@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: लिफाफे में भूचाल

सोमवार, 19 जनवरी 2026

लिफाफे में भूचाल

लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष की दिनचर्या सख्त यांत्रिक अनुशासन में बंध चुकी थी, बिना किसी गलती की गुंजाइश के. सुबह 5 बजे की व्हिशल बजने के पहले उठना और सही समय पर दौड़ व ड्रिल के लिए मैदान पर, लौटकर तैयार होना और समय पर सुबह की प्रेयर पर पहुँचना. उसके बाद क्लासें, ब्रेकफास्ट, फिर क्लासें, लंच और विश्राम, रेमेडियल क्लास, शाम को खेल का मैदान, शाम की प्रार्थना, डिनर, फिर होमवर्क व सेल्फ स्टडी, रात की नींद और सुबह फिर से 5 बजे की व्हिशल. उसे सोचने को भी समय नहीं था. पर हर रात उसे देर तक उसे नींद नहीं आती. आँखों के नीचे के गहरे घेरे इस गड़बड़ी को सार्वजनिक करने लगे थे. विजय कभी-कभी उसे गौर से देखता, पर कुछ नहीं कहता.

एक शाम, हॉस्टल के कॉमन रूम की मेज पर रखे डाक से आए लिफाफों में से एक की लिखावट को आयुष की निगाहों ने फौरन पहचाना, वह शगुन की थी. उसने लिफाफा उठाया, और चुपचाप अपने रूम में आ गया. किवाड़ बन्द कर उसने लिफाफा खोला और साँस रोक कर पत्र पढ़ने लगा.

पत्र के शब्द एक-एक करके उसकी आँखों के सामने से गुजरे; साइकिल, पुस्तकालय, लेखिका का व्याख्यान.

फिर वह पंक्ति आई, “यह चिंता नहीं, तुम्हारा प्यार था.”

आयुष ने देखा पत्र हिल रहा है. वह सोच में पड़ गया. आखिर उसके हाथ क्यों काँप रहे हैं? उसने अपनी रुकी हुई साँस को छोड़ा और दो तीन गहरी साँसें लीं. साँसे दुरुस्त होने पर पत्र फिर पढ़ने लगा.

आखिरी सवाल आया; “क्या यह अनुशासन तुम्हें भीतर से मजबूत बना रहा है?” पढ़ कर उसने पत्र को मेज पर पटक दिया. वह देर तक असमंजस में रहा. भीतर की मजबूती? फिर उसने अपने आप से कहा, वह मजबूत है बाहर से भी, और भीतर से भी. भीतर की मजबूती के बिना क्या बाहर की मजबूती आती है?

अब वह सोच रहा था कि इस पत्र का क्या करे? पहले मन किया कि वह पत्र को फाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दे. फिर विचार आया ... नहीं, यह भागना होगा. जवाब लिखना चाहिए, और शगुन को सब कुछ समझा देना चाहिए. पर कैसे? उसे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह लिखे क्या? आखिर विचार आया अभी कुछ मत करो. वह उठा और उसने पत्र को सूटकेस में सबसे नीचे दबा कर रख दिया. जैसे किसी राज को दफ्न कर दिया हो. उसने महसूस किया उसका गला सूख रहा है. उसने अपनी बोतल उठाई और एक साँस में उसे मुहँ के जरीए अपने पेट में उड़ेल लिया.

उस रात वह देर तक नहीं सो सका. उसने फिर वही सपना देखा; लेकिन इस बार साइकिल चला रही शगुन के पीछे वह दौड़ रहा था. साइकिल तेज थी, वह उसे पकड़ नहीं पा रहा था. वह थकने लगा. साइकिल के पहिए और तेज घूमने लगे. उसके कानों में एक आवाज गूंजी, “सीमाएँ मन में होती हैं...” उसकी नींद टूट गयी. वह हाँफ रहा था.

अगले दिन हॉस्टल के बरामदे में एक जूनियर छात्र तेजी से उसकी बगल से निकला, उसे हलका सा धक्का लगा, आयुष की किताबें गिर गयीं. आयुष उस छात्र की ओर देखने लगा. उसकी आँखों में गुस्सा नहीं आया. वह ठंडी निगाहों से उस छात्र को जाते देखता रहा. आगे जा कर बरामदे के साथ वह भी दाएँ मुड़ कर ओझल हो गया. सब सोच रहे थे; अब उस जूनियर लड़के की खैर नहीं. आयुष दौड़ेगा, लड़के को पकड़ेगा और फिर ... पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

सबकी अपेक्षा के विपरीत आयुष ने लड़के पर से अपनी निगाहें हटाईं. नीचे गिरी किताबों को देखा और झुककर उन्हें उठाने लगा. सब किताबें समेट, बिना एक शब्द मुहँ से निकाले वह आहिस्ता से अपने रूम की ओर बढ़ गया.

सब की निगाहें उस पर चिपकी हुई थी. विजय मुस्कुराए बिना नहीं रह सका. उसने अपने साथियों से कहा, “यह क्या हुआ यार? आज तो आयुष एक दम बदला-बदला लगा. बिलकुल एक इंसान की तरह.” आयुष के कानों तक भी यह आवाज पहुँची. एक पल को उसने मुड़ कर विजय की ओर देखा. लेकिन, बिना कोई जवाब दिए, वह आगे चल दिया. उसे लगा कि उसके कदम थोड़े भारी हो चले हैं.

अपने रूम में लौटकर आयुष ने शगुन का पत्र निकाला, फिर से पढ़ने लगा. पढ़ते हुए ही उसकी नजरें टेबल पर पड़ी कैंची से टकराईं. एक पल को उसके मन में आया; काट दो इसे, मिटा दो इन सवालों को. उसने कैंची उठाई... लेकिन फिर उसे वापस रख दिया. कैंची वहीं पड़ी रह गई. वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था.

उसने तय किया; वह शगुन को जवाब नहीं लिखेगा.

पर उसने एक और फैसला किया; वह अगली छुट्टियों में घर जाएगा. छुट्टियाँ बिताने नहीं, बल्कि शगुन से मिलने, उसे समझाने? शायद वह उसे समझा पाए. पर उसके मन के एक कोने में एक डर छुपा था. वह शगुन से ज्यादा बात ही न कर पाया तो... शगुन ने ही खुद उसे समझा दिया तो ...

उस रात आयुष ने डायरी निकाली. एक खाली पन्ना तलाशा और उस पर लिखा;

"पत्र आया, शगुन के सवाल मिले.

अभी जवाब तलाशना है.

शगुन की साइकिल चल पड़ी है, वह रुक नहीं रही है.

उसके मन के पहिए भी उसी की तरह दौड़ रहे हैं.

वह साइकिल को पकड़ेगा.

नहीं पकड़ पाया तो ... ...

वह आगे नहीं लिख पाया. उसने वह पन्ना मरोड़ा और दोनों हथेलियों के बीच घुमा कर गेंद सी बना दी. फिर उसे डस्टबिन में डाल दिया.

उसने सोने की कोशिश की. नहीं सो सका. कहीं दूर थाने में घंटे बजने लगे, टन .. टन .. टन .. वह गिनने लगा, 12 के बाद घंटे बजना बन्द हो गया. आधी रात गुजर चुकी थी. उसकी आँखों में नींद कहीं नहीं थी. वह उठा. डस्टबिन से उसने गुड़ी मुड़ी हुए पत्र को निकाला. उसे सीधा किया. हाथों से प्रेस कर के उसकी सिलवटें हटाने की कोशिश की और फिर फोल्ड करके अपनी डायरी के बीच रखा. डायरी को अपने तकिए के नीचे दबा कर सोने की कोशिश करने लगा.

खिड़की के बाहर, आज चाँद फिर टूटा हुआ दिखाई दे रहा था, टुकड़ा-टुकड़ा बादलों के बीच से झाँकता हुआ.

कोई टिप्पणी नहीं: