लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
स्कूल की आखिरी घंटी बजने वाली थी, शगुन की नज़र खिड़की से बाहर उड़ती एक चिड़िया पर टिकी थी, पर कान वैल्यू एजुकेशन की क्लास में प्रिंसिपल मैडम के शब्दों पर थे, उनकी आवाज़ में एक ऐसा आग्रह था जो सुझाव नहीं, बल्कि एक कठोर नियम लगता था.
"और याद रखना, लड़कियों, असली सुंदरता चेहरे पर नहीं, चरित्र में होती है. एक अच्छी लड़की की पहचान उसकी विनम्रता, उसका संयम और परिवार के प्रति त्याग है."
शगुन की उँगली अनायास ही अपनी नोटबुक पर खिसक गई, जहाँ उसने सुबह मनोविज्ञान की क्लास में एक शब्द नोट किया था: "सामाजिक अनुकूलन". उसकी परिभाषा याद आई: “व्यवहार को सामाजिक मानदंडों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया.” एक ठंडी सिहरन सी उसकी रीढ़ में दौड़ गयी. मैडम के शब्द अचानक एक प्रोसेस का हिस्सा लगने लगे, कोई शाश्वत सत्य नहीं. वह एक कुम्हार को प्रतिमाएँ गढ़ने के पहले मिट्टी को तैयार करने में लगा था, बस.
"खुश रहना सीखो," मैडम ने बोलना जारी रखा, "घर की खुशहाली तुम्हारे हाथ में है. एक चिड़चिड़ी, हर बात पर सवाल उठाने वाली लड़की पूरे वातावरण को दूषित कर देती है."
शगुन ने अपने आस-पास देखा. कई सिर गंभीरता से हिल रहे थे. उसने सोचा, क्या वे सब इस 'एक खास साँचे में ढाले जाने’ के प्रोसेस को महसूस नहीं कर पा रही थीं? या फिर, वे पहले ही साँचे में ढल चुकी थीं?
अगले दिन सुबह की असेंबली में, जब सब लड़कियाँ लाइन में खड़ी थीं. एक अलग तरह का पाठ शुरू हुआ. वाइस-प्रिंसिपल, जिनकी नज़रें हमेशा ही छात्राओं को स्कैन करती रहती थीं, अचानक प्रिया के सामने रुक गईं. उन्होंने उसकी स्कर्ट के किनारे को उँगलियों से पकड़कर खींचा.
"यह क्या है?" उनकी आवाज़ कर्कश थी, "स्कर्ट इतनी छोटी क्यों है? और यह ब्लाउज़... क्या यह तुम्हें टाइट नहीं लग रहा?"
प्रिया का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया. तमाम छात्राओं की नज़रें उस पर टिक गईं. मैडम ने सबकी तरफ देखा, यह सबक सब छात्राओं के लिए था.
"लड़कियों, तुम्हारा ध्यान पढ़ाई और संस्कारों पर होना चाहिए, न कि ऐसी चीज़ों पर जो अनुचित ध्यान आकर्षित करें. तुम्हारे शरीर की हर अभिव्यक्ति एक संदेश है. यह संदेश सही होना चाहिए."
उनके शब्द हवा में लटक गए. प्रिया अब सिकुड़ी हुई, अपने आप में समाई खड़ी थी. शगुन के मन में कल पढ़ा हुआ एक और शब्द उभरा” "वस्तुकरण". प्रिया का शरीर, उसकी पोशाक, एक समस्या बन गई थी. एक ऐसी वस्तु जिसका विश्लेषण, आलोचना और सार्वजनिक सुधार किया जा सकता था, ताकि वह देखने वालों को 'उचित संदेश’ दे. शगुन ने अपनी स्कर्ट को नीचे खींच लिया, यह एक स्वचालित, आत्म-सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया थी. डर का यह वायरस छूत की तरह फैल गया था.
घर पर चाची की वापसी नई ही थी. विवाह के बाद जब चाचा-चाची के बीच अनबन होने के कारण वह मायके चली गई थीं, अब धुंधली याद बन चुके थे. "मामला सुलझ गया," बस इतना ही कहा गया था, और चाची वापस आ गई थीं. शायद उन नियमों को मान कर, जिन्हें तोड़ना उनके लिए संभव नहीं था.
शाम को एक पारिवारिक समारोह था. माँ ने एक सुंदर, हल्की ज़री वाले सलवार-सूट को हाथ में लेकर वापस रख दिया. वही सूट जो शगुन को पसंद था.
"नहीं बेटा, यह वाला ज़रूरत से ज़्यादा आकर्षक है. तुम्हारी उम्र में सुंदर दिखना अच्छा है, पर 'बहुत' सुंदर दिखने को लोग गलत समझ सकते हैं. बेवजह लोग तुम्हें घूरेंगे. तुम्हारी पढ़ाई और समझदारी ही तुम्हारे लिए असली सुंदरता है."
तभी चाची चाय का कप हाथ में लिए कमरे में आईं. उन्होंने स्थिति भाँप ली और माँ के शब्दों पर मुहर लगा दी, "सही कहा भाभी ने. हम लड़कियों को खुद अपनी सीमाएँ तय करनी पड़ती हैं. वरना ... बाद में पछताना पड़ता है." उनकी आवाज़ के आखिरी शब्दों में थकान और विवशता झलकी, जिसे देख शगुन का दिल एक पल के लिए भारी हो गया. चाची ने यह पाठ शायद स्वयं जीकर सीखा था.
शगुन के भीतर एक तीखा प्रतिवाद उठा. तो क्या सुंदरता एक अपराध है? क्या डर हमारी नियति है? पर उसने कुछ नहीं कहा. उसके चेहरे पर उभरी इस कुंठा और क्रोध को माँ ने भाँप लिया.
माँ उसे खिड़की के पास ले गईं, धीमी आवाज में समझाने लगीं, "मैं समझती हूँ तुम्हें अच्छा नहीं लगा. पर देखो बेटा, आज फंक्शन है. सारे रिश्तेदार वहाँ रहेंगे. ऐसे मौकों पर माहौल खुशनुमा रहना चाहिए. तुम्हारी नाराजगी या जिद से बात बिगड़ सकती है. हम लड़कियों को थोड़ा सहना पड़ता है, ताकि सब की खुशी बनी रहे. तुम्हारी नाराजगी सिर्फ तुम्हारी नहीं रह जाती. उसका असर सब पर पड़ता है."
यह पाठ अब सिर्फ कपड़ों के बारे में नहीं था. यह उसकी खुद की भावनाओं के बारे में था. उसके क्रोध, उसकी इच्छा को दबाकर, दूसरों की सुविधा और 'शांति' को तरजीह देना. उसे सिखाया जा रहा था कि उसकी व्यक्तिगत भावनाएँ सामूहिक भावनात्मक जिम्मेदारी के आगे गौण हो गयी थी. यह आत्म-दमन का पाठ था.
शगुन ने चुपचाप सादा सूट पहन लिया. उसका मन उसके बैग में रखी मनोविज्ञान की किताब में था. किताब में ये सभी शब्द थे, 'सामाजिक अनुकूलन', 'वस्तुकरण', 'आंतरिक उत्पीड़न'. वे सिर्फ शब्द नहीं थे; वे चाबियाँ थीं, जो उसकी ज़िंदगी के बक्सों पर ताले लगा रही थीं.
पर इस ज्ञान ने शगुन को अकेलेपन की पीड़ा दी. इसे साझा करने के लिए उसके निकट कोई नहीं था. न प्रिया के साथ, न माँ के साथ, और न चाची के साथ था, जो खुद इसी व्यवस्था की पूर्व-छात्रा और अब सहायक-शिक्षिका बन चुकी थीं.
फंक्शन में जाने से पहले शगुन ने अपने बैग को देखा मनोविज्ञान की किताब वहीं थी. से छूकर उसे कुछ शान्ति मिली. वह जान गई थी कि ये नियम स्वाभाविक नहीं हैं, बनाए गए हैं. वह उन्हें तोड़ नहीं सकती थी. नहीं, अभी नहीं. अभी तो उसने बस उन्हें जानना शुरू किया था.
और पहला पाठ यही था: तुम्हारा शरीर तुम्हारा नहीं, तुम्हारी भावनाएँ तुम्हारी नहीं. दोनों पर नियंत्रण बाहरी है.
उसने सोचा, कल स्कूल में वह अपनी मनोविज्ञान की किताब फिर खोलेगी. शायद अगला अध्याय उसे कोई माकूल जवाब दे.
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