@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: दोहरी लड़ाई

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दोहरी लड़ाई

देहरी के पार, कड़ी - 23
'इलेक्ट्रो सर्किट इंडिया' (ECE) उद्योग के मजदूरों की आमसभा जज्बे और जोश के साथ हड़ताल को जारी रखने के निर्णय के साथ समाप्त हुई थी. रविवार का दिन आराम का नहीं बल्कि आगे की रणनीति तय करने और उस पर काम करने का था. प्रशांत बाबू, प्रिया, यूनियन के अध्यक्ष व मंत्री और सीनियर वकील रमेश चव्हाण के बीच लंबी बैठक चली.

राज्य के श्रम विभाग से फैक्ट्री के क्लोजर की अनुमति वाले मामले में अभी सुनवाई की तारीख की कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई थी. वकील चव्हाण का सुझाव था कि, “हमें आवेदन की सूचना प्राप्त हो चुकी है, सुनवाई की तारीख तय हो उससे पहले हमें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स मैनेजमेंट से पेश कराए जाने और उनकी प्रतियाँ यूनियन को उपलब्ध कराने के लिए श्रम विभाग को आवेदन पेश कर देना चाहिए. इस रेकॉर्ड के मुकाबले अन्य उद्योगों के ऑडिटेड रिकार्ड से तुलना करके हम फर्जी बिलों के जरीए बड़े मुनाफे को घाटे में दिखाए जाने वाले फर्जीवाड़े को साबित कर सकेंगे. हम यह आवेदन कल ही दे दें तो हमारा समय बचेगा. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि सुनवाई आवेदन के 50वें दिन तक पूरी हो जाए जिससे डीम्ड क्लोजर की संभावना नहीं रहे.”

सुझाव एकदम सही था, सभी इससे सहमत थे. प्रशांत बाबू ने एक समस्या सामने रख दी. “लेकिन कॉमरेड चव्हाण, हम अन्य उद्योगों के खर्चों के ऑडिटेड रिकॉर्ड कहाँ से लाएंगे?”

“उसके लिए मैं एक सीए फर्म को जानता हूँ , जो अनेक उद्योगों का ऑडिट करती है. वह इस तरह का रिकार्ड उपलब्ध करवा सकती है और प्रमाणित करने वाला सीए यह बयान भी दे सकता है कि ये खर्चे उसने खुद उस कंपनी की बुक्स का ऑडिट करके प्रमाणित किए हैं. बस उसे इसका कुछ शुल्क देना पड़ेगा.”

“शुल्क हम यूनियन फंड से दे देंगे, बहुत अधिक तो नहीं होगा न?” यूनियन अध्यक्ष शिंदे ने पूछा.

“नहीं बहुत अधिक नहीं होगा. वे सीए मजदूरों के हमदर्द हैं. हमारी पार्टी को नियमित रूप से चंदा भी देते हैं. उनकी फीस बहुत मामूली होगी, वह भी रिकार्ड के लिए.” वकील चव्हाण ने कहा.

अगले दिन सुबह ग्यारह बजे ही यूनियन के अध्यक्ष और मंत्री वकील चव्हाण के साथ श्रम विभाग गए और एडीशनल सेक्रेटरी लेबर से मिलकर अपना आवेदन पेश किया. इतना ही नहीं उन्होंने क्लोजर परमिशन के आवेदन पर पहली सुनवाई के लिए तारीख तय करा दी और मैनेजमेंट तक नोटिस पहुँचाने की व्यवस्था भी कर आए. नोटिस में यह भी हिदायत दी थी कि वे उनके द्वारा पेश की गई बैलेंस शीटों में दिखाए गए 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स प्रस्तुत करें या यूनियन के आवेदन का जवाब दें. अब गेंद प्रबंधन के पाले में थी.

बुधवार की दोपहर ईसीई फैक्ट्री के गेट पर लगे शामियाने में एक सरकारी चपरासी ने आकर यूनियन अध्यक्ष शिंदे को एक पत्र दिया. श्रम विभाग ने सूचना भेजी थी कि मजदूरों के मांग पत्र और हड़ताल के मामले में प्रबंधन और यूनियन दोनों के प्रतिनिधि समझौता वार्ता के लिए जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में पहुँचें.

शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में भारी तनाव था. एक तरफ प्रबंधन के सूट-बूट पहने प्रतिनिधि थे, दूसरी तरफ प्रशांत बाबू और यूनियन के पदाधिकारी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन प्रतिनिधि ने अपनी लिखित टिप्पणी प्रस्तुत की. उनका प्रस्ताव चालाकी से भरा था. प्रबंधन प्रतिनिधि ने मौखिक रूप से कहा, "हम 'ट्रक सिस्टम' को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते, लेकिन इसमें सुधार के लिए तैयार हैं. हम सामानों की एक सूची बनाएंगे—रोजमर्रा की जरूरत का किराना, स्टेशनरी आदि चीजें 'एम्पलॉइज शॉप' पर दस साल पहले वाली कीमतों पर मिलती रहेंगी, और बाकी चीजों के बदले हम वेतन में भत्ता (Allowance) जोड़ देंगे. लेकिन मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए हम मूल वेतन (Basic Salary) बढ़ाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं."

समझौता अधिकारी (Conciliation Officer) ने प्रबंधन की टिप्पणी को गौर से देखा. उन्होंने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और दो टूक लहजे में कहा, "देखिए, हमारा विभाग किसी भी ऐसी व्यवस्था को मान्यता नहीं देगा जो 'ट्रक सिस्टम' के किसी भी रूप को बरकरार रखती हो. यह पद्धति हमारी सरकार पूरी तरह से अनुचित घोषित कर चुकी है. वह इसके किसी भी रूप को बनाए रखने के लिए तैयार नहीं है. हम ऐसा कोई समझौता नहीं रजिस्टर नहीं करेंगे जिसमें मजदूरों को मजबूरन कंपनी की दुकान से सामान खरीदना पड़े. ट्रक पद्धति को तो खत्म करना ही होगा, इस पर किसी तरह का कोई मोलभाव नहीं होगा."

प्रबंधन प्रतिनिधि ने कुछ कहना चाहा, लेकिन अधिकारी ने उन्हें रोक दिया. "फिलहाल आप ट्रक पद्धति के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करें. वेतन वृद्धि और अन्य मांगों पर हम अगली बैठक में बात करेंगे."

उधर, एडीशनल सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से भी प्रबंधन को तगड़ा झटका लगा. उन्हें आदेश मिला कि, “शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करें.”

फैक्ट्री गेट पर पिकेटिंग कर रहे मजदूरों को जब खबर दी गयी कि श्रम विभाग ने 'ट्रक सिस्टम' को सिरे से खारिज कर दिया है और एडीशनल सैक्रेटरी ने प्रबंधन को शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करने का आदेश दिया गया है, तो वे उत्साह से भर उठे. पंडाल में मजदूरों के आपस में बोलने से कोलाहल बढ़ गया. इस शोर तथा मजदूरों को फिर से सभा के अनुशासन में लौटने के लिए सैक्रेटरी ने जोर से नारा लगाया.

“इंकलाब – ज़िंदाबाद.”

मजदूरों ने बिखरा सा उत्तर दिया, “इंकलाब जिन्दाबाद”.

सैक्रेटरी ने तीन बार यही नारा लगाया. हर बार मजदूरों की आवाज बढ़ती रही. चौथी बार में नारे ने औद्योगिक क्षेत्र गुंजा दिया.

इसी बीच मजदूरों के बीच किसी पंजाबी मजदूर ने नारा लगाया, “साड्डा हक़ ले के रहेंगे.”

“ले के रहेंगे... ले के रहेंगे. ” तमाम मजदूरों ने पूरे जोश से उत्तर दिया.
... क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं: