@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: हमारी जड़ें

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

हमारी जड़ें

देहरी के पार, कड़ी - 25
यह शनिवार प्रिया को करीब एक माह बाद नसीब हुआ था. उसे कहीं नहीं जाना था. लेकिन मुंबई के अंधेरी ईस्ट के जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहाँ उसके लिए बहुत था. फ्लैट की सफाई करनी थी, कपड़ों की धुलाई करनी थी. किराना और दूसरा जो भी सामान समाप्त हो गया था या होने वाला था और जरूरत का जो सामान वह मुम्बई आने के बाद से नहीं खरीद पाई थी, उसकी सूची बनानी थी. समय मिलने पर बाजार से खरीदकर लाना भी था. पिछले चार वीकेंड से वह यूनियन ऑफिस और ईसीआई फैक्ट्री के कामों में व्यस्त रही थी. फिलहाल इन कामों से उसके निजी जीवन का कोई वास्ता न था. लेकिन उसे इन कामों में सुकून मिल रहा था. वह समझ रही थी कि वह जो कर रही है, वह एक सही दिशा में बदलाव के लिए काम है. जिनके साथ वह काम कर रही थी उन्हीं लोगों ने उसे विक्रांत से लड़ने की हिम्मत दी थी और बराबर साथ दिया था. इसी कारण वह उससे निजात पा सकी थी. उसे तो अभी पता तक नहीं था कि विक्रांत अभी भी जेल में है अथवा जमानत पर छूटकर बाहर आ चुका है.

सुबह आठ से दस बजे तक उसने अपनी मैड के साथ मिलकर उसने फ्लैट की सफाई की. इससे उसे यह ठीक-ठीक पता भी लग गया कि उसे बाजार से किन वस्तुओं की खरीद करनी है. सामानों की सूची बनाकर ग्यारह बजे वह बाजार के लिए निकली तो सामान खरीदते हुए करीब एक बजे उसे भूख लगने लगी थी. वह पास ही मेवाड़ भोजनालय जा पहुँची.

रामजी काका वहाँ नहीं थे. लेकिन स्टाफ ने बेटी की तरह उसका स्वागत हुआ. उसने तुरंत खाना लगाने को कहा. उसने खाना शुरू भी नहीं किया था कि रामजी वहाँ पहुँच गए. जब तक उसने खाना खाया, उसके साथ बैठे बात करते रहे. उन्होंने उसके माता-पिता और भाई के बारे में पूछा. आकाश उसके माता-पिता और बहिन तान्या के बारे में पूछा. उसे पिछले दिनों अपनी प्रोफेशनल चुनौतियों और यूनियन के कामों के बीच उन सबसे बात करने का ध्यान ही नहीं रहा था. उधर से भी बस माँ के सिवा किसी का फोन इस बीच नहीं आया था. उसने रामजी काका को यह बात बताई तो वे बहुत नाराज हुए. कहने लगे, “हम बहुत ही अच्छे काम कर रहे हों. लेकिन हमें उन लोगों को कभी भूलना नहीं करना चाहिए जिनसे हमारी जड़ें जुड़ी हैं. थोड़ा सा समय निकाल कर उनसे भी बात करो. जब कुछ नहीं बचता वे ही काम आते हैं.”

काका की बात सुनकर उसकी आँखें नम हो गईं. उसे बहुत संतोष भी हुआ कि यहाँ मुम्बई में कोई तो है जो उसे परिवार के बुजुर्ग की तरह टोक सकता है और सलाह दे सकता है.

वह जब भी कोटा की बात करती तो अक्सर माँ के फोन पर कॉल करती. उसी पर पापा और मयंक से बात हो जाती थी. लेकिन शाम को उसने मयंक को फोन लगाया.

