@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: पुर्जा नहीं, इंसान

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

पुर्जा नहीं, इंसान

देहरी के पार, कड़ी - 16
रविवार शाम चार बजे मुंबई की उमस के बीच, प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी वेस्ट के एक पुराने औद्योगिक इलाके में 'IIDEA' के कार्यालय पहुँचे. बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर एक लंबे कमरे के अंत में एक टेबल लगी थी, जिसके पीछे की कुर्सी पर एक अधेड़ व्यक्ति बैठा था. कमरे में दोनों ओर दो-दो बेंचें रखी थीं जिन पर कुछ लोग बैठे थे. उन्होंने टेबल के पीछे बैठे व्यक्ति से कहा, “हमें प्रशांत बाबू से मिलना है.”

“वे ऊपर मीटिंग में हैं.” वहाँ बैठे व्यक्ति ने जवाब दिया. “आप कहाँ से आए हैं? और क्या नाम हैं? बता दें, मैं उन्हें खबर भिजवा दूंगा.”

“बस उन्हें कहिए ‘डाटाप्रोस’ से प्रिया और उसके साथी आए हैं.”

उसने एक व्यक्ति को अंदर भेजा. पाँच मिनट बाद वह लौटा और बोला, “आपको ऊपर बुलवाया है.”

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

“आओ, तुम लोग बिलकुल समय से आए हो. कुछ देर बाद एक महत्वपूर्ण मीटिंग शुरू होने वाली है. मैं चाहता हूँ तुम सब उसमें दर्शक के रूप में बैठो. बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“हम उसमें शामिल होंगे, लेकिन पहले हम यूनियन की सदस्य बनना चाहते हैं.”

“मैं तुम्हें फॉर्म देता हूँ, इन्हें भर दीजिए और उस पर बने क्यूआर कोड को स्कैन करके अपनी सदस्यता शुल्क पे कर दीजिए.” प्रशांत बाबू ने चार फॉर्म निकाल कर प्रिया को दिए, चारों ने वहीं बैठकर उन्हें भरा, शुल्क भुगतान की. प्रशांत बाबू ने फार्म के निचले हिस्से पर अपने हस्ताक्षर करके उन्हें रसीद दे दी.

“आपकी यूनियन का नाम ‘डेमोक्रेटिक आईटी एम्पलॉइज एसोसिएशन’ यह 'IIDEA' से एफिलिएटेड है. मैं इस यूनियन की मुम्बई इकाई का सैक्रेटरी हूँ. एसोसिएशन के सदस्य बन कर तुम सब एक व्यापक ‘श्रम शक्ति’ का हिस्सा बन गए हो.”

कुछ देर में पास वाले हॉल में मीटिंग आरंभ हो गयी. वे सब भी उसी हॉल में जा बैठे.

मीटिंग में 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के लगभग 150 मज़दूर जमा थे. यह कारखाना इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) बनाता था. चर्चा से पता चला कि दस साल पहले मालिक ने एक अजीब समझौता किया था. जब मज़दूरों ने महंगाई के कारण वेतन बढ़ाने की मांग की, तो मालिक ने कहा— "मैं वेतन नहीं बढ़ाऊंगा, लेकिन कारखाने की अपनी 'एम्प्लॉइज शॉप' पर आपको राशन और दूसरी सब जरूरी चीजें उसी पुराने दाम पर मिलेंगी जो आज हैं."

शुरू में यह लुभावना लगा, लेकिन वक्त के साथ दुकान के बाहर की दुनिया में 'महंगाई' आग लगा चुकी थी. बच्चों की स्कूल फीस, अस्पताल का खर्च और बस का किराया उस से नहीं मिल सकता था. मज़दूरों ने अब फिर से यूनियन बनाई और अपना मांग-पत्र दिया.

मांग पत्र पर मालिक का जवाब सीधा और क्रूर था— "हड़ताल की, तो मैं यह यूनिट पंजाब ले जाऊँगा. तुम सब सड़क पर आ जाओगे."

मीटिंग में 'IIDEA' के कानूनी सलाहकार, एक सीनियर वकील मौजूद थे उन्होंने अपनी राय मजदूरों के सामने रखी: "कानूनी रूप से मालिक को अपना व्यापार कहीं भी ले जाने का हक है. अगर उसने ऐसा किया, तो आप सब बेरोजगार हो जाएंगे. यह आपको सोचना है कि क्या आप फिर भी हड़ताल का जोखिम उठाने को तैयार हैं या नहीं?"

कुछ पल की खामोशी के बाद एक अधेड़ उम्र का मज़दूर खड़ा हुआ. उसके हाथ आईसी बनाने के काम से कुछ काले पड़ गए थे. उसने कड़क आवाज़ में कहा— "साहब, बेरोज़गारी का डर दिखाकर वह हमें गुलाम बनाए रखना चाहता है. इन शर्तों पर काम करना भी तो धीरे-धीरे मरने जैसा ही है. हम कुछ भी कर लेंगे, फुटकर मजदूरी कर लेंगे, लेकिन इस ज़िल्लत में काम नहीं करेंगे. हम हड़ताल करेंगे!"

उसके बाद मजदूरों का आव्हान किया गया कि, ‘वे हड़ताल के विषय अपनी मंच पर आकर रखें. और वे मजदूर अवश्य अपनी बात रखें जो हड़ताल के विरुद्ध राय रखते हों. यदि हड़ताल होती है तो बाद में कोई यह नहीं कहे कि वह हड़ताल के विरुद्ध है’. इसके बाद कुछ हाथ उठे, उन सब मजदूरों ने मंच पर आकर एक-एक करके अपनी राय रखी. अंत में यूनियन के पदाधिकारियों ने आपस में कुछ बात की, फिर सैक्रेटरी ने सब मजदूरों से कहा, “यूनियन कार्यसमिति की राय है कि हमें मालिक को एक सप्ताह का समय और देना चाहिए और उसके बाद के सोमवार से हड़ताल कर देना चाहिए. जो भी इस राय के विरुद्ध हो वह हाथ खड़ा करे, उसे अपनी राय रखने का अवसर दिया जाएगा.

किसी मजदूर ने हाथ नहीं उठाया. कुछ देर इंतजार करने के बाद सैक्रेटरी ने कहा जो हड़ताल के साथ है वे हाथ उठाएँ. मजदूरों ने हाथ उठाए. हाथ गिने गए. उसके बाद सैक्रेटरी ने कहा कि, “सर्वसम्मत राय है कि आज से ठीक आठवें दिन सोमवार को सुबह की शिफ्ट के साथ हड़ताल आरंभ होगी.”

इसके बाद सैक्रेटरी ने नारा लगाया, ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद¡’ सब मजदूरों ने नारे का बुलंदी से जवाब दिया. उनकी आवाज़ों में एक अजीब सा तालमेल था, बिलकुल 'हीरे के अणुओं' की उस मजबूती जैसा जिसके बारे में प्रशांत बाबू ने उन्हें बताया था.

प्रशांत बाबू मंच पर आए. उनकी नज़रें प्रिया पर पड़ीं, जो सन्न होकर यह सब देख रही थी. प्रशांत बाबू ने गरजती हुई आवाज़ में कहा: "जब जीवन का संकट बेरोज़गारी के डर से बड़ा हो जाए, तो नेतृत्व का काम रास्ता दिखाना होता है. हम यहाँ केवल चंद रुपयों के लिए नहीं, बल्कि अपने 'अधिकारों' और 'मनुष्य की गरिमा' के लिए लड़ेंगे. सारा मज़दूर एकमत है, IIDEA इस लड़ाई का नेतृत्व करेगा. हम हड़ताल करेंगे!"

हॉल फिर से 'मजदूर एकता ज़िंदाबाद' के नारों से गूंज उठा. प्रिया ने एक सच्चा जनतंत्र वाद देखा था उसे अहसास हुआ कि 'देहरी के पार' की दुनिया केवल जैसे विक्रांत व्यक्तिगत दुश्मनों से लड़ने के बारे में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से टकराने के बारे में भी है जो इंसान को मशीन का एक पुर्जा समझती है.
... क्रमशः

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