लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
घर से निकलते नौ बज गए, आयुष के होस्टल पहुँचे
तब साढ़े दस बजे थे. सबसे पहले कार से उतर कर शगुन होस्टल में घुसी. आयुष होस्टल
के रिसेप्शन पर ही मिल गया, टेस्ट देकर लौटा ही था. उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे
थे, टेस्ट की तैयारी ने उन्हें कुरेद दिया हो. शगुन की ओर
देखकर वह मुस्कुराने की कोशिश भर कर पाया.
"टेस्ट कैसा रहा?"
आयुष ने कंधे उचकाए. "पता नहीं. पर टॉप
रेंक तो नहीं आएगी." उसकी आवाज़ में खालीपन था, जैसा
रामगंजमंडी से आते समय था. शगुन का दिल भारी हो गया.
“बात तो तेरी सही है... और, मम्मी पापा?”
“मैं फौरन अंदर आ गयी. वे आते होंगे.” शगुन ने
कहा.
“बाहर ही चलते हैं. उधर ही चाय पी लेंगे.”
“चल.” शगुन ने कहा. वे दोनों बाहर आए. कार के
पास मम्मी-पापा आपस में कुछ कह रहे थे.
“क्या हुआ मम्मा?
“कुछ नहीं, बस यूँ ही.” आयुष को सामने देखा तो मम्मा
ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. पूछने लगी, “कैसा है? तेरी शकल कैसी हो गयी है?
तू ठीक से खाया पिया कर. दस-पाँच दिन में जब भी पापा कोटा आएंगे तेरे लिए चाची से
बनवा कर बेसन के लड्डू और मठरी भिजवा दूंगी.
माँ के स्नेह से आयुष की आँखें भी नम हो गईं. शगुन
ठीक थी. उसका लक्ष्य आईआईटी एंट्रेंस क्रैक करना है, न कि बीच के टेस्ट.
तभी पापा ने कहा, “माँ बेटे का मिलन हो गया हो
तो, चल कर चाय पी लें? आगे भी चलना है.”
माँ-बेटे अलग हुए. आयुष उन्हें पास ही सड़क
किनारे एक ठेले पर ले गया. पास रखी बैंचों पर बैठ कर चाय पी. चाय स्वादिष्ट थी.
आयुष से मिल कर वे आगे चले. राजमार्ग नं. 12,
बढ़िया सड़क, नयी कार दौड़ पड़ी. एक अच्छी बारिश हो चुकी थी. खेतों में धान की
रोपाई होते दिखी. बूंदी से देवली तक पहाड़ी इलाका, फिर आगे मैदान था. किसान खेतों
में काम करते दिखे. आगे इकलौता पहाड़ दिखा. गुप्ताजी ने बताया कि इसी की तलहटी में
निवाई कस्बा है और इससे बायें मुड़ कर 9
किलोमीटर बनस्थली.
निवाई और पहाड़ खत्म हुए. बायीं ओर बनस्थली
विद्यापीठ का विशालकाय बोर्ड दिखा गुप्ताजी ने कार बायीं और जाने वाली सड़क पर डाल
दी. कुछ ही देर में वे बनस्थली विद्यापीठ के विशाल प्रवेशद्वार के अंदर थी. यहाँ
गार्ड ने उन्हें रोक कर कार साइड में लगवाई. गेट रजिस्टर में विवरण अंकित करने को
कहा गया. पापा जब तक विवरण अंकित करते शगुन कार से उतरकर परिसर को निहारने लगी.
सीधी जाती सड़क, जिसके दोनों ओर सघन वृक्षावली और उनके बीच से झाँकते तीन-चार
मंजिले भवन.
दोपहर ढलने लगी थी. गेस्ट हाउस में कमरा लिया,
सामान रखा, वहीं के कैंटीन में लंच लिया. विद्यापीठ के प्रवेश कार्यालय पहुँचे तब
तक तीन बज चुके थे.
शगुन ने काउंटर पर बैठे कर्मचारी से "ऑनर्स
मनोविज्ञान” के लिए फार्म मांगा."
शगुन ने फॉर्म भरना शुरू किया. नाम, पता, विषय... फिर अचानक उसकी नज़र एक विकल्प पर अटक
गई.
