@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: रास्ता

शनिवार, 3 जनवरी 2026

रास्ता

 लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

अवनि उस रात के बाद कभी नहीं सो पायी. जिस रात डीजल पम्प की चौंधियाती रोशनी में उसकी बहन तारा को विक्रम सिंह के बेटे और उसके दोस्त उसे उठा कर पीछे जंगल में ले गए थे... फिर कुछ घंटों बाद न जाने कैसे वह घिसटते हुए सड़क तक पहुँची थी. पीसीआर वैन ने उसे अस्पताल पहुँचाया था. उस दिन के बाद से तारा की आँखें नाइट बल्ब की मद्धिम रोशनी को एक टक देखा करतीं — जैसे वह रोशनी ही अब उसकी एकमात्र गवाह हो, जो उसके जागते सवालों का जवाब दे सके. देखने वाले को पता नहीं लगता कि वह सो रही है या जाग रही है.

पुलिस दरोगा उसी पर सवाल दाग रहा था, "अच्छी लड़कियाँ शाम ढलने के बाद वहाँ क्यों जाती हैं?" मीडिया ने सुर्खी बनाई: "दोनों पक्षों में समझौते की बातचीत जारी." समाज ने... सिर्फ अपने कपाट बंद कर लिए.

तारा की एक दम चुप थी. उसकी यह चुप्पी अब एक जीवित, साँस लेता ज़ख़्म थी, जिससे हर पल नई पीड़ा रिस रही थी. उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक ऐसा शून्य था जिसने उसका होना ही उससे छीन लिया था. वह अब सिर्फ एक खोल थी, जिसकी आत्मा उसी डीजल पम्प की रोशनी में कहीं छूट गई थी.

पुलिस स्टेशन के सामने का नज़ारा देखकर अवनि और उसके पिता पत्थर हो गए. विक्रम सिंह का बेटा, गले में मालाएँ डाले, मीडिया के कैमरे के लैंस में अपनी आँखें डालकर कह रहा था—"यह मेरे खिलाफ राजनीतिक साजिश है." पीछे खड़े विक्रम सिंह की मुस्कुराहट में जीत का उल्लास सहज दिखाई दे रहा था.

उसी शाम, "शहर का सम्मान बचाना है" के नारे लगते हुए जुलूस निकला रहा था. उसमें वही सब चेहरे थे जो कभी लड़कियों के 'छोटे कपड़ों' पर टिप्पणी करते थे और वेलेंटाइन डे पर जोड़ों को पकड़ कर तंग करते थे. आज वे ही 'शहर के कथित भविष्य' को बचाने के 'महान कार्य' पर निकले थे.

घटना का बस एक गवाह मिला—बूढ़ा मास्टर राजन, जो उस रात सड़क किनारे अपनी साइकिल ठीक करवा रहा था. एकमात्र साहसी आवाज़ जिसने पुलिस को अपराधियों के नाम बताए. पर अदालत की पहली तारीख पर ही वह गायब था. अगले दिन अखबार के एक कोने में खबर थी: "वृद्ध शिक्षक अचानक बीमार हुआ, उसे विशेषज्ञों के पास भेजा गया."

अवनि समझ गई. यह गवाह की बीमारी नहीं थी, उसके लिए एक संदेश था, “वह चुप हो जाए, अपनी लड़ाई को यहीं समेट ले”.

साल दर बीतते गए. तारा की आँखों का खालीपन अब पूरे घर में फैल चुका था. पिता की नौकरी जा चुकी थी—"कंपनी की प्रतिष्ठा का सवाल जो था." माँ का शरीर रोज़ एक नया पीड़ा से पिराने लगा था. और अदालत का कमरा... वहाँ केवल पंखे की घरघराहट और कागज़ों की सरसराहट सुनाई देती थी. यह वह जगह थी जहाँ समय रुक जाता था, जहाँ हर तारीख एक नई कब्र बन जाती थी. एक श्मशान, जहाँ न्याय के शवों का अन्तिम-संस्कार धीमे-धीमे चलता ही रहता था. कभी-कभी अवनि को लगता, वह अपने ही भविष्य की कब्र खोदने आई है.

एक दिन, जमानत पर आजाद हुए आरोपी को अवनि ने एक विशाल राजनीतिक रैली में मंच से भाषण देते देखा. उसकी आवाज़ गूँज रही थी—"मैं युवा शक्ति का नेता हूँ, समाज का नया सवेरा लाऊँगा!" उसके साहस को ऊँचाइयाँ देने को जन-समुद्र गर्जना कर उठा था.

उसी रात, अवनि ने अपनी डायरी लिखना शुरू किया.

पहला पन्ना:

"हम वह समाज हैं जो बेटियों को गर्भ में ही मार दिया करते हैं, और बलात्कारी को गर्भनाल से ही पालते हैं — वे हमारे वंश के वृक्ष की जड़ें हैं, हम उन्हें काट नहीं सकते. हम वह समाज हैं जो धर्म के नाम पर खून तो बहा सकते हैं, लेकिन एक बेटी के आँसू पोंछने का धर्म — एक सनातन मानवीय धर्म — भूल चुके हैं."

उसने ये शब्द सोशल मीडिया के अपने सभी अकाउंट पर अपलोड किए. पहले कुछ घंटे सन्नाटा रहा. फिर एक आवाज़ ने दस्तक दी... फिर दस... फिर सैकड़ों की आवाज गूँजने लगी.

फिर वह दिन आया. राजन मास्टर अब व्हीलचेयर पर, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे. उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर हर शब्द लोहे की तरह था:

"मैंने देखा है. मैं घटना का आई विटनेस हूँ. और अगर इस नगर में अब भी कोई इंसान बचा है, तो उसे भी यह कहना होगा—'मैंने देखा है'. हम सब गवाह हैं. हमारी चुप्पी ही हमारा सबसे बड़ा अपराध है."

चुप्पी का बाँध अब टूट चुका था. अवनि अकेली नहीं थी. अनेक ताराएँ, अनेक राजन, अब एक मानव-श्रृंखला बनाकर खड़े थे.

अब उनके हाथों में आँसू बहाती मोमबत्तियाँ नहीं, मशालें थीं. उनकी लपटें न केवल अँधेरा लील रही थीं, बल्कि चुप्पी के बवंडर को भी उन्होंने जला दिया था. समाज का वह घिनौना मौन, जो किसी जघन्य अपराध से कम नहीं था, अब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर रहा था. न्याय अभी बहुत दूर था, पर उस तक पहुँचने वाला रास्ता अब बन रहा था — एक ऐसा रास्ता जो चुप्पी के जंगलों को चीरता हुआ, डर के दलदलों को पार करता हुआ, सीधे हमारे अपने घर के दरवाज़े तक आता था. लोग उसे लक्ष्य तक पहुँचाने को जुट पड़े थे. और एक भरोसा कि, इस बार, यह रास्ता टूटेगा नहीं.

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