@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अदृश्य दरारें

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अदृश्य दरारें

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
एनसीसी कैंप से मिले "उत्कृष्ट कैडेट" के प्रमाणपत्र ने आयुष को गर्व से भर दिया. उसे अपने बैग में लिए जब उसने होस्टल में प्रवेश किया तो लग रहा था, जैसे वह अभी भी परेड ग्राउंड पर हो. उसकी चाल सीधी-सतर और मजबूत थी, कंधे सख्त और निगाहें तेज, जैसे अपने लक्ष्य को बेध देंगी. अपने रूम पर पहुँच कर उसने प्रमाणपत्र को दीवार पर इस तरह टांगा कि कमरे में आने वाले हर व्यक्ति की निगाह सबसे पहले उस पर पड़े. वह हर वक्त उसे याद दिलाता रहे कि उसके सभी फैसले सही थे. कैंप में मिले इस खिताब ने उसकी दुनिया को बदल दिया था.

राजन जैसे दोस्तों ने उसकी पीठ थपथपाई, "अब तुम असली मर्द हो, यार!" आयुष को लगा ये तारीफ़ें बेहतर महसूस कराती, लेकिन फिर उसके भीतर गूंजकर कहीं खो जाती. उसके भीतर कहीं एक खाली जगह थी, जहाँ पहले हँसी, डर और गुस्सा रहते थे. अब वे सब वहाँ नहीं थे, सिर्फ गूंज बची थी."

रात सोते के पहले जब वह उनींदा होता, उसे अक्सर एनसीसी कैंप का वह कमजोर कैडेट दिखाई देता जो धूप में खड़ा था, जिसका चेहरा पसीने से सराबोर था. फिर वह चेहरा बदलने लगता. वह कभी सिद्धार्थ, कभी शगुन और कभी-कभी खुद उसके चेहरे में बदल जाता. आयुष की नींद टूटती वह हाँफ रहा होता और उसका बिस्तर पसीने से भीगा होता. वह खुद से सवाल करता. फिर खुद ही जवाब देता,

"कच्ची नींद है, ऐसे में दिमाग पता नहीं क्या-क्या सोचने लगता है." वह फिर से सोने की कोशिश करता. पर देर तक नींद नहीं आती.

एक दिन राजन ने किसी पुरानी मजाकिया घटना का जिक्र कर रहा था. बात हँसने की थी आयुष को हँसी आयी भी. लेकिन उसके मुहँ से हँसी के स्थान पर खी-खी आवाज निकली, जैसे उसे खाँसी आयी हो.

"तेरी हँसी को क्या हो गया? वे ठहाके कहाँ चले गए यार?" राजन ने पूछा.

"हँसने से क्या मिलता है?" आयुष ने कठोर स्वर में कहा, "कुछ सार्थक होता है क्या?" राजन चुप रह गया.

आयुष ने जवाब तो दे दिया था पर खुद हैरान था. वह अकेले में आईने के सामने खड़ा हुआ और हँसने की कोशिश की. उसे आईने में एक विचित्र, बेजान और अजनबी चेहरा दिखाई दिया. वह उसका अपना प्रतिबिंब तो नहीं था. वह देख नहीं सका और उसने मुहँ फेर लिया.

एक दिन घर से माँ का फोन आया, उसके हाल पूछने के बाद उत्साह से बताने लगी. "शगुन ने साइकिल चलाना सीख लिया है. वह उसी से स्कूल जाती है, बाज़ार लो सामान ले आती है."

सुन कर आयुष को अच्छा नहीं लगा. उसने कहा, "माँ, उसका अकेले बाहर. यूँ डोलना ठीक नहीं. उसे रोको."

फोन की दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया. फिर माँ बोली, "ठीक है, बेटा."

फोन कटने पर आयुष मोबाइल को घूरते हुए सोचता रह गया. “शगुन के साइकिल सीख लेने की बात उसे अच्छी क्यों नहीं लगी?” फिर उस को लगा, उसकी यह सोच उसे कमजोर बना देगी, उसने खुद को डाँटा, “कमज़ोर मत बन. औरतें अकेले कभी सुरक्षित नहीं रह सकतीं, उन्हें संरक्षण चाहिए ही”; यही सही है.

फिर बोर्डिंग स्कूल में एक नया लड़का विजय किसी दूसरे बोर्डिंग से आया. वह एनसीसी कैंप में भी था. एक शाम वह आयुष के कमरे में आया. उससे बातचीत में कहने लगा.

"तुम्हें पता है, कैंप में तुमने जो किया, वह ताकत नहीं थी, तुम्हारा डर था. तुमने उसकी मदद नहीं की क्योंकि तुम्हें डर था कि अगर एक बार दया दिखाई, तो तुम्हारा 'मर्द' वाला मुखौटा उतर जाएगा... और तुम फिर वही पुराने वाले आयुष बन जाओगे जो रो सकता था."

सुनते ही आयुष का खून खौल उठा. वह विजय को धक्का देकर बोला, "बाहर निकल जा!"
विजय चला गया, पर उसका वाक्य कमरे में लटकता रह गया. वह वाक्य सारी रात आयुष के कानों में गूंजता रहा, "डर था... डर था..." उसने देखा, उसके हाथों में कंपन हो रहा था. वह सोचता रह गया. “क्या वह वास्तव में डर रहा था?”

तभी एक दिन आयुष सुबह की दौड़ में एक मिनट देरी से पहुँचा. सब उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे. एक जूनियर कैडेट ने हिम्मत करके कहा, "सर, आप तो कभी देर नहीं करते?"

आयुष का दिमाग सन्न हो गया. फिर अचानक वह चिल्ला उठा,

"छोटी सी बात पर टोकना ज़रूरी है क्या? अपना काम करो!"

सब चुप रह गए, जैसे हवा जम गई. आयुष ने दौड़ना शुरू किया, वह तेज दौड़ा, और तेज... और तेज, जैसे वह नहीं, उसका गुस्सा दौड़ रहा हो. उस दिन वह रिकॉर्ड तोड़ दौड़ा. पर जब रुका, तो साँस फूल रही थी, दिल तेजी से धड़क रहा था और आँखों के आगे अँधेरा था. उसे पहली बार अपने शरीर की सीमा का एहसास हुआ, लेकिन मन की सीमा अभी दूर थी.

उस रात आयुष फिर आईने के सामने खड़ा था. उसने गौर से देखा, उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे थे, जबड़े की मांसपेशियाँ तनी हुईं थीं और होंठ सख्त.

उसने अपने प्रतिबिंब से पूछा, "तुम ठीक हो?"

प्रतिबिंब ने जवाब नहीं दिया.

"तुम मजबूत हो?"

फिर कोई जवाब नहीं.

आयुष ने थके स्वर में पूछा, "पर... क्यों? तुम जवाब क्यों नहीं देते?"

उसका प्रतिबिंब फिर भी चुप रहा.

आयुष ने अपना माथा शीशे पर टिका दिया. शीशा ठंडा था, वह ठंडक जैसे उसके सिर में घुसती जा रही थी. उसने अपना माथा शीशे से हटा लिया.

रात को जब उसने बिस्तर पर लेटा, उसे रूम की खिड़की से चाँद दिखाई दिया. लेकिन पूरा नहीं. वह टूटा हुआ था, आधा बादलों से आधा ढका हुआ?

उसने उधर से अपनी आँखें फेर लीं.

सुबह उसे सामने दीवार पर टंगा प्रमाणपत्र दिखाई दिया. उसे वह थोड़ा तिरछा लगा. आयुष ने सोचा वह उसे ठीक करेगा. लेकिन फिर मन न हुआ. कई दिन तक उसने उसे ठीक करने की जहमत नहीं उठाई?

आयुष के भीतर, अदृश्य दरारें फैलने लगी थीं, चुपचाप, निरंतर. वह उन्हें देखने को तैयार नहीं था. उसके बजाय, वह और ज़ोर से दौड़ने, और कठोर बनने की तैयारी कर रहा था.

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