@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: 2026

बुधवार, 3 जून 2026

प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 62

सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 31 मई 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.

पर सोचा हुआ कब होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना है, कब आ सकता हूँ?”

“सर, कभी भी. आज दिनभर घर पर ही हूँ.”

“शाम सात बजे ठीक रहेगा?”

“हाँ, क्यों नहीं. पर सर, कुछ खास काम है?’

“नहीं, कुछ खास नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं, मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”

“सर, मैं इंतज़ार करूंगी.”

कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.

खाने में दाल-चावल थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.

शाम सवा सात बजे करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया. एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”

“चलो बिना चीनी के ब्लैक कॉफी बना लो.”  प्रशांत बाबू ने कहा तो वह कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”

“प्रिया, तुम्हारी नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.

“ठीक है सर, कोई व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं है.”

“फिर ठीक है. इस बीच तुमने ईसीआई  के आंदोलन में बहुत मदद की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”

“नहीं सर, आप उसकी चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”

“तुम बहुत समझदार हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.” प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.

“नहीं सर ऐसा नहीं होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”

“तुमने इस बीच यूनियन लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”

“सभी किताबें अच्छी हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है. कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन खरीद लीं है”

“हाँ, उनमें से अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”

“मुझे ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति”  ने बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”

“तुमने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”

“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है. इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व समझ आता है.”

“यह अच्छी बात है कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”

प्रशांत बाबू ने कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर, एक कॉफी बनाऊँ.”

“नहीं उसकी जरूरत नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव दूँ.”

सुनकर प्रिया स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक देखती रही.

“सर मैं जानती हूँ कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट उत्तर दिया.

“तुम्हारा कहना बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए प्रशांत बाबू मुस्कुराए.

प्रिया हँस पड़ी. “सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”

“प्रिया, साढ़े आठ बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.

“बस अब बनाऊंगी. वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”

“मैं रोज की तरह अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”

“ठीक है सर, आप रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.

आधे घंटे बाद दोनों ‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे. और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.

... क्रमशः

सोमवार, 1 जून 2026

आकाश

देहरी के पार, कड़ी - 61
टैक्सी पवई की ओर आगे बढ़ी. प्रिया पीछे छूट गई. लेकिन आकाश की आँखों में फोर्ट एरिया की गोथिक इमारतों की छाँव से लेकर गेटवे ऑफ इंडिया पर आती समंदर की हवाओं तक, प्रिया के साथ बिताया गया आज का एक-एक पल किसी चलचित्र की तरह गतिशील था. उसने टैक्सी से बाहर की ओर देखा, वहाँ तमाम रोशनियाँ पीछे प्रिया की ओर दौड़ी जा रही हैं. कुछ ही देर में टैक्सी उसकी सोसायटी के गेट पर खड़ी थी. उसने टैक्सी को भाड़ा देकर विदा किया.

फ्लैट का दरवाज़ा खोला, तो वहाँ उसका स्वागत करने के लिए सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं था… दो सप्ताह पहले एक सुबह सूर्योदय के ठीक पहले बोरिवली स्टेशन पर उतरने के पहले तक वह सोच रहा था कि इस विशाल महानगर की दौड़ती हुई अजनबी भीड़ में वह तैरने के लिए अकेला होगा. लेकिन कुछ क्षण बाद प्लेटफॉर्म पर उतरते ही प्रिया का अपने किसी अजीज की तरह उसका स्वागत करना, जबरन उसे अपने फ्लैट ले जाना, वहाँ पहुंचते ही अपने हाथों चाय बनाकर देना. दैनिक प्रातःकालीन कर्मों से निवृत्त होने के बाद अपने हाथों पोहा और चाय बनाकर उसे देना, दोपहर एमबी ले जाकर लंच करना और फिर अपने परिचित ड्राइवर के आटो में बिठाकर कंपनी के गेस्ट हाउस भेजना. इन सबने उसे स्नेहसिक्त कर दिया था. उसके बाद इस नए फ्लैट का अंतिम चुनाव उसी ने किया. उसने जूते उतारे, कपड़े बदले और बालकनी में आकर खड़ा हो गया. सामने पवई झील का शांत पानी में लहरें बहुत हल्की उठ रही थीं. दूर हीरानंदानी की गगनचुंबी इमारतें रात के अंधेरे में जगमगा रही थीं. बदन में दिनभर की दौड़-भाग की वजह से अच्छी-खासी थकान थी, लेकिन आँखों से नींद कोसों दूर थी.

उसने रेलिंग पर हाथ टिकाए हुए गहरी साँस ली. आज वह खुद को बहुत अलग और अजीब-सी कशमकश में पा रहा था।

अपने घर से काम कर रही प्रिया एक बहुत ही शांत, गंभीर और अपने काम से काम रखने वाली कलीग थी. फिर अचानक उसे मुख्यालय के आदेश से उसे प्रिया के घर जाकर उसे आवंटित लैपटॉप लेने जाना पड़ा. उसके बाद उसकी सहेली ऋचा के फ्लैट पर पहली बार वह प्रिया से प्रत्यक्ष हुआ. तब उसकी आँखों में उसने बेबसी और छटपटाहट के साथ कुछ कर गुजरने का संकल्प भी देखा था. कोटा से जयपुर तक की चार घंटे की वह कार यात्रा आकाश को आज भी हूबहू याद थी, जहाँ प्रिया बाहरी दुनिया से बेखबर, चुपचाप अपने तमाम अहसासों को दबाए खिड़की से बाहर देखती रही थी, एकदम गुमसुम. वह उसकी खामोशी तोड़ने को उससे कुछ न कुछ कहता रहा. लेकिन वह केवल हाँ- हूँ करके जवाब देती रही.

जयपुर में तीन दिन दो रात वह उसके घर रही. तब उसे लगा था कि प्रिया मुसीबत में फंसी लड़की है जिसे सुरक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है और वह उसकी 'मदद' कर रहा है. उसका मंगेतर विक्रांत उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा भी, लेकिन पापा की सूझबूझ से उसे गिरफ्तार होना पड़ा. उसी दिन कंपनी ने उसकी पोस्टिंग मुख्यालय मुंबई में कर दी और अगली सुबह ही वह फ्लाइट लेकर मुंबई चली आई. इस बीच उसके अवचेतन में कहीं न कहीं प्रिया के रक्षक वाली भूमिका बनी रही.

"लेकिन आज..." आकाश ने बुदबुदाते हुए अपना सिर झटका.

यहाँ मुंबई में प्रिया का रूप कुछ और ही था. वह बिंदास तरीके से उसे लेने बोरिवली स्टेशन पहुँची और उसे अपने फ्लैट ले गई. चार घंटों में वहाँ उसने प्रिया का एक और रूप देखा. एक गृहस्थिन की तरह उसकी मेहमाननवाजी का, ‘एमबी’ में रामजी काका और फिर ऑटो ड्राइवर बब्बन के चरित्र, वे उसके क्या थे? मित्र, साथी या शुभचिंतक? वह उनके उस संबंध को अभी तक नहीं समझ सकता था. और आज, फोर्ट एरिया में उसने प्रिया का एक और बिल्कुल अलग और विराट रूप देखा. कंप्यूटर स्क्रीन पर मज़दूरों के शोषण के आंकड़ों को एक वैज्ञानिक हथियार में बदल देना, एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी कड़क और नामचीन शख्सियत से पूरी तार्किकता और आत्मविश्वास के साथ बात करना. वह लड़की जो कुछ महीने पहले अपने घर की देहरी लांघने के बाद सहमी हुई थी, आज मुंबई के इस ऐतिहासिक विधिक हलके में बड़े-बड़े दिग्गजों को प्रभावित कर रही थी.

कैफे मिलिट्री की दोपहर आकाश की आँखों के सामने तैर गई. चाय की चुस्कियों के बीच अचानक उसके मुंह से निकल गया था—‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं.’

आकाश ने बालकनी की दीवार पर हल्का सा मुक्का मारा. उसने खुद से सवाल किया कि आखिर उसके भीतर यह डर क्यों आया था? आया भी था तो उसने उसे उसके सामने अभिव्यक्त क्यों कर दिया था? तब उसका पुरुष वादी अहंकार कहाँ जा छिपा था. क्या वह प्रिया की इस बढ़ी हुई शख्सियत और उसकी अद्भुत प्रतिभा से सहम गया था? या फिर यह डर उस सम्मान से उपजा था जो उसके दिल में प्रिया के लिए पल-पल गहरा होता जा रहा था? क्या वह एक सच्चे इंसान का विस्मय था जो अपनी कलीग की इस ऊँचाई देखकर पैदा हुआ था?

उसे पलटकर दिया गया प्रिया का जवाब याद आया, जिसने उसके सारे संशयों को शांत कर दिया था—‘हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं... वैसे, क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

आकाश ने सोचा कि प्रिया के इन शब्दों का असल अर्थ क्या था? उसने उसकी बात को, उस डर को किस रूप में लिया था. क्या वह एक मित्र की सांत्वना मात्र थी, या उसके अंतर्मन में भी अब आकाश को लेकर कोई नया अंकुर पनप रहा था? क्या प्रिया ने इसे भविष्य के किसी बंधन या विवाह के संकेत के रूप में तो नहीं देख लिया है?

विचारों का यह ताना-बाना उसे और गहरे ले गया. वह जानता था कि उसके मम्मी-पापा और छोटी बहन तान्या प्रिया को उन दो रातों से ही चाहने लगे थे. उसके मुंबई चले आने के बाद,माँ ने बार-बार उसकी सादगी और उसकी हिम्मत की सराहना की थी. लेकिन क्या प्रिया जैसी आज़ाद, स्वाभिमानी और बौद्धिक रूप से समृद्ध लड़की उसके सीधे-साधे, पारंपरिक परिवार के माहौल में पूरी तरह सहज होने के लिए स्वयं को तैयार कर पाएगी? और सबसे बड़ा और कड़वा सवाल—विक्रांत के उस कुरूप और थोपे गए रिश्ते के अनुभव के बाद, क्या प्रिया इतनी जल्दी किसी भी पुरुष पर दोबारा पूरा और अटूट भरोसा करने को तैयार होगी?

आकाश ने टेबल पर रखे फोन को देखा. मन हुआ कि अभी प्रिया को कॉल करे और पूछ ले कि वह सोई या नहीं. लेकिन उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया. वह जानता था कि प्रिया कोई साधारण लड़की नहीं है. उसे किसी भावुकता, जल्दबाजी या सतरंगी वादों से प्रभावित नहीं किया जा सकता. उसे समय चाहिए, और सबसे बढ़कर उसे एक ऐसा साथी चाहिए जो उसकी आत्मनिर्भरता की देहरी का सम्मान करे, न कि उसे विवाह के पवित्र बंधन के नाम पर किसी नए दायरे में बांधना चाहे.

घड़ी की घंटे की सुई बारह के अंक को पार कर चुकी थी. अचानक आकाश के चेहरे पर एक शांत और गंभीर मुस्कान छा गई. उसके मन का बवंडर अब थमने लगा था. उसने मन ही मन एक बेहद परिपक्व निर्णय लिया. वह प्रिया पर किसी भी बात का दबाव नहीं बनाएगा. वह उसकी राह का प्रतियोगी नहीं, बल्कि उसकी हर कठिनाई में उसका सबसे मजबूत सहारा बनने की कोशिश करेगा.

उसने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया, कमरे की बत्ती बुझाई और बिस्तर पर लेट गया. पवई झील के पानी से टकराकर आने वाली हवा हल्के से खिड़की के परदों को सहलाए जा रही थी. उसके और प्रिया के बीच कोई वादा नहीं था, कोई इकरार नहीं था, लेकिन इस रात आकाश अपने अंतर्मन के समंदर को पार करने के लिए छलांग लगा चुका था.
... क्रमशः

रविवार, 31 मई 2026

उलझे सवाल

देहरी के पार, कड़ी - 60
टैक्सी हाईवे पर दौड़ी चली जा रही थी. दायीं ओर छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिखाई देने लगा. टैक्सी हाईवे से उतरकर अंधेरी ईस्ट में प्रवेश करने वाली थी. प्रिया ने घड़ी देखी, साढ़े आठ बजे थे. हल्की भूख महसूस होने लगी थी. दिनभर घूमते हुए वह इतनी थक चुकी थी कि फ्लैट पर जाकर खाना बनाना अब उसके बस का नहीं था.

“भूख लगने लगी होगी तुम्हें,” उसने आकाश से पूछा.

“हाँ, क्या तुम्हें भी?”

“हाँ, मुझे भी. तभी तो पूछा है. मन तो कर रहा था कि घर पहुँचकर कुछ हल्का बनाकर खाएँ. लेकिन थकान इतनी है कि नहीं बनेगा.” प्रिया ने कहा.

“तो फिर तुम्हारी सोसायटी के नजदीक किसी रेस्टोरेंट के पास टैक्सी छोड़ते हैं.” वहाँ कुछ खाकर तुम अपने फ्लैट चले जाना और मैं पवई के लिए टैक्सी या ऑटो ले लूंगा.”

“यह ठीक है.” प्रिया ने कहा. तब तक टैक्सी अंधेरी ईस्ट में प्रवेश कर चुकी थी. रास्ता प्रिया ने बताया फिर उसे रुकवाकर दोनों उतर लिए. सामने ही रेस्टोरेंट था, “चपाती”. एकदम सादा और आकर्षक नाम.

दोनों ने अंदर प्रवेश किया. सजावट और पुराने फर्नीचर से रेस्टोरेंट 50-60 साल पुराने जमाने का अहसास दिलाता था. साफ-सफाई में उसे अव्वल कहा जा सकता था. सभी टेबल भरी हुई थीं. वे काउंटर के सामने खड़े रह गए. काउंटर के सामने दो सोफे रखे थे. जिनमें से एक पर तीन लोग बैठे थे, दूसरा खाली था. काउंटर वाले ने कहा, “सर, आप सोफे पर बैठिए. टेबल थोड़ी देर में खाली हो जाएगी.”

तभी प्रिया ने आकाश को कहा, “तुम बैठो मैं अभी आती हूँ.” वह काउंटर से कुछ आगे जाकर दाहिनी और स्थित वाशरुम चली गई.

कुछ देर में टेबलें खाली हुईं. बेयरा उन्हें एक टेबल तक ले गया.

