@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: जून 2026

बुधवार, 3 जून 2026

प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 62

सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 31 मई 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.

पर सोचा हुआ कब होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना है, कब आ सकता हूँ?”

“सर, कभी भी. आज दिनभर घर पर ही हूँ.”

“शाम सात बजे ठीक रहेगा?”

“हाँ, क्यों नहीं. पर सर, कुछ खास काम है?’

“नहीं, कुछ खास नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं, मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”

“सर, मैं इंतज़ार करूंगी.”

कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.

खाने में दाल-चावल थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.

शाम सवा सात बजे करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया. एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”

“चलो बिना चीनी के ब्लैक कॉफी बना लो.”  प्रशांत बाबू ने कहा तो वह कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”

“प्रिया, तुम्हारी नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.

“ठीक है सर, कोई व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं है.”

“फिर ठीक है. इस बीच तुमने ईसीआई  के आंदोलन में बहुत मदद की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”

“नहीं सर, आप उसकी चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”

“तुम बहुत समझदार हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.” प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.

“नहीं सर ऐसा नहीं होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”

“तुमने इस बीच यूनियन लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”

“सभी किताबें अच्छी हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है. कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन खरीद लीं है”

“हाँ, उनमें से अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”

“मुझे ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति”  ने बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”

“तुमने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”

“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है. इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व समझ आता है.”

“यह अच्छी बात है कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”

प्रशांत बाबू ने कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर, एक कॉफी बनाऊँ.”

“नहीं उसकी जरूरत नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव दूँ.”

सुनकर प्रिया स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक देखती रही.

“सर मैं जानती हूँ कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट उत्तर दिया.

“तुम्हारा कहना बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए प्रशांत बाबू मुस्कुराए.

प्रिया हँस पड़ी. “सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”

“प्रिया, साढ़े आठ बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.

“बस अब बनाऊंगी. वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”

“मैं रोज की तरह अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”

“ठीक है सर, आप रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.

आधे घंटे बाद दोनों ‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे. और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.

... क्रमशः

सोमवार, 1 जून 2026

आकाश

देहरी के पार, कड़ी - 61
टैक्सी पवई की ओर आगे बढ़ी. प्रिया पीछे छूट गई. लेकिन आकाश की आँखों में फोर्ट एरिया की गोथिक इमारतों की छाँव से लेकर गेटवे ऑफ इंडिया पर आती समंदर की हवाओं तक, प्रिया के साथ बिताया गया आज का एक-एक पल किसी चलचित्र की तरह गतिशील था. उसने टैक्सी से बाहर की ओर देखा, वहाँ तमाम रोशनियाँ पीछे प्रिया की ओर दौड़ी जा रही हैं. कुछ ही देर में टैक्सी उसकी सोसायटी के गेट पर खड़ी थी. उसने टैक्सी को भाड़ा देकर विदा किया.

फ्लैट का दरवाज़ा खोला, तो वहाँ उसका स्वागत करने के लिए सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं था… दो सप्ताह पहले एक सुबह सूर्योदय के ठीक पहले बोरिवली स्टेशन पर उतरने के पहले तक वह सोच रहा था कि इस विशाल महानगर की दौड़ती हुई अजनबी भीड़ में वह तैरने के लिए अकेला होगा. लेकिन कुछ क्षण बाद प्लेटफॉर्म पर उतरते ही प्रिया का अपने किसी अजीज की तरह उसका स्वागत करना, जबरन उसे अपने फ्लैट ले जाना, वहाँ पहुंचते ही अपने हाथों चाय बनाकर देना. दैनिक प्रातःकालीन कर्मों से निवृत्त होने के बाद अपने हाथों पोहा और चाय बनाकर उसे देना, दोपहर एमबी ले जाकर लंच करना और फिर अपने परिचित ड्राइवर के आटो में बिठाकर कंपनी के गेस्ट हाउस भेजना. इन सबने उसे स्नेहसिक्त कर दिया था. उसके बाद इस नए फ्लैट का अंतिम चुनाव उसी ने किया. उसने जूते उतारे, कपड़े बदले और बालकनी में आकर खड़ा हो गया. सामने पवई झील का शांत पानी में लहरें बहुत हल्की उठ रही थीं. दूर हीरानंदानी की गगनचुंबी इमारतें रात के अंधेरे में जगमगा रही थीं. बदन में दिनभर की दौड़-भाग की वजह से अच्छी-खासी थकान थी, लेकिन आँखों से नींद कोसों दूर थी.

उसने रेलिंग पर हाथ टिकाए हुए गहरी साँस ली. आज वह खुद को बहुत अलग और अजीब-सी कशमकश में पा रहा था।

अपने घर से काम कर रही प्रिया एक बहुत ही शांत, गंभीर और अपने काम से काम रखने वाली कलीग थी. फिर अचानक उसे मुख्यालय के आदेश से उसे प्रिया के घर जाकर उसे आवंटित लैपटॉप लेने जाना पड़ा. उसके बाद उसकी सहेली ऋचा के फ्लैट पर पहली बार वह प्रिया से प्रत्यक्ष हुआ. तब उसकी आँखों में उसने बेबसी और छटपटाहट के साथ कुछ कर गुजरने का संकल्प भी देखा था. कोटा से जयपुर तक की चार घंटे की वह कार यात्रा आकाश को आज भी हूबहू याद थी, जहाँ प्रिया बाहरी दुनिया से बेखबर, चुपचाप अपने तमाम अहसासों को दबाए खिड़की से बाहर देखती रही थी, एकदम गुमसुम. वह उसकी खामोशी तोड़ने को उससे कुछ न कुछ कहता रहा. लेकिन वह केवल हाँ- हूँ करके जवाब देती रही.

जयपुर में तीन दिन दो रात वह उसके घर रही. तब उसे लगा था कि प्रिया मुसीबत में फंसी लड़की है जिसे सुरक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है और वह उसकी 'मदद' कर रहा है. उसका मंगेतर विक्रांत उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा भी, लेकिन पापा की सूझबूझ से उसे गिरफ्तार होना पड़ा. उसी दिन कंपनी ने उसकी पोस्टिंग मुख्यालय मुंबई में कर दी और अगली सुबह ही वह फ्लाइट लेकर मुंबई चली आई. इस बीच उसके अवचेतन में कहीं न कहीं प्रिया के रक्षक वाली भूमिका बनी रही.

"लेकिन आज..." आकाश ने बुदबुदाते हुए अपना सिर झटका.

यहाँ मुंबई में प्रिया का रूप कुछ और ही था. वह बिंदास तरीके से उसे लेने बोरिवली स्टेशन पहुँची और उसे अपने फ्लैट ले गई. चार घंटों में वहाँ उसने प्रिया का एक और रूप देखा. एक गृहस्थिन की तरह उसकी मेहमाननवाजी का, ‘एमबी’ में रामजी काका और फिर ऑटो ड्राइवर बब्बन के चरित्र, वे उसके क्या थे? मित्र, साथी या शुभचिंतक? वह उनके उस संबंध को अभी तक नहीं समझ सकता था. और आज, फोर्ट एरिया में उसने प्रिया का एक और बिल्कुल अलग और विराट रूप देखा. कंप्यूटर स्क्रीन पर मज़दूरों के शोषण के आंकड़ों को एक वैज्ञानिक हथियार में बदल देना, एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी कड़क और नामचीन शख्सियत से पूरी तार्किकता और आत्मविश्वास के साथ बात करना. वह लड़की जो कुछ महीने पहले अपने घर की देहरी लांघने के बाद सहमी हुई थी, आज मुंबई के इस ऐतिहासिक विधिक हलके में बड़े-बड़े दिग्गजों को प्रभावित कर रही थी.

कैफे मिलिट्री की दोपहर आकाश की आँखों के सामने तैर गई. चाय की चुस्कियों के बीच अचानक उसके मुंह से निकल गया था—‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं.’

आकाश ने बालकनी की दीवार पर हल्का सा मुक्का मारा. उसने खुद से सवाल किया कि आखिर उसके भीतर यह डर क्यों आया था? आया भी था तो उसने उसे उसके सामने अभिव्यक्त क्यों कर दिया था? तब उसका पुरुष वादी अहंकार कहाँ जा छिपा था. क्या वह प्रिया की इस बढ़ी हुई शख्सियत और उसकी अद्भुत प्रतिभा से सहम गया था? या फिर यह डर उस सम्मान से उपजा था जो उसके दिल में प्रिया के लिए पल-पल गहरा होता जा रहा था? क्या वह एक सच्चे इंसान का विस्मय था जो अपनी कलीग की इस ऊँचाई देखकर पैदा हुआ था?

उसे पलटकर दिया गया प्रिया का जवाब याद आया, जिसने उसके सारे संशयों को शांत कर दिया था—‘हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं... वैसे, क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

आकाश ने सोचा कि प्रिया के इन शब्दों का असल अर्थ क्या था? उसने उसकी बात को, उस डर को किस रूप में लिया था. क्या वह एक मित्र की सांत्वना मात्र थी, या उसके अंतर्मन में भी अब आकाश को लेकर कोई नया अंकुर पनप रहा था? क्या प्रिया ने इसे भविष्य के किसी बंधन या विवाह के संकेत के रूप में तो नहीं देख लिया है?

विचारों का यह ताना-बाना उसे और गहरे ले गया. वह जानता था कि उसके मम्मी-पापा और छोटी बहन तान्या प्रिया को उन दो रातों से ही चाहने लगे थे. उसके मुंबई चले आने के बाद,माँ ने बार-बार उसकी सादगी और उसकी हिम्मत की सराहना की थी. लेकिन क्या प्रिया जैसी आज़ाद, स्वाभिमानी और बौद्धिक रूप से समृद्ध लड़की उसके सीधे-साधे, पारंपरिक परिवार के माहौल में पूरी तरह सहज होने के लिए स्वयं को तैयार कर पाएगी? और सबसे बड़ा और कड़वा सवाल—विक्रांत के उस कुरूप और थोपे गए रिश्ते के अनुभव के बाद, क्या प्रिया इतनी जल्दी किसी भी पुरुष पर दोबारा पूरा और अटूट भरोसा करने को तैयार होगी?

आकाश ने टेबल पर रखे फोन को देखा. मन हुआ कि अभी प्रिया को कॉल करे और पूछ ले कि वह सोई या नहीं. लेकिन उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया. वह जानता था कि प्रिया कोई साधारण लड़की नहीं है. उसे किसी भावुकता, जल्दबाजी या सतरंगी वादों से प्रभावित नहीं किया जा सकता. उसे समय चाहिए, और सबसे बढ़कर उसे एक ऐसा साथी चाहिए जो उसकी आत्मनिर्भरता की देहरी का सम्मान करे, न कि उसे विवाह के पवित्र बंधन के नाम पर किसी नए दायरे में बांधना चाहे.

घड़ी की घंटे की सुई बारह के अंक को पार कर चुकी थी. अचानक आकाश के चेहरे पर एक शांत और गंभीर मुस्कान छा गई. उसके मन का बवंडर अब थमने लगा था. उसने मन ही मन एक बेहद परिपक्व निर्णय लिया. वह प्रिया पर किसी भी बात का दबाव नहीं बनाएगा. वह उसकी राह का प्रतियोगी नहीं, बल्कि उसकी हर कठिनाई में उसका सबसे मजबूत सहारा बनने की कोशिश करेगा.

उसने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया, कमरे की बत्ती बुझाई और बिस्तर पर लेट गया. पवई झील के पानी से टकराकर आने वाली हवा हल्के से खिड़की के परदों को सहलाए जा रही थी. उसके और प्रिया के बीच कोई वादा नहीं था, कोई इकरार नहीं था, लेकिन इस रात आकाश अपने अंतर्मन के समंदर को पार करने के लिए छलांग लगा चुका था.
... क्रमशः