@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अपनी ही ज़मीन

सोमवार, 5 जनवरी 2026

अपनी ही ज़मीन

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

जब दुर्घटना ने पति को निगल लिया, तो नियति का 'नाम' भी अँधेरे में खो गया. अब वह 'विधवा' थी. उसे एक ऐसा नया संबोधन मिला था जिसकी चुभन उसकी पहचान से ज़्यादा गहरी थी. सात वर्ष के वैवाहिक जीवन ने उसे एक और चुपचाप सहे जाने वाला दर्द दिया था. वह माँ नहीं बन पाई थी. इस 'कमी' ने उसके और सास-ससुर के बीच धीरे-धीरे एक अदृश्य खाई खोद दी थी. अब वह दर्द एक 'दोष' बन गया. "हमारा तो वंश ही बूढ़ गया, अब और न जाने कितने दिन हमारे सिर बनी रहेगी?" सास की यह फुसफुसाहट दीवारों के पार से भी साफ़ सुनाई देती थी.

घर की दीवारों ने उसके बदन पर 'अशुभ', 'बोझ' और 'वंश चलाने में अक्षम' शब्द उकेर दिए. जिस घर को उसने सात सालों तक अपनी साँसों से सींचा था, कानून की किताबें कहतीं कि उसमें उसका कोई हिस्सा नहीं. एक दिन वह अपने पहनने के कपड़े लिए उस आंगन की और चल पड़ी जिस पर उसके असंख्य पद चिन्ह छपे हुए थे.

जहाँ उसने अपनी गुड़िया की शादी रचाई थी, उसी आँगन ने अब उसकी वापसी पर एक लंबी और ठंडी साँस छोड़ी. अब वहाँ हवा में तैरती बचपन की खुशबुओं के बीच एक अदृश्य दीवार थी, जो दिखती नहीं थी, लेकिन महसूस होती थी. माँ का आंचल तो उसके हाथ पीले होने के पहले ही छिन चुका था, पिता की मृत्यु ने भाइयों, दिनेश और महेश के भीतर के लालच को नंगा कर दिया था.

"बहनें विदा हो जाएँ तो घर की दीवारों से उनका हक भी मिट जाता है, नियति." दिनेश ने एक दिन दफ्तर से लौटने के बाद चाय का सिप लेते हुए दो-टूक कह दिया. "और तू तो... जानती ही है, तेरे हिस्से का वारिस भी कोई है नहीं." उसकी आवाज़ में उपहास का एक तीखा स्वर था.

नियति ने शांत भाव से उसे देखा. यह शांति एक तूफान के बाद की शांति थी. उसकी आवाज़ में कोमलता थी, पर लौह जैसी दृढ़ता भी: "भैया, कानून कहता है कि 1956 के पूर्व पिता को उत्तराधिकार में अपने पुरुष पूर्वज से मिली सहदायिक संपत्ति में बेटियों का जन्म से अधिकार है, पिताजी की कोई वसीयत भी नहीं है, इसलिए उनकी स्वअर्जित संपत्ति में भी मेरा हिस्सा बराबर है.

महेश ने चाय का कुछ कप टेबल पर पटकते हुए कहा, "कानून और शास्त्र अलग होते हैं. बड़े शहर के ससुराल से क्या लौटी, ज़बान कैंची की तरह चलने लगी है तुम्हारी. इस सप्ताह में तुम अपनी राह देख लेना, वरना..."

उसने हार नहीं मानी थी. वह चुपचाप कब की शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन कर चुकी थी, साक्षात्कार हो चुका था. बस निर्णय आना शेष था. उसी सप्ताह उसे नौकरी मिल गयी. अगले सप्ताह उसने नगर के निकट ही एक गाँव के स्कूल में शिक्षक का पद संभाल लिया. उसे अपनी लड़ाई लड़ने के लिए संबल मिल गया था.

घर के भीतर छिड़ा युद्ध अब भाभियों की ज़ुबान पर आ गया था. उनके ताने हवाओं में तीर की तरह तैरते थे; "अपना तो वंश ही नहीं चला सकी, अब बाप की संपत्ति हड़पने चली है." नियति के लिए उसके भतीजे-भतीजियाँ मरहम बने. वे बच्चे, जो राजनीति नहीं जानते थे, शाम को छिपकर अपनी बुआ के पास पहुँच जाते.

इस संघर्ष में उसका सहारा बना आर्यन, उसके वकील का सहायक. एक रोज़ कोर्ट की कैंटीन में, भावनाओं के उफान में, नियति ने अपने मन की बात कहनी चाही, तो आर्यन ने कोमलता से उसे रोक दिया.

"नियति," आर्यन ने पूरी गरिमा के साथ कहा, "मैं तुम्हारे संघर्ष का हिस्सा हूँ, लेकिन तुम मेरी क्लाइंट हो. आज अगर हम किसी रिश्ते में बँधते हैं, एक तो यह मेरे पेशे की शुचिता के विपरीत होगा. तुम्हारे भाइयों को भी तुम्हारी शुचिता पर कीचड़ उछालने का अवसर मिलेगा. हम इंतज़ार करेंगे. जिस दिन तुम यह मुकदमा जीतोगी, मैं तुम्हारा वकील न रहूंगा, उस दिन मैं एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह तुम्हारा हाथ चाहूंगा."

मुकदमा लंबा चला. भाइयों ने पिता की कोई वसीयत ले आए थे. उसी के आधार पर उनके वकील ने उनका पक्ष प्रस्तुत किया. "माननीय, परिवार में कोई सहदायिक संपत्ति नहीं है. परिवार की पुश्तैनी जमीन कब की बिक चुकी थी. जो हैं वे सब पिता की स्वअर्जित संपत्तियाँ हैंपिता की वसीयत रिकार्ड पर मौजूद है जिसमें पिता ने अपनी बेटी का उल्लेख तक नहीं किया है. यदि इसका कोई हिस्सा है तो इसके पति के परिवार की संपत्तियों में है. यह वहाँ अपना हिस्सा मांगे. इसे अपने पिता की संपत्तियों पर कोई अधिकार नहीं. लिहाजा दावा खारिज किया जाए."

नियति के वकील चट्टान की तरह डटे रहे. अदालत के फैसले ने सदियों पुरानी पितृसत्ता की जड़ें हिला दीं. अदालत ने प्रारंभिक डिक्री पारित कर सहदायिक और पिता की स्वअर्जित संपत्तियों में दोनों भाइयों के समान हिस्सा तय किया और उसके एक तिहाई हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार को मान लिया गया. उसे संपत्तियों का बँटवारा अंतिम होने तक पैतृक घर में सम्मान पूर्वक अबाध निवास करने के उसके अधिकार को स्पष्ट करते हुए. उसके निवास में किसी तरह की बाधा न डालने की हिदायत देने वाली स्थायी निषेधाज्ञा भी जारी की.

अदालत की सीढ़ियों से उतरते हुए नियति ने देखा, दिनेश और महेश हार के बोझ से दबे तेज़ कदमों से निकल गए. वे पीठ पर अब भी नफरत लादे हुए थे.

पीछे खड़े आर्यन के चेहरे पर मुस्कराहट थी. नियति ने उसकी ओर देखा, और फिर उस धूल भरी सड़क की ओर जो उसके स्कूल को जाती थी. उसने अपना हिस्सा जीत लिया था, पर वह जानती थी कि असली लड़ाई तो अब शुरू होगी.

नियति ने अपना बैग सँभाला. हवा में घुली भाइयों की नफरत अब उसे प्रभावित नहीं कर रही थी. उसकी साँसों में आज़ादी तैर रही थी. उसने न केवल सिर्फ़ कानूनी लड़ाई जीती थी, बल्कि उस सामाजिक कलंक को भी अपने शरीर से अलग कर दिया था जो एक स्त्री को उसके शरीर के आधार पर परिभाषित करता है. आँगन अब भी वही था, पर उस पर उसके हिस्से के अधिकार की मुहर लग चुकी थी. वह उसकी जमीन ही जमीन थी.

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