@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: पाठ

रविवार, 11 जनवरी 2026

पाठ

 लघुकथा  :  दिनेशराय द्वि्वेदी

ट्रेन की खिड़की से बाहर धुँधले उजाले में खेत-पेड़ गुजर रहे थे. आयुष की नजर उन पर थी, पर दिख कुछ नहीं रहा था. आँखों के सामने शगुन का चेहरा था, उस आखिरी रात का, जब उसने पूछा था, "क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुम खुद को खो रहे हो?"

सवाल अब भी कानों में सरसरा रहा था. उसने जवाब नहीं दिया था. बस चिल्ला दिया था, और चिल्लाने के बाद की चुप्पी सीने पर पत्थर-सी पड़ी थी.

ट्रेन रुकी. बोर्डिंग स्कूल का स्टेशन था. प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही एक गंध ने घेर लिया; पसीना, फिनाइल, पुरानी किताबों की गंध. हॉस्टल की गंध. एक अजीब सी राहत मिली. यहाँ सब स्पष्ट था. नियम, पदानुक्रम, मजाक. यहाँ शगुन जैसे सवाल नहीं थे. यहाँ सब कुछ सतह पर था, और सतह पर ही निपट जाता था.

हॉस्टल के कमरे में राजन ने उसका स्वागत एक गाली से किया. आयुष बेमन से मुस्कुरा दिया. यह रस्म थी. विजय ने बैग की ओर देखा, "घर से मिठाई?"

"कुछ खास नहीं," आयुष ने कहा. बैग में माँ के हाथ के लड्डू थे, पर उन्हें निकालना अब कमजोरी लगता.

शाम को डिनर हॉल में उसने एक नया चेहरा देखा; नौवीं कक्षा का पतला-दुबला लड़का, समर.

"अरे देखो, नया 'कुमारी' आ गया है!" राजन ने ऊँची आवाज़ में कहा.

"क्यों भई, तेरा नाम तो लड़कियों जैसा है," विजय ने कहा, "कविता पढ़ता होगा न?"

समर ने सिर उठाकर देखा, फिर नीचे झुक गया. उसकी चुप्पी और भड़काने वाली थी.

उस रात के बाद समर "सिस्सी" बन गया. धीरे चलना, शर्माना, वगैरा; उसकी हर छोटी हरकत पर टिप्पणी होती. आयुष देखता रहा.

यह इस सत्र का पहला पाठ था: स्त्रीलिंग विशेषताएँ उस पर चस्पा कर दी गईं. समर का "इलाज" शुरू हुआ. उसे जबरन क्रिकेट खिलाया गया, गालियाँ रटाई गईं.

एक दिन लाइब्रेरी में आयुष ने समर को कविता की किताब छुपाते देखा. नजरें मिलीं. समर की आँखों में सवाल था; ‘तुम क्यों नहीं कुछ कहते?’ आयुष ने तुरंत नजरें फेर लीं. उसकी चुप्पी एक सुरक्षा-दीवार थी.

हफ्ते बीते. बातें गहरी और विकृत होती गई. अब सिर्फ हीरोइनें नहीं, सोशल मीडिया की अनजान लड़कियों के प्रोफाइल तोड़े जाते. "देखो इसका नया डीपी. क्या रेटिंग दोगे?"

लड़के स्क्रीन के इर्द-गिर्द झुंड बना लेते. लड़की का चेहरा, उसकी पोस्ट; सब एक कोड की तरह तोड़ा जाता. उसकी इच्छा, व्यक्तित्व सब गायब. वह शारीरिक अंगों का एक सेट बन जाती. जो सबसे "बोल्ड" टिप्पणी करता, वह नायक बन जाता. आयुष चुप रहता. उसकी चुप्पी असहमति नहीं, सहमति थी. यह दूसरा पाठ था: स्त्री एक वस्तु है, और उसका 'ज्ञान' ही पुरुषत्व की पूंजी है.

एक शाम "विशेष व्याख्यान" हुआ. एक बुजुर्ग शिक्षक बोले, "याद रखो, लड़कियाँ ध्यान भटकाने का सबसे बड़ा साधन हैं. प्रेम-प्रसंग मीठा जहर है. अच्छा लड़का वही है जिसका ध्यान केवल पढ़ाई, व्यायाम और खेल पर टिका रहे."

हॉल में सन्नाटा था. आयुष के मन में विचार कौंधा: अगर लड़कियाँ इतनी खतरनाक हैं... तो क्या यह स्त्री-विहीन दुनिया एक लाभ नहीं? हम बचाए गए हैं? यह विचार वीभत्स था, पर उसमें एक सच्चाई भी थी. यह तीसरा पाठ था: स्त्री एक बाहरी खतरा है. यह दुनिया हमारा 'सुरक्षित क्षेत्र' है.

इन पाठों के बीच आयुष ने एक और पाठ सीखा. हॉस्टल की महिला कर्मचारियों के प्रति. वे झाड़ू लगाती थीं, बर्तन साफ करती थीं. पर वे होते हुए भी अदृश्य थीं. लड़के उनसे आँख नहीं मिलाते थे, नाम नहीं जानते थे. उनका श्रम चाहिए था, उनकी मानवता, उनकी संवेदनाएँ नहीं. वे सिर्फ मशीन थी.

फिर वह रात आई. अँधेरे कमरे में केवल मोबाइल स्क्रीन की रोशनी थी. राजन ने एक वीभत्स वीडियो दिखाना शुरू किया. समर फुसफुसाया, "बंद करो... यह गलत है."

कमरे में सन्नाटा. फिर राजन हँसा, "अरे! हमारी 'कुमारी' को तो 'गलत' लगता है!" वह मुड़ा, "अरे आयुष, तेरी बहन है न? कभी उसकी सहेली की फोटो दिखाई है?"

प्रश्न बिजली-सा गुजरा. आयुष के मन में दो छवियाँ टकराईं: उसकी सगी बहन शगुन, और इस कमरे की भाषा की "बहन". एक वस्तु, एक मजाक.

सब की नजरें उस पर थीं. यह परीक्षा थी. शगुन का चेहरा आँखों के सामने तैरा. “तुम खुद को खो रहे हो?”

आयुष ने एक सेकंड के लिए आँखें बंद कीं. जब खोलीं, तो चेहरे पर कोई भाव नहीं था. एक खाली मुस्कुराहट होंठों पर चिपक गई. उसकी आवाज़ सपाट निकली:

"अरे, वो’ वो बहुत साधारण है. बस पढ़ाई में लगी रहती है. कोई फोटो नहीं."

उसने जानबूझकर उसे 'उबाऊ' बना दिया. इस एक झूठ में, आयुष ने हॉस्टल के मूल्यों को अपने सबसे पुराने रिश्ते से ऊपर रख दिया.

कमरे में तालियाँ बजीं. आयुष ने इम्तिहान 'पास' कर लिया था. उसकी जगह सुरक्षित हो गई.

रात को सपना आया. शगुन धुंधली परछाई सी खड़ी थी, "आयुष, तुम कहाँ खो गए?"

आयुष जवाब देना चाहता था, पर मुहँ से वही गालियाँ निकलने लगीं. शगुन की छवि चीखती हुई गायब हो गई.

आयुष हाँफता हुआ जाग गया. कमरे में खर्राटे गूँज रहे थे. उसने अपने हाथ देखे. वही हाथ जिसने शगुन की गुड़िया थामी थी. आँखों में जलन उभरी. गले की पुरानी गाँठ फूल गई. एक सिसकी सीने से टकराकर ऊपर आई. उसने तकिए को जोर से पकड़ लिया. और फिर, बिना आवाज किए, तकिए में मुहँ दबाकर, उसने वह पहला और आखिरी आँसू रोया जो बारह साल की उम्र के बाद कभी नहीं आया था. शरीर एक झटके में काँपा, फिर शांत हो गया.

सुबह जब वह उठा, तो सकी आँखें सूखी और चेहरा पत्थर की तरह सख्त था. दर्पण के सामने यूनिफॉर्म के बटन लगाते हुए उसने अपनी ओर देखा. भीतर का वह लड़का, जिसने रात को आँसू बहाए थे, अब गायब था. उसकी जगह एक खोखला, सही ढंग से ढला हुआ खोल था, जो सभी पाठ याद कर चुका था.

उसने दर्पण से नजर हटा ली, और कमरे से बाहर कदम रख दिया. दिन का पहला पाठ शुरू होने वाला था.

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