@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: आँकड़ों के पीछे

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

आँकड़ों के पीछे

देहरी के पार, कड़ी - 29
वकील रमेश चव्हाण के ऑफिस से बाहर निकलकर प्रिया ने देखा कि घड़ी में साढ़े नौ बज रहे हैं. घर जाकर खाना बनाने में ग्यारह बज जाएंगे. वहाँ से ऑटो पकड़कर वह एमबी (मेवाड़ भोजनालय) पहुँची. रामजी काका काउंटर पर ही मिल गए. डिनर का पीक टाइम था. दोनों हॉल खचाखच भरे थे. उसने स्थिति देखकर कहा, “काका, आज बहुत भागदौड़ हो गयी है. सुबह एएसएल का ऑफिस, फिर अपना ऑफिस, फिर चव्हाण साहब के यहाँ. अब इन्तजार करना मुश्किल है. आप खाना पैक करवा दो.”

“बिटिया, तुम्हारे लिए एमबी में हमेशा जगह है. तुम्हें पता है पीछे यहाँ काम करने वालों का रेस्टरूम है, इस वक्त खाली है तुम वहाँ पहुँचो, मैं वहीं खाना लगवाता हूँ. बस बता दो क्या खाओगी?”

भोजन की व्यवस्था ऐसे होगी. प्रिया ने सोचा नहीं था. वह भोजन करके सीधे अपने फ्लैट पहुँची. शरीर की थकान कह रही थी कि वह कपड़े बदले बिना ही सो जाए. लेकिन दिमाग कहता था कि एक बार सरसरी तौर पर शपथ पत्र और उनके साथ पेश किए दस्तावेज देख लिए जाएँ, जिससे उन पर सोचने की प्रक्रिया आरंभ हो ले. वह जानती थी कि दिमाग कभी विश्राम नहीं करता. सोते समय वह मेमोरी को संगठित करके पक्का (Memory Consolidation) करता है. दिन भर की जानकारियों को छांटता है. जरूरी बातें लॉन्ग-टर्म मेमोरी में भेजता है और फालतू चीजें हटा देता है. इसके अलावा वह नींद में भी सक्रिय रूप से समस्याओं और प्रश्नों के समाधान तलाशता है.

प्रिया ने शपथ पत्र पढ़े और साथ के साथ जहाँ उनमें दस्तावेजों का उल्लेख आता गया वह दस्तावेजों को भी संदर्भ के साथ देखती गयी. रात बारह बजे बाद जब वह सोने गई तब उसके दिमाग में पूरा ख़ाका बन गया था कि प्रबंधन इनसे क्या साबित करना चाहता है. अब उसके दिमाग में प्रश्न था कि उसे कौनसी सूचनाएँ तलाशनी चाहिए जिनसे वह प्रबंधन के मुद्दों को असिद्ध कर सके और श्रमिक पक्ष को सिद्ध कर सके. इसी प्रश्न को जेहन में लिए उसे नींद आ गई.

पूरे सात घंटे की नींद लेकर सुबह सवा सात बजे उसकी नींद खुली. नित्य की तरह दो गिलास पानी पीकर उसने गैस पर चाय के लिए पानी चढ़ाकर, मंजन करते करके उसे ध्यान आया कि फैक्ट्री इलेक्ट्रॉनिक सर्किट (IC) बनाती है, इसलिए यहाँ काम आने वाला कच्चा माल सिलिकॉन वेफर्स और फोटोरेसिस्ट केमिकल्स जैसे संवेदनशील सामान की हेरफेर को पकड़ना ही प्रबंधन को बेनकाब करने का रास्ता हो सकता है. आज यदि वह सुबह का नाश्ता एमबी में करे तो उसे समय मिल जाएगा. जिसमें वह कल मिले दस्तावेजों की सामग्री को डिजिटल डाटा में बदल सकती है. इस डाटा और शपथ पत्रों की प्रतियों को वह राहुल, स्नेहा और आदित्य को भी दे दे तो वे भी कोई काम की चीज तलाश सकते हैं. इससे आज की शाम चार लोग काम करके कुछ न कुछ ऐसा जरूर तलाश सकते हैं जो प्रबंधन के गवाहों के लिए सरप्राइजिंग हो और जिससे क्लोजर के आधार को मिथ्या सिद्ध किया जा सके. उसने यही किया. उस शाम चारों ने एमबी से अपना डिनर पैक करवाया और घर जाकर इस काम में जुट गए.

रात दस बजे आदित्य की वीडियो काल आई, उसने चारों को कॉन्फ्रेंस पर ले रखा था.

“ईसीआई फैक्ट्री के 'इन्वेंट्री डेटा' और 'परचेज़ लेज़र' के डाटा को एक साथ खोल कर देखो.” आदित्य ने कहा.

तीनों ने अपने लैपटॉप पर इन्हें खोला.

“अब शपथ पत्र से इन्हें मिलाकर देखो.”

प्रिया ने मिलान करके देखा तो वह उछल पड़ी. वहाँ जीएम के शपथ-पत्र में लिखा था, 'सिलिकॉन वेफर्स' की वैश्विक कमी के कारण उत्पादन ठप पड़ा है. लेकिन मार्च के 'स्टॉक रजिस्टर' 5,000 यूनिट्स का ओपनिंग बैलेंस दिखा रहा था. उधर अप्रैल की शुरुआत में कोई 'सेल्स एंट्री' नहीं थी. अगर माल नहीं बना, तो ये वेफर्स कहाँ गायब हो गए थे?"

“ये तो बहुत जबर्दस्त बात है. मैं नोट कर रही हूँ.”

“इसके आगे कुछ और भी है,” आदित्य ने कहा. “प्रिया, IC बनाने में इस्तेमाल होने वाले फोटोरेसिस्ट रसायनों की शेल्फ-लाइफ बहुत कम होती है. हड़ताल के कारण फैक्ट्री में तो उत्पादन बंद था. फिर पिछले हफ्ते इन महंगे रसायनों को 'डिस्पोज' करने का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं है? फैक्ट्री में चोरी छिपे तो उत्पादन हो नहीं सकता. मजदूर गेट से चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं. यह माल जरूर कहीं और डाइवर्ट किया जा रहा है."

“तुम ठीक कह रहे हो आदित्य. सुबह चव्हाण साहब को बताते हैं. किसी और के पास और कुछ न हो तो अब काम बन्द करके सोने जाया जाए?”

“हाँ बिलकुल.” सबने उत्तर दिया. कॉन्फ्रेंस समाप्त हुई.

अगली सुबह जयपुर से आकाश का फोन आया. वह पिछले दो दिनों से कोटा में प्रिया के घर के आसपास ही था. उसने बताया कि वह काली संदिग्ध गाड़ी अब वहाँ नहीं दिख रही है. आकाश ने मयंक और पापा को स्थानीय पुलिस स्टेशन ले जाकर 'सर्विलांस' की अनौपचारिक शिकायत दर्ज करवा दी थी.

आकाश ने प्रिया को ढाढस बंधाया, "प्रिया, यहाँ अब सब शांत है. मयंक अब डरा हुआ नहीं है, बल्कि वह उन जासूसों की फोटो खींचने की ताक में है. तुम मुंबई की इस कानूनी लड़ाई पर ध्यान दो. कल 19 अप्रैल का दिन तुम्हारा होना चाहिए."

उस शाम, प्रिया ऑफिस से लौटते हुए यूनियन ऑफिस पहुँची, वहाँ उसने देखा कि रामजी काका और प्रशांत बाबू कुछ पर्चियों का मिलान कर रहे थे. यह हड़ताल का 38वां दिन था और मजदूरों के सब्र का बाँध अब टूटने को था.

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराकर प्रिया को बताया, "आइडिया (IIDEA) से जुड़ी अन्य यूनियनों ने हमारे 350 परिवारों के लिए रसद का इंतजाम किया है. आज रात दस बजे बाद अनाज के बीस-बीस किलो के कट्टे मजदूरों के घरों तक पहुँचना शुरु हो जाएंगे."

रामजी काका ने भावुक होकर कहा, "बेटा, पेट की आग बड़ी जालिम होती है. प्रबंधन ने सोचा था कि भूख हमें घुटनों पर ले आएगी, पर अब कल तुम जब कॉमरेड चव्हाण के साथ अदालत में खड़ी होगी, तब इन 350 परिवारों की एकता की तुम्हारे साथ होगी."

कुछ ही देर बाद वकील रमेश चव्हाण वहाँ पहुँच गए. प्रिया ने 19 अप्रैल के लिए उनके सामने अपना नोट रख दिया जिसमें तीन मुख्य सवाल थे:

1. यदि उत्पादन बंद था, तो क्लीन रूम (Clean Room) को मेंटेन करने के लिए बिजली की खपत 'पीक' पर क्यों थी?

2. स्टॉक रजिस्टर से गायब हुए 5,000 सिलिकॉन वेफर्स का विधिक स्पष्टीकरण क्या है?

3. क्या 'वेस्ट डिस्पोजल' के नाम पर असल में तैयार IC को फैक्ट्री से बाहर भेजा गया?

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की लाइटें जल रही थीं. उसे यकीन हो गया कि कल की जिरह केवल एक विधिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की स्थापना होगी जिसे प्रबंधन ने फाइलों के नीचे दबा रखा था.
... क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं: