@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: मई 2026

शनिवार, 2 मई 2026

बेड़ियाँ

देहरी के पार, कड़ी - 41
मई के महीने की तपिश और समंदर से उठती नमी से भरपूर हवा से वातावरण भारी था. पसीना किसी तरह रुकता नहीं था. शनिवार की सुबह, जब ज्यादातर मुंबईकर वीकेंड की सुस्ती में डूबे थे, प्रिया अंधेरी (पूर्व) के चकाला इलाके की एक तंग गली के मुहाने पर खड़ी थी. राहुल और स्नेहा भी उसके साथ थे.

दो मई को दोपहर बाद ही असिस्टेंट सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से कार्यवाही समाप्त हुई थी. उसी दिन उसे सेक्रेटरी को रिपोर्ट देनी थी लेकिन तीन मई की दोपहर ट्रैकिंग से पता लगा कि रिपोर्ट सुबह सेक्रेटरी को मिली थी और शाम को यह जानकारी कि फाइल को सेक्रेटरी ने राय देने के लिए लॉ सेक्रेटरी को भेज दिया है. अगले दो दिन अवकाश होने के कारण फाइल को वहीं रहना था, जिससे ट्रैकिंग से कुछ हासिल नहीं हो सकता था.

प्रिया को ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बीच हमेशा यह लगा कि जब वे फैक्ट्री में या संघर्ष के दौरान साथ रहते हैं तो नौकरी या फैक्ट्री के बंद होने के संबंध में उनका विचार लगभग एक जैसा रहता है. लेकिन इनके परिवार के लोग क्या सोचते हैं? और परिवार के बीच रहकर खुद मजदूर क्या सोचते हैं? इसे अवश्य जानना चाहिए. उसने अपना यह विचार अपने शेष तीनों साथियों के सामने रखा कि क्यों न इस वीकेंड पर इन मजदूरों के परिवारों के बीच जाया जाए. क्योंकि जब तक वह उन ३५० परिवारों के चूल्हों की आग और उनके संघर्ष की नमी को महसूस न किया जाए तब तक इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता कि आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

आदित्य का कार्यक्रम इस वीकेंड पर अपने किसी मित्र से मिलने पुणे जाने का था. स्नेहा फौरन इस काम के लिए तैयार हो गई. राहुल पहले तो आने में हिचकिचा रहा था, उसे चकाला और जे.बी. नगर की तंग गलियों में धूल फाँकने के विचार में कोई औचित्य नजर नहीं आता था. लेकिन प्रिया ने जब कहा कि, “औचित्य का पता तो वहीं जाकर लगेगा. हम शनिवार को चलते हैं, यदि हमें लगेगा कि यह औचित्यहीन है तो रविवार नहीं चलेंगे.” यह सुनने के बाद वह अनमने तरीके से ही सही पर तैयार हो गया था और अब साथ था.

जैसे-जैसे वे गलियों के भीतर बढ़े, शहर का शोर पीछे छूटता गया और एक अलग ही दुनिया सामने आई. यहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे, मानों एक-दूसरे का सहारा लेकर खड़े हों. उनके पास यूनियन सेक्रेटरी शिंदे का पता था. वे तलाश करके सबसे पहले वहाँ पहुँचे. दो कमरे, एक छोटी सी रसोई, एक टॉयलेट और एक कॉमन हॉल. हॉल में ही एक कोने में रखी मशीन पर शिंदे की पत्नी सावित्री कपड़े सिल रही थीं. मशीन की 'पच-पच' की आवाज़ हवा में एक लय पैदा कर रही थी. प्रिया को देखते ही वे मुस्कुराईं. उन्होंने मशीन रोक दी. उनसे पास ही रखे चीड़ की लकड़ी के ढाँचे पर बने स्प्रिंग वाले पुराने सोफे पर बैठने को कहा. राहुल के उस पर बैठते ही वह करीब आठ इंच अंदर बैठ गया. प्रिया और स्नेहा बहुत सावधानी से उस पर बैठे.

“दीदी, मैं दो तीन साल से शिंदे साहब से कह रही हूँ कि इसे ठीक करा लें. लेकिन वे कहते हैं बोनस मिलेगा तो नया ले लेंगे. जब बोनस आता है तो और दूसरे जरूरी खर्चे निकल आते हैं.” सावित्री जी ने कहा. उन्होंने बताया कि “शिंदे साहब की तो सुबह की शिफ्ट थी वे सुबह सवा पाँच बजे ही निकल गए थे. आप आईं, बहुत अच्छा लगा," सावित्री जी ने कहा. उनके हाथों की फुर्ती बता रही थी कि वे सिर्फ एक गृहिणी नहीं, बल्कि घर की आर्थिक रीढ़ भी हैं.

