@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

सोमवार, 19 जनवरी 2026

लिफाफे में भूचाल

लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष की दिनचर्या सख्त यांत्रिक अनुशासन में बंध चुकी थी, बिना किसी गलती की गुंजाइश के. सुबह 5 बजे की व्हिशल बजने के पहले उठना और सही समय पर दौड़ व ड्रिल के लिए मैदान पर, लौटकर तैयार होना और समय पर सुबह की प्रेयर पर पहुँचना. उसके बाद क्लासें, ब्रेकफास्ट, फिर क्लासें, लंच और विश्राम, रेमेडियल क्लास, शाम को खेल का मैदान, शाम की प्रार्थना, डिनर, फिर होमवर्क व सेल्फ स्टडी, रात की नींद और सुबह फिर से 5 बजे की व्हिशल. उसे सोचने को भी समय नहीं था. पर हर रात उसे देर तक उसे नींद नहीं आती. आँखों के नीचे के गहरे घेरे इस गड़बड़ी को सार्वजनिक करने लगे थे. विजय कभी-कभी उसे गौर से देखता, पर कुछ नहीं कहता.

एक शाम, हॉस्टल के कॉमन रूम की मेज पर रखे डाक से आए लिफाफों में से एक की लिखावट को आयुष की निगाहों ने फौरन पहचाना, वह शगुन की थी. उसने लिफाफा उठाया, और चुपचाप अपने रूम में आ गया. किवाड़ बन्द कर उसने लिफाफा खोला और साँस रोक कर पत्र पढ़ने लगा.

पत्र के शब्द एक-एक करके उसकी आँखों के सामने से गुजरे; साइकिल, पुस्तकालय, लेखिका का व्याख्यान.

फिर वह पंक्ति आई, “यह चिंता नहीं, तुम्हारा प्यार था.”

आयुष ने देखा पत्र हिल रहा है. वह सोच में पड़ गया. आखिर उसके हाथ क्यों काँप रहे हैं? उसने अपनी रुकी हुई साँस को छोड़ा और दो तीन गहरी साँसें लीं. साँसे दुरुस्त होने पर पत्र फिर पढ़ने लगा.

आखिरी सवाल आया; “क्या यह अनुशासन तुम्हें भीतर से मजबूत बना रहा है?” पढ़ कर उसने पत्र को मेज पर पटक दिया. वह देर तक असमंजस में रहा. भीतर की मजबूती? फिर उसने अपने आप से कहा, वह मजबूत है बाहर से भी, और भीतर से भी. भीतर की मजबूती के बिना क्या बाहर की मजबूती आती है?

अब वह सोच रहा था कि इस पत्र का क्या करे? पहले मन किया कि वह पत्र को फाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दे. फिर विचार आया ... नहीं, यह भागना होगा. जवाब लिखना चाहिए, और शगुन को सब कुछ समझा देना चाहिए. पर कैसे? उसे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह लिखे क्या? आखिर विचार आया अभी कुछ मत करो. वह उठा और उसने पत्र को सूटकेस में सबसे नीचे दबा कर रख दिया. जैसे किसी राज को दफ्न कर दिया हो. उसने महसूस किया उसका गला सूख रहा है. उसने अपनी बोतल उठाई और एक साँस में उसे मुहँ के जरीए अपने पेट में उड़ेल लिया.

उस रात वह देर तक नहीं सो सका. उसने फिर वही सपना देखा; लेकिन इस बार साइकिल चला रही शगुन के पीछे वह दौड़ रहा था. साइकिल तेज थी, वह उसे पकड़ नहीं पा रहा था. वह थकने लगा. साइकिल के पहिए और तेज घूमने लगे. उसके कानों में एक आवाज गूंजी, “सीमाएँ मन में होती हैं...” उसकी नींद टूट गयी. वह हाँफ रहा था.

अगले दिन हॉस्टल के बरामदे में एक जूनियर छात्र तेजी से उसकी बगल से निकला, उसे हलका सा धक्का लगा, आयुष की किताबें गिर गयीं. आयुष उस छात्र की ओर देखने लगा. उसकी आँखों में गुस्सा नहीं आया. वह ठंडी निगाहों से उस छात्र को जाते देखता रहा. आगे जा कर बरामदे के साथ वह भी दाएँ मुड़ कर ओझल हो गया. सब सोच रहे थे; अब उस जूनियर लड़के की खैर नहीं. आयुष दौड़ेगा, लड़के को पकड़ेगा और फिर ... पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

सबकी अपेक्षा के विपरीत आयुष ने लड़के पर से अपनी निगाहें हटाईं. नीचे गिरी किताबों को देखा और झुककर उन्हें उठाने लगा. सब किताबें समेट, बिना एक शब्द मुहँ से निकाले वह आहिस्ता से अपने रूम की ओर बढ़ गया.

सब की निगाहें उस पर चिपकी हुई थी. विजय मुस्कुराए बिना नहीं रह सका. उसने अपने साथियों से कहा, “यह क्या हुआ यार? आज तो आयुष एक दम बदला-बदला लगा. बिलकुल एक इंसान की तरह.” आयुष के कानों तक भी यह आवाज पहुँची. एक पल को उसने मुड़ कर विजय की ओर देखा. लेकिन, बिना कोई जवाब दिए, वह आगे चल दिया. उसे लगा कि उसके कदम थोड़े भारी हो चले हैं.

अपने रूम में लौटकर आयुष ने शगुन का पत्र निकाला, फिर से पढ़ने लगा. पढ़ते हुए ही उसकी नजरें टेबल पर पड़ी कैंची से टकराईं. एक पल को उसके मन में आया; काट दो इसे, मिटा दो इन सवालों को. उसने कैंची उठाई... लेकिन फिर उसे वापस रख दिया. कैंची वहीं पड़ी रह गई. वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था.

उसने तय किया; वह शगुन को जवाब नहीं लिखेगा.

पर उसने एक और फैसला किया; वह अगली छुट्टियों में घर जाएगा. छुट्टियाँ बिताने नहीं, बल्कि शगुन से मिलने, उसे समझाने? शायद वह उसे समझा पाए. पर उसके मन के एक कोने में एक डर छुपा था. वह शगुन से ज्यादा बात ही न कर पाया तो... शगुन ने ही खुद उसे समझा दिया तो ...

उस रात आयुष ने डायरी निकाली. एक खाली पन्ना तलाशा और उस पर लिखा;

"पत्र आया, शगुन के सवाल मिले.

अभी जवाब तलाशना है.

शगुन की साइकिल चल पड़ी है, वह रुक नहीं रही है.

उसके मन के पहिए भी उसी की तरह दौड़ रहे हैं.

वह साइकिल को पकड़ेगा.

नहीं पकड़ पाया तो ... ...

वह आगे नहीं लिख पाया. उसने वह पन्ना मरोड़ा और दोनों हथेलियों के बीच घुमा कर गेंद सी बना दी. फिर उसे डस्टबिन में डाल दिया.

उसने सोने की कोशिश की. नहीं सो सका. कहीं दूर थाने में घंटे बजने लगे, टन .. टन .. टन .. वह गिनने लगा, 12 के बाद घंटे बजना बन्द हो गया. आधी रात गुजर चुकी थी. उसकी आँखों में नींद कहीं नहीं थी. वह उठा. डस्टबिन से उसने गुड़ी मुड़ी हुए पत्र को निकाला. उसे सीधा किया. हाथों से प्रेस कर के उसकी सिलवटें हटाने की कोशिश की और फिर फोल्ड करके अपनी डायरी के बीच रखा. डायरी को अपने तकिए के नीचे दबा कर सोने की कोशिश करने लगा.

खिड़की के बाहर, आज चाँद फिर टूटा हुआ दिखाई दे रहा था, टुकड़ा-टुकड़ा बादलों के बीच से झाँकता हुआ.

रविवार, 18 जनवरी 2026

पहियों पर आज़ादी

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
साइकिल सीख लेने से शगुन का दायरा बढ़ गया. अब वह स्कूल और बाज़ार के साथ शहर की उन सड़कों पर भी जा सकती थी जहाँ लड़कियाँ अकेली कम दिखती थीं. लेकिन वह यह भी जानती थी कि हर आज़ादी की कीमत चुकानी पड़ती है.

एक शाम चाय पर चाची ने माँ से कहा, “भाभी, शगुन को थोड़ा रोको... लोग क्या कहेंगे? वह इतनी दूर निकल जाती है.”

माँ ने हल्के से कहा, “पढ़ाई में तो अव्वल है, और अब तो खुद ही सब संभाल लेती है.”

पर चाचा ने अखबार नीचे रखते हुए स्पष्ट कह दिया, “अब बस भाभी, आप तो जानती हैं. लड़कियों के अकेले कहीं जाने के नतीजे क्या होते हैं. समय रहते संभल जाना चाहिए.”

शगुन मनोविज्ञान के अध्ययन से जानने लगी थी कि “सीमाएँ तोड़ने के लिए पहले धैर्य से सीमाओं को समझना जरूरी है.” उसने सोच लिया कि वह चाचा को विश्वास दिलाएगी कि साइकिल समय बचाती है, पढ़ाई के लिए अधिक समय मिलता है. पर पहले उसे साबित करना था कि यह आज़ादी सुरक्षित और सार्थक है.

वह तहसील पुस्तकालय में युवा लेखिका, नीरजा शर्मा, की वार्ता सुनने जाना चाहती थी. वहाँ पहले आटोरिक्शा से जा चुकी थी. इस बार उसने साइकिल से वहाँ जाना तय किया. वार्ता समकालीन स्त्री समस्याओं पर थी, ”स्त्रियों की आवाज, स्त्रियों की सड़कें.” शगुन वार्ता के दिन बिना किसी को बताए पुस्तकालय गई. रास्ते में उसे सुनने को भी मिला, “देखो, अकेली लड़की साइकिल पर!” शगुन ने उसे अनसुना कर दिया. तब उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. उसने तेजी से पैडल चलाए, जैसे उसका डर उसे आगे धकेल रहा हो.

वार्ता में का सार था कि, ”स्त्रियाँ अक्सर समाज से पहले अपनी सीमाएँ खुद बना लेती हैं. हम स्त्रियाँ सोचने लगती हैं कि यह रास्ता हमारे लिए नहीं है, पर सच यह नहीं. सही में हम कदम उठाने से डरती हैं. यह पहला कदम ही सबसे कठिन होता है. बाद का रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाता है.”

शगुन ने सोचा, ”क्या मैं भी अपनी सीमाएँ खुद बना रही हूँ? यदि ऐसा है भी तो मैंने आज यहाँ आकर एक सीमा तोड़ी है.

वह घर लौटी, तब सूरज ढल चुका था. चाचा दरवाज़े पर ही थे. शगुन को देख उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया. “तू कहाँ गई थी? किसके साथ गयी थी? आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.” वे ऊँची आवाज में बोले.

सुन कर वह बिलकुल नहीं घबराई, वह जानती थी कि किसी न किसी दिन उसे ऐसे सवालों का सामना करना पड़ेगा. शगुन ने पहली बार स्पष्ट और धीमे स्वर में कहा, “ चाचाजी, भाई यहाँ नहीं है, और मैंने कोई गलत काम नहीं किया. मैं पुस्तकालय गई थी.

“चाची और माँ चुप रहीं. माँ की आँखों में चिंता दिखी, पर उन्होंने संयम रखा और अपने होंठ बन्द रखे.

रात में, जब सब सो चुके तब मम्मा शगुन के कमरे में आई. “तेरी हिम्मत अच्छी है... पर चाचा का डर भी ठीक है. बदनामी होते देर नहीं लगती, बेटी.”

शगुन ने माँ की आँखों में देख कर गंभीरता से कहा, ”माँ, डर हमेशा रहेगा. पर डर के आगे जीना सीखना होगा. वरना जिंदगी सिर्फ चारदीवारी में सिमट जाएगी.” मम्मा ने और कुछ नहीं कहा, बस उसके सिर पर हाथ रखा. यह उनका अनकहा, स्नेहासिक्त मौन समर्थन था. यह शगुन की जीत थी, छोटी थी, मगर ठोस थी.

उस रात शगुन अपनी डायरी लिखने बैठी, पर मन न लगा. उसके मन में चाचा का वह वाक्य गूंज रहा था, “आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.”

डायरी के स्थान पर वह आयुष को पत्र लिखने बैठ गयी. उसने लिखा,

प्रिय भाई, आयुष¡ तुम्हें बहुत प्यार.

तुमने एनसीसी कैम्प में “उत्कृष्ट कैडेट” का खिताब प्राप्त किया, तुम्हें बहुत बहुत मुबारक. 

मैंने भी हाल ही में एक “उपलब्धि” हासिल की है, साइकिल चलाना सीख लिया है. अब मैं स्कूल और बाज़ार साइकिल से जाती हूँ. कल मैं तहसील पुस्तकालय गई. वहाँ वार्ता में एक लेखिका ने कहा, ”सीमाएँ अक्सर हमारे मन में होती हैं, बाहर नहीं.”

तुम्हें याद है, तुमने कहा था, “हॉस्टल में लड़कियों के बारे में बात नहीं होती।” मैं यह बात तब नहीं समझी थी। अब समझ रही हूँ. शायद तुम भी एक ऐसी ही दुनिया में रहते हो, जहाँ कुछ बातें “नहीं” होतीं, कुछ भाव “नहीं” दिखाए जाते.

चाचा कहते हैं, “लड़कियाँ अकेले बाहर नहीं जानी चाहिए. तुमने भी शायद माँ से यही कहा था? मैं जानती हूँ, तुम चिंतित हो, यह चिंता नहीं तुम्हारा प्यार था. पर कभी तुमने सोचा, यह चिंता हमें सुरक्षित रखती है या छोटा बनाती है?

तुम्हारे कैंप में जो कठोर अनुशासन सिखाया जाता है, क्या वह तुम्हें अन्दर से भी मजबूत बना रहा है? या सिर्फ बाहर से? इस सवाल का कोई जवाब देने की ज़रूरत नहीं. बस इतना जान लो, मैं सुरक्षित हूँ, और थोड़ी आज़ाद भी. शायद एक दिन तुम भी अपने हॉस्टल की उन “न कही जाने वाली बातों” के बारे में कुछ बताओगे।
                                                                                                                              तुम्हारी बहन,

                                                                                                                                  शगुन

उसने पत्र लिख कर तह किया और लिफाफे में बंद करके गोंद से चिपका दिया. सुबह स्कूल जाते समय ही वह पोस्ट ऑफिस से टिकट ले कर चिपकाकर इसे डाक में छोड़ देगी.

इसके बाद उसने डायरी लिखी.

“आज मैंने साइकिल पर पहली बार इतनी दूर तय की. रास्ते में डर भी लगा, दिल तेजी से धड़कता रहा. पर आवाज़ नहीं दबी. पुस्तकालय में बैठकर लगा जैसे मैंने अपने लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल लिया है.

घर में लड़ाई हुई, पर मैं हारी नहीं. माँ ने चुपचाप मेरा साथ दिया, शायद यही “सूक्ष्म जीत” है. उनका हाथ मेरे सिर पर था, और उसमें एक आशीर्वाद था जो शब्दों से बड़ा था.

अब मैं जानती हूँ, पहिये सिर्फ साइकिल के नहीं, मन के भी होते हैं. और एक बार घूमने लगें, तो रुकते नहीं.

मैंने आयुष को भी पत्र लिखा है. शायद वह मेरी बात को समझ सके. हो सकता है वह न भी समझे. पर उसने जब मुझे रोके जाने की बात कही थी, तो मुझे उस तक अपनी बात भी जरूर पहुँचानी चाहिए थी. मैंने पहुँचा दी है.
 ... क्रमश:

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अदृश्य दरारें

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
एनसीसी कैंप से मिले "उत्कृष्ट कैडेट" के प्रमाणपत्र ने आयुष को गर्व से भर दिया. उसे अपने बैग में लिए जब उसने होस्टल में प्रवेश किया तो लग रहा था, जैसे वह अभी भी परेड ग्राउंड पर हो. उसकी चाल सीधी-सतर और मजबूत थी, कंधे सख्त और निगाहें तेज, जैसे अपने लक्ष्य को बेध देंगी. अपने रूम पर पहुँच कर उसने प्रमाणपत्र को दीवार पर इस तरह टांगा कि कमरे में आने वाले हर व्यक्ति की निगाह सबसे पहले उस पर पड़े. वह हर वक्त उसे याद दिलाता रहे कि उसके सभी फैसले सही थे. कैंप में मिले इस खिताब ने उसकी दुनिया को बदल दिया था.

राजन जैसे दोस्तों ने उसकी पीठ थपथपाई, "अब तुम असली मर्द हो, यार!" आयुष को लगा ये तारीफ़ें बेहतर महसूस कराती, लेकिन फिर उसके भीतर गूंजकर कहीं खो जाती. उसके भीतर कहीं एक खाली जगह थी, जहाँ पहले हँसी, डर और गुस्सा रहते थे. अब वे सब वहाँ नहीं थे, सिर्फ गूंज बची थी."

रात सोते के पहले जब वह उनींदा होता, उसे अक्सर एनसीसी कैंप का वह कमजोर कैडेट दिखाई देता जो धूप में खड़ा था, जिसका चेहरा पसीने से सराबोर था. फिर वह चेहरा बदलने लगता. वह कभी सिद्धार्थ, कभी शगुन और कभी-कभी खुद उसके चेहरे में बदल जाता. आयुष की नींद टूटती वह हाँफ रहा होता और उसका बिस्तर पसीने से भीगा होता. वह खुद से सवाल करता. फिर खुद ही जवाब देता,

"कच्ची नींद है, ऐसे में दिमाग पता नहीं क्या-क्या सोचने लगता है." वह फिर से सोने की कोशिश करता. पर देर तक नींद नहीं आती.

एक दिन राजन ने किसी पुरानी मजाकिया घटना का जिक्र कर रहा था. बात हँसने की थी आयुष को हँसी आयी भी. लेकिन उसके मुहँ से हँसी के स्थान पर खी-खी आवाज निकली, जैसे उसे खाँसी आयी हो.

"तेरी हँसी को क्या हो गया? वे ठहाके कहाँ चले गए यार?" राजन ने पूछा.

"हँसने से क्या मिलता है?" आयुष ने कठोर स्वर में कहा, "कुछ सार्थक होता है क्या?" राजन चुप रह गया.

आयुष ने जवाब तो दे दिया था पर खुद हैरान था. वह अकेले में आईने के सामने खड़ा हुआ और हँसने की कोशिश की. उसे आईने में एक विचित्र, बेजान और अजनबी चेहरा दिखाई दिया. वह उसका अपना प्रतिबिंब तो नहीं था. वह देख नहीं सका और उसने मुहँ फेर लिया.

एक दिन घर से माँ का फोन आया, उसके हाल पूछने के बाद उत्साह से बताने लगी. "शगुन ने साइकिल चलाना सीख लिया है. वह उसी से स्कूल जाती है, बाज़ार लो सामान ले आती है."

सुन कर आयुष को अच्छा नहीं लगा. उसने कहा, "माँ, उसका अकेले बाहर. यूँ डोलना ठीक नहीं. उसे रोको."

फोन की दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया. फिर माँ बोली, "ठीक है, बेटा."

फोन कटने पर आयुष मोबाइल को घूरते हुए सोचता रह गया. “शगुन के साइकिल सीख लेने की बात उसे अच्छी क्यों नहीं लगी?” फिर उस को लगा, उसकी यह सोच उसे कमजोर बना देगी, उसने खुद को डाँटा, “कमज़ोर मत बन. औरतें अकेले कभी सुरक्षित नहीं रह सकतीं, उन्हें संरक्षण चाहिए ही”; यही सही है.

फिर बोर्डिंग स्कूल में एक नया लड़का विजय किसी दूसरे बोर्डिंग से आया. वह एनसीसी कैंप में भी था. एक शाम वह आयुष के कमरे में आया. उससे बातचीत में कहने लगा.

"तुम्हें पता है, कैंप में तुमने जो किया, वह ताकत नहीं थी, तुम्हारा डर था. तुमने उसकी मदद नहीं की क्योंकि तुम्हें डर था कि अगर एक बार दया दिखाई, तो तुम्हारा 'मर्द' वाला मुखौटा उतर जाएगा... और तुम फिर वही पुराने वाले आयुष बन जाओगे जो रो सकता था."

सुनते ही आयुष का खून खौल उठा. वह विजय को धक्का देकर बोला, "बाहर निकल जा!"
विजय चला गया, पर उसका वाक्य कमरे में लटकता रह गया. वह वाक्य सारी रात आयुष के कानों में गूंजता रहा, "डर था... डर था..." उसने देखा, उसके हाथों में कंपन हो रहा था. वह सोचता रह गया. “क्या वह वास्तव में डर रहा था?”

तभी एक दिन आयुष सुबह की दौड़ में एक मिनट देरी से पहुँचा. सब उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे. एक जूनियर कैडेट ने हिम्मत करके कहा, "सर, आप तो कभी देर नहीं करते?"

आयुष का दिमाग सन्न हो गया. फिर अचानक वह चिल्ला उठा,

"छोटी सी बात पर टोकना ज़रूरी है क्या? अपना काम करो!"

सब चुप रह गए, जैसे हवा जम गई. आयुष ने दौड़ना शुरू किया, वह तेज दौड़ा, और तेज... और तेज, जैसे वह नहीं, उसका गुस्सा दौड़ रहा हो. उस दिन वह रिकॉर्ड तोड़ दौड़ा. पर जब रुका, तो साँस फूल रही थी, दिल तेजी से धड़क रहा था और आँखों के आगे अँधेरा था. उसे पहली बार अपने शरीर की सीमा का एहसास हुआ, लेकिन मन की सीमा अभी दूर थी.

उस रात आयुष फिर आईने के सामने खड़ा था. उसने गौर से देखा, उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे थे, जबड़े की मांसपेशियाँ तनी हुईं थीं और होंठ सख्त.

उसने अपने प्रतिबिंब से पूछा, "तुम ठीक हो?"

प्रतिबिंब ने जवाब नहीं दिया.

"तुम मजबूत हो?"

फिर कोई जवाब नहीं.

आयुष ने थके स्वर में पूछा, "पर... क्यों? तुम जवाब क्यों नहीं देते?"

उसका प्रतिबिंब फिर भी चुप रहा.

आयुष ने अपना माथा शीशे पर टिका दिया. शीशा ठंडा था, वह ठंडक जैसे उसके सिर में घुसती जा रही थी. उसने अपना माथा शीशे से हटा लिया.

रात को जब उसने बिस्तर पर लेटा, उसे रूम की खिड़की से चाँद दिखाई दिया. लेकिन पूरा नहीं. वह टूटा हुआ था, आधा बादलों से आधा ढका हुआ?

उसने उधर से अपनी आँखें फेर लीं.

सुबह उसे सामने दीवार पर टंगा प्रमाणपत्र दिखाई दिया. उसे वह थोड़ा तिरछा लगा. आयुष ने सोचा वह उसे ठीक करेगा. लेकिन फिर मन न हुआ. कई दिन तक उसने उसे ठीक करने की जहमत नहीं उठाई?

आयुष के भीतर, अदृश्य दरारें फैलने लगी थीं, चुपचाप, निरंतर. वह उन्हें देखने को तैयार नहीं था. उसके बजाय, वह और ज़ोर से दौड़ने, और कठोर बनने की तैयारी कर रहा था.
 ... क्रमश:

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

सूक्ष्म प्रतिरोध

लघुकथा  :   दिनेशराय द्विवेदी
चाची के घर लौटने पर परिवार 'पूरा' लगने लगा. माँ को अपनी 'चाय-संगिनी' मिल गयी, चाचा अब आराम से थे. घर में अब और दो स्त्रियाँ थीं जो उनके लिए सब कुछ 'ढंग से' करतीं. शगुन के लिए घर अब मनोविज्ञान सीखने की प्रयोगशाला था. अब वह मनोविज्ञान के सिद्धांत केवल किताबों से ही नहीं बल्कि व्यवहार से भी सीख रही थी. उसने 'सूक्ष्म प्रतिरोध' के बारे में पढ़ा और तय किया कि वह चुपचाप प्रयोग शुरू करेगी.

रात खाने पर चाचा बोले, "आज ऑफिस में विक्रम ने खूब मज़े लेकर बता रहा था कि आखिर उसकी पत्नी ने यह कह कर नौकरी छोड़ दी, कि पति के तनाव के कारण उसका दिल नौकरी में नहीं लगता."
चाची ने सहमति दी, "उसने सही किया, आखिर स्त्री का पहला फर्ज पति की संतुष्टि है.”

न ने अपनी प्लेट उठाते हुए धीरे से कहा, "अगर, पत्नी का तनाव देखकर पति नौकरी छोड़ दे, तो?"

एक बारगी सन्नाटा छा गया, उसकी बात सुनकर. फिर चाचा एक ठहाका लगाकर बोले, "वाह... शगुन, लगता है तुम मनोविज्ञान के साथ तर्कशास्त्र भी पढ़ रही हो. भविष्य में वकील बनने का इरादा तो नहीं?”

माँ ने अन्दरूनी भय के साथ शगुन को देखा, शगुन बस मुस्कुरा दी.

अपने घर में शगुन का यह पहला प्रयोग था. एक असंतुलित कथन को संतुलित सवाल में बदल देना. प्रतिक्रिया में ठहाका लगा लेकिन विचार बीज की तरह गिरा.

उधर शगुन के स्कूल में लड़कियों के लिए 'आत्मरक्षा' की एक क्लास आयोजित हुई. जिसमें सलवार-पूरी बाँह वाली कमीज वाली यूनिफॉर्म अनिवार्य थी, हँसना मना, और केवल 'स्वीकार्य' मूव्स सीखने की इजाज़त थी.

शगुन ने ट्रेनर से पूछा, "सर, क्या हमें वही मूव्स सिखाएंगे जो लड़कों को सिखाते हैं? असल हमला तो वही होगा न?"

ट्रेनर अपना ट्रैक सूट ठीक करते हुए बोला, "तुम्हारी सुरक्षा के लिए ये काफी हैं. ज़्यादा आक्रामक मूव्स लड़कियों को नुकसान पहुँचा सकते हैं. अगर हमला करने वाला अस्पताल पहुँच गया तो लड़की मुकदमा लड़ते-लड़ते ही थक जाएगी."

कुछ लड़कियाँ हँस पड़ीं.

उस रात शगुन ने यूट्यूब पर वीडियो देखकर अपने कमरे में प्रैक्टिस की. माँ ने दरवाज़ा खोला तो देखा तो वह एक किक का अभ्यास कर रही थी.

"अरे बाप रे! यह सब क्या कर रही हो? चोट लग जाएगी!"

"वही सीख रही हूँ माँ, जो स्कूल में 'स्वीकार्य' नहीं है."

माँ ने आँखें दिखाईं, लेकिन दरवाज़ा बंद करते हुए बुदबुदाई, "अच्छा ही है... कम से कम आयुष जैसे लड़कों से तो बच लोगी." मां की आँखों में थोड़ा गर्व झलका.

शगुन का दूसरा प्रयोग भी आंशिक रूप से सफल रहा. उसने डर तोड़ा, और माँ की चिंता से छिपा समर्थन भी मिला.



एक दिन चाची अपना पुराना एलबम देख रही थी. शगुन ने देखा, युवा चाची साड़ी में, कॉलेज की सीढ़ियों पर किताबें हाथ लिए खड़ी हैं.

"चाची, आप कॉलेज में पढ़ी हैं?" शगुन ने पूछा.

चाची के चेहरे पर एक चमक आकर बुझ गयी. "बस बी.ए. किया और फिर... शादी हो गई."

"आपको अफ़सोस है?"

"अफ़सोस? नहीं... बस कभी-कभी सोचती हूँ, अगर पढ़ाई जारी रखती तो क्या होता?"
फिर अचानक उन्होंने गर्व से कहा, "तब फिर तुम्हारे चाचाजी का टिफिन कौन पैक करता? उनके फेवरेट मेथी के पराठे कौन बनाता!" इन पराठों ने तो मेरी पहचान बना दी?"

शगुन मुसकुराई. उसने चाची से भावनात्मक कनेक्शन स्थापित कर लिया. और पराठों का राज़ भी हाथ लगा! उसका यह प्रयोग भी सफल रहा.

शहर के तहसील लायब्रेरी में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता थी. विषय था "शिक्षा में लैंगिक समानता".

शगुन ने घर बताया: "स्कूल प्रोजेक्ट की रिसर्च के लिए लायब्रेरी जाना है."

चाचा ने समाचार पत्र के पीछे से अपना सर बाहर निकालते हुए कहा, "अच्छा है. पर जल्दी लौटना. वैसे भी लायब्रेरी में तो सब किताबें ही हैं... बातें करने वाले कौन मिलेंगे वहाँ?" शायद उनको को लगता था कि लायब्रेरियाँ सिर्फ किताबों का गोदाम भर होती हैं. शगुन ने नहीं बताया कि वह प्रतियोगिता में भाग लेने जा रही है.

लायब्रेरी के हॉल में लड़कों की भीड़ थी. कुछ लड़कियाँ भी थीं. उसने अपना नाम प्रतिभागी सूची में लिखवाया, तो क्लर्क ने हैरानी से पूछा, "तुम... तुम प्रतियोगी हो?"

"जी," शगुन ने दृढ़ता से कहा.

मंच पर बैठी तो एक लड़का अपने दोस्त से फुसफुसाया, "अरे, यह तो गर्ल्स स्कूल वाली यूनिफॉर्म है... यह कहाँ आ गई?"

शगुन ने सुन कर अनसुना कर दिया. उसका दिल धड़क रहा था. फिर उसने वह सब कहा जो उसने महीनों से सोचा था. “स्कूल के नियमों से लेकर घर की बातचीत तक. उसकी आवाज़ शुरू में काँपी, फिर मजबूत हो गई.”

जब वह बोलकर बैठी, तो सन्नाटा था. फिर एक वरिष्ठ शिक्षक ने ताली बजाई. फिर कुछ और तालियाँ बजीं.

उसे पुरस्कार नहीं मिला. पर जब वह नीचे उतरी, तो दो लड़कियों ने उसके पास आकर कहा, "तुम बहुत हिम्मती हो. अगली बार हम भी भाग लेंगे."

"एक कॉलेज स्टूडेंट मिला, उसने कहा, "मेरी बहन भी खूब सवाल करती है। आज मैंने समझा, उन्हें दबाना नहीं, सुनना चाहिए।"

शगुन को लगा, यही तो है, धीरे-धीरे बदलाव.



शाम को घर लौटते हुए उसका कदम हल्के थे. रास्ते में उसे एक पोस्टर दिखा, "लड़कियों के लिए साइकिल प्रशिक्षण शिविर". उसने मन ही मन सोच लिया. अगला लक्ष्य.

उस रात शगुन ने अपनी डायरी लिखी-

"आज मैंने अपनी आवाज़ को पहली बार सुना. यह परफेक्ट से बहुत कम थी, लेकिन मजबूत थी, और मेरी थी.
घर लौटी तो चाची ने चाय के लिए पूछा. माँ ने पूछा, ‘भूख लग आयी होगी?’. चाचा ने पूछा, 'प्रोजेक्ट हो गया?' मैंने कहा, 'हाँ, हो गया.'
उन्हें नहीं पता कि प्रोजेक्ट क्या है? उन्हें शायद पता भी न चले. पर मुझे पता है.
मैं अब वह नहीं, जो सिर्फ सवाल पूछती थी. मैं वह बन रही हूँ जो उन सवालों के जवाब तलाशती हूँ, आहिस्ता से, बिना किसी शोर के.
चाचा आज रिमोट तलाश रहे थे. मैंने चुपचाप सोफ़े के नीचे से निकालकर दिया. उन्होंने कहा, देखो, लड़कियाँ छुपी हुई चीज़ें तलाश देती हैं!'
मैंने मन ही मन सोचा, 'वे खोई हुई आवाज़ भी ढूँढ लेती हैं.'
यह मेरा सूक्ष्म प्रतिरोध था. आज से यही मेरी भाषा होगी.
आज मैंने इस भाषा का पहला वाक्य बोल दिया है."          ... क्रमश:

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

स्वैच्छिक पलायन

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

गर्मियों की लंबी छुट्टियाँ आयुष के लिए एक अवांछित कैद बन गई थीं. बोर्डिंग स्कूल की व्यवस्थित दुनिया से निकलकर, उसे अपने ही घर में अजनबी जैसा महसूस हो रहा था. यहाँ कोई घंटी नहीं बजती थी, कोई यूनिफॉर्म नहीं थी, और न ही वह मर्दाना भाईचारा था, जहाँ हर बात का अर्थ सपाट होता था.

यहाँ सब कुछ गहरा और उलझा हुआ था. माँ की चिंताएँ घर-परिवार की थीं, और शगुन... वह अब और भी पढ़ी-लिखी और सवाल पूछने वाली हो गई थी. एक दिन उसने आयुष से पूछा, "तुम्हारे हॉस्टल में कितनी लड़कियाँ हैं?"

सवाल इतना सीधा और अप्रत्याशित था कि आयुष का दिमाग पल भर के लिए खाली हो गया. हॉस्टल की दीवारों पर लिखे नंबर और दोस्तों के मजाक उसकी आँखों के सामने तैर गए. "लड़कियाँ? वहाँ लड़कियाँ नहीं होतीं. सिर्फ... लड़के होते हैं." उसने अटकते हुए जवाब दिया.

"तो फिर लड़कियों के बारे में बात कैसे होती है?" शगुन ने पूछा, उसकी आँखों में एक जिज्ञासा थी जो आयुष को तीर सी चुभ गई.

"बात... नहीं होती," उसने जल्दी से कहा, और टीवी देखने लगा. उस रात उसे नींद नहीं आयी. शगुन के सवाल ने उसके अंदर बेचैनी पैदा कर दी थी, जैसे कोई पर्दा हिल गया हो.

छुट्टियाँ खत्म होने पर उसे राहत मिली. हॉस्टल लौटकर उसने गहरी साँस ली. यहाँ सब कुछ स्पष्ट था. पर यह स्पष्टता लंबे समय तक नहीं टिकी.

दिवाली के बाद, चाचा ने फोन पर खबर दी, "चाची वापस आ गई हैं. अब घर में रौनक रहेगी."

आयुष ने 'बहुत अच्छा' कहा, पर उसका दिल एक भारी पत्थर-सा हो गया. चाची भी. अब घर पर तीन औरतें होंगी. उसकी कल्पना में घर का वातावरण और भी दमघोंटू हो गया. चाय पीते हुए सलाह, कपड़ों पर टिप्पणियाँ, शगुन के उलझे हुए सवाल. एक ऐसी दुनिया जहाँ बोर्डिंग स्कूल वाली भाषा बेकार थी, और जहाँ वह हमेशा उलझन महसूस करने लगता था.

तभी उसकी नज़र नोटिस बोर्ड पर लगे एक पोस्टर पर पड़ी; "एनसीसी विंटर कैंप: अनुशासन, साहस, राष्ट्र सेवा का सुनहरा अवसर!"

यह अंधेरे में अचानक मिली रोशनी थी. कैंप. टेंट. दौड़. ड्रिल. सिर्फ लड़के. कोई औरतें नहीं. कोई उलझे सवाल नहीं. यह उसकी जानी-पहचानी दुनिया का विस्तार था, बल्कि उससे भी बेहतर ... स्वैच्छिक पलायन की राह.

उसने पिता को फोन किया, अपनी आवाज़ में उत्साह भरकर, "पापा, यह एनसीसी कैंप मेरे करियर के लिए बहुत अच्छा रहेगा. प्रमाणपत्र मिलेगा, एकता और अनुशासन सीखूँगा. मैं क्रिसमस पर घर नहीं आ पाऊँगा, यह मेरे भविष्य के लिए ज़रूरी है."

पिता ने सहमति दे दी. चाचा ने कहा, "शाबाश बेटा! जोश देखकर अच्छा लगा."

कैंप की कठोरता आयुष के लिए सान्त्वना भरी थी. यहाँ आदेश और पालन सब कुछ था. सुबह पाँच बजे की घंटी, दौड़, यूनिफॉर्म की शानदार सफाई, ड्रिल की तेज आवाज़ें. एनसीसी अधिकारी की गूंजती कड़क आवाज़, "तुम लड़के हो! नरम मत बनो! देश को अपने कंधों पर जिम्मेदारी लेने वाले सिपाही चाहिए, रोने-धोने वाले जवान नहीं!"

हर दिन शारीरिक थकान से खत्म होता, भरपूर मानसिक शांति मिलती. यहाँ कोई जटिलता नहीं थी. हर जगह ताकत थी. आज्ञापालन था. भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं था.

एक दिन एक जूनियर कैडेट को, जो ड्रिल में लगातार गलती कर रहा था, सबके सामने धूप में खड़ा रहने की सजा दी गयी. उसका चेहरा शर्म और थकान से लाल हो गया था. उसे देख कर आयुष को लड़के पर बिलकुल दया नहीं आयी, बल्कि तीव्र घृणा महसूस हुई. “इतना कमजोर बंदा? सबके सामने शर्मिंदा हो रहा है? वह यहाँ के लायक ही नहीं.” आयुष ने तभी अपने अंदर की आवाज सुनी: "मर्द बनना है, तो ऐसी कमजोरी कभी मत दिखाओ."

कैंप समाप्त हुआ. आयुष को 'उत्कृष्ट कैडेट' का प्रमाणपत्र मिला. वह लौटा तो उसकी चाल में एक नया दबदबा था, कंधे और सीधे थे, निगाहें सीधी और सधी आवाज. अब वह केवल बोर्डिंग स्कूल का सीनियर नहीं रह गया था; बल्कि एक प्रशिक्षित सिपाही था, जिसने स्वेच्छा से कठोरता सीखी और उसे आत्मसात कर लिया था.

हॉस्टल में उसकी वापसी पर एक छोटी सी पार्टी हुई. राजन ने कहा, "अब, हमारा आयुष असली मर्द है!" आयुष ने मुस्कुराकर उसकी पीठ थपथपाई, लेकिन यह मुस्कुराहट उसकी आँखों में नहीं थी. वहाँ एक शून्यता थी, जैसे भीतर सब कुछ व्यवस्थित होकर एक निर्जीव कक्ष में बंद कर दिया गया हो.

एक रात फिर वही पुराना नाटक दोहराया गया. सिद्धार्थ, वही कविता वाला लड़का, फिर से निशाने पर था. इस बार उसने किसी लड़की से फोन पर बात कर ली थी, यह, एक अक्षम्य पाप था.

आयुष अपनी किताब में डूबा था. चीखें सुनकर उसने सिर उठाया. सिद्धार्थ की आँखें, जो हमेशा की तरह मदद माँग रही थीं, उसकी आँखों से मिलीं. पहले की तरह उसे झटका लगा, पर यह झटका इस बार सिर्फ पल भर का विचलन था. उसने कोई भाव नहीं दिखाया. उसने धीरे से किताब का पन्ना पलटा, और पढ़ने में व्यस्त हो गया. उसके कानों में एनसीसी अधिकारी की आवाज़ गूँजी; "तुम लड़के हो! नरम मत बनो!"

उसके अंदर की सारी नरमी पत्थर हो गयी.

कमरा शोर से भर गया था, पर आयुष का ध्यान अपनी साँसों पर केंद्रित था; स्थिर, नियमित. जब सब शांत हो गया तो उसने देखा, सिद्धार्थ कोने में सिसक रहा था. आयुष के भीतर कोई हलचल नहीं हुई. बल्कि उसने संतोष महसूस किया, जैसे कोई कठिन परीक्षा पास कर ली हो.

बाद में शीशे के सामने खड़े होकर उसने अपना प्रतिबिंब देखा. यूनिफॉर्म पर एकदम सही क्रीज, बाल व्यवस्थित. चेहरे पर कोई रेखा, कोई उथल-पुथल नहीं. केवल एक शांत, नियंत्रित रिक्तता. एक परफेक्ट मर्द.

उसे शगुन का विचार आया. पर उसकी याद अब धुंधली थी, बहुत दूर से आते स्वर जैसी, जिसका उसकी मौजूदा हकीकत से कोई संबंध नहीं रह गया था. उसने सही रास्ता चुना था. उसने कमजोरी से पलायन किया था, और अब वह उस ताकत के केंद्र में था, जिसे वह जानता था.

उसने अपने कमरे की लाइट बंद कर दी, और बिना किसी विचार और स्वप्न के, एक गहरी, भारी नींद में डूब गया. उसका पलायन पूरा हो चुका था. अब केवल उसे एक नई, कड़ी हकीकत का सामना करना था, जिसका चुनाव उसने स्वयं किया था.                       ... क्रमश:

सोमवार, 12 जनवरी 2026

नियमावली

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

स्कूल की आखिरी घंटी बजने वाली थी, शगुन की नज़र खिड़की से बाहर उड़ती एक चिड़िया पर टिकी थी, पर कान वैल्यू एजुकेशन की क्लास में प्रिंसिपल मैडम के शब्दों पर थे, उनकी आवाज़ में एक ऐसा आग्रह था जो सुझाव नहीं, बल्कि एक कठोर नियम लगता था.

"और याद रखना, लड़कियों, असली सुंदरता चेहरे पर नहीं, चरित्र में होती है. एक अच्छी लड़की की पहचान उसकी विनम्रता, उसका संयम और परिवार के प्रति त्याग है."

शगुन की उँगली अनायास ही अपनी नोटबुक पर खिसक गई, जहाँ उसने सुबह मनोविज्ञान की क्लास में एक शब्द नोट किया था: "सामाजिक अनुकूलन". उसकी परिभाषा याद आई: “व्यवहार को सामाजिक मानदंडों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया.” एक ठंडी सिहरन सी उसकी रीढ़ में दौड़ गयी. मैडम के शब्द अचानक एक प्रोसेस का हिस्सा लगने लगे, कोई शाश्वत सत्य नहीं. वह एक कुम्हार को प्रतिमाएँ गढ़ने के पहले मिट्टी को तैयार करने में लगा था, बस.

"खुश रहना सीखो," मैडम ने बोलना जारी रखा, "घर की खुशहाली तुम्हारे हाथ में है. एक चिड़चिड़ी, हर बात पर सवाल उठाने वाली लड़की पूरे वातावरण को दूषित कर देती है."

शगुन ने अपने आस-पास देखा. कई सिर गंभीरता से हिल रहे थे. उसने सोचा, क्या वे सब इस 'एक खास साँचे में ढाले जाने’ के प्रोसेस को महसूस नहीं कर पा रही थीं? या फिर, वे पहले ही साँचे में ढल चुकी थीं?

अगले दिन सुबह की असेंबली में, जब सब लड़कियाँ लाइन में खड़ी थीं. एक अलग तरह का पाठ शुरू हुआ. वाइस-प्रिंसिपल, जिनकी नज़रें हमेशा ही छात्राओं को स्कैन करती रहती थीं, अचानक प्रिया के सामने रुक गईं. उन्होंने उसकी स्कर्ट के किनारे को उँगलियों से पकड़कर खींचा.

"यह क्या है?" उनकी आवाज़ कर्कश थी, "स्कर्ट इतनी छोटी क्यों है? और यह ब्लाउज़... क्या यह तुम्हें टाइट नहीं लग रहा?"

प्रिया का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया. तमाम छात्राओं की नज़रें उस पर टिक गईं. मैडम ने सबकी तरफ देखा, यह सबक सब छात्राओं के लिए था.

"लड़कियों, तुम्हारा ध्यान पढ़ाई और संस्कारों पर होना चाहिए, न कि ऐसी चीज़ों पर जो अनुचित ध्यान आकर्षित करें. तुम्हारे शरीर की हर अभिव्यक्ति एक संदेश है. यह संदेश सही होना चाहिए."

उनके शब्द हवा में लटक गए. प्रिया अब सिकुड़ी हुई, अपने आप में समाई खड़ी थी. शगुन के मन में कल पढ़ा हुआ एक और शब्द उभरा” "वस्तुकरण". प्रिया का शरीर, उसकी पोशाक, एक समस्या बन गई थी. एक ऐसी वस्तु जिसका विश्लेषण, आलोचना और सार्वजनिक सुधार किया जा सकता था, ताकि वह देखने वालों को 'उचित संदेश’ दे. शगुन ने अपनी स्कर्ट को नीचे खींच लिया, यह एक स्वचालित, आत्म-सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया थी. डर का यह वायरस छूत की तरह फैल गया था.

घर पर चाची की वापसी नई ही थी. विवाह के बाद जब चाचा-चाची के बीच अनबन होने के कारण वह मायके चली गई थीं, अब धुंधली याद बन चुके थे. "मामला सुलझ गया," बस इतना ही कहा गया था, और चाची वापस आ गई थीं. शायद उन नियमों को मान कर, जिन्हें तोड़ना उनके लिए संभव नहीं था.

शाम को एक पारिवारिक समारोह था. माँ ने एक सुंदर, हल्की ज़री वाले सलवार-सूट को हाथ में लेकर वापस रख दिया. वही सूट जो शगुन को पसंद था.

"नहीं बेटा, यह वाला ज़रूरत से ज़्यादा आकर्षक है. तुम्हारी उम्र में सुंदर दिखना अच्छा है, पर 'बहुत' सुंदर दिखने को लोग गलत समझ सकते हैं. बेवजह लोग तुम्हें घूरेंगे. तुम्हारी पढ़ाई और समझदारी ही तुम्हारे लिए असली सुंदरता है."

तभी चाची चाय का कप हाथ में लिए कमरे में आईं. उन्होंने स्थिति भाँप ली और माँ के शब्दों पर मुहर लगा दी, "सही कहा भाभी ने. हम लड़कियों को खुद अपनी सीमाएँ तय करनी पड़ती हैं. वरना ... बाद में पछताना पड़ता है." उनकी आवाज़ के आखिरी शब्दों में थकान और विवशता झलकी, जिसे देख शगुन का दिल एक पल के लिए भारी हो गया. चाची ने यह पाठ शायद स्वयं जीकर सीखा था.

शगुन के भीतर एक तीखा प्रतिवाद उठा. तो क्या सुंदरता एक अपराध है? क्या डर हमारी नियति है? पर उसने कुछ नहीं कहा. उसके चेहरे पर उभरी इस कुंठा और क्रोध को माँ ने भाँप लिया.

माँ उसे खिड़की के पास ले गईं, धीमी आवाज में समझाने लगीं, "मैं समझती हूँ तुम्हें अच्छा नहीं लगा. पर देखो बेटा, आज फंक्शन है. सारे रिश्तेदार वहाँ रहेंगे. ऐसे मौकों पर माहौल खुशनुमा रहना चाहिए. तुम्हारी नाराजगी या जिद से बात बिगड़ सकती है. हम लड़कियों को थोड़ा सहना पड़ता है, ताकि सब की खुशी बनी रहे. तुम्हारी नाराजगी सिर्फ तुम्हारी नहीं रह जाती. उसका असर सब पर पड़ता है."

यह पाठ अब सिर्फ कपड़ों के बारे में नहीं था. यह उसकी खुद की भावनाओं के बारे में था. उसके क्रोध, उसकी इच्छा को दबाकर, दूसरों की सुविधा और 'शांति' को तरजीह देना. उसे सिखाया जा रहा था कि उसकी व्यक्तिगत भावनाएँ सामूहिक भावनात्मक जिम्मेदारी के आगे गौण हो गयी थी. यह आत्म-दमन का पाठ था.

शगुन ने चुपचाप सादा सूट पहन लिया. उसका मन उसके बैग में रखी मनोविज्ञान की किताब में था. किताब में ये सभी शब्द थे, 'सामाजिक अनुकूलन', 'वस्तुकरण', 'आंतरिककरण उत्पीड़न' (Internalized Oppression). वे सिर्फ शब्द नहीं थे; वे चाबियाँ थीं, जो उसकी ज़िंदगी के बक्सों पर ताले लगा रही थीं.

पर इस ज्ञान ने शगुन को अकेलेपन की पीड़ा दी. इसे साझा करने के लिए उसके निकट कोई नहीं था. न प्रिया के साथ, न माँ के साथ, और न चाची के साथ था, जो खुद इसी व्यवस्था की पूर्व-छात्रा और अब सहायक-शिक्षिका बन चुकी थीं.

फंक्शन में जाने से पहले शगुन ने अपने बैग को देखा मनोविज्ञान की किताब वहीं थी. से छूकर उसे कुछ शान्ति मिली. वह जान गई थी कि ये नियम स्वाभाविक नहीं हैं, बनाए गए हैं. वह उन्हें तोड़ नहीं सकती थी. नहीं, अभी नहीं. अभी तो उसने बस उन्हें जानना शुरू किया था.

और पहला पाठ यही था: तुम्हारा शरीर तुम्हारा नहीं, तुम्हारी भावनाएँ तुम्हारी नहीं. दोनों पर नियंत्रण बाहरी है.
उसने सोचा, कल स्कूल में वह अपनी मनोविज्ञान की किताब फिर खोलेगी. शायद अगला अध्याय उसे कोई माकूल जवाब दे.                 ... क्रमश:

रविवार, 11 जनवरी 2026

पाठ

 लघुकथा  :  दिनेशराय द्वि्वेदी

ट्रेन की खिड़की से बाहर धुँधले उजाले में खेत-पेड़ गुजर रहे थे. आयुष की नजर उन पर थी, पर दिख कुछ नहीं रहा था. आँखों के सामने शगुन का चेहरा था, उस आखिरी रात का, जब उसने पूछा था, "क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुम खुद को खो रहे हो?"

सवाल अब भी कानों में सरसरा रहा था. उसने जवाब नहीं दिया था. बस चिल्ला दिया था, और चिल्लाने के बाद की चुप्पी सीने पर पत्थर-सी पड़ी थी.

ट्रेन रुकी. बोर्डिंग स्कूल का स्टेशन था. प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही एक गंध ने घेर लिया; पसीना, फिनाइल, पुरानी किताबों की गंध. हॉस्टल की गंध. एक अजीब सी राहत मिली. यहाँ सब स्पष्ट था. नियम, पदानुक्रम, मजाक. यहाँ शगुन जैसे सवाल नहीं थे. यहाँ सब कुछ सतह पर था, और सतह पर ही निपट जाता था.

हॉस्टल के कमरे में राजन ने उसका स्वागत एक गाली से किया. आयुष बेमन से मुस्कुरा दिया. यह रस्म थी. विजय ने बैग की ओर देखा, "घर से मिठाई?"

"कुछ खास नहीं," आयुष ने कहा. बैग में माँ के हाथ के लड्डू थे, पर उन्हें निकालना अब कमजोरी लगता.

शाम को डिनर हॉल में उसने एक नया चेहरा देखा; नौवीं कक्षा का पतला-दुबला लड़का, समर.

"अरे देखो, नया 'कुमारी' आ गया है!" राजन ने ऊँची आवाज़ में कहा.

"क्यों भई, तेरा नाम तो लड़कियों जैसा है," विजय ने कहा, "कविता पढ़ता होगा न?"

समर ने सिर उठाकर देखा, फिर नीचे झुक गया. उसकी चुप्पी और भड़काने वाली थी.

उस रात के बाद समर "सिस्सी" बन गया. धीरे चलना, शर्माना, वगैरा; उसकी हर छोटी हरकत पर टिप्पणी होती. आयुष देखता रहा.

यह इस सत्र का पहला पाठ था: स्त्रीलिंग विशेषताएँ उस पर चस्पा कर दी गईं. समर का "इलाज" शुरू हुआ. उसे जबरन क्रिकेट खिलाया गया, गालियाँ रटाई गईं.

एक दिन लाइब्रेरी में आयुष ने समर को कविता की किताब छुपाते देखा. नजरें मिलीं. समर की आँखों में सवाल था; ‘तुम क्यों नहीं कुछ कहते?’ आयुष ने तुरंत नजरें फेर लीं. उसकी चुप्पी एक सुरक्षा-दीवार थी.

हफ्ते बीते. बातें गहरी और विकृत होती गई. अब सिर्फ हीरोइनें नहीं, सोशल मीडिया की अनजान लड़कियों के प्रोफाइल तोड़े जाते. "देखो इसका नया डीपी. क्या रेटिंग दोगे?"

लड़के स्क्रीन के इर्द-गिर्द झुंड बना लेते. लड़की का चेहरा, उसकी पोस्ट; सब एक कोड की तरह तोड़ा जाता. उसकी इच्छा, व्यक्तित्व सब गायब. वह शारीरिक अंगों का एक सेट बन जाती. जो सबसे "बोल्ड" टिप्पणी करता, वह नायक बन जाता. आयुष चुप रहता. उसकी चुप्पी असहमति नहीं, सहमति थी. यह दूसरा पाठ था: स्त्री एक वस्तु है, और उसका 'ज्ञान' ही पुरुषत्व की पूंजी है.

एक शाम "विशेष व्याख्यान" हुआ. एक बुजुर्ग शिक्षक बोले, "याद रखो, लड़कियाँ ध्यान भटकाने का सबसे बड़ा साधन हैं. प्रेम-प्रसंग मीठा जहर है. अच्छा लड़का वही है जिसका ध्यान केवल पढ़ाई, व्यायाम और खेल पर टिका रहे."

हॉल में सन्नाटा था. आयुष के मन में विचार कौंधा: अगर लड़कियाँ इतनी खतरनाक हैं... तो क्या यह स्त्री-विहीन दुनिया एक लाभ नहीं? हम बचाए गए हैं? यह विचार वीभत्स था, पर उसमें एक सच्चाई भी थी. यह तीसरा पाठ था: स्त्री एक बाहरी खतरा है. यह दुनिया हमारा 'सुरक्षित क्षेत्र' है.

इन पाठों के बीच आयुष ने एक और पाठ सीखा. हॉस्टल की महिला कर्मचारियों के प्रति. वे झाड़ू लगाती थीं, बर्तन साफ करती थीं. पर वे होते हुए भी अदृश्य थीं. लड़के उनसे आँख नहीं मिलाते थे, नाम नहीं जानते थे. उनका श्रम चाहिए था, उनकी मानवता, उनकी संवेदनाएँ नहीं. वे सिर्फ मशीन थी.

फिर वह रात आई. अँधेरे कमरे में केवल मोबाइल स्क्रीन की रोशनी थी. राजन ने एक वीभत्स वीडियो दिखाना शुरू किया. समर फुसफुसाया, "बंद करो... यह गलत है."

कमरे में सन्नाटा. फिर राजन हँसा, "अरे! हमारी 'कुमारी' को तो 'गलत' लगता है!" वह मुड़ा, "अरे आयुष, तेरी बहन है न? कभी उसकी सहेली की फोटो दिखाई है?"

प्रश्न बिजली-सा गुजरा. आयुष के मन में दो छवियाँ टकराईं: उसकी सगी बहन शगुन, और इस कमरे की भाषा की "बहन". एक वस्तु, एक मजाक.

सब की नजरें उस पर थीं. यह परीक्षा थी. शगुन का चेहरा आँखों के सामने तैरा. “तुम खुद को खो रहे हो?”

आयुष ने एक सेकंड के लिए आँखें बंद कीं. जब खोलीं, तो चेहरे पर कोई भाव नहीं था. एक खाली मुस्कुराहट होंठों पर चिपक गई. उसकी आवाज़ सपाट निकली:

"अरे, वो’ वो बहुत साधारण है. बस पढ़ाई में लगी रहती है. कोई फोटो नहीं."

उसने जानबूझकर उसे 'उबाऊ' बना दिया. इस एक झूठ में, आयुष ने हॉस्टल के मूल्यों को अपने सबसे पुराने रिश्ते से ऊपर रख दिया.

कमरे में तालियाँ बजीं. आयुष ने इम्तिहान 'पास' कर लिया था. उसकी जगह सुरक्षित हो गई.

रात को सपना आया. शगुन धुंधली परछाई सी खड़ी थी, "आयुष, तुम कहाँ खो गए?"

आयुष जवाब देना चाहता था, पर मुहँ से वही गालियाँ निकलने लगीं. शगुन की छवि चीखती हुई गायब हो गई.

आयुष हाँफता हुआ जाग गया. कमरे में खर्राटे गूँज रहे थे. उसने अपने हाथ देखे. वही हाथ जिसने शगुन की गुड़िया थामी थी. आँखों में जलन उभरी. गले की पुरानी गाँठ फूल गई. एक सिसकी सीने से टकराकर ऊपर आई. उसने तकिए को जोर से पकड़ लिया. और फिर, बिना आवाज किए, तकिए में मुहँ दबाकर, उसने वह पहला और आखिरी आँसू रोया जो बारह साल की उम्र के बाद कभी नहीं आया था. शरीर एक झटके में काँपा, फिर शांत हो गया.

सुबह जब वह उठा, तो सकी आँखें सूखी और चेहरा पत्थर की तरह सख्त था. दर्पण के सामने यूनिफॉर्म के बटन लगाते हुए उसने अपनी ओर देखा. भीतर का वह लड़का, जिसने रात को आँसू बहाए थे, अब गायब था. उसकी जगह एक खोखला, सही ढंग से ढला हुआ खोल था, जो सभी पाठ याद कर चुका था.

उसने दर्पण से नजर हटा ली, और कमरे से बाहर कदम रख दिया. दिन का पहला पाठ शुरू होने वाला था.                   ... क्रमश: