@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: परछाइयाँ

गुरुवार, 26 मार्च 2026

परछाइयाँ

देहरी के पार कड़ी - 7

फ्लैट में शिफ्ट होने के दिन प्रिया ने केवल चाय-कॉफी बनाने के लिए सामान लिया था. शनिवार सुबह चाय पीकर वह सामानों की लिस्ट बनाने बैठी, सुबह के नाश्ते के लिए उसने इडली-सांभर फ्लैट पर ही मंगा लिए. नाश्ता करके ग्यारह बजे सामान लेने निकली. सामान लेते-लेते उसे ढाई बाजार में ही बज गए. उसे वहाँ मेवाड़ वैष्णव भोजनालय दिखा. उसे भूख लगी थी, वह अंदर जा बैठी. लड़का पानी का जग और गिलास रखकर जाने लगा तो उसने पूछ लिया, “भोजनालय किसका है?”


“रामजी का है, वे रहे.” लड़के ने इशारे से बताया.

दुकान के सड़क की ओर एक चूल्हा था, दीवार की ओर सब्जियों के बड़े पतीले रखे थे, दीवार के विपरीत जहाँ दुकान में प्रवेश-निकास स्थान था वहीं काउंटर था. वहाँ पचास-पचपन की उम्र का व्यक्ति कमीज पाजामा पहने कंधे पर गुलाबी गमछा डाले सब्जी छौंक रहा था, वही कुछ देर पहले काउंटर पर ग्राहक से बिल का भुगतान ले रहा था. भोजनालय राजस्थान के ढाबों की तरह था. राजस्थानी थाली उपलब्ध थी, उसने वही मंगा ली. फ्राइड भिंडी और बेसन गट्टे की सब्जियाँ थीं, चावल, छाछ का रायता और बढ़िया फूली हुई गर्म चपातियाँ. लड़के ने बताया कि संडे को दाल-बाटी-चूरमा भी बनता है. प्रिया को अपने देस का स्वाद मिला. पेट तो भरा ही, मन भी तृप्त हो गया. काउंटर पर बिल देने आई तो उसने रामजी से पूछ लिया, “वे मेवाड़ में कहाँ से हैं?” रामजी ने बताया कि “वे भैंसरोड़गढ़ से हैं, दुकान वहीं के एक सेठजी की है, उन्होंने मामूली किराए पर दे रखी है.”

जब प्रिया ने बताया कि वह कोटा से है तो कहने लगे, “बिटिया आप तो हमारी भतीजी हुई, कोटा और हमारा गाँव दोनों चम्बल किनारे हैं, बस पचास किलोमीटर की दूरी है.” उन्होंने थाली के पैसे लेने से भी इन्कार कर दिया. “आज पैसे नहीं लूंगा, फिर कभी आओगी तब देखूंगा.” रामजी ने खुद को प्रिया का चाचा घोषित कर दिया. कहने लगे, “बिटिया आते रहना अच्छा लगेगा.” रामजी ने उससे पैसे नहीं ही लिए. इतनी दूर ऐसा अपनापन देख उसकी आँखें नम हो गईं.

ऑफिस में प्रिया को एक महत्वपूर्ण इंटरनेशनल प्रोजेक्ट का 'लीड' बनाया गया था. जिम्मेदारी और काम का बोझ दोनों बढ़ गए. वह सुबह ग्यारह बजे ऑफिस पहुँचती, वापस लौटने में रात के आठ-नौ बज जाते हैं. एक शाम जब वह गोरेगाँव स्टेशन से पैदल अपने फ्लैट की ओर बढ़ रही थी, उसे अहसास हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है. वह रुकी, पीछे मुड़कर देखा, लेकिन पीछे केवल मुंबई की कभी न खत्म होने वाली लोगों की भीड़ थी.


घर पहुँचकर उसने दरवाजा बंद किया और हमेशा की तरह अपने बैग को टेबल पर रख उसने खुद को बिस्तर पर गिरा लिया. तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. एक 'फेक' इंस्टाग्राम आईडी से उसे उसकी ही एक धुंधली तस्वीर भेजी गई थी, जो शायद स्टेशन के बाहर ली गई थी. नीचे संदेश था— "मुम्बई की भीड़ में छिपना आसान तो है, प्रिया. पर फिर भी हकदार अपनी ‘अमानत’ तलाश कर ही लेते हैं." प्रिया के हाथ कांपने लगे. यह विक्रांत के सिवा कोई नहीं था. वह यहाँ तक पहुँच चुका था या उसका कोई गुर्गा उस पर नजर रख रहा था.

उसी रात उसके भाई, मयंक का फोन आया. मयंक ने अपनी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन रखा था. "दीदी, पापा की तबीयत कल रात फिर बिगड़ गई थी. डॉक्टर कह रहे हैं कि यह ब्लड प्रेशर नहीं, मानसिक तनाव है. वे किसी से बात नहीं करते, बस खिड़की के बाहर देखते रहते हैं. विक्रांत भी अक्सर उन्हें फोन करता रहता है. क्या तेरा स्वाभिमान उनके जीवन से बड़ा है?"

प्रिया समझती थी कि यह 'इमोशनल ब्लैकमेल' का पुराना तरीका है, लेकिन फिर भी एक टीस उठी. क्या वह वाकई अपने पिता की बीमारी का कारण है? या पिता अपनी बीमारी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं? उसने इतना ही कहा, “मैं प्रोजेक्ट में व्यस्त हूँ, तुरंत नहीं आ सकती”, और फोन काट दिया. वह उस रात सो नहीं सकी. उसे 'मोहन विला' याद आ रहा था जहाँ वह बचपन में खेलती थी.

आखिर अगले दिन उसने आकाश को फोन किया. आकाश ने शांति से उसकी पूरी बात सुनी—विक्रांत की फोटो वाली बात भी और भाई के संदेश वाली भी.

​"प्रिया, विक्रांत वही कर रहा है जो एक हारा हुआ इंसान करता है. वह तुम्हें कमजोर करना चाहता है. तुम्हारे पिता की अस्थिरता का कारण तुम्हारा फैसला नहीं, बल्कि समाज का दबाव है जिसे विक्रांत हवा दे रहा है. तुम बस अपने काम पर ध्यान दो. जयपुर से मैं और मेरा परिवार तुम्हारे साथ हैं. अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं खुद कोटा जाकर तुम्हारे भाई और पापा से मिलूँगा. तुम अकेली नहीं हो."

​आकाश की इन बातों ने प्रिया के भीतर की दरारों को जैसे भर दिया. उसे अहसास हुआ कि जहाँ एक तरफ विक्रांत उसे नीचे खींचने की फिराक में है, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा परिवार भी है जो हर पल उसके साथ खड़ा दिखाई देता है.

उसने तय किया कि वह डरेगी नहीं. अगले दिन उसने ऑफिस की आईटी सिक्योरिटी टीम को उस 'फेक आईडी' रिपोर्ट की और पुलिस को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई.

शनिवार सुबह, प्रिया ने अपने फ्लैट की खिड़की से आरे कॉलोनी के पेड़ों को देखा. उसने खुद से कहा, "यह घर छोटा है, अकेलापन भी है, और डर भी. लेकिन यहाँ मैं 'प्रिया' हूँ, किसी की 'अमानत' नहीं." अलमारी में उसे अपनी माँ की दी हुई एक पुरानी साड़ी दिखी. उसे याद आया कि माँ हमेशा उसके साथ है. उसने तय किया कि वह आज शाम माँ से बात करेगी.
... क्रमशः

 

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