लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
चाची के घर लौटने के बाद परिवार 'पूरा' हुआ. माँ को अपनी 'चाय-संगिनी' मिल गयी, चाचा अब आराम से थे. घर में अब और दो स्त्रियाँ थीं जो उनके लिए सब कुछ 'ढंग से' करतीं. शगुन के लिए घर अब मनोविज्ञान सीखने की प्रयोगशाला था. अब वह मनोविज्ञान के सिद्धांत केवल किताबों से ही नहीं बल्कि व्यवहार से भी सीख रही थी. उसने 'सूक्ष्म प्रतिरोध' के बारे में पढ़ा और तय किया कि वह चुपचाप प्रयोग शुरू करेगी.
रात खाने पर चाचा बोले, "आज ऑफिस में विक्रम ने खूब मज़े लेकर बता रहा था कि आखिर उसकी पत्नी ने यह कह कर नौकरी छोड़ दी, कि पति के तनाव के कारण उसका दिल नौकरी में नहीं लगता."
चाची ने सहमति दी, "उसने सही किया, आखिर स्त्री का पहला फर्ज पति की संतुष्टि है.”
शगुन ने अपनी प्लेट उठाते हुए धीरे से कहा, "अगर, पत्नी का तनाव देखकर पति नौकरी छोड़ दे, तो?"
एक बारगी सन्नाटा छा गया, उसकी बात सुनकर. फिर चाचा एक ठहाका लगाकर बोले, "वाह... शगुन, लगता है तुम मनोविज्ञान के साथ तर्कशास्त्र भी पढ़ रही हो. भविष्य में वकील बनने का इरादा तो नहीं?”
माँ ने अन्दरूनी भय के साथ शगुन को देखा, शगुन बस मुस्कुरा दी.
अपने घर में शगुन का यह पहला प्रयोग था. एक असंतुलित कथन को संतुलित सवाल में बदल देना. प्रतिक्रिया में ठहाका लगा लेकिन विचार बीज की तरह गिरा.
उधर शगुन के स्कूल में लड़कियों के लिए 'आत्मरक्षा' की एक क्लास आयोजित हुई. जिसमें सलवार-पूरी बाँह वाली कमीज वाली यूनिफॉर्म अनिवार्य थी, हँसना मना, और केवल 'स्वीकार्य' मूव्स सीखने की इजाज़त थी.
शगुन ने ट्रेनर से पूछा, "सर, क्या हमें वही मूव्स सिखाएंगे जो लड़कों को सिखाते हैं? असल हमला तो वही होगा न?"
ट्रेनर अपना ट्रैक सूट ठीक करते हुए बोला, "तुम्हारी सुरक्षा के लिए ये काफी हैं. ज़्यादा आक्रामक मूव्स लड़कियों को नुकसान पहुँचा सकते हैं. अगर हमला करने वाला अस्पताल पहुँच गया तो लड़की मुकदमा लड़ते-लड़ते ही थक जाएगी."
कुछ लड़कियाँ हँस पड़ीं.
उस रात शगुन ने यूट्यूब पर वीडियो देखकर अपने कमरे में प्रैक्टिस की. माँ ने दरवाज़ा खोला तो देखा तो वह एक किक का अभ्यास कर रही थी.
"अरे बाप रे! यह सब क्या कर रही हो? चोट लग जाएगी!"
"वही सीख रही हूँ माँ, जो स्कूल में 'स्वीकार्य' नहीं है."
माँ ने आँखें दिखाईं, लेकिन दरवाज़ा बंद करते हुए बुदबुदाई, "अच्छा ही है... कम से कम आयुष जैसे लड़कों से तो बच लोगी." मां की आँखों में थोड़ा गर्व झलका.
शगुन का दूसरा प्रयोग भी आंशिक रूप से सफल रहा. उसने डर तोड़ा, और माँ की चिंता से छिपा समर्थन भी मिला.
एक दिन चाची अपना पुराना एलबम देख रही थी. शगुन ने देखा, युवा चाची साड़ी में, कॉलेज की सीढ़ियों पर किताबें हाथ लिए खड़ी हैं.
"चाची, आप कॉलेज में पढ़ी हैं?" शगुन ने पूछा.
चाची के चेहरे पर एक चमक आकर बुझ गयी. "बस बी.ए. किया और फिर... शादी हो गई."
"आपको अफ़सोस है?"
"अफ़सोस? नहीं... बस कभी-कभी सोचती हूँ, अगर पढ़ाई जारी रखती तो क्या होता?"