स्नातक कार्यक्रम चुनें:
- बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान
- बी.एससी. (ऑनर्स) मनोविज्ञान
उसने पलकें झपकाईं. बी.एससी.? मनोविज्ञान में?
"सर, यह बी.एससी.
वाला..." उसने कर्मचारी से पूछा.
"हाँ, यह भी है.
बी.एससी. ऑनर्स लेना है तो पहले साल कुछ फिजिक्स, केमिस्ट्री,
मैथ्स और बायोलॉजी भी पढ़नी होगी. दूसरे साल से पूरा फोकस मनोविज्ञान पर."
एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया. फिर एक गर्म लहर
उसके भीतर से उठी. यह वह रास्ता था जिसकी उसे कल्पना भी नहीं थी. वह विज्ञान पढ़
सकती थी¡. अपनी मर्जी से. बिना किसी के कहने पर.
"पापा," उसकी
आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी, "मैं बी.एससी. ऑनर्स ले लूँ?"
मिस्टर गुप्ता ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा. "पर...
इतने विषय? तू संभाल पाएगी?"
"संभाल लूंगी." शगुन का जवाब तत्काल
और स्पष्ट था. उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी नए अवसर के सामने आती है; “आकांक्षा
और उत्साह का मिश्रण.”
पापा ने एक लंबी साँस ली. उन्होंने शगुन के
चेहरे पर वह निश्चय देखा जो उन्होंने कार खरीदते समय अपने चेहरे पर महसूस किया था.
एक अजीब सा गर्व उनके भीतर उमड़ा.
उन्होंने कहा, "जो
ठीक लगे."
फॉर्म भरा गया. फीस जमा हुई. शाम पाँच बजने को
थे. फीस जमा करने वाले कैशियर ने कहा, “देर हो गयी, पाँच बजने को हैं, होस्टल का
आवंटन कल सुबह हो सकेगा.
गेस्ट हाउस लौटते हुए, सड़क से अंदर जाती सड़क पर
एक कैंटीन सी दिखी. वहाँ कुछ लड़कियाँ बैठ
कर चाय पीते हुए बातें कर रही थीं. गुप्ता जी ने कैंटीन के निकट ले जा कर करा रोक
दी. “उतरो, चाय पी लेते हैं, पता भी लगेगा कि यहाँ कैंटीन में क्या मिल जाते हैं.
"बहुत कठिन कोर्स है, बेटा," माँ ने बैंच पर बैठते हुए चिंतित स्वर
में कहा, "पर तू कर लेगी."
"तुमने सही चुना," पापा ने कहा, "आजकल साइंस के क्षेत्र में बहुत
संभावनाएँ हैं."
शगुन मुस्कुराई. उनके शब्दों में एक नई समझ थी.
वे उसे अब केवल एक 'लड़की' के रूप में
नहीं, बल्कि एक 'छात्रा' के रूप में देख रहे थे.
तभी माँ ने कहा, "आयुष
का चेहरा देखा तुमने? कितना थका हुआ लग रहा था."
“तुम भी क्या बातें करने लगीं? गेस्ट-हाउस जाकर
खूब बतिया लेना.
की थकी आँखों की याद ने शगुन की खुशी पर एक छाया
डाल दी. उसके भाई के लिए विज्ञान एक बोझ था, एक जेल. उसके
लिए यह एक चुनाव था, एक चाबी. एक ही सिक्के के दो पहलू.
रात को कमरे में अकेले, शगुन
ने अपनी डायरी खोली.
आज मैंने खुद चुना. बी.एससी.. पापा मान गए. यह
कोई छोटी जीत नहीं. कल होस्टल मिलने पर मम्मा पापा चले जाएंगे. होस्टल मेरे लिए
नया घर होगा.
उसने खिड़की से बाहर देखा. विद्यापीठ की मुख्य
सड़क पर रोशनी थी. दोनों ओर वृक्षों के पीछे भवनों से कुछ रोशनियाँ फैली हुई थीं. उनमें से एक रोशनी उसके
होस्टल की भी है, जिसमें कल से उसे रहना होगा.
... क्रमश:
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