देहरी के पार, कड़ी - 19
मंगलवार की सुबह भी प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी की उसी शांत सड़क पर, कारखाने के गेट से कुछ दूर उसी बेंच पर आकर बैठे. कुछ मिनट बाद ही प्रिया का फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे. उन्होंने कहा, "बैठने का स्थान बदलो, जरूरी है." वे तुरंत वहाँ से उठकर फैक्ट्री गेट के सामने होते हुए दूसरी और पहुँचे वहाँ ऐसी ही एक बैंच देखकर बैठ गए. हड़ताल का जोश दूसरे ही दिन एक 'अनुशासन' में बदल चुका था. गेट पर मज़दूरों की टोलियाँ शांतिपूर्ण तरीके से वहाँ लगाए गए शामियाने में बैठी रहीं. मजदूरों के पास लाउडस्पीकर सिस्टम था. कोई न कोई उस पर भाषण देता रहता. बीच-बीच में जोशीले नारे भी लगते. मजदूरों के बीच बहुत से अच्छे गायक भी थे, वे क्रांतिकारी गीत गाते. इसी तरह उनका समय गुजरता. शाम छह बजे पिकेटिंग समाप्त कर दी जाती. दस-पंद्रह लोग शामियाने में रात रहते. मजदूरों की आँखों में दृढ़ संकल्प दिखाई देता. बुधवार सुबह आठ बजे के कुछ पहले प्रशांत बाबू पिकेटिंग के स्थान से टहलते हुए उस बेंच तक पहुँचे जहाँ प्रिया और उसके साथी बैठे थे. उन्हें देख राहुल और आदित्य खड़े होने लगे तो उन्होंने इशारे से मना कर दिया. फिर खड़े-खड़े ही उन्होंने गंभीरता से कहा, "साथियों, अब तुम्हें यहाँ आने की जरूरत नहीं है. तुमने तीन दिन इस संघर्ष को जीकर महसूस कर लिया है. यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं, तुम 'अदृश्य' रहकर हमारे सूचना तंत्र को संभालो.” चारों स्तब्ध होकर सुन रहे थे. “मैं यहाँ से टहलते हुए कुछ दूर जाकर वापस लौटूंगा. मैं वापस शामियाने तक पहुँच जाऊँ, तब तुम यहाँ से निकल लेना. रामजी काका ने तुम्हें याद किया है उनसे मिलते हुए जाना.”
वहाँ से वापस लौटते हुए चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे. रामजी काका उन्हें देखते ही चहक उठे. “आओ बच्चों, लगता है आज सुबह-सुबह रास्ता भूल गए हो, मैं तो तुम्हें देखने को ही तरस गया था.”
“नहीं काका, हम सुबह तो रोज वैसे ही लेट उठते हैं और जैसे तैसे समय से काम पर पहुँचते हैं. यह तो तीन दिनों से हम जल्दी उठकर छह बजे ही आईएसआई के मजदूरों की हड़ताल देखने पहुँच जाते थे. वहाँ से वापस घर होकर ऑफिस पहुँचते थे. सुबह जल्दी उठने की वजह से शाम को ऑफिस से छूटते ही सीधे घर पहुँचना ही सूझता था. आज भी वहीं गए थे, प्रशांत बाबू ने ही कहा कि हम लौटते हुए आपसे मिलकर जाएँ. आप हमें बहुत याद कर रहे हैं.” प्रिया ने सफाई देने की कोशिश की.
“हाँ बिटिया, प्रशांत बाबू न भेजते तो तुम लोग तो आज भी नहीं आते. खैर छोड़ो, तुम अंदर चलकर बैठो, आज तुम सबका ब्रेक फास्ट यहीं है. मैं भी आता हूँ."
वे अंदर जाकर बैठे. कुछ देर बाद रामजी भी वहाँ आ गए. तब तक सबके लिए पोहा और जलेबी का नाश्ता आ गया था.
“देखो बच्चों, तुम अभी वाकई नासमझ हो.” रामजी काका ने परिवार के बुजुर्ग की तरह बोलना शुरु किया. “तुम तीन दिन से हड़ताल देखने जा रहे हो, यह ठीक नहीं है. जो काम तुम अपने ऑफिस या घर से कर सकते हो, उसके लिए हड़ताल की जगह जाना जरूरी नहीं. यह पूंजीपति और मजदूरों की लड़ाई है और निजाम पूरी तरह पूंजीपति का है. वह अभी तुम पर हाथ नहीं डालेगा. लेकिन जैसे ही उसे पता लगेगा कि तुम मजदूरों के संघर्ष को धारदार बनाते हो, तो वह तुम्हें नहीं बख्शेगा. इसलिए जरूरी है कि इस लड़ाई का हर सिपाही यथाशक्ति इसके लिए काम भी करे और खुद को बचाकर भी रखे. तुम अब मजदूर वर्ग के सिपाही हो, तुम्हें उसी के हिसाब से सोचने की आदत डालनी चाहिए. तुम शाम के समय यहाँ आ सकते हो. तुम्हें हड़ताल की सारी सूचनाएँ यहीं मिलेंगी.”
चारों अवाक थे कि 'रामजी मजदूरों की लड़ाई के बारे में इतने गंभीर कैसे हैं.' रामजी उनकी जिज्ञासा समझ कर बोले. “अभी मेरे बारे में कुछ मत पूछना. तुम्हें घर होकर अपने ऑफिस जाना है. मेरी कहानी फिर किसी दिन फुरसत में सुनाऊंगा.”
नाश्ता करके चारों चल दिए.
गुरुवार सुबह आठ बजे, जब मज़दूर रोज़ की तरह गेट पर जमा थे, अचानक दो पुलिस गाड़ियाँ वहाँ आकर रुकीं. इस बार पुलिस का रवैया सख्त था. इंस्पेक्टर ने हाथ में एक कागज़ लहराते हुए यूनियन अध्यक्ष और सैक्रेटरी को बुलाया.
"यह सिविल कोर्ट का अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) का आदेश है," इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज़ में कहा. "कारखाना मालिक की अर्जी पर अदालत ने आदेश दिया है कि कोई भी मज़दूर या प्रदर्शनकारी कारखाने के मुख्य द्वार के 100 मीटर के दायरे में पिकेटिंग नहीं करेगा. आप लोग तुरंत पीछे हटिए, वरना हमें बल प्रयोग करना पड़ेगा."
यूनियन अध्यक्ष ने कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) पढ़ी. उन्होंने देखा कि कानून की कलम ने मज़दूरों को उनके अपने ही कारखाने की देहरी से 'दूर' कर दिया था.
अब मज़दूरों ने अपनी पिकेटिंग को दो हिस्सों में बाँट लिया. अनुशासन ऐसा था कि बिना किसी शोर-शराबे के, आधे मज़दूर सड़क के उत्तरी छोर पर चले गए और आधे दक्षिणी छोर पर. 100 मीटर की वह खाली सड़क अब 'मालिक के अहंकार' और 'मज़दूरों के धैर्य' के बीच की एक सरहद बन गई थी.
प्रिया को यह खबर अपने ऑफिस के केबिन में मिली. उसने राहुल को मैसेज किया— "कोर्ट के आदेश ने मजदूरों को शारीरिक रूप से दूर किया है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि डिजिटल दुनिया में 100 मीटर की दूरी का कोई अस्तित्व नहीं है."
प्रिया की टीम ने तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर एक नया संदेश प्रसारित किया: "दूरी बढ़ी है, हौसला नहीं. हम गेट से दूर हुए हैं, लक्ष्य से नहीं."
शाम को रामजी काका ने प्रशांत बाबू से कहा, "बाबू, 100 मीटर दूर होने से क्या होता है? हमारी निगाहें तो अभी भी गेट पर ही हैं. हम गेट पर ही 'सामूहिक रसोई' शुरू करेंगे. हड़ताल करने वाले मजदूर यहीं सड़क के किनारे बैठकर खाना खाएंगे."
प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रिया को फोन किया, "प्रिया, अब असली परीक्षा शुरू हुई है. कल शुक्रवार है, और मुझे लग रहा है कि मालिक कोई बड़ा धमाका करने वाला है. तैयार रहना."+
... क्रमशः
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