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गुरुवार, 12 मार्च 2026

रूपांतरण

पिंजरा और पंख-55

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

श्रृंखला फाइनल- अन्तिम कड़ी

शगुन का नियुक्ति पत्र देखने के बाद अनिल चाचा अवाक रह गए थे. उनकी पितृसत्ता वाली कंडीशनिंग को चोट लगी थी. वे एक-दो दिन मौन रहे, कुछ नॉर्मल हुए तो उन्होंने शगुन और आयुष से बात करना शुरू किया. वे शगुन से बनस्थली के बारे में और आयुष से आईआईटी गुवाहाटी के बारे में सवाल करने लगे. कई बार उनकी प्रतिक्रिया होती, “अच्छा ऐसा भी है?” ... “मतलब हम तो कुएँ के मेंढक ही रह गए" ... हमने जाना ही नहीं कि दुनिया कितनी बड़ी और विविध है, ... कहाँ थी और कहाँ जा रही है?” ... “हम तो सरकारी दफ्तरों में अपनी जान पहचान, कुछ व्यापारियों और कुछ नेताओं से रसूख को ही दुनिया समझे बैठे थे. तुमसे पता लगा कि वास्तविक ज्ञान के सामने वह सब महत्वहीन है.”  इस बातचीत से चाचा की ग्रंथियाँ शनै-शनै खुलने लगीं. अब वे शगुन और आयुष से अभिभावक जैसा नहीं, बल्कि दोस्तों जैसा व्यवहार कर रहे थे. देखते-देखते जून की बीस तारीख आ गई.

शगुन का सत्र 27 जून से आरंभ होना था. उस दिन उसे ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर जॉइन भी करना था. वह चाहती थी कि 25 को ही बनस्थली पहुँच जाए. जिससे वह अपने एडमिशन और होस्टल आवंटन का काम पूरा कर सके. उसने पैकिंग शुरू कर दी थी. इस बार उसे नया होस्टल मिलने वाला था और जरूरत का सारा सामान ले जाना था. दो दिन वह चाची के साथ बाजार जाकर स्त्रियों के लिए जरूरी वस्त्र और दूसरे सामान खरीद लाई थी.

जाने के तीन दिन पहले रात को डिनर के बाद, जब चाचा पान खाने के लिए बाज़ार चले गए और गुप्ताजी ड्राइंग रूम में आकर बैठे, तभी शगुन उनके पास आकर बैठी और बतियाने लगी. करीब आधे घंटे इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने कहा.

“पापा, आप दिल पर न लें तो एक बात कहूँ?”

“बोल ना, कभी तेरी बात को दिल पर लिया है मैंने?”

 “सोचती हूँ कि मैं 25 जून को सुबह पाँच बजे वाली जयपुर एक्सप्रेस बस पकड़ूँ, वह 9:30 बजे मुझे निवाई उतारेगी. वहाँ से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बनस्थली पहुँच जाऊंगी.”

गुप्ताजी ने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा दिए.

“अच्छा तुझे नौकरी मिल गयी तो इत्ती बड़ी हो गई है, अब हम तुझे बनस्थली छोड़ने भी नहीं जा सकते. तुझे हमारे छोड़ने आने से कोई तकलीफ है?”

“नहीं पापा, मुझे कोई तकलीफ नहीं है. पर आप जाते हैं, रात गेस्ट हाउस में रुकते हैं और अगले दिन वापस लौटते हैं. इतनी दूर कार चलाने से थकान भी तो होती है. फिर मैं सोच रही थी कि इस बार मैं अपना पहला जॉब शुरू करने जा रही हूँ... तो आत्मनिर्भर होने का अहसास घर से ही क्यों न शुरू करूँ?”

गुप्ता जी की आँखों में हल्की चमक, थोड़ा गर्व और थोड़ी शरारत थी. उन्होंने शगुन के कंधे पर हाथ रखा.

"शगुन, तुम एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हो, यह तुम साबित कर चुकी हो. लेकिन अभी तुमने नौकरी जॉइन नहीं की है. अभी तुम जॉइन करोगी, अगस्त के पहले सप्ताह में तुम्हारा पहला वेतन तुम्हारे हाथ में आएगा. उस दिन मैं मानूँगा कि मेरी बेटी सचमुच अपने पैरों पर खड़ी हो गई है. उसके बाद तुम अपनी फीस खुद भरना, अपनी पसंद के कपड़े खरीदना और शायद हमारे लिए भी कुछ लाना. पर अभी? अभी तो हम ही तुझे छोड़ने चलेंगे."

“पापा, आपने तो मेरा सारा प्लान ही ध्वस्त कर दिया.” शगुन हल्की मुस्कान के साथ बोली.

“अच्छा शगुन मेरी बात सुन.” अनिल चाचा की आवाज सुन कर शगुन चौंक कर आश्चर्य से उन्हें देखा. उसे इस बात का अहसास ही नहीं था कि वे वहाँ आ बैठे थे और उनकी बातें सुन रहे थे.

“चाचा, आप?

“शगुन मैं तो बहुत देर से तेरी और भाई साहब की बातें सुन रहा हूँ. अब मेरी बात सुन. आज मेरी 26 से 1 जुलाई तक की छुट्टी मंजूर हो गयी है, 2 को रविवार है. मेरे पास पूरे आठ दिन हैं. तेरी चाची भी जयपुर घूमना चाहती है. तो भाभी और भाई साहब की जगह तुझे छोड़ने मैं और चाची जा रहे हैं, साथ में मुक्ति भी होगी. आयुष से भी पूछेंगे, वह भी हमारे साथ घूम आएगा. कैसा रहेगा?”   

शगुन चाचा के इस प्रस्ताव से चकित थी. यह तो उसे पता था कि चाचा का रूपांतरण (Transformation) तेजी हो रहा है. लेकिन उसे यह अहसास नहीं था कि वे इस स्तर तक पहुँच जाएंगे. उसने पापा की ओर देखा तो वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे.

“मतलब पापा, ये बात आपको भी पता थी.” शगुन ने रुआँसा होने का अभिनय करते हुए कहा.

“मुझे भी अनिल ने शाम को ही बताया. मुझे प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा तो मैंने तुरन्त हाँ कर दी. तुझे मंजूर न हो तो यह नहीं जाएगा.”

“नहीं पापा, चाचा-चाची मुक्ति के साथ मुझे छोड़ने जाएँ, वहाँ दो-तीन दिन रुकें, सब कुछ देखें. इससे अच्छा क्या हो सकता है? आखिर कभी तो उन्हें भी मुक्ति के भविष्य के बारे में सोचना होगा.”

“मुक्ति की मुझे अब कोई चिन्ता नहीं. उसकी सोचने वाले यहाँ तुम और आयुष हो तो.” चाचा ने कहा.

 

25 जून की सुबह.

गुप्ता निवास के बाहर सुबह से ही चहल-पहल थी. हवा में रामगंजमंडी की वही परिचित महक थी, लेकिन शगुन को आज सब कुछ नया लग रहा था. गुप्ताजी की कोरल रेड मारूति-800 बनस्थली जाने को तैयार खड़ी थी.

चाचा ड्राइविंग सीट पर थे, शगुन आगे बैठी, पीछे चाची और आयुष, आयुष की गोद में थी मुक्ति. मम्मा-पापा ने उन्हें हाथ हिलाकर विदा किया. कार धीरे-धीरे गली से बाहर निकलने लगी. ताई-ताऊ की ओर देखते हुए मुक्ति उत्साह से हवा में हिला रही थी.

शगुन ने भी खिड़की से पीछे देखा कि उसका घर छोटा होता जा रहा है, लेकिन उसके अपने भीतर का आसमान बड़ा होता जा रहा था. उसने अपने छोटे बैग से अपनी ‘संबल’ नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया:

"स्वतंत्रता का अर्थ रिश्तों को तोड़ना नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनी पहचान को ढूँढना है. संबल केवल सहारा नहीं, बल्कि वह विश्वास है जो आपको तब भी उड़ने की शक्ति देता है जब हवाएँ खिलाफ बह रही हों.

आज मेरे लिए पिंजरे का दरवाज़ा खुल चुका है…     अब सारा आसमान मेरा है."

 (समाप्त)

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