"नमस्ते दीदी! आज आपको मैं कैसे याद आ गया. मैं तो समझा था आप मुझे भूल ही गईं. सुना है आप वहाँ किसी 'मज़दूर नेता' के साथ मिलकर फैक्ट्री बंद करवा रही हैं?" मयंक की आवाज़ में छोटे भाई वाली शरारत थी, तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई, "अरे उसे डरा मत, पूछ खाना खाया कि नहीं!"

प्रिया मुस्कुरा दी. कोटा की उस स्थिर ज़िंदगी और मुंबई के इस उबलते संघर्ष के बीच का अंतर उसे आज साफ़ महसूस हुआ. "मयंक, मैं फैक्ट्री बंद नहीं करवा रही, जो बंद करना चाहते हैं उनसे लड़ रही हूँ. तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. और पापा को मदद करता है या नहीं? और मम्मी को बता दे कि मैं खाने में कभी चूक नहीं करती. आज भी खा लिया है.”

"ये सही है, तू टाइम से खा लिया कर वरना माँ हमें बात नहीं करने देंगी.”

“तू तेरी पढ़ाई की बता”

“दीदी, पढ़ाई भी ठीक है, पापा की मदद भी करता हूँ. अब तो वे कहते हैं, तेरी एम.कॉम. छोड़ और बिजनेस संभाल अब मुझसे इतना काम नहीं होता.”

“वे तो कहेंगे जब तक तू सब नहीं संभाल लेता. पर तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे और इसे पूरा कर. पता नहीं कब ये काम आ जाए.”

“देता हूँ पर आप जल्दी -जल्दी मुझे फोन किया करो. जयपुर से आकाश भाई का फोन आया था वह भी कह रहे थे कि प्रिया को क्या 'कानूनी भूत' सवार हो गया है जो फोन भी नहीं उठाती."

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की चिमनियाँ रात के अंधेरे में किसी खामोश पहरेदार जैसी लग रही थीं. "मयंक, यहाँ जो मैं देख रही हूँ, वह किसी किताब में नहीं लिखा. जब हज़ारों लोगों का हक छीना जाता है, तो चुप रहना अपराध लगता है. माँ से कहना मैं ठीक हूँ. उनसे कल बात करूंगी."

अगली शाम को यूनियन ऑफिस में एक गंभीर बैठक हुई. रामजी ने सुझाव रखा, "प्रशांत बाबू, हड़ताल को चार सप्ताह हो चुके हैं. मजदूरों के घरों में राशन कम होने लगा होगा. क्यों न हम फैक्ट्री गेट पर जहाँ पिकेटिंग करते हैं वहीं 'सामूहिक रसोई' शुरू कर दें?"

प्रशांत बाबू ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और कुछ देर सोचा. यूनियन के सचिव शिंदे ने तुरंत टोक दिया, "काका, विचार अच्छा है पर व्यावहारिक नहीं. हमारे मज़दूर कल्याण और टिटवाला तक फैले हैं. वे यहाँ अकेले खाने आएंगे तो पीछे परिवार क्या करेगा? और आना-जाना खाने से महँगा पड़ेगा. अभी तो पिछले महीने की पगार हाथ में है, सबने हाथ खींचकर खर्च किया है, इसलिए एक महीना तो निकल जाएगा."

शिंदे की बात में दम था. रामजी काका थोड़ा ठिठके, "बात तो सही है शिंदे. लेकिन अगले 40-50 दिनों बाद जब जेब पूरी खाली होगी, तब क्या करेंगे? हमें कोई ऐसा तरीका सोचना होगा जिससे राशन हर घर तक पहुँचे, न कि लोग राशन तक आएँ."

तभी प्रशांत बाबू बोल उठे. “उस बारे में हम अगले सप्ताह बात करेंगे, रामजी. आज हमें क्लोजर वाले मुकदमे की रणनीति पर बात करनी है. चव्हाण भाई नीचे ऑफिस में प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह मीटिंग हमें यहीं खत्म करनी होगी.”
... क्रमशः

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