लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
गर्मियों की लंबी छुट्टियाँ आयुष के लिए एक अवांछित कैद बन गई थीं. बोर्डिंग स्कूल की व्यवस्थित दुनिया से निकलकर, उसे अपने ही घर में अजनबी जैसा महसूस हो रहा था. यहाँ कोई घंटी नहीं बजती थी, कोई यूनिफॉर्म नहीं थी, और न ही वह मर्दाना भाईचारा था, जहाँ हर बात का अर्थ सपाट होता था.
यहाँ सब कुछ गहरा और उलझा हुआ था. माँ की चिंताएँ घर-परिवार की थीं, और शगुन... वह अब और भी पढ़ी-लिखी और सवाल पूछने वाली हो गई थी. एक दिन उसने आयुष से पूछा, "तुम्हारे हॉस्टल में कितनी लड़कियाँ हैं?"
सवाल इतना सीधा और अप्रत्याशित था कि आयुष का दिमाग पल भर के लिए खाली हो गया. हॉस्टल की दीवारों पर लिखे नंबर और दोस्तों के मजाक उसकी आँखों के सामने तैर गए. "लड़कियाँ? वहाँ लड़कियाँ नहीं होतीं. सिर्फ... लड़के होते हैं." उसने अटकते हुए जवाब दिया.
"तो फिर लड़कियों के बारे में बात कैसे होती है?" शगुन ने पूछा, उसकी आँखों में एक जिज्ञासा थी जो आयुष को तीर सी चुभ गई.
"बात... नहीं होती," उसने जल्दी से कहा, और टीवी देखने लगा. उस रात उसे नींद नहीं आयी. शगुन के सवाल ने उसके अंदर बेचैनी पैदा कर दी थी, जैसे कोई पर्दा हिल गया हो.
छुट्टियाँ खत्म होने पर उसे राहत मिली. हॉस्टल लौटकर उसने गहरी साँस ली. यहाँ सब कुछ स्पष्ट था. पर यह स्पष्टता लंबे समय तक नहीं टिकी.
दिवाली के बाद, चाचा ने फोन पर खबर दी, "चाची वापस आ गई हैं. अब घर में रौनक रहेगी."
आयुष ने 'बहुत अच्छा' कहा, पर उसका दिल एक भारी पत्थर-सा हो गया. चाची भी. अब घर पर तीन औरतें होंगी. उसकी कल्पना में घर का वातावरण और भी दमघोंटू हो गया. चाय पीते हुए सलाह, कपड़ों पर टिप्पणियाँ, शगुन के उलझे हुए सवाल. एक ऐसी दुनिया जहाँ बोर्डिंग स्कूल वाली भाषा बेकार थी, और जहाँ वह हमेशा उलझन महसूस करने लगता था.
तभी उसकी नज़र नोटिस बोर्ड पर लगे एक पोस्टर पर पड़ी; "एनसीसी विंटर कैंप: अनुशासन, साहस, राष्ट्र सेवा का सुनहरा अवसर!"
यह अंधेरे में अचानक मिली रोशनी थी. कैंप. टेंट. दौड़. ड्रिल. सिर्फ लड़के. कोई औरतें नहीं. कोई उलझे सवाल नहीं. यह उसकी जानी-पहचानी दुनिया का विस्तार था, बल्कि उससे भी बेहतर ... स्वैच्छिक पलायन की राह.
उसने पिता को फोन किया, अपनी आवाज़ में उत्साह भरकर, "पापा, यह एनसीसी कैंप मेरे करियर के लिए बहुत अच्छा रहेगा. प्रमाणपत्र मिलेगा, एकता और अनुशासन सीखूँगा. मैं क्रिसमस पर घर नहीं आ पाऊँगा, यह मेरे भविष्य के लिए ज़रूरी है."
पिता ने सहमति दे दी. चाचा ने कहा, "शाबाश बेटा! जोश देखकर अच्छा लगा."
कैंप की कठोरता आयुष के लिए सान्त्वना भरी थी. यहाँ आदेश और पालन सब कुछ था. सुबह पाँच बजे की घंटी, दौड़, यूनिफॉर्म की शानदार सफाई, ड्रिल की तेज आवाज़ें. एनसीसी अधिकारी की गूंजती कड़क आवाज़, "तुम लड़के हो! नरम मत बनो! देश को अपने कंधों पर जिम्मेदारी लेने वाले सिपाही चाहिए, रोने-धोने वाले जवान नहीं!"
हर दिन शारीरिक थकान से खत्म होता, भरपूर मानसिक शांति मिलती. यहाँ कोई जटिलता नहीं थी. हर जगह ताकत थी. आज्ञापालन था. भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं था.
एक दिन एक जूनियर कैडेट को, जो ड्रिल में लगातार गलती कर रहा था, सबके सामने धूप में खड़ा रहने की सजा दी गयी. उसका चेहरा शर्म और थकान से लाल हो गया था. उसे देख कर आयुष को लड़के पर बिलकुल दया नहीं आयी, बल्कि तीव्र घृणा महसूस हुई. “इतना कमजोर बंदा? सबके सामने शर्मिंदा हो रहा है? वह यहाँ के लायक ही नहीं.” आयुष ने तभी अपने अंदर की आवाज सुनी: "मर्द बनना है, तो ऐसी कमजोरी कभी मत दिखाओ."
कैंप समाप्त हुआ. आयुष को 'उत्कृष्ट कैडेट' का प्रमाणपत्र मिला. वह लौटा तो उसकी चाल में एक नया दबदबा था, कंधे और सीधे थे, निगाहें सीधी और सधी आवाज. अब वह केवल बोर्डिंग स्कूल का सीनियर नहीं रह गया था; बल्कि एक प्रशिक्षित सिपाही था, जिसने स्वेच्छा से कठोरता सीखी और उसे आत्मसात कर लिया था.
हॉस्टल में उसकी वापसी पर एक छोटी सी पार्टी हुई. राजन ने कहा, "अब, हमारा आयुष असली मर्द है!" आयुष ने मुस्कुराकर उसकी पीठ थपथपाई, लेकिन यह मुस्कुराहट उसकी आँखों में नहीं थी. वहाँ एक शून्यता थी, जैसे भीतर सब कुछ व्यवस्थित होकर एक निर्जीव कक्ष में बंद कर दिया गया हो.
एक रात फिर वही पुराना नाटक दोहराया गया. सिद्धार्थ, वही कविता वाला लड़का, फिर से निशाने पर था. इस बार उसने किसी लड़की से फोन पर बात कर ली थी, यह, एक अक्षम्य पाप था.
आयुष अपनी किताब में डूबा था. चीखें सुनकर उसने सिर उठाया. सिद्धार्थ की आँखें, जो हमेशा की तरह मदद माँग रही थीं, उसकी आँखों से मिलीं. पहले की तरह उसे झटका लगा, पर यह झटका इस बार सिर्फ पल भर का विचलन था. उसने कोई भाव नहीं दिखाया. उसने धीरे से किताब का पन्ना पलटा, और पढ़ने में व्यस्त हो गया. उसके कानों में एनसीसी अधिकारी की आवाज़ गूँजी; "तुम लड़के हो! नरम मत बनो!"
उसके अंदर की सारी नरमी पत्थर हो गयी.
कमरा शोर से भर गया था, पर आयुष का ध्यान अपनी साँसों पर केंद्रित था; स्थिर, नियमित. जब सब शांत हो गया तो उसने देखा, सिद्धार्थ कोने में सिसक रहा था. आयुष के भीतर कोई हलचल नहीं हुई. बल्कि उसने संतोष महसूस किया, जैसे कोई कठिन परीक्षा पास कर ली हो.
बाद में शीशे के सामने खड़े होकर उसने अपना प्रतिबिंब देखा. यूनिफॉर्म पर एकदम सही क्रीज, बाल व्यवस्थित. चेहरे पर कोई रेखा, कोई उथल-पुथल नहीं. केवल एक शांत, नियंत्रित रिक्तता. एक परफेक्ट मर्द.
उसे शगुन का विचार आया. पर उसकी याद अब धुंधली थी, बहुत दूर से आते स्वर जैसी, जिसका उसकी मौजूदा हकीकत से कोई संबंध नहीं रह गया था. उसने सही रास्ता चुना था. उसने कमजोरी से पलायन किया था, और अब वह उस ताकत के केंद्र में था, जिसे वह जानता था.
उसने अपने कमरे की लाइट बंद कर दी, और बिना किसी विचार और स्वप्न के, एक गहरी, भारी नींद में डूब गया. उसका पलायन पूरा हो चुका था. अब केवल उसे एक नई, कड़ी हकीकत का सामना करना था, जिसका चुनाव उसने स्वयं किया था.
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