देहरी के पार, कड़ी - 27
जनरल मैनेजर से सफल जिरह के बाद ईसीआई के मजदूरों का मनोबल सातवें आसमान पर था. एएसएल के दफ्तर से बाहर निकलने के बाद मजदूरों के लगाए नारों में जो खनक थी, वह सालों के शोषण के विरुद्ध एक हूँकार जैसी लग रही थी. शामियाने के नीचे अब डर की जगह जीत की चर्चा थी. वह अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि एक 'कम्युनिटी सेंटर' बन चुका था जहाँ मजदूर अपने हक की बारीकियाँ समझ रहे थे.
प्रिया वहीं से अपने फ्लैट के लिए रवाना हुई. रास्ते भर वह जिरह के दृश्यों को जेहन में दोहराती रही. उसे अपनी नई पहचान—काली पैंट, सफेद शर्ट और वह कोट—किसी कवच जैसी लग रही थी. उसने महसूस किया कि वह 'विक्रांत के डर' की देहरी के बहुत पार निकल आई है. अब उसे विक्रांत की याद डराती नहीं, बल्कि उसकी बेवकूफी भरी हरकतों पर उसे हँसी आने लगी थी.
गुरुवार, 11 अप्रैल को मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के यहाँ समझौता वार्ता नियत थी. प्रबंधन दो बार से वार्ता में नहीं आ रहा था. इसे कलेक्टिव बारगेनिंग में असहयोग मानते हुए श्रम विभाग अनुचित श्रम आचरण के लिए फैक्ट्री की मालिक कंपनी के निदेशकों पर अपराधिक मुकदमा चला सकता था. प्रशांत बाबू और यूनियन की टीम को उम्मीद थी कि आपराधिक मुकदमे के डर से शायद प्रबंधन बातचीत की मेज पर आ जाए. लेकिन जैसा कि अंदेशा था, प्रबंधन नदारद रहा. रामजी काका ने जब शाम को फोन पर प्रिया को बताया कि श्रम आयुक्त ने जनरल मैनेजर और डायरेक्टरों को 'आपराधिक नोटिस' जारी कर दिए हैं, तो प्रिया को एक विधिक जीत का अहसास हुआ. इसका मतलब था कि अब प्रबंधन पर मजदूरों को अंतरिम राहत देने के लिए दबाव बढ़ेगा.
शुक्रवार की रात जब प्रिया अपने फ्लैट पर लौटी, तो थकान के बावजूद उसने वकील चव्हाण से फोन पर बात की. चव्हाण साहब ने एक नई चुनौती सामने रखी, "प्रिया, आज प्रबंधन ने शपथ पत्र पेश नहीं किए. उन्होंने चतुराई से समय मांग लिया. हालांकि एएसएल ने उन पर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है, लेकिन असली खेल 'समय' का है. 15 मार्च को नोटिस मिला था और 14 मई की डेडलाइन में अब सिर्फ 29 दिन बचे हैं. वे मामले को लटकाना चाहते हैं ताकि 'डीम्ड क्लोजर' (Deemed Closure) की कानूनी अनुमति मिल जाए."
रविवार की शाम IIDEA ऑफिस में जब बैठक चल रही थी, तभी प्रिया का फोन घनघना उठा. कोटा से पापा की कॉल थी. प्रिया का दिल धड़क गया, क्योंकि पापा उसे रात नौ बजे से पहले कभी फोन नहीं करते थे.
प्रिया ने कांपते हाथों से फोन उठाया और उसे स्पीकर पर लिया. "बेटा, कल से घर के बाहर एक काली गाड़ी खड़ी है," पापा की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, "आज दो आदमी आए थे, पूछ रहे थे कि क्या तुम वाकई किसी लॉ फर्म में काम कर रही हो? वे मयंक के बिजनेस के बारे में भी सवाल पूछ रहे थे. मयंक थोड़ा डरा हुआ है."
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब ने एक-दूसरे की ओर देखा. प्रिया को समझ आ गया कि 10 अप्रैल की जिरह के बाद प्रबंधन ने उसकी 'जड़ें' खोदना शुरू कर दिया है. वह विधिक लड़ाई को व्यक्तिगत हमले से रोकने की कोशिश में जुटा था.
प्रिया ने तुरंत जयपुर से आकाश को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया. आकाश ने स्थिति की गंभीरता भांपते हुए कहा, "प्रिया, तुम विचलित मत हो. मैं आज रात की बस से कोटा निकल रहा हूँ. मैं देखूँगा कि ये 'जासूस' किस एजेंसी के हैं. मयंक और अंकल अकेले नहीं हैं. तुम बस अपनी इस लड़ाई पर ध्यान दो."
आकाश के आश्वासन ने प्रिया को संबल दिया, पर उसे अहसास हुआ कि ईसीआई प्रबंधन अब केवल उसके 'डेटा' से नहीं, उसके 'अस्तित्व' से लड़ रहा है.
बैठक खत्म होने के बाद जब यूनियन के सदस्य चले गए, तब रामजी काका और प्रशांत बाबू अकेले रह गए. रामजी काका ने धीमी आवाज़ में अपना डर साझा किया जो पिछले कुछ दिनों से उन्हें खाए जा रहा था.
"प्रशांत, हड़ताल को आज 34 दिन पूरे हो गए. मार्च की आखिरी पगार जो मजदूरों को मिली थी, वह अब अंतिम सांसें ले रही है. कल फैक्ट्री गेट की पिकेटिंग पर कल्ला और रामदीन राशन की मदद के बारे में पूछ रहे थे. शिंदे सही कहता था, मुंबई की दूरियों में 'सामूहिक रसोई' संभव नहीं है, लेकिन हमें इन 350 परिवारों तक आटा-दाल पहुँचाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा. स्वाभिमान की लड़ाई भूखे पेट नहीं लड़ी जा सकती."
प्रशांत बाबू ने लंबी सांस ली, "यह दोहरी घेराबंदी है काका. एक तरफ क्लोजर की कानूनी डेडलाइन और दूसरी तरफ मजदूरों की खाली होती रसोइयाँ. इन्होंने प्रिया के परिवार को डराकर उसे तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है. सरकार मामले को एक दो रोज में न्याय निर्णयन के लिए लेबर कोर्ट को भेजेगी, हड़ताल और तालाबंदी पर पाबंदी लगाएगी. ऐसे में मजदूरों को काम पर जाना होगा. बस मिनिस्टर दबाव डालकर कुछ अंतरिम राहत दिला दे तो ठीक, नहीं तो हमें आइडिया से सम्बद्ध यूनियनों से मदद लेनी पड़ेगी."
प्रिया, जो फाइलें समेटने के लिए कमरे में दाखिल हुई थी, उसने यह बात सुन ली. उसकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि एक योद्धा वाली चमक थी. उसने मेज पर अपना लैपटॉप रखते हुए कहा, "सर, अगर वे मेरे घर तक पहुँच रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हम जीत रहे हैं. वे बुरी तरह डरे हुए हैं. जिरह के दौरान जब उनकी चोरी पकड़ी गई, तभी उन्होंने यह रास्ता चुना है. अब हमें रुकना नहीं है."
प्रिया ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब और भी मजबूती से 'निजी दौरों और फर्जी खर्चों' का ब्यौरा अदालत के पटल पर रखने की तैयारी करेगी. उसे अहसास हुआ कि उसकी जड़ें केवल कोटा की मिट्टी में नहीं, बल्कि मुंबई के उन मजदूरों के चूल्हों की आग में भी हैं जो आज उसकी ओर उम्मीद से देख रहे थे.
प्रिया ने मन ही मन खुद से कहा— 'देहरी के उस पार का डर अब बीत चुका है, अब इस पार की ज़मीन को मज़बूत करना ही मेरा इष्ट है.'
... क्रमशः
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