देहरी के पार, कड़ी - 8
शनिवार का अवकाश फ्लैट की सफाई और नए लाए गए सामानों को सही स्थान देने में पूरा हुआ. अब वह अपना खाना, नाश्ता, चाय, कॉफी आदि फ्लैट में बना सकती थी. कोई मिलने आए तो उससे हॉल में मिल सकती थी. दिन भर के काम ने उसे थका दिया था. थोड़ी देर के लिए वह बिस्तर पर लेटी तो उसे नींद लग गई. नींद टूटी तो आठ बजे थे. उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की, लेकिन शरीर की ज्यादातर मांसपेशियाँ दर्द से चीख रही थीं. बहुत दिनों बाद इतना शारीरिक काम किया था, तो यह स्वाभाविक था. उसने अपने मेडिसिन बॉक्स से पैरासिटामोल की गोली निकाली और पानी के साथ गटक ली. एक कड़क ब्लैक कॉफी बना कर पीने बैठी. उसे लगा कि आज किचन तैयार हो जाने पर भी खाना बनाना संभव नहीं, उसने ऑर्डर कर दिया. उसे ध्यान आया कि मम्मी से बात करना था. कॉफी का खाली मग सिंक में पहुँचाने के बाद उसने मम्मी को फोन लगाया. बातचीत के शुरुआती औपचारिक वाक्यों के बाद ही मम्मी सिसक पड़ी. उनकी सिसकियाँ थमने के बाद बात आरंभ हो सकी.
"बेटा, तेरे पापा बहुत पछताते हैं," माँ ने धीमी आवाज़ में कहा. "अक्सर तेरी तस्वीरें देखते रहते हैं. पर जैसे ही विक्रांत का फोन आता है या अखबार में कोई खबर पढ़ते हैं, उनकी आँखों में खून उतर आता है. उन्हें लगता है कि उनकी उम्रभर की सामाजिक और व्यापारिक प्रतिष्ठा तूने मिट्टी में मिला दी है. विक्रांत उन्हें बार-बार उकसाता है कि लड़की हाथ से निकल गई तो समाज थूकेगा. तब वे अपना पछतावा भूलकर तुझे ही अपराधी मानकर कोसने लगते हैं."
प्रिया को अहसास हुआ कि उसके पिता एक ऐसे द्वंद्व में हैं जहाँ कोई बाहर वाला उनका दुश्मन नहीं, बल्कि उनका अपना 'अहंकार' और 'सामाजिक भय' है. वह समझ गई कि अभी पिता का समर्थन तो दूर, बल्कि मामूली सहानुभूति की उम्मीद करना व्यर्थ है.
सोमवार सुबह की चाय पीते हुए प्रिया ने अपने ऑफिस का व्हाट्सएप ग्रुप देखा, वहाँ सन्नाटा पसरा था. लेकिन व्यक्तिगत संदेशों की भरमार थी, जिनमें एक लिंक शेयर किया गया था. लिंक खोला तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. विक्रांत ने उसके सोशल मीडिया अकाउंटों से उसकी तस्वीरें चोरी कर उसके नाम से एक 'फेक प्रोफाइल' बना ली थी. उन तस्वीरों को भद्दे तरीके से एडिट किया गया था और नीचे उसके मुम्बई के ऑफिस का पता लिखा था. कैप्शन था, "शादी से भागकर मुंबई में आजाद घूमने वाली कन्या की हकीकत."
उसका दिल धक से रह गया. यह सीधे-सीधे उसके चरित्र पर हमला था. एक पल के लिए प्रिया को लगा कि वह फिर से उसे उसी अंधेरी कोठरी में धकेल देने की तैयारी है, जहाँ से वह भागी थी. आज जब वह ऑफिस जाएगी तो सबकी नजरें उससे सवाल पूछ रही होंगी. वह क्या जवाब देगी? सवाल पूछती इन नजरों से बिंधती हुई, वह कैसे काम कर सकेगी और करवा सकेगी? वह अपना सुबह का नाश्ता तक नहीं बना सकी, लंच के लिए टिफिन तैयार करना तो दूर की बात थी. उसे कुछ नहीं समझ आया. वह तैयार हो कर सीधे रामजी के मेवाड़ भोजनालय पहुँच गयी.
जैसे ही प्रिया ने भोजनालय में प्रवेश किया. रामजी ने उसे देखते ही जान लिया कि बिटिया तकलीफ में है. वे उठे और भोजनालय के आखिरी कोने की टेबल पर उसे बिठाकर खुद भी सामने की कुर्सी पर बैठ गए. उसके लिए पानी मंगा कर पिलाया, फिर पूछा, उसे क्या तकलीफ है. प्रिया ने बताने के लिए मुहँ खोला, लेकिन बजाए बोल के उसकी रुलाई फूट पड़ी. रामजी ने उसे ढाढ़स बंधाया, तब वह बता सकी कि बात क्या है.
प्रिया की बात सुनते हुए रामजी के चेहरे का रंग बदलता रहा. बात पूरी होने तक उनका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. पर उन्होंने संयम रखा. रामजी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा,"पगली, रोती क्यों है? यह दुनिया गंदी है, पर तू साफ़ है. तू चंबल की बेटी है, तुझे डरने की जरूरत नहीं. फिर रामजी का हाथ तेरे सिर पर है."
रामजी के निस्वार्थ, वात्सल्यपूर्ण और बिना शर्त स्नेह में उसे पुराने बरगद की छाँव महसूस हुई. उसका मन शांत हुआ तो रामजी कहने लगे, “बिटिया, तुमने सुबह से कुछ खाया भी नहीं होगा. मैं नाश्ता भेजता हूँ, कुछ पेट में जाएगा तो कोई हल सूझेगा.” इतना कह कर वे काउंटर की तरफ बढ़ गए.
तभी उसके फोन की घंटी बजी. आकाश का कॉल था. उसने भी वह 'फेक आईडी' देख ली थी. उसका बहुत ही शांत स्वरों में उसने बात शुरू की. "प्रिया, सुनो. पैनिक मत हो. मैंने और पापा ने जयपुर के साइबर सेल में लिखित शिकायत दर्ज करा दी है. वहां के अधिकारियों से भी बात की है. मैंने अपनी कंपनी के आईटी एक्सपर्ट भी लगा दिए हैं ताकि उस आईडी को तुरंत 'टेक डाउन' कराया जा सके. तुम मुंबई पुलिस स्टेशन जाओ और एफआईआर दर्ज कराओ. विक्रांत डरा हुआ है, इसलिए वह ओछी हरकतों पर उतर आया है. तुम बिल्कुल, घबराना नहीं. ये विक्रांत की हार की निशानी है."
आकाश और उसके परिवार का व्यवहार उसे सिर्फ छाँह ही नहीं, बल्कि उसे लड़ने के लिए ढाल-तलवार और हिम्मत भी दे रहा था.
प्रिया ने रामजी और आकाश के प्रेम को महसूस किया. जहाँ एक उसे सुरक्षा का अहसास देता था, दूसरा उसे सशक्त बनाता था. उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे. उसने तय किया कि वह न तो पिता के पछतावे के जाल में फंसेगी और न ही विक्रांत के इस 'साइबर आतंक' से डरेगी. नाश्ता करके उसने टिफिन लिया और ऑफिस के लिए चल दी.
ऑफिस से घर लौटी तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. उसने अपने कपड़े बदले, फिर आईने में खुद को देखा. अपने ही प्रतिबिंब को निहारते हुए बुदबुदाई, "विक्रांत, तू मेरी तस्वीरें चुरा सकता है, मेरा अक्स नहीं. मैं कोई वस्तु नहीं, जीती जागती इंसान हूँ, मैं किसी की 'अमानत' नहीं हो सकती. मैं 'प्रिया' हूँ." उसने लैपटॉप चालू किया, साइबर सेल की वेबसाइट पर अपनी शिकायत का ड्राफ्ट तैयार किया और फिर एक गहरी नींद सोने चली गई. उसे पता था कि कल की सुबह और भी कठिन होगी, पर वह अब अकेली नहीं थी.
... क्रमशः
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