स्वर घूंघट की ओट में कहीं लुप्त हो जाते थे.
भंवर की पूरी पढ़ाई एक 'लड़कों के स्कूल' में हुई. स्कूल एक ऐसा किला था जहाँ औरतों का प्रवेश वर्जित तो नहीं था, पर उनकी अनुपस्थिति एक 'सांस्कृतिक ज़रूरत' बना दी गई थी. स्कूल के लड़कों के लिए लड़कियां कोई हाड-माँस का इंसान नहीं, बल्कि 'इज्जत' या 'आफत' के दो खानों में बँटी हुई कल्पित आकृतियाँ थीं. वहाँ मर्दानगी का पैमाना था—बिना पलक झपकाए किसी की आँखों में देखना और अपनी जाति के रसूख को अपनी कमीज के कॉलर पर टांगे रखना.
फिर भंवर का सामना कुलदीप से हुआ. कुलदीप, जिसके पास अपनी जाति और अपने 'मर्दाना' होने का एक गहरा अहंकार था.
"देख भँवर, चंबल का पानी और हाड़ौती का खून... दोनों में उबाल रहना चाहिए," कुलदीप अक्सर अपनी बाइक को रेस देते हुए कहता. उसके लिए दबदबा ही एकमात्र सद्गुण था.
एक दिन, पुराने कस्बे के स्कूल से लौट रही लड़कियां कुएं की जगत पर बैठकर कुछ बातचीत करने लगी थीं. उनमें मास्टर जी की मंजरी भी थी. मास्टर जी कुछ चार साल कोटा में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के दफ्तर में सहायक रहे थे. मंजरी चार साल कोटा के किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ कर लौटी थी. उसकी चाल में दबी हुई सहम नहीं थी, होंठों पर मुस्कान बसती और आँखों में प्यार झलकता. उसकी काया में बेबसी की वह रेखा नहीं थी जिसे भँवर ने अपने घर की औरतों में देखा था. उसके बोल में 'हुकम' की गुलामी नहीं, बराबरी का आत्मविश्वास था. उसका स्वर कस्बे में पसरा सदियों का सन्नाटा तोड़ता लगता था. उस दिन कुलदीप ने उसे देखते ही अपनी बाइक का पहिया उसकी ओर मोड़ा और एक भद्दा मज़ाक उछाला.
"अरे भाई, ये तो शहर जाकर ज़्यादा ही पढ़ ली है," सड़क से गुजरते लड़के ठहर गए और ठहाका मारकर हँसे.
भंवर वहीं से गुजर रहा था. उसे लगा कि उसे भी इस ठहाके में शामिल होना चाहिए, क्योंकि यही उस 'पटकथा' की मांग थी जो उसे पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी गई थी. लेकिन उस पल मंजरी ने अपनी नज़रें नीचे नहीं कीं. उसने रुककर कुलदीप की आँखों में सीधे झांका. उस नज़र में नफरत से ज़्यादा एक गहरी 'घृणा' थी, ऐसी घृणा जो किसी ताकतवर को बौना बना दे और बरसती आग सा क्रोध.
मंजरी ने सिर्फ इतना कहा, "कुलदीपे, ये जो तुम 'मर्दानगी' दिखा रहे हो न... ये तुम्हारे भीतर का डर है. तुम डरे हुए हो कि अगर हम तुम्हारे बराबर खड़े हो गए, तो तुम्हारी ये विरासत पसर जाएगी."
कुलदीप तिलमिला गया. उसने हाथ उठाया, लेकिन भंवर में, न जाने कहाँ से हिम्मत आ गई, उसने आगे बढ़ कर कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.
"छोड़ दे कुलदीप," भँवर की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक ठहराव था. उसे न जाने क्या हुआ था. जैसे ही मंजरी ने कुलदीप की मर्दानगी को डर कहा, उसका दिमाग झनझना उठा था. फिर उसका हाथ बढ़ा और उसने कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.
"तू पागल हो गया है? एक लड़की के लिए अपने दोस्त और अपनी बिरादरी के खिलाफ जाएगा?" कुलदीप की आवाज़ में पारंपरिक रोब था.
"बिरादरी के खिलाफ नहीं, खुद के खिलाफ जा रहा हूँ," भंवर ने जवाब दिया. "हम सालों से यही तो कर रहे हैं. चुप रहना, डराना और इसे ही मर्द होना समझना. पर हम ही तो डरते रहते हैं हर पल कि कोई बराबरी पर न आ खड़ा हो. मुझे अब ये डर का बोझ नहीं ढोना."
उस शाम भँवर जब घर लौटा, तो बैठक में सन्नाटा था. उसके पिता हुक्का पी रहे थे. भंवर ने पहली बार गौर किया कि उस सन्नाटे में कितनी घुटन थी. उसने अपनी माँ को देखा, जो रसोई की गर्मी में बिना पंखे के रोटियाँ बेल रही थी. वह अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया, वहाँ, जहाँ अमूमन घर के 'मर्द' नहीं बैठते.
"माँ, आज से मैं स्कूल के बाद आपका हाथ बँटाऊँगा," उसने धीरे से कहा.
माँ ने रोटी बेलते बेलन को रोक कर भँवर की आँखों में देखा, वहाँ उसके प्रति शाब्दिक आदर नहीं बल्कि प्यार था.
उसके पिता ने चौंककर हुक्का छोड़ दिया. उनकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन भँवर की आँखों की 'भावनात्मक चुप्पी' टूट चुकी थी. उसे समझ आ गया था कि जिस मर्दानगी को वह अब तक अपना कवच समझता था, वह दरअसल उसके खुद के व्यक्तित्व की बेड़ियाँ थीं.
हाड़ौती की उस तपती दोपहर में चंबल के पानी ने भले अपना रास्ता न बदला हो, लेकिन भँवर ने पीढ़ियों से लिखी जा रही अपनी 'पटकथा' फाड़ दी थी. उसे अब समझ आ गया था कि असली मर्दानगी किसी को दबाने में नहीं, बराबरी से खड़े होने में है.
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