@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: चक्रव्यूह

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

चक्रव्यूह

देहरी के पार, कड़ी - 31
क्लोजर परमिशन के मामले में 19 अप्रैल को हुई जिरह के बाद ईसीआई प्रबंधन बुरी तरह हड़बड़ा गया था. एएसएल के सामने सुनवाई के दौरान 'Siphoning' और 'बिजली खपत' का जो कच्चा चिट्ठा खुला था, उसने प्रबंधन के अहंकार को हिलाकर रख दिया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसका संकट केवल क्लोजर की परमिशन का आवेदन निरस्त हो जाने की संभावना तक सीमित नहीं था. मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के दफ्तर ने भी उसके सिर पर तलवार लटका रखी थी.

दस साल पहले जब मजदूरों ने वेतन बढ़ोतरी की मांग की थी, तब प्रबंधन ने यूनियन के साथ समझौता कर ट्रक सिस्टम लागू किया तभी उसने यूनियन को मान्यता दे दी थी. हर साल उसी के साथ वह बोनस का समझौता करता था. उसी मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियन के साथ लगातार तीन वार्ताओं में उपस्थित न होने को सीएलसी ने सामूहिक सौदेबाजी की उपेक्षा मानते हुए 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट' की पाँचवीं अनुसूची के भाग प्रथम के आइटम नं. 15 में अनुचित श्रम आचरण मान लिया था और धारा 25-यू में अपराधिक मुकदमा चलाए जाने के लिए प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था.

कंपनी का कोई भी निदेशक नहीं चाहता था कि उनमें से किसी पर भी कोई अपराधिक मुकदमा चले. निदेशक मंडल की मीटिंग में कंपनी के लीगल मैनेजर मिस्टर दास को बहुत हड़काया गया था कि आपके रहते हुए यह स्थिति कैसे पैदा हुई? मीटिंग के दौरान ही कंपनी के वकील मनोज भट्ट से बात की गई तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया कि उनसे इस मामले में कोई सलाह नहीं ली गई. अब दोनों को जिम्मेदारी दी गयी थी कि किसी भी स्थिति में अपराधिक मुकदमा किसी निदेशक के विरुद्ध नहीं चलना चाहिए.

मुख्य श्रम आयुक्त ने समझौता वार्ता को असफल घोषित कर राज्य सरकार को जो गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी, वह और भी घातक थी. उन्होंने स्पष्ट सिफारिश की थी कि वेतन वृद्धि और बोनस के विवाद को तुरंत 'एडजुडिकेशन' (न्याय-निर्णयन) के लिए लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को प्रेषित कर दिया जाए और उद्योग में मौजूदा हड़ताल व तालाबंदी पर धारा 10 (3) के अंतर्गत तत्काल पाबंदी लगा दी जाए. यदि सरकार इस सिफारिश को मान लेती—जिसकी पूरी संभावना थी—तो प्रबंधन के पास मजदूरों को बाहर रखने का कोई विधिक बहाना नहीं था.

मामला राज्य सचिवालय तक पहुँच चुका था. प्रबंधन के प्रतिनिधि के रूप में फैक्ट्री जीएम मिस्टर सरकार, सोमवार 22 अप्रैल को लीगल मैनेजर मिस्टर दास और वकील मनोज भट्ट सुबह ठीक साढ़े दस बजे सेक्रेट्रिएट में थे. उन्होंने जैसे-तैसे श्रम मंत्री के निजी सचिव को प्रसन्न कर मंत्री जी से मुलाकात कराने का जुगाड़ किया. मंत्री जी ने उनसे मिलने के पहले श्रम सचिव को बुलाकर मंत्रणा की. उसके बाद ही प्रबंधन प्रतिनिधियों को भीतर बुलाया गया. माहौल में भारी तनाव था. श्रम सचिव ने मेज पर एक फाइल पटकते हुए कड़े लहजे में कहा, "मिस्टर भट्ट, आपकी कंपनी केवल कानून ही नहीं तोड़ रही, बल्कि सरकार की छवि भी खराब कर रही है. हड़ताल को 44 दिन हो चुके हैं. 350 परिवार सड़कों पर हैं और आपकी बैलेंस शीट में जो गड़बड़ियाँ सामने आई हैं, वे आपराधिक जांच का विषय बन सकती हैं."

प्रबंधन के पास अब सौदेबाजी की कोई ताकत नहीं बची थी. अंततः एक 'बीच का रास्ता' (Interim Arrangement) प्रस्तावित किया गया. श्रम सचिव ने दो टूक शब्दों में कहा, "सरकार मजदूरों के वेतन में वृद्धि का मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण को एडजुडिकेशन के लिए संप्रेषित करने और उसके साथ ही हड़ताल व तालाबंदी पर पाबंदी का आदेश जारी करने की सोच रही है. लेकिन मजदूर तब तक काम पर नहीं लौटेंगे जब तक उनके हाथ में कुछ पैसा न हो. आपको हड़ताल की अवधि का वेतन 'एडवांस' के रूप में मजदूरों के बैंक खाते में हस्तांतरित करना पड़ेगा. यह वेतन मजदूरों के खातों में जाने के अगले दिन वे काम पर लौटेंगे. मजदूरों की हड़ताल वैध थी या अवैध और वे हड़ताल अवधि के वेतन के हकदार हैं या नहीं—यह प्रश्न भी वेतन वृद्धि के विवाद के साथ न्यायाधिकरण को प्रेषित किया जाएगा. जिसमें न्यायाधिकरण तीन महीने में अपना फैसला देगा."

आपराधिक मुकदमे में जेल जाने और क्लोजर के मामले में अपनी किरकिरी से बचने के लिए प्रबंधन ने कांपते हाथों सरकार के प्रस्ताव पर सहमति दे दी. अपरान्ह चार बजे सरकार ने औद्योगिक न्यायाधिकरण को रेफ्रेंस करने, हड़ताल-तालाबंदी पर पाबंदी का नोटिफिकेशन जारी कर दिया. इसके साथ ही यह आदेश पृथक से जारी किया कि हड़ताल अवधि के वेतन की राशि के बराबर राशि नियोजक एडवांस के रूप में मजदूरों के बैंक खाते में ट्रांसफर करेगी. अगले दिन से मजदूर काम पर लौट आएंगे. पाँच बजे के रेडियो और टीवी समाचारों में यह खबर सरकार की महत्वपूर्ण कार्यवाही के रूप में प्रसारित हुई.

प्रशांत बाबू ने यह खबर (IIDEA) ऑफिस में सुनी. सारा माहौल बदल गया था. उन्होंने वकील रमेश चव्हाण से फोन पर परामर्श किया. तय हुआ की तुरन्त फैक्ट्री गेट पहुँचा जाए. दोनों ने वहाँ ईसीआई एम्पलॉइज यूनियन की कार्यसमिति के उपस्थित सदस्यों के साथ मीटिंग की और आगे की रणनीति पर विचार किया. खबर मजदूरों तक कानोंकान पहुँच चुकी थी और वे पिकेटिंग स्थल पहुँच रहे थे. कार्यसमिति की मीटिंग चल ही रही थी कि श्रम मंत्रालय का एक क्लर्क विभागीय कार से वहाँ पहुँचा नोटिफिकेशन की एक प्रति यूनियन अध्यक्ष को थमा दी. हड़ताल प्रतिबंधित की जा चुकी थी. उसे तुरंत समाप्त करना आवश्यक हो चुका था. पिकेटिंग स्थल पर कारखाने के तीन चौथाई से अधिक मजदूर इकट्ठा हो चुके थे. रामजी को मेवाड़ भोजनालय पर यह समाचार मिला तो वे भी पहुँच गए. मीटिंग में तुरन्त आमसभा कर हड़ताल को समाप्त करने की घोषणा करना तय हुआ. उधर श्रम मंत्रालय का क्लर्क नोटिफिकेशन की एक प्रति फैक्ट्री में भी दे कर जा चुका था.

उपस्थित मजदूरों की आमसभा शुरू हुई. प्रशांत बाबू ने आमसभा में बोलते हुए बताया, “साथियों, हमारे संघर्ष के सामने सरकार और फैक्ट्री मालिकों को मजबूर होना पड़ा. उन्होंने हड़ताल और तालाबंदी दोनों पर पाबंदी लगा दी. इसलिए हड़ताल खत्म कर मजदूरों को काम पर जाना होगा. लेकिन उसके पहले हड़ताल की अवधि का वेतन मजदूरों के बैंक खातों में होगा. वेतन कितना और कब से बढ़ेगा, इसका फैसला अब औद्योगिक न्यायाधिकरण करेगा और तीन माह में निर्णय लेगा. ‘फेयर वेजेज’ की हमारी लड़ाई थमी नहीं है. यह अदालत में चली गई है. हम वहाँ भी पूरी मुस्तैदी से लड़ेंगे. अभी क्लोजर की तलवार हम पर लटकी हुई है. कल मंगलवार को फिर सुनवाई है. प्रबंधन का आवेदन निरस्त हो इसकी पूरी कोशिश है. लेकिन अभी हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि आगे क्या होगा.”

प्रशांत बाबू बोल ही रहे थे कि किसी ने उनके पास जाकर उनके कान में कुछ कहा. उसके बाद उन्होंने अपना भाषण जारी रखा. “फैक्ट्री प्रबंधन ने फैक्ट्री गेट नोटिस लगाया है कि’ वह हड़ताल अवधि का वेतन कल दोपहर तक सभी कर्मचारियों के बैंक खातों में हस्तांतरित कर देगा.’ कर्मचारियों को परसों की पहली शिफ्ट से ड्यूटी पर उपस्थित होने का आदेश दिया है.’ सभी मजदूर परसों ड्यूटी पर जाएंगे. कल ज्यादा से ज्यादा लोग एएसएल के दफ्तर में सुनवाई के वक्त पहुँचें. वहाँ मजदूरों की उपस्थिति हमारे मामले को मजबूत करती है. हम अगले शनिवार कार्यकारिणी की मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार करेंगे फिर अगले रविवार को आमसभा में आप सबसे विचार विमर्श करके आगे का निर्णय लेंगे.”

प्रिया, को यह समाचार अपने ऑफिस में मिला. उसने दूसरे साथियों को भी बताया. साढ़े सात बजे अपना काम पूरा कर ऑफिस से निकलने के पहले प्रिया ने प्रशांत बाबू से फोन पर बात की. पता लगा कि पिकेटिंग समाप्त कर दी गई है. अब वे और रामजी काका आठ बजे तक मेवाड़ भोजनालय पहुँचेंगे. प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे तब तक दोनों वहाँ पहुँच चुके थे. प्रशांत बाबू ने उन्हें विस्तार से सारी स्थिति बताई.

प्रिया ने सब कुछ गंभीरता से सुना. उसने महसूस किया कि यह जीत विधिक से ज्यादा रणनीतिक है. उसने प्रशांत बाबू से पूछा, "क्या यह एडवांस वेतन देना उनकी कोई नई चाल तो नहीं? क्या वे इसके जरिए क्लोजर वाले मामले को कमजोर करना चाहते हैं और फैक्ट्री मालिकों और सरकार के बीच की जुगलबंदी कोई चक्रव्यूह न रच रही हो?"

प्रशांत बाबू उसका सवाल सुन कर मुस्कुराए, “तुम बहुत होशियार हो, एकदम सही बिन्दु पर पहुँच जाती हो प्रिया. वे एएसएल के सामने कल यह कह सकते हैं कि 'देखिए, हमने तो मजदूरों को एडवांस दे दिया है, हम उनके भले की सोच रहे हैं, लेकिन घाटे के कारण अब हम चला नहीं सकते'. वे अपनी छवि सुधारने की कोशिश करेंगे. लेकिन हम कल उन्हें इस जाल में नहीं फंसने देंगे. कल हमें यह साबित करना ही होगा कि क्लोजर का आवेदन केवल एक ढोंग है."
... क्रमशः

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