प्रिया ने देखा कि पास ही में एक 12-13 साल का लड़का, जिसे शिंदे का पोता 'छोटू' बताया गया, स्कूल का बस्ता एक तरफ रखकर कुछ पुराने रेडियो और बिजली के बोर्ड खोलकर बैठा था. राहुल ने उत्सुकता से पूछा, "बेटा, ये क्या कर रहे हो?"

छोटू ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, " स्कूल से आने के बाद बिजली वाले चाचा की दुकान पर बैठता हूँ. तार जोड़ना और सोल्डरिंग करना सीख रहा हूँ. अगले साल तक मैं खुद के छोटे-मोटे काम करना सीख जाऊंगा.”

प्रिया के मन में एक टीस उठी. ये बच्चे बचपन से ही जानते हैं कि ज़िंदगी की लड़ाई उन्हें जल्दी शुरू करनी है. सावित्री जी ने चाय के प्याले बढ़ाते हुए कहा, "बेटा, ईसीआई की नौकरी ने हमें सिर्फ अनिश्चितता दी है. पिछले दस साल से उस 'ट्रक सिस्टम' ने उनको आधा कर दिया है. हफ़्ते के छहों दिन काम मिलता है, बस इसी लालच में वे वहां बंधे रहे. पर अब हम सब चाहते हैं कि बस बहुत हुआ."

डेढ़ बजे तक प्रिया और उसके साथी पाँच-छह घरों में जा चुके थे. स्नेहा, जो आमतौर पर काफी चुलबुली रहती थी, खामोशी से डायरी में कुछ नोट कर रही थी.

तीनों ने पास ही एक रेस्टोरेंट में दोपहर का लंच किया और फिर से बस्ती में घुस गए. एक घर में वे बिठ्ठल भाई से मिले, जो ईसीआई में करीब 15 साल से थे. उनके पैर में चोट थी, फिर भी वे एक कोने में बैठकर प्लास्टिक के कुछ खिलौने जोड़ रहे थे. बिठ्ठल भाई की राय ने प्रिया को चौंका दिया. उन्होंने कहा, "दीदी, सब कहते हैं कि यूनियन नौकरी बचाने के लिए लड़ती है. पर हम? हम इस नौकरी से 'मुक्ति' चाहते हैं. ईसीआई अब कारखाना नहीं, एक ऐसी जेल है जिसका जेलर हमें न मारता है, न जीने देता है. हमें बस हमारा हिसाब ठीक-ठीक मिल जाए, हम अपनी मेहनत से कहीं भी पेट पाल लेंगे."

प्रिया ने महसूस किया कि ये मजदूर हार नहीं मान रहे थे, बल्कि वे एक ऐसी आज़ादी माँग रहे थे जहाँ उनके पसीने की कीमत तय हो, न कि कोई प्रबंधन उन्हें 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों में जकड़े रखे.

अगले दिन, रविवार सुबह भी तीनों अपनी इस 'जाँच' में जुटे रहे. अपने-अपने घरों को लौटने के पहले उन्होंने बाहर ही लंच किया. तीनों का मन विचारों से भरा हुआ था. खाना खाते समय प्रिया के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. यह विक्रांत के किसी पुराने व्यावसायिक सहयोगी का सोशल मीडिया पोस्ट था. फोटो में विक्रांत एक आलीशान रेस्टोरेंट में कुछ लोगों के साथ बैठा था. चेहरे पर वही पुराना अहंकार वापस लौट रहा था.

प्रिया ने नोटिफिकेशन देखकर भी अनदेखा कर दिया. विक्रांत अब उसके लिए एक 'अदृश्य साया' था, जिससे वह डरती नहीं थी, पर सावधान जरूर थी. उसे पता था कि विक्रांत अपनी खोई हुई साख पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. लेकिन चकाला की उन गलियों में मिले अनुभवों ने उसे एक अलग ही सुरक्षा कवच दे दिया था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया, "प्रिया, शाम छह बजे IIDEA ऑफिस में यूनियन की मीटिंग है उसमें एआईसीसीटीयू के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी भी होंगे. मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार होगा. तुम आ सको तो बेहतर होगा."

उसने तय किया कि वह इस मीटिंग में अवश्य जाएगी. दो दिनों में उसने जो कुछ मजदूरों के परिवारों से मिलकर जाना है, उसे सभी को बताया जाना आवश्यक है.
... क्रमशः

शुक्रवार, 1 मई 2026

अंदेशा

देहरी के पार, कड़ी - 40
प्रशांत बाबू और रामजी काका से दिन में हुई बहस का हाल जानने के बाद प्रिया डिनर के बाद ही घर लौट सकी. उसने कपड़े बदले ही थे कि फोन घनघना उठा. कोटा से मयंक था.

“हेलो मयंक कैसे हो? मम्मा और पापा कैसे हैं?”

“दीदी, फोन मैंने किया, तो पहले मुझे बोलने दो. मैं बोलता उसके पहले तीन सवाल दाग दिए आपने.”

“सॉरी मयंक, मैं पिछले दिनों बहुत व्यस्त रही, फोन नहीं कर सकी. आज ही कुछ फुरसत है तो फोन करने वाली ही थी कि तुम्हारा फोन आ गया, मैं खुद को रोक नहीं पाई.”

“रहने दो दीदी, असल बात तो ये है कि आप हमें भूल गई हैं. और वहाँ पता नहीं क्या-क्या करती रहती हैं. आकाश भाई ने सब बता दिया है मुझे. ....अच्छा अब सुनो, सबसे ताजा समाचार यह है कि हमारे भूतपूर्व होने वाले जीजाजी ‘श्रीमान विक्रांत जी’ की जमानत अर्जी आज मुम्बई हाईकोर्ट ने मंजूर कर ली है, एक दो दिन में आदेश निचली अदालत को पहुँचेगा और जमानत पेश करने पर वे छूट जाएंगे. वैसे तो आपने उनकी हुलिया बढ़िया कर दिया है इसलिए उनकी हिम्मत नहीं होगी, फिर भी अंदेशा तो बना रहेगा. सावधान रहने में बुराई क्या है?” मयंक ने बात परिहास से आरंभ की थी और गंभीरता से समाप्त की.”

“तू मेरी चिन्ता मत कर, यह मुम्बई है. इस महानगर में विक्रांत की हैसियत किसी गली के गुंडे बराबर भी नहीं है. फिर यहाँ मेरा साथ देने वाले बहुत हैं, मैं पूरी तरह सुरक्षित हूँ. तू बता, मम्मा-पापा कैसे हैं? पापा बिलकुल ठीक हैं, बिजनेस को पूरे जोर शोर से संभाल लिया है. मुझे अपनी पढ़ाई और आवारागर्दी के लिए पूरी छूट मिल गई है. माँ तुम्हारे ले दुखी रहती हैं. उनकी इच्छा होती है कि वे आपसे रोज बात करें. वे मेरे पास ही हैं, उन्हें फोन दे रहा हूँ.

“हेलो प्रिया, कैसी है बेटा? कितने दिन हुए तुझे मुझसे बात किए हुए? मुझे तेरी बहुत फिकर रहती है. तू रोज मुझसे बात किया कर, वरना मैं जल्दी ही बूढ़ी होकर चल दूंगी.” बात करते-करते मम्मा का स्वर रुआँसा हुआ तो प्रिया बोल पड़ी.

“माँ, तुम्हें पता है मैं कैसे घर से निकली, फिर कुछ दिन जयपुर रही. मुम्बई आई तो यहाँ भी विक्रांत ने मुझे चैन से न रहने दिया. वो तो मुझे ऐसे साथी मिल गए जिनकी वजह से वह कुछ नहीं कर सका और उसे जेल जाना पड़ा. उसके बाद जिन्होंने साथ दिया वे कुछ संकट में थे तो मुझे उनकी मदद करनी पड़ी.” आज ही फुरसत मिली थी. मैं फोन करने वाली थी कि मयंक का फोन आ गया. प्रिया ने माँ को समझाने की कोशिश की.”

“मैं जानती हूँ बेटा, तू काम में व्यस्त ही रही होगी. पर माँ का मन नहीं मानता. बस आज से नियम बना ले, रात को जब भी तूझे फुरसत मिले तू मुझे फोन जरूर करेगी.”

“हाँ माँ, आज से मैं रोज आपको फोन करूंगी.”

“और सुना है विक्रांत छूटने वाला है, तू सावधान रहना. यहाँ तो तेरे पापा अब वापस बिजनेस और समाज में सक्रिय हो गए हैं तो यहाँ उसकी हिम्मत नहीं पड़ेगी.”

“माँ, यहाँ भी उसकी जो दुर्गत हुई है वह हिम्मत नहीं करेगा. और कुछ करने की कोशिश की तो इस बार और अधिक मुहँ की खाएगा. अच्छा माँ, आप अपना खयाल रखना. मैं रखती हूँ.”

प्रिया फोन बंद करने के बाद सोच में पड़ गई कि विक्रांत आखिर छूटने के बाद क्या करेगा? निश्चय ही वह पहले अपने बिजनेस को संभालेगा. खैर, वह कल सुबह प्रशांत बाबू को कहेगी. विक्रांत के ऑफिस के इलाके में कुछ लोग तो यूनियन के जरूर होंगे, उसकी गतिविधियों की जानकारी मिल जाएगी.

प्रिया ने सुबह ऑफिस के लिए निकलने के पहले दस बजे प्रशांत बाबू को फोन किया और विक्रांत की जमानत की खबर दी.

“प्रिया, जिस तरह हमने उसे दबोच कर पुलिस के हवाले किया था. उसकी अब तुम्हारी तरफ नजर उठाने की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी. फिर भी मैं उसके दफ्तर के इलाके में रहने वाले लोगों को कह दूंगा. वे विक्रांत की गतिविधियों पर नजर रखेंगे. कुछ खास होगा तो हमें सूचना दे देंगे. तुम चाहो तो चव्हाण साहब को बता सकती हो वे हाईकोर्ट में अपने असिस्टेंट को कह देंगे कि वह विक्रांत की जमानत की शर्तों का पता लगा कर बताए.”

“ठीक है, मैं चव्हाण साहब से बात करती हूँ. कल एएसएल ने लेबर सेक्रेटरी को अपनी रिपोर्ट दे दी होगी. आगे की गतिविधि की क्या खबर है?” उसने ईसीआई के क्लोजर वाले मामले में प्रशांत बाबू से पूछा.

“अभी तक कोई खबर नहीं है, एएसएल की रिपोर्ट गोपनीय है इसलिए उसकी कोई खबर नहीं है लेकिन महाराष्ट्र सरकार मार्च 2012 से ई-फाइलिंग सिस्टम का उपयोग कर रही है. एएसएल के यहाँ सुनवाई की प्रत्येक पेशी की ‘ऑर्डर शीट’ भी वेब पर उपलब्ध है. एएसएल ने अपनी रिपोर्ट को भी इलेक्ट्रोनिकली सेक्रेटरी को भेजा होगा. यदि ऐसा है तो फाइल मूवमेंट ट्रेस किया जा सकता है. तुम चाहो तो कोशिश कर सकती हो.”

“यह तो बहुत अच्छी बात है. जरूर मैं आज कोशिश करती हूँ कि क्या हुआ है, यदि एक मूवमेंट का पता लगा तो फिर हर मूवमेंट पर नजर रखी जा सकती है.” प्रिया ने कहा.

“आज शाम ईसीआई यूनियन के सेक्रेटरी शिन्दे और मेरी एआईसीसीटीयू (All India Central Council of Trade Unions) के स्टेट सेक्रेटरी से मीटिंग है. वे इस मामले में क्या सुझाते हैं. मैं तुम्हें बताऊंगा. अच्छा मैं फोन रखता हूँ, जरूरी कॉल आ रही है.”

प्रिया ने घड़ी देखी, सवा दस बज चुके थे. वह आज नियमित समय पर ठीक ग्यारह बजे ऑफिस पहुँच जाना चाहती थी. उसने फ्लैट से बाहर आकर दरवाजा लॉक किया और तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़ गई. लिफ्ट में उसका ध्यान फिर ईसीआई के मजदूरों की ओर चला गया. उनका जीवन कितना संघर्षशील रहा है? प्रबंधन ने उन्हें कितने लंबे समय तक ट्रक सिस्टम में जकड़े रखा. वे उससे मुक्त होना चाहते थे, यहाँ तक कि उससे मुक्त होने के संघर्ष में उनकी नौकरी चली जाए तो वे उसके लिए तैयार थे. कम से कम उसके बाद वे किसी बेहतर काम की तलाश करने की संभावनाएँ तो उनके पास थीं. इस संघर्ष को शुरू करते ही उन पर क्लोजर की लड़ाई थोप दी गई. मजदूरों और उनकी यूनियन ने अब तक इस लड़ाई को बेहतरीन तरीके से लड़ा था. फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि अब कारखाने के मजदूर अपने जीवन और भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं. उसने तय किया कि इस पर वह प्रशांत बाबू से बात भी करेगी और जब भी संभव हुआ मजदूरों से भी बात करने की कोशिश करेगी.
... क्रमशः