@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: पहियों पर आज़ादी

रविवार, 18 जनवरी 2026

पहियों पर आज़ादी

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
साइकिल सीख लेने से शगुन का दायरा बढ़ गया. अब वह स्कूल और बाज़ार के साथ शहर की उन सड़कों पर भी जा सकती थी जहाँ लड़कियाँ अकेली कम दिखती थीं. लेकिन वह यह भी जानती थी कि हर आज़ादी की कीमत चुकानी पड़ती है.

एक शाम चाय पर चाची ने माँ से कहा, “भाभी, शगुन को थोड़ा रोको... लोग क्या कहेंगे? वह इतनी दूर निकल जाती है.”

माँ ने हल्के से कहा, “पढ़ाई में तो अव्वल है, और अब तो खुद ही सब संभाल लेती है.”

पर चाचा ने अखबार नीचे रखते हुए स्पष्ट कह दिया, “अब बस भाभी, आप तो जानती हैं. लड़कियों के अकेले कहीं जाने के नतीजे क्या होते हैं. समय रहते संभल जाना चाहिए.”

शगुन मनोविज्ञान के अध्ययन से जानने लगी थी कि “सीमाएँ तोड़ने के लिए पहले धैर्य से सीमाओं को समझना जरूरी है.” उसने सोच लिया कि वह चाचा को विश्वास दिलाएगी कि साइकिल समय बचाती है, पढ़ाई के लिए अधिक समय मिलता है. पर पहले उसे साबित करना था कि यह आज़ादी सुरक्षित और सार्थक है.

वह तहसील पुस्तकालय में युवा लेखिका, नीरजा शर्मा, की वार्ता सुनने जाना चाहती थी. वहाँ पहले आटोरिक्शा से जा चुकी थी. इस बार उसने साइकिल से वहाँ जाना तय किया. वार्ता समकालीन स्त्री समस्याओं पर थी, ”स्त्रियों की आवाज, स्त्रियों की सड़कें.” शगुन वार्ता के दिन बिना किसी को बताए पुस्तकालय गई. रास्ते में उसे सुनने को भी मिला, “देखो, अकेली लड़की साइकिल पर!” शगुन ने उसे अनसुना कर दिया. तब उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. उसने तेजी से पैडल चलाए, जैसे उसका डर उसे आगे धकेल रहा हो.

वार्ता में का सार था कि, ”स्त्रियाँ अक्सर समाज से पहले अपनी सीमाएँ खुद बना लेती हैं. हम स्त्रियाँ सोचने लगती हैं कि यह रास्ता हमारे लिए नहीं है, पर सच यह नहीं. सही में हम कदम उठाने से डरती हैं. यह पहला कदम ही सबसे कठिन होता है. बाद का रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाता है.”

शगुन ने सोचा, ”क्या मैं भी अपनी सीमाएँ खुद बना रही हूँ? यदि ऐसा है भी तो मैंने आज यहाँ आकर एक सीमा तोड़ी है.

वह घर लौटी, तब सूरज ढल चुका था. चाचा दरवाज़े पर ही थे. शगुन को देख उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया. “तू कहाँ गई थी? किसके साथ गयी थी? आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.” वे ऊँची आवाज में बोले.

सुन कर वह बिलकुल नहीं घबराई, वह जानती थी कि किसी न किसी दिन उसे ऐसे सवालों का सामना करना पड़ेगा. शगुन ने पहली बार स्पष्ट और धीमे स्वर में कहा, “ चाचाजी, भाई यहाँ नहीं है, और मैंने कोई गलत काम नहीं किया. मैं पुस्तकालय गई थी.

“चाची और माँ चुप रहीं. माँ की आँखों में चिंता दिखी, पर उन्होंने संयम रखा और अपने होंठ बन्द रखे.

रात में, जब सब सो चुके तब मम्मा शगुन के कमरे में आई. “तेरी हिम्मत अच्छी है... पर चाचा का डर भी ठीक है. बदनामी होते देर नहीं लगती, बेटी.”