फिर अचानक उन्होंने गर्व से कहा, "तब फिर तुम्हारे चाचाजी का टिफिन कौन पैक करता? उनके फेवरेट मेथी के पराठे कौन बनाता!" इन पराठों ने तो मेरी पहचान बना दी?"
शगुन मुसकुराई. उसने चाची से भावनात्मक कनेक्शन स्थापित कर लिया. और पराठों का राज़ भी हाथ लगा! उसका यह प्रयोग भी सफल रहा.
शहर के तहसील लायब्रेरी में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता थी. विषय था "शिक्षा में लैंगिक समानता".
शगुन ने घर बताया: "स्कूल प्रोजेक्ट की रिसर्च के लिए लायब्रेरी जाना है."
चाचा ने समाचार पत्र के पीछे से अपना सर बाहर निकालते हुए कहा, "अच्छा है. पर जल्दी लौटना. वैसे भी लायब्रेरी में तो सब किताबें ही हैं... बातें करने वाले कौन मिलेंगे वहाँ?" शायद उनको को लगता था कि लायब्रेरियाँ सिर्फ किताबों का गोदाम भर होती हैं. शगुन ने नहीं बताया कि वह प्रतियोगिता में भाग लेने जा रही है.
लायब्रेरी के हॉल में लड़कों की भीड़ थी. कुछ लड़कियाँ भी थीं. उसने अपना नाम प्रतिभागी सूची में लिखवाया, तो क्लर्क ने हैरानी से पूछा, "तुम... तुम प्रतियोगी हो?"
"जी," शगुन ने दृढ़ता से कहा.
मंच पर बैठी तो एक लड़का अपने दोस्त से फुसफुसाया, "अरे, यह तो गर्ल्स स्कूल वाली यूनिफॉर्म है... यह कहाँ आ गई?"
शगुन ने सुन कर अनसुना कर दिया. उसका दिल धड़क रहा था. फिर उसने वह सब कहा जो उसने महीनों से सोचा था. “स्कूल के नियमों से लेकर घर की बातचीत तक. उसकी आवाज़ शुरू में काँपी, फिर मजबूत हो गई.”
जब वह बोलकर बैठी, तो सन्नाटा था. फिर एक वरिष्ठ शिक्षक ने ताली बजाई. फिर कुछ और तालियाँ बजीं.
उसे पुरस्कार नहीं मिला. पर जब वह नीचे उतरी, तो दो लड़कियों ने उसके पास आकर कहा, "तुम बहुत हिम्मती हो. अगली बार हम भी भाग लेंगे."
"एक कॉलेज स्टूडेंट मिला, उसने कहा, "मेरी बहन भी खूब सवाल करती है। आज मैंने समझा, उन्हें दबाना नहीं, सुनना चाहिए।"
शगुन को लगा, यही तो है, धीरे-धीरे बदलाव.
शाम को घर लौटते हुए उसका कदम हल्के थे. रास्ते में उसे एक पोस्टर दिखा, "लड़कियों के लिए साइकिल प्रशिक्षण शिविर". उसने मन ही मन सोच लिया. अगला लक्ष्य.
उस रात शगुन ने अपनी डायरी लिखी-
"आज मैंने अपनी आवाज़ को पहली बार सुना. यह परफेक्ट से बहुत कम थी, लेकिन मजबूत थी, और मेरी थी.
घर लौटी तो चाची ने चाय के लिए पूछा. माँ ने पूछा, ‘भूख लग आयी होगी?’. चाचा ने पूछा, 'प्रोजेक्ट हो गया?' मैंने कहा, 'हाँ, हो गया.'
उन्हें नहीं पता कि प्रोजेक्ट क्या है? उन्हें शायद पता भी न चले. पर मुझे पता है.
मैं अब वह नहीं, जो सिर्फ सवाल पूछती थी. मैं वह बन रही हूँ जो उन सवालों के जवाब तलाशती हूँ, आहिस्ता से, बिना किसी शोर के.
चाचा आज रिमोट तलाश रहे थे. मैंने चुपचाप सोफ़े के नीचे से निकालकर दिया. उन्होंने कहा, देखो, लड़कियाँ छुपी हुई चीज़ें तलाश देती हैं!'
मैंने मन ही मन सोचा, 'वे खोई हुई आवाज़ भी ढूँढ लेती हैं.'
यह मेरा सूक्ष्म प्रतिरोध था. आज से यही मेरी भाषा होगी.
आज मैंने इस भाषा का पहला वाक्य बोल दिया है."
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