@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: प्रोसेसिंग प्लांट

बुधवार, 28 जनवरी 2026

प्रोसेसिंग प्लांट

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

नतीजे आए, फैसला हुआ, और अब आयुष के सामने एक तारीख टंगी थी, ‘22 जून’. इस तारीख को, कोटा के सबसे अग्रणी कोचिंग संस्थान संबल कोचिंग का आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए पहला बैच आरम्भ होने वाला था.

उस तारीख तक पहुँचने का रास्ता सूचनाओं और अफवाहों के बियाबान से होकर गुजरता था. आयुष उसी में भटक रहा था.

वह अपने दोस्त अभिषेक से मिला, उसका बड़ा भाई पिछले साल कोटा से पढ़कर लौटा था.
“भैया, वहाँ कैसा है?” आयुष ने पूछा.

अभिषेक के भाई ने चश्मे के पीछे से थकी आँखें उठाईं. “जैसा सुना है वैसा ही है. दिन में चौदह घंटे क्लास, रात को दो टेस्ट. शुरुआत में लगता है सब कुछ कर लेंगे… फिर धीरे-धीरे पता चलता है कि तुम नहीं, तुम्हारा दिमाग ही दौड़ रहा है रेस में.”

आयुष की रूह काँप गई. “और… अगर नहीं हुआ?”

भाई की आवाज़ और भी भारी हो गई. “तो फिर वहीं रह जाता है इंसान… पीछे. बस ‘अटेम्प्ट’ रह जाता है.”

राजेश एक अलग ही कहानी सुनाई. उसके चचेरे भाई ने आईआईटी क्रैक किया था. “अरे यार, इतना गंभीर मत हो. शहर बढ़िया है! भैया बता रहे थे. वीकेंड पर मूवी चलती है, चाय की दुकानें हैं. पढ़ाई भी सिस्टम से होती है, बस फॉर्मूला पकड़ो, फटाफट!”

एक ने डर दिखाया, दूसरे ने रास्ता. लेकिन आयुष के दिमाग में सवालों का झुंड भिनभिना रहा था, “कौन सच कह रहा है? अठारह घंटे पढ़ने वाला लड़का, या वीकेंड पर मूवी देखने वाला?

रातों को नींद उचट जाती, वह बोर्डिंग स्कूल के दिन याद करने लगता. हॉस्टल के लॉन में शाम को दोस्तों के साथ गप्पें, क्रिकेट मैदान में गेंदबाजी, बल्लेबाजी, प्रीफेक्ट की नज़र बचाकर चॉकलेट खाना. वह कोटा के ‘होस्टल’ की कल्पना करता. उसे वह “स्टडी सैल” लगता. क्या वह फिर से कुछ अलग तरह की कैद में लौट रहा था? या यह एक “प्रोसेसिंग प्लांट” था, जहाँ से या तो ‘आईआईटीयन’ निकलता था, या फिर… ‘रिजेक्ट’.

‘रिजेक्ट’… शब्द उसके मन के सबसे अंधेरे कोने में बैठा था. अगर वह नहीं कर पाया, तो? पापा की नजरें, क्या कहेंगी? चाचा, जो हर किसी को कहते, “हमारे खानदान का पहला ‘आईआईटीयन’ होगा!” और रिश्तेदार? पड़ोसी? वे सब क्या कहेंगे? “देखो, वर्मा साहब का लड़का कोटा गया था न? वापस आ गया… कुछ नहीं हुआ.” केवल पैसा ही नहीं, घर की पूरी शान बर्बाद हो जाएगी. ये, नहीं तो फिर? बी.एससी.? लोकल डिग्री कॉलेज से? उसके बाद? कुछ साक्षात्कार और एक साधारण सी नौकरी? उस चमकदार कैरियर के सपने का क्या, जो हर कोई उसे दिखा रहा था ... विदेश, बड़ी कार, पैरेंट्स को सम्मान…

एक रात चाय पीते हुए, शगुन ने उसके चेहरे पर उलझन पढ़ ली.

“क्या सोच रहे हो, भाई?” वह धीरे से बोली.

आयुष ने अपने मग में देखते हुए कहा, “कुछ नहीं… बस… पता नहीं यह सब हो पाएगा या नहीं.”
शगुन ने एक पल की चुप्पी के बाद कहा, “मैं भी नहीं जानती भाई… बनस्थली में क्या होगा. हम दोनों किसी नई नाव पर चढ़ने जा रहे हैं. किनारा नजर नहीं आता.”

वह आगे कुछ कहना चाहता, पर माँ किचन से आ गईं. बात अधूरी रह गई. उस अधूरेपन में एक सच्चाई थी. दोनों के सामने संघर्ष था, लेकिन दोनों का अलग. क्या अब वे एक-दूसरे से अपने संघर्ष के बारे में बात भी पाएंगे?


22 जून से तीन दिन पहले, आयुष और मम्मी, पापा दोनों कोटा जाने वाली ट्रेन में सवार थे. चाचा, शगुन और चाची सब प्लेटफॉर्म आए थे. ट्रेन ने गति करना शुरु किया तो चाचा ने साथ चलते हुए उसका हाथ दबाया और छोड़ दिया.


“चम्बल रेजीडेंसी” यह एक निजी होस्टल था. रूम नं. 203. एक वार्ड रोब, एक दर्पण लगी अलमारी और एक बुक शेल्फ. एक तख्त जिसपर बिस्तर लगा था, एक टेबल-चेयर, खिड़कियों पर पर्दे, छत पर पंखा, एक कूलर और एक अटैच बाथरूम. आयुष और माँ को कमरा सही लगा. मम्मी उसके साथ रुकीं, उसकी दिनचर्या सामान्य होने तक, पिता वापस मंडी लौट गए.

अगले दिन वह कोचिंग के दफ्तर गया. वहाँ से उसे कोचिंग का नाम और लोगो छपी दो यूनिफोर्म, एक छाता, आई कार्ड, जरूरी किताबें और स्टेशनरी मिली. अब वह कायदे से संबल कोचिंग का स्टूडेंट था.

तीसरा दिन खाली था. उसने होस्टल, कोचिंग के ऑफिस और जहाँ उसकी क्लास लगनी थी उसके आसपास का पूरा इलाका पैदल घूमा. कहाँ से वह क्या खरीद सकता है, यह सब वह देख आया. जिससे अचानक किसी चीज की जरूरत होने पर किसी से पूछना न पड़े.

चौथे दिन से क्लासेज शुरू हो गयीं. उसकी शेड्यूल निरन्तर थी. सुबह 07:00 से 10:00 बजे तक फिजिक्स, 10:10 से 01:00 बजे दोपहर तक केमिस्ट्री, 01:00 से 02:00 बजे लंच ब्रेक, फिर 02:00 से शाम 05:00 बजे तक गणित की क्लासेज और लैक्चर्स. शाम 05:00 से 06:00 बजे तक अवकाश और फिर 06:00 से 09:00 बजे तक सेल्फ स्टडी, दैनिक अभ्यास और डाउट क्लासेज, 09:00 से 10:00 बजे तक डिनर और विश्राम और रात्रि 10:00 से 12:00 बजे तक दिन में पढ़े गए टॉपिक्स का रिविजन. सुबह सात बजे से रात 12 बजे तक सोचने की फुरसत नहीं. पहले दिन उसे बहुत घबराहट हुई. मन हुआ कि वह वापस अपने बोर्डिंग चला जाए. लेकिन सप्ताह बीतते वह इस दिनचर्या का अभ्यस्त होने लगा. इस अभ्यस्त होने में माँ की बड़ी भूमिका थी.

अगले रविवार को पापा आ गए. कहने लगे माँ को वे मंडी लेकर जाएंगे.

मम्मी के जाने की बात सुनकर आयुष का गला सूख गया. उसने पापा से कहा, "बस एक सप्ताह और माँ को यहाँ रहने दें." पापा-मम्मी मुस्कुरा दिए। उस मुस्कुराहट में आयुष ने एक चुनौती देखी, 'अब तू बड़ा हुआ.' उसने महसूस किया कि अगले सप्ताह से उसकी असली परीक्षा शुरू हो जाएगी, और वह परीक्षा क्लास रूम से पहले, उसके अपने कमरे में ही होगी. आयुष का दिल डूबने लगा. वह अकेला खुद को कैसे संभालेगा. उसने पापा से कहा, बस एक सप्ताह और माँ को यहाँ रहने दें. पापा बोले, “माँ बस एक सप्ताह और रुकेंगी. उसके बाद आयुष को सब कुछ खुद देखना होगा. वे उसे मोबाइल दिला देंगे. वह रोज घर बात कर सकेगा. अपनी हर परेशानी बता सकता है.”

 

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