शगुन ने माँ की आँखों में देख कर गंभीरता से कहा, ”माँ, डर हमेशा रहेगा. पर डर के आगे जीना सीखना होगा. वरना जिंदगी सिर्फ चारदीवारी में सिमट जाएगी.” मम्मा ने और कुछ नहीं कहा, बस उसके सिर पर हाथ रखा. यह उनका अनकहा, स्नेहासिक्त मौन समर्थन था. यह शगुन की जीत थी, छोटी थी, मगर ठोस थी.

उस रात शगुन अपनी डायरी लिखने बैठी, पर मन न लगा. उसके मन में चाचा का वह वाक्य गूंज रहा था, “आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.”

डायरी के स्थान पर वह आयुष को पत्र लिखने बैठ गयी. उसने लिखा,

प्रिय भाई, आयुष¡ तुम्हें बहुत प्यार.

तुमने एनसीसी कैम्प में “उत्कृष्ट कैडेट” का खिताब प्राप्त किया, तुम्हें बहुत बहुत मुबारक. 

मैंने भी हाल ही में एक “उपलब्धि” हासिल की है, साइकिल चलाना सीख लिया है. अब मैं स्कूल और बाज़ार साइकिल से जाती हूँ. कल मैं तहसील पुस्तकालय गई. वहाँ वार्ता में एक लेखिका ने कहा, ”सीमाएँ अक्सर हमारे मन में होती हैं, बाहर नहीं.”

तुम्हें याद है, तुमने कहा था, “हॉस्टल में लड़कियों के बारे में बात नहीं होती।” मैं यह बात तब नहीं समझी थी। अब समझ रही हूँ. शायद तुम भी एक ऐसी ही दुनिया में रहते हो, जहाँ कुछ बातें “नहीं” होतीं, कुछ भाव “नहीं” दिखाए जाते.

चाचा कहते हैं, “लड़कियाँ अकेले बाहर नहीं जानी चाहिए. तुमने भी शायद माँ से यही कहा था? मैं जानती हूँ, तुम चिंतित हो, यह चिंता नहीं तुम्हारा प्यार था. पर कभी तुमने सोचा, यह चिंता हमें सुरक्षित रखती है या छोटा बनाती है?

तुम्हारे कैंप में जो कठोर अनुशासन सिखाया जाता है, क्या वह तुम्हें अन्दर से भी मजबूत बना रहा है? या सिर्फ बाहर से? इस सवाल का कोई जवाब देने की ज़रूरत नहीं. बस इतना जान लो, मैं सुरक्षित हूँ, और थोड़ी आज़ाद भी. शायद एक दिन तुम भी अपने हॉस्टल की उन “न कही जाने वाली बातों” के बारे में कुछ बताओगे।
                                                                                                                              तुम्हारी बहन,

                                                                                                                                  शगुन

उसने पत्र लिख कर तह किया और लिफाफे में बंद करके गोंद से चिपका दिया. सुबह स्कूल जाते समय ही वह पोस्ट ऑफिस से टिकट ले कर चिपकाकर इसे डाक में छोड़ देगी.

इसके बाद उसने डायरी लिखी.

“आज मैंने साइकिल पर पहली बार इतनी दूर तय की. रास्ते में डर भी लगा, दिल तेजी से धड़कता रहा. पर आवाज़ नहीं दबी. पुस्तकालय में बैठकर लगा जैसे मैंने अपने लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल लिया है.

घर में लड़ाई हुई, पर मैं हारी नहीं. माँ ने चुपचाप मेरा साथ दिया, शायद यही “सूक्ष्म जीत” है. उनका हाथ मेरे सिर पर था, और उसमें एक आशीर्वाद था जो शब्दों से बड़ा था.

अब मैं जानती हूँ, पहिये सिर्फ साइकिल के नहीं, मन के भी होते हैं. और एक बार घूमने लगें, तो रुकते नहीं.

मैंने आयुष को भी पत्र लिखा है. शायद वह मेरी बात को समझ सके. हो सकता है वह न भी समझे. पर उसने जब मुझे रोके जाने की बात कही थी, तो मुझे उस तक अपनी बात भी जरूर पहुँचानी चाहिए थी. मैंने पहुँचा दी है.

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