देहरी के पार, कड़ी - 15
प्रिया ऑटो से मेवाड़ भोजनालय पहुँची, तब रात के साढ़े दस बज चुके थे. मुंबई की सड़कों पर ट्रैफिक कम था. वाहन अपनी गति से दौड़ने लगे थे. राहुल और आदित्य भी उसके पीछे ही पहुँच गए. 'मेवाड़ भोजनालय' में कुछ और ही चल रहा था. कर्मचारियों ने रामजी काका के निर्देश पर भोजनालय के अंदर वाले हॉल की मेजों और कुर्सियों को फुर्ती से जोड़कर एक विशाल 'राउंड टेबल' की शक्ल दे दी थी. अब हॉल में बीस लोग एक साथ बैठकर डिनर कर सकते थे. ऐसा लगता था कि आज हॉल में किसी खास क्लाइंट के ऑर्डर पर मीटिंग और डिनर होने वाला था.
हॉल तैयार होते ही प्रशांत बाबू और उनकी 'आइडिया' एसोसिएशन के चार पाँच साथियों ने सबसे पहले हॉल में प्रवेश किया. प्रिया के सभी साथियों को भी रामजी काका ने अंदर के हॉल में जाने को कहा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि आज क्या होने वाला है. लेकिन कुछ ही देर में सबको समझ आ गया कि पिछले चार दिन से जो लोग विक्रांत को सबक सिखाने के ऑपरेशन में लगे थे वे सब इस डिनर में शामिल होने वाले हैं. प्रशांत बाबू राउंड टेबल की मुख्य कुर्सी पर बैठे. उनके पास दोनों ओर की एक-एक कुर्सी छोड़ कर एक तरफ प्रिया और उसकी टीम के लोग थे तो दूसरी तरफ एसोसिएशन के सदस्य. उनके साथ ही ऑटो चालक फरीद भाई और मोड़ पर विक्रांत को रुकने पर मजबूर करने वाले मिनी-ट्रक के चालक डेनियल भी मौजूद थे. प्रिया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब प्रिया और उसके मैनेजर मिस्टर देसाई भी वहाँ पहुँच गए. प्रिया और उसके साथियों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. प्रशांत बाबू ने उन्हें अपने पास प्रिया की टीम के साथ बैठने का न्यौता दिया. उनके दूसरी ओर की कुर्सी अब भी खाली थी. हॉल के दरवाजे के पास खड़े रामजी को उन्होंने इशारे से अपने पास बुलाया और कहा, “रामजी भाई, ये खाली कुर्सी आपकी है, आप कब तक हमसे बचते रहेंगे. आज के असली हीरो तो आप ही हैं. आप न होते तो यह आपरेशन ही नहीं होता. आज आपको भी हमारे साथ डिनर करना है.” उन्होंने खड़े होकर रामजी का हाथ पकड़ा और लगभग जबरन पास की खाली कुर्सी पर बिठा दिया.
प्रशांत बाबू ने गले में पड़ा गमछा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बोले, "साथियों, आज हमने जो किया, वह केवल एक अपराधी को पकड़वाना नहीं था. इस 'ऑपरेशन' में फरीद भाई के ऑटो ने रास्ता दिखाया तो डेनियल भाई के मिनी-ट्रक ने दीवार खड़ी की." उन्होंने आगे बढ़कर दोनों का परिचय कराया. ये दोनों अपनी-अपनी यूनियनों के बेहतरीन कार्यकर्ता हैं जो हमारी एसोसिएशन के बिरादराना संगठन हैं.
"यह दृश्य देखिए," प्रशांत बाबू ने कमरे की ओर इशारा किया, "यहाँ हिंदू, मुस्लिम और क्रिश्चियन साथी एक साथ बैठे हैं. और ताज्जुब देखिए, यह सब मेरे जैसे एक 'नास्तिक' के कहने पर आपस में जुटे हैं. आज दुनिया भर के ज्यादातर राजनीतिज्ञ धर्म, जाति और नस्लों के आधार पर लोगों को बाँटने के चलन पर हैं तब हम सबका इस तरह एक उद्देश्य के लिए एकजुट होकर सफल हो जाने को लोग चमत्कार कह सकते हैं. हम सब अपने संगठनों में तो काम करते ही हैं, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर हमारे 'बिरादराना संगठन' श्रमजीवियों के एक विशाल परिवार की तरह एकजुट हो जाते हैं. आज विक्रांत इसलिए हारा क्योंकि वह अपने उद्देश्य में अकेला था. उसके साथ जो थे वे उसके साथी नहीं, कर्मचारी थे, उनमें उद्देश्य और लक्ष्य की एकता नहीं थी, उनकी एकता गीली रेत के लड्डू जैसी भुरभुरी थी. और हम, इसलिए जीते क्योंकि हम संगठित थे और हमारा उद्देश्य और लक्ष्य एक था, हमारी एकता हीरे के अणुओं जैसी मजबूत और अकाट्य थी."
माहौल की गरमाहट और सुरक्षा का अहसास ऐसा था कि राहुल और आदित्य अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए. राहुल ने हिचकिचाते हुए पूछा, "सर, क्या हम लोग भी आपकी एसोसिएशन के सदस्य बन सकते हैं? आज जो ताकत हमने देखी, वह किसी कंपनी की पॉलिसी में नहीं है."
प्रशांत बाबू ने हलकी मुस्कुराहट और शरारत भरी नज़रों से कोने में बैठे देसाई जी को देखा और मज़ाक में कहा, "आप सबका एसोसिएशन में स्वागत है, मेंबरशिप फार्म भरने की औपचारिकता कभी भी की जा सकती है. पर पहले सोच लीजिए, देसाई जी जरूर आपसे नाराज हो जाएंगे. कहीं वे इसे 'बगावत' न समझ लें!"
हॉल में हल्का ठहाका गूँज उठा. देसाई जी, जो अब तक केवल आंकड़ों और फाइलों में जी रहे थे, भावुक होकर बोले, "नाराजगी कैसी प्रशांत जी? सच कहूँ तो मन तो मेरा भी कर रहा है कि मैं भी आप लोगों की इस एसोसिएशन में शामिल हो जाऊँ. लेकिन भला एक मैनेजर का वहाँ क्या काम?"
प्रशांत बाबू ने गर्मजोशी से उनके कंधे पर हाथ रखा, "देसाई साहब, आप अकेले क्यों? आप जैसे कम से कम दस मैनेजर तैयार करिए, फिर हम 'मैनेजर्स एसोसिएशन' बनाएंगे. हमारी यूनियनों के बीच 'बिरादराना ताल्लुक' (Fraternal Relations) रहेंगे. मज़दूर हो या मैनेजर, हम सभी इस सिस्टम में वर्किंग पीपुल्स ही हैं, जब तक हम एक-दूसरे के हक़ के लिए खड़े हैं, कोई हमारा शोषण नहीं कर सकता."
रामजी काका के कर्मचारियों ने गरम-गरम मेवाड़ी दाल-बाटी और चूरमा परोसना शुरू कर दिया. माहौल उत्सव जैसा हो गया था. फरीद और डेनियल एक-दूसरे को 'ऑपरेशन काली स्कॉर्पियो' के किस्से सुना रहे थे. प्रिया ने महसूस किया कि मुंबई उसके लिए अब 'पराया' नहीं रहा.
इसी जश्न के बीच, प्रशांत बाबू का फोन बजा. उन्होंने कुछ देर बात की और उनका चेहरा गंभीर हो गया. वे धीरे से प्रिया के पास आए और बोले, "प्रिया, विक्रांत के पिता ने मुंबई के एक नामी वकील से संपर्क किया है. कल सुबह वे 'जमानत' की अर्जी डालेंगे. उन्होंने ‘फेक आईडी’ वाले मामले को बंद करा देने तैयारी की है."
प्रिया के हाथ में निवाला रुक गया. उसने प्रशांत बाबू की आँखों में देखा और शांत आवाज़ में बोली, "सर, वह बाहर आए या अंदर रहे, अब मैं अकेली नहीं हूँ. मेरे पास फरीद भाई का रास्ता है, डेनियल की दीवार है और हमारी एसोसिएशन का सुरक्षा कवच है. अब वह 'बग' मेरा सिस्टम क्रैश नहीं कर पाएगा."
... क्रमशः
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