@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: खेद

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

खेद

कथा श्रृंखला : देहरी के पार
प्रिय पाठकों,

मेरा मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है. मैंने बचपन से ही बहुत पढ़ा, और जब भी विदेशी साहित्य पढ़ा तो उनकी 'तथ्यात्मक सटीकता' ने मुझे प्रभावित किया. इसके उलट, अक्सर भारतीय फिक्शन, सिनेमा और टीवी में स्थान, काल, विज्ञान और विशेषकर 'कानूनी प्रक्रियाओं' को लेकर गंभीर त्रुटियाँ देखने को मिलती हैं. एक पाठक अक्सर इन जानकारियों को सत्य मान लेता है, जिसका खामियाजा उसे वास्तविक जीवन में उठाना पड़ सकता है.

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती है—लिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

परंतु, कभी-कभी शोध की गहनता या कुछ अपरिहार्य व्यवधानों के कारण यह लय टूट जाती है. कल इसी कारण और कुछ प्रोफेशनल व्यस्तता के कारण श्रृंखला की अगली कड़ी समय पर प्रकाशित नहीं हो सकी. मुझे पता है कि आप उत्सुकता से इसका इंतज़ार करते हैं और आपके व्यक्तिगत संदेशों ने मुझे आपकी इसी प्रतीक्षा और स्नेह का अहसास कराया.

आपके समय और इस 'इंतज़ार' के प्रति मैं अपनी संवेदनशीलता व्यक्त करता हूँ. पाठकों को हुई निराशा के लिए मुझे खेद है. मेरी कोशिश रहेगी कि यह सिलसिला नियमपूर्वक चलता रहे और मैं अपने शोध पूर्ण लेखन के माध्यम से निरंतर आपके साथ बना रहूँ.

स्नेह और आभार,

@दिनेशराय द्विवेदी

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