@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: सन्नाटे की गूँज

सोमवार, 9 मार्च 2026

सन्नाटे की गूँज

पिंजरा और पंख-52

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-2
शनिवार की शाम हवा में एक अजीब सा भारीपन था. अनिल चाचा ऑफिस से जल्दी आ गए. झटपट चाय पी, कपड़े बदले और खड़े हो गए, “मैं होटल ऋतुराज जा रहा हूँ, मेहमान आने वाले होंगे. वहाँ उन्हें रिसीव करने वाला कोई होना चाहिए.”

करीब सात बजे इंदौर वाले मेहमान अपनी बड़ी गाड़ी के साथ होटल पहुँचे. अनिल चाचा होटल में मेहमानों को चाय पिला कर वापस घर पहुँचे तब तक गुप्ताजी भी फैक्ट्री से वापस आ चुके थे. चाचा का उत्साह सातवें आसमान पर था. "भाई साहब, मेहमान होटल पहुँच गए हैं. थोड़ी देर आराम करके वे डिनर के लिए तैयार हो जाएंगे. हमें नौ बजे तक डिनर के लिए होटल पहुँच जाना चाहिए. वहीं लड़का देख लेंगे और दोनों परिवार मिल लेंगे, बातचीत हो जाएगी. शगुन घर ही रहेगी, वैसे भी मेहमानों के सामने उसे कल सुबह ही आना चाहिए."

शगुन अपने कमरे की खिड़की से देख रही थी कि कैसे पापा, मम्मा, चाचा और आयुष होटल के लिए निकल रहे हैं. आयुष ने जाते-जाते एक नज़र शगुन की ओर देखा, उसकी आँखों में एक चेतावनी थी.

घर अब खाली था. शगुन के लिए यह सन्नाटा नया नहीं था, लेकिन आज इस सन्नाटे में एक अजीब सी ताकत थी. उसने रसोई में जाकर अपने लिए चाय बनाई. उसने सोचा, "वहाँ होटल में इस वक्त मेरे भविष्य के बारे में बातें हो रही होंगी. शादी कैसे करनी है? क्या लेन-देन होना है, सारी शर्तों पर बातें हो रही होंगी. वहाँ पूरा परिवार है, बस मैं ही नहीं हूँ, जिसके बारे में उन्हें निर्णय करने हैं. कितना विचित्र है यह? और बरसों से चला आ रहा है कि एक लड़की के भविष्य के बारे में पूरा परिवार विमर्श करता है बस उस लड़की को ही छोड़ दिया जाता है. क्या यही मैं भी होने दूँ? नहीं, मैं यह कैसे होने दे सकती हूँ? मैं अपने अस्तित्व को किसी अनजान के अस्तित्व में विलीन नहीं होने दूंगी. मुझे अपनी पहचान खुद बनाना है.”

रात ग्यारह बजे घर के बाहर कार रुकी. मम्मा के हाथ में शगुन के लिए खाने का बैग था. वे थकी हुई और उदास लग रही थीं. अनिल चाचा और पापा नीचे लिविंग रुम में ही बातें करने बैठ गए.

आयुष सीधे ऊपर शगुन के कमरे में पहुँचा. उसके हाथ में शगुन के खाने का बैग था. वह बहुत उत्तेजित और गुस्से में था. "दीदी, वहाँ जो हुआ वह अपमानजनक था. विवेक के पापा और चाचा तो ऐसे बात कर रहे थे जैसे आप कोई वस्तु हों. विवेक की माँ ने तो मम्मा से यहाँ तक कह दिया कि, 'शगुन को समझा दीजियेगा कि शादी के बाद उसे अपनी पढ़ाई और नौकरी की ज़िद छोड़नी होगी. उसे उसकी कोई जरूरत नहीं. हमारे घर में किसी बहू ने आज तक बाहर काम नहीं किया. घर में सब कुछ है. वह घर संभाले, वही उसके लिए बहुत बड़ा काम होगा.' और पापा? वे बस चुपचाप गर्दन झुकाए सुन रहे थे. उनके पास कोई जवाब नहीं था."

शगुन ने आयुष की बात शांति से सुनी. उसने आयुष का हाथ थाम लिया. "आयुष, पापा की चुप्पी उनका डर है, और विवेक की माँ का अहंकार उनकी कंडीशनिंग. उन्हें लगता है कि स्त्रियों का जीवन परिवार और घर के पिंजरे के लिए है. उन्होंने खुद इसे जिया है. उसी में वे खुद को और तमाम स्त्रियों को सुरक्षित समझती हैं. उन्होंने अपनी बहू के लिए अपने यहाँ सुन्दर 'पिंजरा' तैयार किया है. उस पिंजरे के गुण भी उन्होंने खूब बताए होंगे. पर उन्हें पता नहीं कि शगुन उस पिंजरे में रहने को तैयार नहीं है, वह उड़ना सीख चुकी है उसके पंख अब पेरालाइज नहीं हैं."

आयुष ने खाने का बैग मेज़ पर रख दिया. "मम्मा ने कहा है कि खाना खा लेना, लेकिन दीदी, कल सुबह वे लोग तुम्हें देखने आएंगे, और उसी समय दस्तूर के लिए तैयार रहेंगे. चाचा ने पापा को लगभग मना लिया है कि कल ही बात पक्की कर दी जाए और लड़के का तिलक कर दिया जाए. तुम खाना खा लो. मैं छत पर हूँ."

शगुन अपनी 'संबल' नोटबुक के पास गई. उसने फातिमा वाले उस सूखे गुलाब को हाथ में लिया. "कल सुबह का सूरज रामगंजमंडी के लिए एक सामान्य रविवार होगा, पर मेरे लिए यह अपनी मर्यादा और अस्मिता की लड़ाई होगी. आयुष मेरे साथ है, बाकी बात मैं खुद संभालूँगी."

आयुष के जाने के बाद मम्मा आईं. कहने लगी, “लड़का सुन्दर है, उनके कपड़े का होलसेल का बिजनेस है. लड़का भी पहले एमबीए करके एमपीएससी की तैयारी में लगा था. उसके लिए उसने कोचिंग भी की थी. लेकिन बिजनेस में पूरा परिवार लगता है, इसलिए बहुत समझाने पर वह तैयारी छोड़ कर बिजनेस में आ गया. उसके बाद उसने बिजनेस को बहुत बढ़ा लिया. उसके पापा कह रहे थे. ‘शगुन पढ़ी लिखी है. वह भी मनोविज्ञान से. वह लड़कियों और औरतों के वस्त्रों के बिजनेस को घर से ही देख सकती है.’ मुझे तो लड़का और परिवार पसंद आया है. तुम्हारा भविष्य सुरक्षित रहेगा. कल तुम भी उन सब से मिल लोगी. तब तुम्हारे लिए मना करना कठिन होगा.”

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने इतना ही कहा, “माँ, कल का कल देखेंगे.”

माँ वापस नीचे चली गयीं, वह खाना खाकर ऊपर छत पर चली गयी.

देर रात तक भाई-बहन छत पर बैठे रहे. नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रवि-पुष्य योग में तिलक कर देने से शगुन का भविष्य सुघड़ होने की बात कर रहे थे, और ऊपर छत पर दोनों उस 'अदृश्य पिंजरे' की सलाखों को गिन रहे थे जिन्हें कल सुबह टूटना था.

शगुन ने नोटबुक में लिखा, "जब सन्नाटा बहुत गहरा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि आवाज़ अब गूँजने वाली है."
... क्रमशः

3 टिप्‍पणियां:

Sweta sinha ने कहा…

तूफान से पहले की शांति....।
एक आवेग, हवाओं में इक अलग-सी बदलाव की गंध है जो रगों में उत्साह सा भर रही।
बहुत सशक्त संदेश देती शानदार और रोचक कहानी सर।
सादर।
------
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १० मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

Sweta sinha, आभार श्वेता जी.

Anita ने कहा…

काश! हर लड़की को शगुन की तरह पिंजरा पहले ही दिख जाए