लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
जब आयुष प्राथमिक विद्यालय की अंतिम कक्षा में था तभी अनिल चाचा उसे नवोदय विद्यालय में प्रवेश की तैयारी करा रहे थे. प्रवेश के लिए आवेदन किया और उसे वहाँ प्रवेश मिल गया. यह एक बोर्डिंग स्कूल था. उसके वहाँ जाने के पहले मम्मा ने उसके लिए बेसन के लड्डू और मठरियाँ बनाईं उन्हें नए एयरटाइट डब्बे मंगवा कर उनमें पैक किया. उसके सूटकेस में हर चीज सावधानी से रखी गई. कपड़े, किताबें और भी बहुत कुछ. पापा ने सभी दस्तावेज अच्छी तरह जाँच कर रखे. मम्मा-पापा दोनों उसे बोर्डिंग स्कूल तक छोड़ कर गए शगुन और अनिल चाचा उन्हें स्टेशन छोड़ने आए. ट्रेन में चढ़ने के बाद वह अपनी सीट पर खिड़की के पास जा बैठा. ट्रेन चलने तक खिड़की से बाहर झाँकता रहा. शगुन चुप थी लेकिन एकटक उसे देखे जा रही थी, जैसे सोच रही हो कि आयुष नहीं उसका बचपन जा रहा है. अनिल चाचा ने ट्रेन में चढ़ने के पहले आयुष के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, "बेटा, बोर्डिंग स्कूल से तुम्हें मर्द बन कर निकलना है."
जब ट्रेन ने रवाना होने की सीटी दी तो शगुन ने धीमे से उसे कहा, “आयुष वहाँ से मुझे पत्र लिखना.
"हाँ, जरूर लिखूंगा", आयुष ने कहा. तभी ट्रेन चल दी. वह शगुन और चाचा की ओर तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक कि वे उसकी नजरों से ओझल न हो गए.
आयुष को बोर्डिंग स्कूल छोड़ कर माता-पिता वापस घर पहुँचे. शगुन ने दरवाजा खोला और माँ के हाथ से बैग ले लिया. सामान रखने के बाद माँ ने शगुन की ओर देखा, और हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया और बोली, "अब आयुष दूर है, उसकी याद आएगी. अब तुम्हें भी समझदार बनना होगा. घर के काम-काज में तुम्हारी ज्यादा हिस्सेदारी रहेगी. पर मैं धीरे-धीरे सब सिखा दूँगी."
अनिल चाचा ने सहमति में सिर हिलाया, "बिल्कुल सही. लड़कियों को घर की जिम्मेदारियाँ सीखनी ही चाहिए. आयुष को तो बाहर की दुनिया का अनुभव करना है."
शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने महसूस किया कि अब उसकी अपनी भूमिका भी बदल रही थी. वह "घर की बड़ी बेटी" हो गयी थी. एक ऐसा अलंकरण जिसमें आज़ादी नहीं, जिम्मेदारियों का बोझ था.
बोर्डिंग स्कूल पूरी तरह ‘मर्दों की दुनिया था. वहाँ कहीं लड़कियाँ, स्त्रियाँ नहीं थीं, न शिक्षक, न रसोइया, न और कोई. उनके न होने पर यहाँ गर्व किया जाता था, मानो स्त्रियाँ तपस्या भंग कर डालने वाली व्यवधान हों. कुछ दिन बाद ही आयुष ने महसूस किया कि स्त्रियों का यह अभाव बहुत भारी था.
रात दस बजे हॉस्टल का वार्डन लाइट बंद करके चला जाता था. उसके बाद आवाज़ें ज़ोर पकड़ने लगतीं थी. छात्रों के बीच "दुनिया" पर चर्चा होने लगती. ऐसी दुनिया जिससे आयुष यहाँ आने तक पूरी तरह अनजान था.
"अरे यार, तुझे मेरे दोस्त अमित की बहन का फोटो दिखाता हूँ?" राजन ने चारपाई पर पलटते हुए कहा, “क्या क्लासिक ब्यूटी है."
"ब्यूटी क्या होती है, असली देखी है कभी?" विजय ने कहा" फिल्मों हीरोइनें ही तो ब्यूटी हैं."
आयुष चुपचाप लेटा सब सुन रहा था. उसके लिए "लड़की" शब्द अब तीन हिस्सों में बंट गया था.
एक, स्कूल की ऊँची दीवारों से दूर वाली एक अमूर्त अवधारणा. जिसकी भाषा उसे नहीं आती थी.
दो, होस्टल की अंधेरी कोरिडोरों और शौचालयों की दीवारों पर लिखे गंदे किस्से और फोन नंबर. जिनकी लड़की एक रहस्य थी, एक पाप, एक गुप्त कोड.
तीन, उसकी बहन शगुन, जिसकी पीठ पर बैठ वह घोड़ा-घोड़ा खेलता था. पर अब उसकी घर की यादें पुराने एलबम की तस्वीर जैसी फीकी पड़ रही थी. उनके बीच का अंतिम सार्थक बात कब हुई थी? शायद उस दिन जब उसने शगुन की गुड़िया लौटाई थी. उसके बाद केवल गर्मियों की छुट्टियों की औपचारिक बातें ही रह गई थीं. अब वह सोलह की है. वह कैसी होगी? उसे कुछ भी पता नहीं था.
"सुनो आयुष," राजन ने रोबदार अंदाज में कहा, "तूने कभी किसी लड़की से बात की है? असली वाली से?"
सवाल सुनकर आयुष का दिमाग़ खाली हो गया. "बात?" उसने कहा, "मेरी... बहन से मैंने खूब बातें की हैं."
कमरे में एकाएक ठहाका फूट पड़ा. "अरे यार, बहन नहीं! बहन तो परिवार वाली होती है. असली लड़की. जैसे किसी दोस्त की बहन. या... कोई और."
आयुष के पास कोई जवाब नहीं था. उसके पास "असली" का कोई अनुभव नहीं था. उसकी पूरी जानकारी सुनी सुनाई थी. फिल्मी गानों, दोस्तों की डींगों और दीवारों पर लिखे शब्दों से मिली हुई. एक दिन विजय ने अपने फोन पर एक फोटो दिखाई, "देखो, मेरे बड़े भाई की गर्लफ्रेंड."
लड़कों का झुंड उस छोटी सी स्क्रीन के इर्द-गिर्द जमा हो गया. आयुष भी झाँका. तस्वीर में एक लड़की बिलकुल फेशनेबल कपड़ों में पेड़ के सहारे खड़ी थी.
"वाह! क्या फिगर है!"
"ऐसी गर्लफ्रेंड मिले तो जिंदगी बन जाए!"
आयुष ने ध्यान से देखा. लड़की के चेहरे पर एक भाव था, शायद खुशी का. पर झुंड की टिप्पणियों ने उस भाव को नष्ट कर दिया. वह तस्वीर अब एक "फिगर" बन गई थी. एक मापदंड. किशोर बच्चों की गोसिप्स का विषय.
रात को, जब बातें शांत हो गईं, आयुष ने अपनी आँखें बंद कीं. उसे शगुन याद आई. उसे याद आया कि कैसे उसने चाचा के जाने के बाद उसकी गुड़िया उसे लौटा दी थी, और कैसे अगले दिन उससे दूरी बना ली थी. अगर शगुन की तस्वीर किसी लड़के के फोन में होती तो? क्या वह भी ऐसी ही टिप्पणियों का विषय बनती?
एक अजीब सी ग्लानि ने उसे घेर लिया. उसने सोचा, "हम लड़कियों के बारे में कुछ नहीं जानते. बस, बातें बनाते हैं. और ऐसे ही एक काल्पनिक दुनिया गढ़ लेते हैं."
उसकी यह सोच अकेलेपन में दब गई. अगली सुबह दर्पण के सामने यूनिफॉर्म में खड़े आयुष ने अपने कंधे सीधे किए। शीशे में वह खुद को नहीं, अपनी नई भूमिका को देख रहा था. एक ऐसी भूमिका जिसमें अभिनेता की खुद की आवाज़ दब रही थी। उसकी दुनिया में लड़कियाँ केवल तस्वीरें, किस्सों और दीवारों पर लिखे नंबर थीं। वह सोच रहा था की जेलें भी स्कूल और होस्टल जैसी ही होती होंगी. आयुष को फिलहाल उसी हवा में सांस लेनी थी.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें