लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
आयुष के बोर्डिंग स्कूल चले जाने के बाद शगुन को कई नए काम मिल गए. पहले आयुष बाहर के छोटे-मोटे काम कर देता था. अब उनमें से अधिकांश उसे करने पड़ते थे. उसका स्कूल के अलावा मोहल्ले की सीमा से बाहर जाना सिमट गया. पहले वह जाती तो आयुष को साथ ले जाती थी. अब उसे अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी. शगुन 'घर की बड़ी बेटी' होने का अर्थ समझ रही थी, उसका अपना समय सिकुड़ गया था. उसकी दुनिया अब अधिक से अधिक घर की चारदीवारी में सिमट रही थी. जिज्ञासावश खरीदी गई उसकी विज्ञान की किताबें वह यदा-कदा ही पढ़ पाती थी.
शगुन ने सैकण्डरी स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी. गणित और विज्ञान के अंकों ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था. अब उसे अध्ययन के लिए अपनी स्ट्रीम चुननी थी. वह जीव विज्ञान लेना चाहती थी. सोचती, यदि डॉक्टर बन सकी तो परिवार और लोगों के काम आ सकती हूँ. खुद का और परिवार का नाम भी रोशन होगा.
चाचा स्कूल से उसका प्रवेश फॉर्म ले आए. रात के खाने के समय पिता और चाचा बैठे थे. वह रसोई में रोटियाँ बेल रही थी, माँ परोस रही थी. अचानक माँ ने कहा, “रोटियाँ मुझे बेलने दे, खाना तू परोस दे. पापा तेरे एडमिशन के बारे में बात करना चाहते हैं.”
उसने बेलन माँ को थमाया, आटा सने हाथ धोए और गर्म रोटियाँ लेकर डाइनिंग में पहुँची.
"आर्ट्स ही ठीक रहेगा," पिता ने शगुन को बिना देखे ही कहा, "लड़कियों के लिए आसान है. इतिहास-समाजशास्त्र शादी के बाद बच्चों को पढ़ाने में भी काम आएंगे."
सुनकर शगुन की साँसें थम सी गईं. “पर पापा, मेरे सबसे ज़्यादा नंबर तो साइंस और गणित में आए हैं," उसने पिता और चाचा की थाली में रोटियाँ परोसते हुए कहा, "मैं बायोलॉजी पढ़ना चाहती हूँ.”
“अब तक की जो साइंस-गणित तुमने पढ़ी, वह प्रारंभिक थी, जो सब को सीखनी चाहिए," चाचा ने बिना रुके कह दिया, "आगे जब ये मुख्य विषय होंगे तो बहुत मुश्किल होंगे. आयुष भी यहाँ नहीं है. घर के इतने काम करते हुए तुम बायोलॉजी नहीं कर सकोगी. एक बार फेल हुई तो बहुत इज्ज़त खराब होगी.”
“पर गणित में मैं कभी 90-95 प्रतिशत से कम नहीं लाई. वह मेरी पसंदीदा है," शगुन ने हिम्मत जुटाकर कहा.
“क्या?” पिता की आवाज़ कड़ी हो गई, “तुम बायोलॉजी लेकर क्या करोगी? मेडिकल के लिए प्री-मेडिकल देना पड़ेगा, कोचिंग करनी पड़ेगी, बहुत मेहनत. और कॉम्पिटीशन निकाल भी लिया तो मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी है. एक-सवा करोड़ खर्च होता है. हम जैसे मध्यवर्गीय के बस की बात नहीं.”
“और डॉक्टर बन भी गई तो शादी में कितना दहेज देना होगा, पता है?” चाचा ने आगे जोड़ा, “आजकल तो डेढ़-दो करोड़ मांग चल रही है. मेडिकल की तो हम सोच भी नहीं सकते.”
शगुन का गला रुंध गया. उसकी सारी हसरतों पर पानी फिर चुका था. तभी उसके मन में एक तर्क कौंधा ‘आजकल आर्ट्स में ऑप्शनल गणित या मनोविज्ञान भी ले सकते हैं. मनोविज्ञान से तर्कशक्ति बढ़ती है... वह विज्ञान का ही एक हिस्सा है.’
“तो... क्या मैं आर्ट्स में मनोविज्ञान ले सकती हूँ?” उसकी आवाज़ धीमी, पर स्पष्ट थी, “वह भी तो... विज्ञान जैसा ही है.”
पिता और चाचा ने एक दूसरे की ओर देखा. एक क्षण की चुप्पी के बाद पिता बोले, “ठीक है... मनोविज्ञान ले सकती हो.”
चाचा की भृकुटियाँ तन गईं, पर वे चुप रहे.
शगुन डाइनिंग रूम छोड़कर सीधे अपने कमरे में गई और बिस्तर पर गिरकर तकिए में मुँह दबा रोने लगी. उसका मुख्य सपना तो टूट गया था, पर एक खिड़की... एक छोटी सी खिड़की खुली रह गई थी. “मनोविज्ञान”.
खाना खाने वह नीचे नहीं लौटी. सब काम निपटाने के बाद माँ उसके कमरे में आई. जैसे-तैसे समझाया और नीचे लाकर खाना खिलाया.
अगली सुबह शगुन नीचे नहीं उतरी. माँ उसे बुला कर लाई. पिता ने समझाना शुरू किया, “हम मध्यवर्गीय लोग हैं, बेटा. अपनी गुदड़ी देखकर चलना पड़ता है...” आखिरकार, शगुन आर्ट्स लेने को राजी हो गई, बशर्ते मनोविज्ञान उसका विषय हो.
दिन में चाचा के साथ वह स्कूल गई और आर्ट्स स्ट्रीम में मनोविज्ञान चुनते हुए आवेदन जमा करा दिया.
क्रिसमस की छुट्टियों में आयुष घर लौटा. वह लंबा हो गया था, बात करने का अंदाज़ भी बदल गया था. वह बोर्डिंग स्कूल के किस्से सुनाता — कंप्यूटर लैब, हॉस्टल की शरारतें. पूरा परिवार मंत्रमुग्ध सुनता रहता.
"देखो, कितना कुछ सीख रहा है!" माँ गर्व से कहतीं.
एक शाम चाचा ने वह तुलना फिर दोहराई, "आयुष को दुनिया देखने-सीखने को मिल रही है. शगुन, तुम्हें भी अब अपनी दुनिया, घर-परिवार को बेहतर सीखना है."
शगुन ने आयुष की ओर देखा. पर आयुष बेखबर अपनी प्लेट में खाना परोस रहा था. रात को दोनों जब अपने कमरे में सोने गए, तो शगुन ने पूछा, "बोर्डिंग स्कूल... कैसा लगा तुम्हें?"
आयुष ने कंधे उचकाए, "ठीक है. पर खाना बहुत बेकार है."
उसकी शिकायतें सतही थीं. शगुन की आँखों के गहरे सवालों को, उस चुप्पी के भार को, वह नहीं पढ़ पाया. उनके बीच नई दीवार अब देखी जा सकती थी.
छुट्टियाँ खत्म हुईं. आयुष वापस जाने के लिए तैयार हुआ. इस बार शगुन स्टेशन नहीं गई. वह अपनी खिड़की से उसे जाते देखती रही.
जब वह नज़रों से ओझल हुआ, तो उसकी नज़र अपनी अलमारी पर पड़ी जिसमें उसकी शौकिया तौर पर खरीदी विज्ञान पुस्तकें थी. फिर अपने स्कूल बैग पर, जिसमें मनोविज्ञान की नई किताब थी. वह अपने आप से ही कहने लगी, “पाठ्यक्रम में नहीं तो क्या हुआ? स्कूल लाइब्रेरी से लाकर विज्ञान की किताबें पढ़ सकती हूँ. इसी से मेरा ज्ञान बढ़ेगा.
उसने तय किया, वह ऐसा करती रहेगी. यही छोटी सी आदत, यही अध्ययन की ललक... उसकी चिंगारी को बचाए रखेगी.
4 टिप्पणियां:
शगुन का सच्चा मनोविज्ञान
बहुत सुंदर
वर्मा जी, नमस्ते. आपका ब्लाग पर आना सकून दे गया. यहाँ आना बेहतर लगता है. जब देखते हैं कि लोग अभी भी ब्लाग लिख रहे हैं और पढ़ भी रहे हैं. फेसबुक के जंगल की अपेक्षा यहाँ बहुत कुछ व्यवस्थित है. विचार जैसे भी हों पर उनमें व्यवस्था है और शालीनता भी. आपका आभार आप आए और यहाँ टिप्पणी की.
लड़कियों को अक्सर धन के और पारिवारिक सहयोग के अभाव में मन मारना पड़ता है पर जहाँ चाह वहाँ राह!
पूरा ना मिला, थोड़ा ही सही. कहानी रोचक के साथ ही संदेशप्रद भी है. सादर.
"ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है "
नाम भी शगुन !
आस जगाने वाली छोटी सी कथा ।
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