@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: दो राहें, दो निर्णय

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

दो राहें, दो निर्णय

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

सब शाम की चाय के लिए बैठे. चाय का आखिरी घूँट गले से नीचे उतार कर चाचा बोले, "अब फैसले का वक्त आ गया है. आयुष और शगुन के नतीजे अच्छे आए हैं. अब इन्हें आगे का रास्ता तय करना है."

माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू सँभाला. चाची चुपचाप बैठी थीं, पर उनकी आँखें शगुन पर टिकी थीं.

"पहली बात, हमारे शहर में इकलौता डिग्री कॉलेज है, शगुन उसमें प्रवेश ले, बी.ए. करे, डिग्री हाथ में आए, तब तक इसकी शादी की उम्र हो जाएगी. बी.ए. के आखिरी साल में हम रिश्ते भी देखने लगें."

शगुन दृढ़ता से बोली, "चाचा, यहाँ कॉलेज में आधे विषयों के भी लेक्चरर नहीं हैं. खास तौर पर मेरे मनोविज्ञान का तो कोई है ही नहीं. पढ़ाई में बहुत मुश्किल होगी. पढ़ाई का स्तर वैसा नहीं है जैसा मुझे चाहिए."

चाचा ने भौंहें सिकोड़ीं. "दूसरा रास्ता, तू खुद दिल्ली की जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के लिए इंटरनेट छान रही है."

शगुन ने सिर हिलाया. "जी, पर ...."

"पर कुछ नहीं!" चाचा का स्वर तीखा हुआ. "दिल्ली दूर है, बड़ा महानगर है और जेएनयू में बच्चे पढ़ाई कम और आंदोलन ज्यादा करते हैं. वहाँ पढ़ने वाले अधिकांश लड़के लड़की कम्युनिस्ट बन जाते हैं. वहाँ बात-बात पर राजनीति होती है. मेरे विचार में यह शगुन के लिए ठीक नहीं."

तभी माँ बोल उठी, "इतनी दूर... इतने बड़े शहर में अकेली लड़की, कैसे रहेगी, हलकान हो जाएगी? मैं तो वहाँ बिलकुल न भेजूंगी मेरी शगुन को."

चाची ने शब्दों को तौलते हुए धीरे से कहा, "तीसरा रास्ता बनस्थली विद्यापीठ है. मेरी भांजी वहाँ पढ़ी है. कहती है, वहाँ सिर्फ लड़कियाँ ही पढ़ती हैं, और अधिकांश स्टाफ भी स्त्रियों का है. पूरा कैंपस रेजिडेंशियल है, होस्टल के रूम बड़े-बड़े है और हर रूम में 2 से 4 लड़कियाँ रहती हैं. वहाँ घुड़सवारी और हवाई जहाज उड़ाना और दूसरी बहुत सारी चीजें भी सिखाते हैं."

“सुझाव तो यह भी ठीक है”, चाचा ने चाची की बात का समर्थन किया. “ ज्यादा दूर भी नहीं, बस ढाई सौ किलोमीटर है यहाँ से सीधी ट्रेन भी है.”

शगुन ने मन ही मन सोचा; बनस्थली उसकी पहली पसंद नहीं, पर जेएनयू की आज़ादी और उसके शहर रामगंजमंडी के स्थानीय कॉलेज के बीच यह एक संभव रास्ता था. कम से कम वहाँ की पढ़ाई तो अच्छी है.

“वैसे भी अंतिम निर्णय तो भाई साहब ही करेंगे. उन्होंने भी दोनों के लिए खासी मालूमात की है. सीमेंट फैक्ट्री में होने से उनके ताल्लुकात बहुत हैं. इस बारे में क्यों न हम रात को खाने के समय बात करें. तब भाई साहब भी साथ होंगे.” इतना कह कर चाचा आयुष की ओर मुड़े. "तेरा मामला सीधा है. तू साइंस मैथ्स लेगा. इंजीनियरिंग करेगा, फिर फौज में भी जा सकता है."

आयुष ने सिर झुकाकर हाँ भर दी. उसके स्वर में कोई उत्साह नहीं था, बस एक स्वीकार्यता थी. शगुन ने देखा; उसके भाई के हाथ मेज पर रखे थे, मुट्ठियाँ थोड़ी सिकुड़ी हुईं.

"भाई," शगुन ने धीरे से पूछा, "तुम्हें सच में साइंस पसंद है?"

आयुष ने ऊपर देखा. "पसंद-नापसंद से क्या फर्क पड़ता है? अच्छे लड़कों को साइंस ही लेना चाहिए." पर उसकी आँखों में एक खालीपन था, जैसे उसे अपने ही शब्दों पर यकीन न हो.

माँ शगुन से कहने लगी, "बनस्थली में संतरे तो मिलते होंगे न? यहाँ तो हमारे शहर के आसपास इतने बगीचे हैं कि कहीं से भी ताजा तुड़वा कर ले आओ.... तुझे विटामिन सी कहाँ से मिलेगा?"

शगुन मुस्कुराकर बोली, "मम्मा आप भी न, अभी से न जाने क्या सोचने लगीं. अभी पक्का तो होने दो, फिर सोच लेना.” उसने देखा माँ की आँखें थीं. "तेरा भाई बोर्डिंग लौटेगा... वहाँ कोई मोबाइल नहीं रख सकता. हफ्ते में एक बार ही बात हो पाएगी."

रात को पापा फैक्ट्री से देर से लौटे, उनसे सुबह चाय पर बात हो सकी. वे कहने लगे, "बनस्थली विद्यापीठ में प्रवेश के लिए परीक्षा देनी पड़ेगी, लेकिन मनोविज्ञान में कम बच्चे आवेदन करते हैं. यदि अंतिम तिथि तक आवेदन कम होंगे तो शगुन को सीधे प्रवेश मिल जाएगा.”

फिर वे आयुष से मुखातिब होकर बोले, “तू साइंस ले तो रहा है, पर अभी समय है, अच्छी तरह सोच लेना, चल पाएगा कि नहीं?”

“मैं साइंस कर लूंगा. मेरे इस बार साइंस और गणित दोनों में अच्छे नंबर आए हैं.” आज वह दृढ़ता से बोला लेकिन स्वर में उत्साह कम था.”

“अच्छी तरह सोच ले, अभी वक्त है. तुझे इंजीनियरिंग करना है तो कोटा में भी प्रवेश लेकर वहाँ साथ में कोचिंग भी कर सकता है. हमारे स्टाफ मेम्बरों के बच्चों ने वहाँ से कोचिंग करके इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया है. कुछ को तो आईआईटी और ट्रिपल आई टी में भी प्रवेश मिला है.”

पापा के इस नए सुझाव से आयुष असमंजस में पड़ गया. “सोचता हूँ पापा.”

“हाँ आयुष¡ कोटा का सुझाव भी बढ़िया है. यहाँ से सिर्फ डेढ़ घंटे में बस और ट्रेन एक घंटे में पहुँचा देती है. यह बढ़िया है. और भाई साहब तो कंपनी के काम से महीने में चार पाँच बार कोटा जाते ही हैं.”

शगुन ने बनस्थली का ब्रोशर देखा, उसमें घोड़ों पर सवार लड़कियों की तस्वीर थी, उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था.

आयुष दिन में दोस्तों के साथ सलाह करने निकला.


उस रात शगुन ने अपनी डायरी में लिखा;

"आज तय हुआ, मैं बनस्थली जाऊँगी. यह मेरी पहली पसंद नहीं, पर शायद यही वह रास्ता है जो मुझे खुद तक ले जाएगा.

भाई साइंस ले रहा है... पर क्या वह सच में चाहता है?

कभी-कभी लगता है, हम दोनों ही अपने-अपने पिंजरे तोड़ने निकले हैं.

मैं कोटा स्टोन की कठोर खदानों वाले इस शहर से निकलकर बनस्थली के गाँवों के बीच बसे हरे-भरे परिसर में जा रही हूँ... शायद यही सही है, पत्थर की कठोरता से पेड़ों की कोमलता की ओर."

बाहर बरामदे में शगुन की साइकिल खड़ी थी, उसके पहिए अब एक नई, दूर की यात्रा के इंतज़ार में थे.

आयुष अपनी खिड़की से उसे देख रहा था. उसे लगा, जैसे साइकिल के पहिए उससे कह रहे हों: "हम चल पड़े हैं. अब तुम्हारी बारी है, चलने की, या रुकने की?"

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