@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: जज़्बा

रविवार, 12 अप्रैल 2026

जज़्बा

देहरी के पार, कड़ी - 22
प्रशांत बाबू, प्रिया और उसके साथी लंच के दौरान भी ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के फर्जीवाड़े की बारीकियों पर बात करते रहे. फर्जीवाड़ा सामने आने से उनका हौसला बढ़ गया था. सबके चेहरों पर एक नई चमक थी. प्रशांत बाबू के पास आज कार थी. पाँचों उसी से फैक्ट्री गेट पहुँचे. चार बजने में समय था. आमसभा की तैयारी पूरी थी. दोनों शामियाने एक ही ओर तान कर एक लंबा पंडाल बना दिया गया था. अब उसमें ढाई सौ से अधिक लोग बैठ सकते थे. इतने ही मजदूरों के एकत्र होने की संभावना थी. लेकिन चार बजते-बजते पंडाल पूरा भर गया. उसके बाद भी मजदूर आते जा रहे थे. मंच से आग्रह हुआ कि लोग बीच की जगह को कम करते हुए आगे खिसकें. जिससे बाद में आने वालों को बैठने में परेशानी न हो. मजदूरों ने आगे खिसककर जगह बनाई तो आने वाले कुछ मजदूर वहाँ बैठ गए. फिर भी काफी लोग खड़े रह गए.

हड़ताल का सातवाँ दिन था. उमस भरे दिन और खाली जेबों की चिंता के बीच मज़दूरों के चेहरों पर एक गंभीर सन्नाटा था. 'ट्रक सिस्टम' के शोषण ने उनके पास बचत के नाम पर कुछ नहीं छोड़ा था. 'अगली 10 तारीख' का डर सबके मन में था, जब उन्हें मासिक वेतन नहीं मिलने वाला था. यदि क्लोजर मंजूर हो जाता तो छंटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी का पैसा उसके भी 65 दिन बाद उन्हें मिलता. इस तरह उनके सामने दो माह से अधिक घर चलाने की समस्या थी. सभी मजदूर वैसे ही बमुश्किल जी रहे थे. हड़ताल के दिन से ही उन्होंने हर तरह के खर्च पर लगाम लगा ली थी. खाने-पीने के बजट तक में कटौती कर दी थी.

प्रिया की टीम ने सभास्थल से 50 फुट दूर एक चाय की गुमटी के बाहर रखी बेंचों में से एक पर अपना अड्डा जमा लिया था. कुछ देर बाद रामजी काका भी आ गए वे भी उनके साथ बेंच पर बैठ गए और गुमटी वाले को पाँचों के लिए चाय देने को कहा.

यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."

उन्होंने प्रिया की टीम की तैयार की हुई 'एनालिसिस रिपोर्ट' हवा में लहराई. "हमारे तकनीकी विशेषज्ञ मित्रों ने 24 घंटों से भी कम में कंपनी की बैलेंस शीटों का पोस्टमार्टम करके साबित कर दिया है कि जिसे ये 'घाटा' बता रहे हैं, वो असल में ''ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' के नाम पर की गई चोरी है. जिस साल आपका वेतन स्थिर रहा, उसी साल इन अफसरों के खर्चे चार गुना बढ़ गए! यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसको मेन्युफेक्चर किया गया है. हमारे साथियों ने मैनेजमेंट के सारे फर्जीवाड़े को उजागर कर दिया है."

जैसे ही 'आंकड़ों के फर्जीवाड़े' की बात हुई, मज़दूरों के बीच एक गुस्से की लहर दौड़ गई. जो मज़दूर अब तक क्लोजर के नाम से डरे हुए थे, उनकी आँखों में अब गुस्से की चमक थी. एक ने नारा लगाया, "शेम-शेम" सबने ऊंची आवाज में  उसका उत्तर दिया, "शेम-शेम".

प्रशांत बाबू माइक पर आए. वे इस उद्योग के मजदूरों की यूनियन के सदस्य या पदाधिकारी न होते हुए भी मजदूरों के बीच सर्वप्रिय नेता थे, मजदूरों का उन पर भरोसा था. उन्होंने सीधा सवाल किया, "अगले माह वेतन नहीं मिलेगा. प्रबंधन ने क्लोजर का जाल बिछाया है ताकि आप डरकर घुटने टेक दें. यह भी हो सकता है कि सरकार क्लोजर की मंजूरी दे दे और 90 दिन बाद कारखाना बंद हो जाए. वैसी स्थिति में आपको छँटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी ही मिलेंगे. प्रोविडेंट फंड तो वैसे भी आपका ही है. इसलिए हमें एक बार फिर याद करना पड़ेगा कि इस सप्ताह के शुरू में जब हमने हड़ताल शुरू की थी तब आपने ही एक स्वर में कहा था कि, “हम ‘ट्रक सिस्टम’ समाप्त होने और फेयर वेजेज लागू किए बिना काम पर नहीं जाएंगे. चाहे नौकरी क्यों न चली जाए.”

अब हमारे पास दो रास्ते हैं—या तो हम इस फर्जीवाड़े के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ते हुए हड़ताल जारी रखें, या फिर फिलहाल पुरानी शर्तों पर काम पर लौट जाएं. और क्लोजर पर सरकार के फैसले तक इंतजार करें. इससे आपको अगले तीन माह के वेतन मिल जाएंगे. फैसला आपका है."

सभा में एक पल के लिए भारी खामोशी छा गई. तभी एक अधेड़ उम्र का मज़दूर, जिसके हाव-भाव से ही अनुभव और गंभीरता का अहसास होता था खड़ा हुआ माइक हाथ में लिया.

"साथियों," उन्होंने गूँजती आवाज़ में कहा, "मालिक कहता है कि कारखाना उसका है. अरे, इस कारखाने की एक-एक मशीन हमने अपने हाथों से लगाई है, इस कारखाने की ईंट-ईंट हमारे पसीने से भीगी है. जब हम निर्माण कर सकते हैं, तो हम मजदूर इसके असली मालिक हैं. और जो मालिक कहलाता है, वह बकौल बापू गांधी केवल ट्रस्टी है. अब ये ट्रस्टी एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर हमारे हक को निगल रहे हैं?"

मज़दूरों के बीच से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा गूँजा. अधेड़ मज़दूर ने आगे कहना जारी रखा, "उस 'ट्रक सिस्टम' की गुलामी में वापस जाने से बेहतर है कि हम बाहर फावड़ा चला लें, गड्ढे खोद लें. हम इस बेईमान मैनेजमेंट के आगे अपना आत्मसम्मान नहीं खोएंगे. हड़ताल जारी रहेगी और अब हम क्लोजर का जवाब कोर्ट में देंगे!"

मज़दूरों को हड़ताल होने से पहले की मीटिंग याद आई. जब फैसले के लिए हाथ उठवाए गए कि हड़ताल जारी रखी जाए या स्थगित कर दी जाए तो बहुमत ने एक स्वर में हड़ताल जारी रखने का निर्णय लिया. रामजी काका, सोच रहे थे, अब जब मजदूरों के घरों की रसोइयों पर संकट गहराएगा, तब 'सामूहिक रसोई' चालू करनी ही पड़ेगी.

प्रिया ने दूर से ही प्रशांत बाबू को सिर हिलाकर संकेत दिया. उसे अहसास हुआ कि कोडिंग और डेटा एनालिसिस केवल कागज थे, असली ताकत तो शोषण के विरुद्ध खड़े होने का वह 'जज़्बा' है जो इन मज़दूरों को खाली जेब होने के बावजूद सीना तानकर खड़े रहने की शक्ति दे रहा था.
... क्रमशः

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