खाना स्वादिष्ट और सुपाच्य था. खाने के बाद बेयरे से बिल मांगा तो उसने बताया कि बिल काउंटर पर ही मिलेगा. दोनों ने काउंटर पर बिल का भुगतान किया. पूछने पर काउंटर वाले ने बताया कि, ‘वे नहीं चाहते कोई हमारे स्टाफ को कोई टिप दे. बिल बहुत वाजिब था, जितने की आकाश ने बिल्कुल अपेक्षा नहीं की थी.

वे ‘चपाती’ से बाहर आए और टैक्सी का इंतजार करने लगे. तब आकाश ने प्रिया से पूछा, “तुम ‘चपाती’ और ‘एमबी’ जैसी अच्छी जगहें कैसे तलाश कर लेती हो?”

प्रिया ने हँस पड़ी. उसने उत्तर दिया, “एक तो लड़की हूँ, दूसरे मजदूरों के साथ रहती हूँ. उन्हें अच्छी और किफायती जगहों का पता रहता है, वे बता देते हैं.” तभी प्रिया की निगाह एक खाली टैक्सी पर पड़ी, उसने आवाज देकर उसे रुकवाया और आकाश को विदा किया.

फ्लैट पहुँचकर प्रिया ने कपड़े बदले और बिस्तर पर ढेर हो गई. थकान बहुत थी. आज उसने और आकाश ने घूमने के चक्कर में अपने शरीरों के साथ अति कर दी थी. बदन दर्द कर रहा था. वह जानती थी कि आज जल्दी नींद नहीं आने वाली. उसे मम्मी-पापा और मयंक की याद आई, उनसे बात किए बहुत दिन हो गए हैं. आज बहुत देर हो गयी. लेकिन वह कल जरूर उनसे बात करेगी. फिर उसके जेहन में आकाश की तस्वीरें उभरने लगीं.

आकाश और प्रिया एक ही टीम का हिस्सा थे. काम के दौरान वे अक्सर कानों पर चढ़े हेडफोनों पर एक-दूसरे की आवाजें सुनते थे. जानते थे कि सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में वह अच्छा है. कामकाजी बातों के सिवा बातचीत का कोई सिलसिला नहीं था. फिर अचानक पापा ने उसकी शादी विक्रांत से तय कर दी, एक पारिवारिक समारोह में दोनों की सगाई हो गयी. वह विक्रांत के संपर्क में आई तो पता लगा कि उसके साथ जीवन नहीं निभाया जा सकता. माँ को बताया, माँ ने पापा को. पापा ने साफ मना कर दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता सगाई तोड़ने पर बदनामी होगी. शादी तो वहीं करनी पड़ेगी. जल्दी में शादी की तारीख तय हो गयी. दो दिन पहले तक वह प्रयत्न करती रही कि किसी तरह रिश्ता खत्म हो जाए, विवाह न हो. पर पापा टस से मस नहीं हुए. उसने घर छोड़ने का निर्णय किया. वह एक बैग में कपड़े लेकर घर से निकल आई. दोस्तों ने उसे सहारा दिया. वह अपनी सहेली ऋचा के घर रही. कंपनी का लैपटॉप घर छूट गया. कंपनी ने जयपुर से आकाश को उसका लैपटॉप लेने भेजा. वह लैपटॉप लाने के बाद ऋचा के यहाँ आया प्रिया की उससे प्रत्यक्ष भेंट हुई. वहाँ तय हुआ कि उसे आकाश के साथ ही कोटा छोड़ देना चाहिए. आकाश उसे अपनी कार से जयपुर अपने घर ले गया. वह होटल में ठहरना चाहती थी लेकिन आकाश के माता-पिता ने उसे होटल में नहीं ठहरने दिया, वह उनके यहाँ रुकी. वहीं उसकी मुलाकात आकाश की छोटी बहन तान्या से हुई. विक्रम ने जयपुर तक उसका पीछा किया और आकाश के घर पहुँच गया. आकाश के पिता की सूझ बूझ से विक्रम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. प्रिया को कंपनी ने मुंबई कार्यालय में काम करने का ऑफर मिला तो वह मुंबई आ गई. अकेले में दोनों का साथ केवल चार घंटे कोटा से जयपुर की कार यात्रा में और चार घंटे प्रिया के फ्लैट में कुल आठ घंटे का साथ था. उसमें वह उसे कितना जान सकती थी. उसने आकाश को फ्लैट तय करने में मदद की. आज अचानक उसने आकाश को अपने साथ घूमने का निमंत्रण दे डाला. दोनों खूब साथ घूमे, लंच और डिनर साथ किए.

जब आकाश ने उसे कहा था कि ‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं’ तब उसने पलटकर सवाल किया था कि ‘हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

क्या सोचा होगा आकाश ने? कहीं उसने इसे विवाह के प्रस्ताव के रूप में तो नहीं लिया होगा?

दिन का अंत होते-होते आकाश का यह कहना कि, ‘प्रिया, मैं जान गया हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्तित्व बन चुकी हो जो अपने जीवन में जो भी फैसले लेगी, उससे कोई भी उसे डिगा नहीं सकता.’ आखिर आकाश के इस कथन का क्या अर्थ हो सकता है? क्या उसने अपने आपको उसका जीवनसाथी बनने को तैयार होने का मन बनाना शुरु कर दिया है? उसने बहुत सोचा लेकिन बहुत सारे सवालों ने उसे घेर लिया.

‘क्या वह खुद आकाश को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करने को तैयार है?’ यह सवाल उसका खुद से था. उसके पास जवाब था कि वह इतनी जल्दी निर्णय नहीं ले सकती. उसकी आकाश के बारे में जानकारी अभी बहुत उथली है, और उसके परिवार के बारे में भी वह कितना कम जानती है. दो दिन के मेहमान के साथ तो हर कोई अच्छा व्यवहार करता है. मुसीबत में घर आए मेहमान की मदद भी कोई भी कर सकता है. लेकिन यदि वह आकाश की पत्नी होकर उस परिवार में जाए तो उनका व्यवहार क्या होगा? वह नहीं सोच सकती थी. अंत में उसने निर्णय लिया कि वह इस मामले में कोई भी निर्णय धीरज से लेगी. अभी उसे आकाश और उसके परिवार के बारे में बहुत कुछ जानना शेष है.

उसने घड़ी देखी, बारह बजने को थे. ओह! अब सोना होगा. सोचना छोड़ना होगा. वरना नींद नहीं आएगी. उसने उठकर दो घूंट पानी पिया, टॉयलेट होकर आई, कमरे की बत्ती बुझाई. अंधेरा हो गया था. लेकिन अधूरा. खिड़की के पर्दे से छन कर मुंबई की रोशनियों का नैनो अंश भीतर प्रवेश कर रहा था जिससे नींद के बाद अचानक खुली आँखें कमरे में सब कुछ देख सकती थीं.
... क्रमशः

सोमवार, 25 मई 2026

दिलों में पहुँच

 देहरी के पार, कड़ी - 59
आकाश के सवाल के जवाब में प्रिया मुस्कुराकर रह गई. आकाश ने दुबारा पूछा, “किधर ले चलने इरादा है इस नाचीज को आज.”

“बस चलते चलो मेरे साथ. तुम्हें किसी तिलिस्म में नहीं ले जा रही हूँ. बस यह इलाका महानगर मुंबई का दिल है और फिलहाल हम इसके अंदर हैं.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए अपने बैग के स्ट्रैप को कंधे पर सँभालते हुए आकाश की ओर देखा. धूप अब तीखी होने लगी थी, इसलिए उसने आकाश का हाथ हल्के से थामते हुए कहा, "प्लान बहुत सिंपल है आकाश. धूप तेज़ है, तो सबसे पहले हम यहाँ के एक बहुत पुराने और ऐतिहासिक पारसी कैफे चलेंगे. वहाँ की कड़क ईरानी चाय और बन-मस्क खाए बिना दक्षिण मुंबई आना अधूरा माना जाता है."

वे दोनों टहलते हुए फोर्ट की एक शांत लेन में स्थित 'कैफे मिलिट्री' के भीतर दाखिल हो गए. कैफे के भीतर कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे वक्त का पहिया अचानक पीछे की ओर घूम गया है. दीवारों पर लगे पुराने शीशे, महोगनी की गोल मेजें, लकड़ी की मुड़ी हुई कुर्सियाँ और छत पर बेहद धीमे घूमते पुराने ज़माने के पंखे—सब मिलकर मुंबई के एक अलग ही दौर की दास्तान बयां कर रहे थे.

प्रिया ने दो ईरानी चाय, बन-मस्क और वेज पफ का ऑर्डर दिया. टेबल पर आते ही बन-मस्क की खुशबू हवा में तैर गई. प्रिया ने चम्मच उठाकर आकाश की चाय में चीनी घोलनी शुरू की, लेकिन आकाश चुपचाप उसे ही देखता रहा. उसके चेहरे पर अभी भी एक अनजानी खामोशी और विचारमग्नता थी.

"क्या बात है आकाश? चैंबर से निकलने के बाद से तुम बहुत शांत रहे हो. ऐसा लग रहा है कि कुछ गंभीर सोच रहे हो?" प्रिया ने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए पूछा.

आकाश ने चाय की एक चुस्की ली और खिड़की से बाहर देखते हुए बेहद संजीदगी से कहा, "प्रिया, सच कहूँ तो आज चव्हाण साहब के चैंबर में जो कुछ हुआ, उसे देखकर मुझे जो अहसास हुआ उससे मैं भीतर तक हिल गया हूँ. अब तक मैं तुम्हें सिर्फ एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और कंपनी में अपने घर कोटा से काम कर रही अपनी कलीग के रूप में देखता था. लेकिन आज मैंने देखा कि कॉर्पोरेट की इस नौकरी के साथ तुमने मज़दूरों के इतने बड़े आंदोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को सहज ही संभाला हुआ है. सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी हस्ती तुम्हें लॉ ग्रेजुएट बनने की सलाह दे रहे हैं… मुझे एक पल के लिए लगा कि तुम मुझसे बहुत ऊपर निकल चुकी हो. तुम्हारी प्रतिभा की ऊँचाई के सामने मुझे अपनी कॉर्पोरेट के साथ काम करने की योग्यता बहुत बौनी लगने लगी. एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं."

प्रिया ने आकाश की आँखों में झाँका, वहाँ एक सच्चे मनुष्य का सहज असमंजस और आदर दिखाई दे रहा था. उसने मुस्कुराते हुए कहा, "आकाश, तुम अपनी तुलना मुझसे क्यों कर रहे हो? जयपुर से निकलकर सीधे मुंबई जैसे शहर में आने का साहसिक फैसला करना, एक बिल्कुल नई कंपनी में दो हफ्ते के भीतर अपनी जगह बनाना और अपनी पहचान साबित करना—क्या यह तुम्हारी काबिलीयत नहीं है? हम व्यक्तिगत जीवन में दो अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम प्रतिस्पर्धी हैं. हम दोनों में बहुत कमियाँ हो सकती हैं. हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं. वैसे में क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?”

प्रिया की इस आत्मीय और परिपक्व बात ने आकाश के मन के सारे संशयों को एक झटके में धो दिया. उसके चेहरे पर एक सहज और निश्चिंत मुस्कान लौट आई.

कैफे से निकलने के बाद वे दोनों 'काला घोड़ा' की तरफ बढ़ गए. सड़क किनारे फुटपाथ पर सजे हुए स्थानीय चित्रकारों के कैनवस देखते हुए वे 'जहाँगीर आर्ट गैलरी' के भीतर चले गए. गैलरी के शांत कमरों में लगी खूबसूरत कलाकृतियों को देखते हुए दोनों की बचपन की यादें ताजा होने लगीं. आकाश ने अपने बचपन में जयपुर में की गई अपनी किसी बेवकूफी वाली घटना सुनाई तो प्रिया ने उत्तर में कोटा की गई अपनी मूर्खता सुना दी. दोनों अपने बचपन की इन मूर्खताओं को याद कर खूब हँसे भी. दोनों ने मुंबई जैसे महानगर में अपने भविष्य को लेकर बहुत सारी बातें कीं. बीच में वे बिना बोले खामोशी से चलते भी रहे. ऐसा लगा जैसे दोनों एक-दूसरे के और करीब आ रहे हैं.

शाम ढलते-ढलते दोनों पैदल ही टहलते हुए 'गेटवे ऑफ इंडिया' के सामने आ पहुँचे. ढलते सूरज की लालिमा के बीच अरब सागर की लहरें ताज होटल की दीवारों से टकरा रही थीं. समंदर से आने वाली ठंडी और ताज़ा हवा ने दोपहर की सारी थकान को चंद लम्हों में सोख लिया. दोनों रेलिंग के सहारे खड़े होकर दूर समंदर के पानी में डोलती नावों को देखने लगे.

प्रिया ने समंदर की लहरों को देखते हुए अचानक थोड़े गंभीर स्वर में कहा, "जानते हो आकाश, चव्हाण साहब जो कह रहे थे, वो बात पूरी तरह गलत भी नहीं थी. इस सांख्यिकीय सर्वे को करते हुए मुझे पहली बार महसूस हुआ कि हमारे आईटी और सॉफ्टवेयर के ज्ञान का इस्तेमाल अगर उन मज़दूरों के जीवन को बदलने में हो जो अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी तरस रहे हैं, तो उससे मिलने वाला सुकून कॉर्पोरेट के किसी बड़े से बड़े इंसेंटिव या बोनस से कहीं बड़ा होगा."

आकाश ने प्रिया की तरफ देखा. उसकी आँखें इस समय समंदर की तरह ही गहरी और किसी बड़े संकल्प से भरी लग रही थीं. आकाश ने आगे बढ़कर पूरी आत्मीयता और हौसले के साथ प्रिया का हाथ थाम लिया और कहा, "प्रिया, मैं जान गया हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्तित्व बन चुकी हो जो अपने जीवन में जो भी फैसले लेगी, उससे कोई भी उसे डिगा नहीं सकता.”

गेटवे ऑफ इंडिया पर शाम की रोशनियाँ एक-एक कर जगमगाने लगी थीं. मुंबई की उस ढलती शाम में, समंदर की लहरों के शोर के बीच, उन दोनों ने एक-दूसरे से कोई वादा नहीं किया, लेकिन उन्होंने एक दूसरे के दिलों में अपनी पहुँच बना ली थी.
... क्रमशः

रविवार, 24 मई 2026

नया चेहरा

 देहरी के पार, कड़ी - 58

शनिवार सुबह सोकर उठने के बाद प्रिया रसोई में अपने लिए चाय बना रही थी कि प्रशांत बाबू का फोन आ गया. उसने फोन उठाया,  “प्रिया, हड़ताल के दिनों के वेतन और फेयर वेजेज का जो औद्योगिक विवाद राज्य सरकार ने इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल को रेफ्रेंस किया था, उसमें यूनियन को मंगलवार 18 जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम पेश करना है, इसे तैयार करने के लिए हमारे पास केवल दो सप्ताह हैं. कल कणिका की सांख्यिकीय रिपोर्ट भी मिल गई है. मैं जल्दी से जल्दी चव्हाण साहब से मिलना चाहता हूँ. उन्होंने आज ग्यारह बजे का समय दिया है. वे तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे कि प्रिया कैसी है, मैंने उन्हें कहा है कि हो सका तो वह भी मेरे साथ आएगी. तुम चल रही हो न?”

“चलना तो चाहती हूँ सर, पर आज आकाश से भी मिलना है. खैर मैं आपको आधे घंटे में बताती हूँ.” प्रिया ने इतना कहकर फोन काट दिया. उसने आकाश को फोन लगाया. देर तक घंटी जाने के बाद उधर से आवाज आई, “हेलो, कौन प्रिया? तुम बड़ी जल्दी उठ गई.” ऐसा लगा जैसे घंटी की आवाज सुनकर ही आकाश की नींद टूटी है.

“तो तुम अभी तक सो ही रहे थे?”

“हाँ तो, आज छुट्टी है, आज तो नींद निकालने का ही दिन है.” आकाश ने अलसाई आवाज में कहा.

“तो सुनो, मैं दस बजे फोर्ट के लिए निकल रही हूँ, वहाँ सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण का चैंबर है. उन्होंने ग्यारह बजे का समय दिया है. मैं सोचती हूँ तुम भी साथ चलो. आज हम दक्षिण मुंबई में घूमते हैं. वहीं कहीं लंच करेंगे और शाम तक लौट आएंगे. तुम चलोगे?” प्रिया ने अपने मन का बता दिया.”

“क्या? क्या? आज घूमने चलना है. वह तो सही है.  पर चव्हाण साहब के चैम्बर में मैं क्या करूंगा?”

“कुछ नहीं करना, बस सबसे मिलना और हमारी बातें सुनना. वहाँ आधे घंटे से अधिक नहीं लगेगा.”

“ठीक है, मैं तैयार होता हूँ, तुम मेरे फ्लैट पर आ रही हो या मुझे तुम्हारे फ्लैट पर आना है? आकाश ने पूछा.”

“वैसे तो तुम्हें ही आना चाहिए, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे इधर से पास है, यहाँ से फोर्ट जाना अधिक सही है.”

“ठीक है, मैं ही आता हूँ.” आकाश ने कहा.

“पर दस बजे के पहले पहुँच जाना. हम समय से चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच जाएँ.” प्रिया ने कहा और फोन काट दिया.

उसके बाद उसने प्रशांत बाबू को भी फोन करके बता दिया कि वह और आकाश सीधे चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच रहे हैं. ग्यारह बजने के पहले दोनों सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण के चैम्बर में थे.

चव्हाण साहब ने प्रिया का स्वागत किया और जानना चाहा कि उसके साथ कौन है?

“सर, ये आकाश हैं, मेरी कंपनी में मेरे कलीग थे. मैंने जब अपने घर से पलायन किया, तब इन्होंने मेरी बहुत मदद की. अब तक जयपुर अपने घर से काम कर रहे थे. अब इन्होंने कंपनी स्विच कर ली है और दो सप्ताह पहले मुंबई आ गए हैं. पवई में रह रहे हैं. आज मैं इन्हें साउथ मुंबई घुमाने ले आई.”

“वेलकम आकाश! प्रिया ने तुम्हारे बारे में पहले भी बताया था. उसने क्लोजर वाले केस में मेरी सहायक की भूमिका अदा की थी. यह बहुत प्रतिभाशाली है, यदि यह लॉ में ग्रेजुएशन कर ले तो मैं इसे स्थायी सहायकों में स्थान दे सकता हूँ. तुम्हें जब भी मेरी जरूरत हो, मुझे याद कर सकते हो. बेझिझक मुझसे मिल सकते हो.” चव्हाण साहब ने जो कुछ भी कहा, उससे आकाश असमंजस में आ गया. वह समझ ही नहीं पा रहा था कि, 'आखिर यह लड़की प्रिया है क्या?' जहाँ भी जाती है, अपने लिए जगह बना लेती है. उसने आकाश के दिल में स्थान बना लिया था. पर क्या वह भी उसके दिल में जगह बना सकेगा? यह सवाल मन में लिए ही उसने चव्हाण साहब को नमस्ते किया.

“नमस्ते सर, प्रिया ऐसी ही है. यह दो रात हमारे घर रुकी थी लेकिन आज भी मम्मी-पापा और छोटी बहन इसे याद करते ही रहते हैं.”

तभी प्रशांत बाबू और यूनियन सचिव शिंदे ने चैम्बर में प्रवेश किया. उन्होंने कणिका की तैयार की हुई सांख्यिकीय सर्वे की रिपोर्ट चव्हाण साहब को दी और कहा, “सर, फेयर वेजेज के केस में अठारह जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम प्रस्तुत करना है.”

चव्हाण साहब सर्वे रिपोर्ट लेकर उसके पन्ने पलटने लगे. रिपोर्ट के अंत में वे रिजल्ट पर रुके और उसे गंभीरता से पढ़ा. फिर बोले, “रिपोर्ट गंभीर है, 92 फीसदी मज़दूरों का कारखाने के नारकीय माहौल से पूरी तरह टूट जाने और 78 फीसदी का साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में फँसे होने के पुख्ता आंकड़े हमारे इस केस में यह मजबूत साक्ष्य होंगे. बस कणिका को गवाही देने के लिए दो-तीन बार आना पड़ सकता है.”

“वह आ जाएगी सर, कॉमरेड कुलकर्णी जी की भांजी है. बस उसे आने की तारीख सप्ताह भर पहले मिल जाए जिससे वह इसके लिए समय रख सके.”

“ठीक है, पहले इस मामले में जो समझौता वार्ता हुई थी, उसका सारा रिकार्ड और हड़ताल के दौरान जो पत्राचार प्रबंधन, लेबर कमिश्नर, पुलिस, स्थानीय प्रशासन आदि से हुआ था वह सब मुझे चाहिए. लाए हो?”

“नहीं सर, अभी तो नहीं है. पर हम आज ही शाम तक या कल दोपहर तक भिजवा देंगे.”

“आप सोमवार को शाम सात से नौ बजे के बीच भिजवाएँ.” मेरा चैम्बर आज दो बजे के बाद सोमवार को ही खुलेगा. आपका रिकॉर्ड आने के बाद मैं यह सब अपने सहायकों को सौंप दूंगा जिससे वे स्टेटमेंट ऑफ क्लेम तैयार कर सकें.”

मुलाकात यहीं खत्म हो गई. वापस लौटते वक्त चव्हाण साहब ने आकाश को फिर कहा, “आप आते रहिएगा. और यदि प्रिया को लॉ ग्रेजुएट होने के लिए प्रेरित करें तो देश को एक बेहतरीन वकील मिल सकता है.”

सुनकर प्रिया हँस पड़ी. कहने लगी, “सर, आप मजाक अच्छा करते हैं. मैं कानून के सागर में गोता लगाने का कतई इरादा नहीं रखती. मैं सॉफ्टवेयर में अच्छी हूँ. मेरे लिए वही ठीक है.”

“प्रिया यह हँसने की बात नहीं, मैं कोई विनोद नहीं कर रहा. बल्कि सीरियसली कह रहा हूँ. तुम्हारा ये सॉफ्टवेयर और आईटी का अनुभव तुम्हें इस क्षेत्र का श्रेष्ठ वकील बना सकता है. एक बार सोचकर देखना.” चव्हाण साहब ने उसे फिर कहा.

“ठीक है सर, आपका आशीर्वाद बना रहे. आज तो मैं बिलकुल नहीं सोचूंगी. मुझे और आकाश को साउथ मुम्बई घूमना है.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया. उसकी बात सुनकर चव्हाण साहब भी हँसने लगे.

चैंबर की सीढ़ियों से नीचे उतरते ही की दोपहर की धूप और समुद्री हवा ने आकाश और प्रिया का स्वागत किया. शनिवार की दोपहर होने के कारण फोर्ट की सड़कों पर दफ्तरों की भीड़ नहीं थी. ओल्ड विक्टोरियन गोथिक शैली और आर्ट डेको वास्तुकला की गर्व से खड़ी ऐतिहासिक इमारतें, चौड़ी सड़कें और शांत माहौल अब पूरी तरह उन नजरों के सामने था.

"चलो प्रिया, तुम्हारा आज का काम तो अच्छे से मुकम्मल हो गया," आकाश ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कुराकर कहा. "अब बताओ, इस खूबसूरत फोर्ट एरिया को एक्सप्लोर करने का तुम्हारा क्या प्लान है?

प्रिया ने अपने बैग को कंधे पर सँभाला और आकाश की ओर देखकर आत्मीयता से मुस्कुरा दी.

... क्रमशः

शनिवार, 23 मई 2026

आत्मीयता के रंग

देहरी के पार, कड़ी - 57
जब आकाश का फोन आया, तब डेटा फीड करने का काम लगभग समाप्त हो चुका था. कणिका ने डेटा देखकर कहा, “प्रिया, लगता है ये नतीजे तुम्हारे रैंडम सर्वे से बहुत अलग नहीं होंगे. तुमने जो औचक सर्वे किया था वह भी काफी बढ़िया था, तुमने भी वैज्ञानिक और सांख्यिकीय सिद्धांतों का बखूबी इस्तेमाल किया था.”

“नहीं, मैं इन सिद्धांतों के बारे में अधिक कुछ नहीं जानती. पर बचपन से सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए पढ़ने की आदत पड़ गयी और जब से इंटरनेट और सर्च इंजन हत्थे चढ़े हैं, जिज्ञासा को मैं दबाती नहीं. मुझे तुरंत उत्तर चाहिए. वहाँ मिली जानकारी जीवन का हिस्सा बन जाती है. वह सर्वे भी हमने अपनी जिज्ञासावश ही किया था.” प्रिया ने कहा.

“खैर, इस सर्वे को पूरा होने दो. इस बीच हम मिलते रहेंगे. तुम्हारी जिज्ञासाएँ तुम्हें बहुत कुछ सिखाएंगी और मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“वह तो है. साथ काम करते हैं तो एक दूसरे से सीखते ही हैं.” प्रिया ने कणिका से सहमति जताई.

उधर सोफे पर बैठे कुलकर्णी जी से बात करते हुए प्रशांत बाबू कह रहे थे. “देखो कॉमरेड, इन दोनों लड़कियों को देखकर लगता ही नहीं कि ये कल पहली बार मिली थीं. ऐसे बातें कर रही हैं जैसे कई महीनों से एक दूसरे को जानती हैं.”

“कॉमरेड प्रशांत, यही बात है, जब दो या अधिक व्यक्ति एक समान उद्देश्य के लिए साथ काम करते हैं तो उनमें जानकारियों का आदान प्रदान होता है और वे तेजी से नजदीक आते हैं. रक्त संबंध हमें जन्म से मिलते हैं. लेकिन उनके बाद साथ मिलकर काम करने का रिश्ता ही सबसे अधिक मजबूत होता है....” वे बात कर ही रहे थे कि तभी डोरबेल बज उठी.

प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.

“आप आकाश ही हैं न? प्रिया ने बताया था कि आपने आज ही फ्लैट में सामान रखा है. आपको फ्लैट प्रवेश की बहुत बधाई.”

“मैं गलती नहीं कर रहा हूँ तो आप प्रशांत बाबू हैं.”

“जी, मैं ही हूँ. आपने ठीक ही पहचाना.”

“नमस्ते सर, प्रिया ने आपके बारे में मुझे अनेक बार बताया है. वह अक्सर कहती है कि मुंबई में आप और रामजी काका ही उसके गार्जियन हैं. आज से मैं भी आपका वार्ड हूँ. और सर, ये ‘आप’ के स्थान पर मुझे ‘तुम’ कहें तो मुझे अच्छा लगेगा.”

“आकाश! ऐसा लगता है प्रिया ने तुमसे मेरी कुछ अधिक की तारीफ कर दी है. मैं उसका गार्जियन नहीं, एक अच्छा साथी जरूर हूँ, और हम एक दूसरे की परवाह करते हैं. आज से तुम भी हमारे साथी हुए.” प्रशांत बाबू की इस आत्मीयता ने आकाश की सारी झिझक को पल भर में दूर कर दिया. 'एमबी' में खाना पैक करवाने के बाद जब रामजी ने उसके दाम लेने से इन्कार करते हुए कहा कि यह खाना मेरे घर ही जा रहा है, तब वह चौंका था कि उन्हें कैसे खबर थी कि खाना कहाँ जा रहा है. रामजी ने बताया था कि प्रशांत बाबू का फोन आया था.

डाइनिंग टेबल से सर्वे के कागज़ात और लैपटॉप को हटाकर जल्दी से खाना लगा दिया गया. भोजन के दौरान माहौल पूरी तरह अनौपचारिक और पारिवारिक हो गया. कॉमरेड कुलकर्णी और कणिका ने आकाश से उसके नए फ्लैट और विक्रोली के ऑफिस के काम के बारे में बहुत सहजता से बातें कीं. आकाश चुपचाप उनके चेहरों को देख रहा था. कॉर्पोरेट जगत में उसने अब तक केवल नफा-नुकसान की भाषा सुनी थी, लेकिन यहाँ बैठे ये लोगों के बारे में उसके मन में केवल 'कट्टर मज़दूर नेता' की छवि थी. आज उसे पहली बार अहसास हुआ कि वे भीतर से कितने संवेदनशील, आत्मीय और सहृदय थे और क्यों प्रिया उनकी इतनी तारीफ करती थी. खाना टेबल पर लगा देने के बाद प्रिया ने आकाश को कणिका का परिचय दिया और बताया कि वह भी उससे कल ही मिली है.

बातचीत जब ईसीआई कारखाने और 'ट्रक सिस्टम' पर पहुँची, तो एक प्रोफेशनल के नाते आकाश ने अपना नज़रिया रखा कि कैसे आज के दौर में कोई भी मैनेजमेंट बिना आर्थिक संतुलन के उद्योग नहीं चला सकता. प्रशांत बाबू ने उसकी बात को काटा नहीं, बल्कि बहुत धीरज से उसे मज़दूरों के उस मानवीय यथार्थ से जोड़कर समझाया जो आज के सर्वे में सामने आया था. आकाश के लिए यह बातचीत एक नई वैचारिक खिड़की खोलने जैसा था. प्रिया खाना खाते हुए चुपचाप उन्हें देख रही थी, उसकी आँखों में आकाश के प्रति एक गहरा आदर और गर्व साफ़ झलक रहा था. भोजन के बाद प्रशांत बाबू, कुलकर्णी जी और कणिका ने आत्मीयता से विदा ली. थोड़ी देर प्रिया से बातचीत करने के बाद प्रिया आकाश को छोड़ने नीचे सड़क तक आई. वहाँ दोनों ने एक साथ आइसक्रीम खाने के बाद एक दूसरे को विदा किया.

अगले तीन दिन यूनियन और प्रिया दोनों के लिए बेहद व्यस्तता भरे रहे. कार्यकर्ताओं ने पूरी लगन से कारखाने के भीतर और बाहर चाय की दुकानों, बस्तियों और चालों में जाकर सर्वे किया. मज़दूरों का डर अब पूरी तरह खत्म हो चुका था, और वे खुद आगे बढ़कर फार्म भरवा रहे थे. तीन सौ बयालीस फार्म पूरी तरह और सही-सही भरे जा चुके थे. केवल चार-पाँच मजदूर ही रह गए थे जिन्होंने फार्म नहीं भरा था. यहाँ तक कि कुछ सुपरवाइजरों ने भी बदले हुए नामों से फार्म भर दिया था.

प्रिया का रोज़ को यूनियन ऑफिस से भरे हुए फार्म लेती हुई घर लौटती. कपड़े बदलकर तुरंत लैपटॉप खोलकर बैठ जाती और एक-एक मज़दूर का डेटा, उनकी बीमारी, साहूकारों का कर्ज़ और ट्रक सिस्टम से हुए नुकसान के आंकड़े दर्ज करती जाती.

गुरुवार रात पूरी डेटा शीट तैयार हो चुकी थी. शुक्रवार को कणिका के विश्लेषण के बाद जब उन्होंने परिणाम देखे तो चौंकाने वाले सांख्यिकीय आंकड़े सामने आए. साफ़ था कि 92 फीसदी मज़दूर इस कारखाने के नारकीय माहौल से इस कदर टूट चुके थे कि वे तुरंत यह नौकरी छोड़ना चाहते थे, बशर्ते उन्हें एक सम्मानजनक और बेहतर 'गोल्डन हैंडशेक' (मुआवजा) मिले. इसके अलावा, 78 फीसदी मज़दूर अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में डूबे हुए थे.

प्रशांत बाबू ने रिपोर्ट की समरी देखी तो उनकी आँखों में एक विजयी चमक तैर गई. उन्होंने बेहद संतुष्ट स्वर में कहा, "अद्भुत! तुम दोनों ने कमाल कर दिया है. अब इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में मैनेजमेंट के झूठ और कपट को बेनकाब करने के लिए एक अकाट्य और वैज्ञानिक हथियार है. मैं कल ही रिपोर्ट के साथ चव्हाण साहब से मिलता हूँ.

उस रात खाना खाने के बाद प्रिया ने खिड़की खोलकर बाहर झाँक कर देखा. मुंबई की रात रोशनियों से भरपूर थी. शीतल समुद्री हवा चल रही थी. वह सोच रही थी कि रिसर्च से प्राप्त ये आँकड़े क्या मज़दूरों के जीवन की दिशा बदल सकेंगे?
... क्रमशः

शुक्रवार, 22 मई 2026

नए रिश्ते

देहरी के पार, कड़ी - 56
प्रॉपर्टी डीलर संदीप ने आकाश को सोमवार सुबह नौ बजे पवई के उस सुसज्जित फ्लैट वाली बिल्डिंग पर बुलाया था. आकाश वहाँ दस मिनट पहले ही पहुँचकर बिल्डिंग के रिसेप्शन पर संदीप का इंतज़ार करने लगा. संदीप करीब आधे घंटे बाद फ्लैट ओनर के साथ पहुँचा, और आकाश को अपनी गाड़ी में बिठाकर दस्तावेज तैयार करने वाले ऑफिस पहुँचा. वहाँ करीब दस लोग कंप्यूटर पर बैठकर कुछ न कुछ टाइप कर रहे थे. संदीप ने उनमें से एक ऑपरेटर से पूछा, “कितनी देर लगेगी?”

“आप आ ही जाइए, मैं तो शाम को देने वाले दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ.” ऑपरेटर ने कहा. संदीप ने आकाश से आधार कार्ड और दो फोटो मांगे, ऑपरेटर ने रिसेप्शन से एक दस्तावेजी स्टाम्प लेकर एग्रीमेंट टाइप कराया. वहीं एक अलग चैम्बर में बैठे नोटेरी के सामने दस्तावेज पर आकाश से दस्तखत कराए, नोटेरी ने अपने रजिस्टर में उसके और फ्लैट ओनर के दस्तखत करवाकर दस्तावेज को प्रमाणित कर दिया. डिपॉजिट की राशि फ्लैट ओनर को दी तो उसने आकाश को फ्लैट की चाबियाँ दीं. आधे घंटे बाद उसने गेस्ट हाउस से सूटकेस लाकर फ्लैट में प्रवेश किया और सूटकेस को टेबल पर रख दिया. अब उसे लग रहा था कि इस मुंबई जैसे बेगाने शहर में उसका भी एक 'ठिकाना' है. ठीक ग्यारह बजे वह विक्रोली के अपने ऑफिस के लिए निकल गया, जहाँ नए प्रोजेक्ट की चुनौतियाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं.

यूनियन ने जिन बीस कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी थी उनमें से नौ कार्यकर्ताओं की ड्यूटी सोमवार को सुबह की शिफ्ट में थी. सुबह दस बजे जब पहली शिफ्ट का विश्राम हुआ तब ये कार्यकर्ता अपने विभाग में श्रमिकों से सर्वे का फार्म भरवाने लगे. आधे घंटे में केवल इक्कीस मजदूर फार्म पूरा भर सके, कुछ के फार्म अधूरे रह गए. कुछ मजदूर जानना चाहते थे कि यूनियन आखिर ये फार्म क्यों भरवा रही है. उन्हें समझाने में समय लगा. कुछ मज़दूर फॉर्म देखकर कतराने लगे—"कॉमरेड, इस कागज़ पर हस्ताक्षर करने से हमारी नौकरी या मिलने वाले लाभों पर तो फर्क नहीं पड़ेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि मैनेजमेंट को पता लग जाए तो वे हमें गेट पर ही कार्ड पंच करने से न रोक दें." लेकिन जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि यह फॉर्म पूरी तरह गुप्त है और इसमें न तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत है और न ही उनका नाम कहीं उजागर होगा, बल्कि यह हम मजदूरों की कानूनी लड़ाई का कवच बनेगा. विश्राम के बाद मजदूरों में फार्म भरने की खबर आम हो गई. शिफ्ट छूटने के बाद कुछ कार्यकर्ता गेट के बाहर की चाय की दुकानों पर रुके तो बहुत सारे मजदूर भी रुक गए और वहीं फार्म भरवाने लगे.

फॉर्म भरते समय कारखाने के भीतर 'ट्रक सिस्टम' के जरिए होने वाले शोषण का वह खौफनाक यथार्थ सामने आया, जिसने मज़दूरों को भीतर तक निचोड़ दिया था. एक बुजुर्ग मज़दूर ने फॉर्म भरवाते हुए भर्राई आवाज़ में कहा, "कॉमरेड, इस नौकरी से तो मौत भली. वेतन के नाम पर मालिक अपनी दुकान का सड़ा हुआ अनाज और कूपन थमा देता है. महीने के अंत में जेब में एक रुपया नकद नहीं बचता. बच्चों की फीस और दवाइयों के लिए भी साहूकारों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है. अगर ये सेठ हमारे इतने बरस का हिसाब राजी-राजी दे दे, तो हम यह नौकरी कल छोड़ दें. कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. नहीं मिलेगी तो फुटकर मजदूरी कर लेंगे या अपना ही कोई काम कर लेंगे." लगभग हरेक मज़दूर का यही दर्द था. वे इस नारकीय स्थिति से बाहर निकलना चाहते थे.

प्रिया अपने ऑफिस का काम निपटाकर रात साढ़े आठ बजे घर लौटी. कपड़े बदलकर कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेटी, सोच रही थी कि खाने में क्या बनाया जाए. तभी डोर-बेल बजी. उसने उठकर दरवाजा खोला तो वहाँ प्रशांत बाबू, कणिका और कॉमरेड कुलकर्णी खड़े थे. उसने उन्हें हॉल में बिठाया. वे पहले दिन दूसरी शिफ्ट के विश्राम-काल तक भरे हुए फॉर्म लेकर आए थे. पहले ही दिन करीब चौहत्तर फॉर्म भरे जा चुके थे. वे चाहते थे कि रोज के फार्मों को रोज ही कणिका की सुझाई एक्सेल शीट में फीड कर दिया जाए और यह काम प्रिया अपने लैपटॉप पर रोज कर ले. इससे तीन चार दिन में डाटा शीट विश्लेषण के लिए तैयार हो जाएंगी और जल्दी ही कणिका रिपोर्ट तैयार कर सकेगी. प्रिया ने अपने हॉल की डाइनिंग टेबल को जल्दी से 'डेटा सेंटर' में बदल डाला.

कणिका ने अपने पेन ड्राइव से प्रिया के लैपटॉप में तैयार एक्सेल शीट ट्रांसफर की. इस शीट में प्रत्येक मजदूर के लिए एक रो (Row) आवंटित की गयी थी, और प्रत्येक प्रश्न के दो कॉलम बने हुए थे. जिसमें मजदूर की रो में एक में हाँ या ना वाला उत्तर अंकित करना था और दूसरे कॉलम में उनके विशिष्ट उत्तर लिखने थे कणिका फार्मों को व्यवस्थित कर रही थी और यह देख रही थी कि मज़दूरों ने कर्ज, बीमारी और ट्रक सिस्टम से जुड़े कॉलम सही-सही भरे हैं या नहीं. प्रिया ने अपने लैपटॉप पर एक्सेल शीट खोलकर मज़दूरों के उस दर्द को आंकड़ों के रूप में दर्ज करना शुरू किया. जैसे-जैसे डेटा स्क्रीन पर उभर रहा था, यह साफ़ हो गया कि नब्बे फीसदी से अधिक मज़दूर इस कारखाने को तुरंत छोड़ना चाहते थे.

करीब नौ बजे प्रिया के फोन की स्क्रीन चमक उठी, आकाश का फोन था. उसने सबको कहा, “जरूरी फोन है, मैं बात करके लौटती हूँ.” वह बेडरूम में आ गई.

“हाँ, आकाश, कैसे हो? फ्लैट का क्या किया?”

“सुबह पजेशन ले लिया था. मेरा सूटकेस रखकर ही ऑफिस गया था. अभी फ्लैट से फ्रेश होकर ‘एमबी’ आया हूँ खाने के लिए. तुमने खाने का क्या किया?”

“कुछ नहीं, आकर सोच ही रही थी क्या बनाऊँ? तभी प्रशांत सर, कणिका और कुलकर्णी जी आ गए. अब आज के कलेक्ट किए हुए फार्मों के डाटा मेरे कंप्यूटर की एक्सेल शीट में डाल रहे हैं.”

“ये बढ़िया है, मैं पाँच लोगों का खाना पैक करवाकर उधर ही आ जाता हूँ. मेरे फ्लैट का गृह प्रवेश सेलिब्रेट कर लेंगे.” आकाश ने कहा तो प्रिया फोन लिए हुए ही हॉल में आ गई. “आकाश का फोन है वह ‘एमबी’ से खाना लेकर आ रहा है. आप लोग खाना खाएंगे न.” उसने सभी से पूछा. प्रशांत बाबू ने कणिका और कुलकर्णी जी से पूछा तो उन्होंने हाँ कर दी.

“हाँ, ले आओ. सभी खाएंगे,” प्रिया ने आकाश को कह दिया और फोन बंद किया.”

प्रशांत बाबू ने तुरन्त रामजी काका को फोन लगाया. “हैलो रामजी, प्रिया का दोस्त आकाश आपके यहाँ हम सबके लिए खाना पैक करवा रहा है. उससे कहना भुगतान हो गया है.” इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया. प्रिया उन्हें असमंजस भरी नजरों से देखती रह गयी.

प्रशांत बाबू ने प्रिया को अपनी ओर इस तरह देखते हुए कहा, “प्रिया, आकाश तुम्हारा दोस्त है, उससे तुम्हारे भावनात्मक संबंध हैं. वह हमारे लिए उतना ही बेशकीमती है, जितनी तुम. आज उससे इसी तरह पहचान होने दो”

प्रिया सोच रही थी कि, आकाश को भी 'एमबी' से अनजान नए रिश्ते मिलने वाले हैं.
... क्रमशः

गुरुवार, 21 मई 2026

नया आशियाना

देहरी के पार, कड़ी - 55
शनिवार को यूनियन ऑफिस में कणिका के साथ मीटिंग समाप्त हुई, तब 3 बज चुके थे. सुबह उसने खाना बनाने के बाद धुलने वाले कपड़े मशीन में धुलने के लिए डाले थे. सोचा था खाना खाने के बाद उन्हें निकाल कर सुखा देगी. लेकिन मीटिंग का समय हो जाने पर वह निकल ली थी. उसे ध्यान आया कि कपड़े सुखाकर उन्हें इस्त्री के लिए डालना है वरना सोमवार को ऑफिस जाने के लिए कपड़ों का संकट हो सकता है. वह फौरन घर पहुँची, मशीन से कपड़े निकालकर उन्हें बालकनी में सूखने डाल दिया और कुछ देर विश्राम के लिए बिस्तर पर लेट गई.

उसकी आँखें खुलीं तो खिड़की के शीशे से आता हलका प्रकाश देख उसे लगा सुबह हो गई है. उसने समय देखने के लिए आदतन पास रखा मोबाइल उठाकर देखा, आकाश की अनेक मिस-कॉल थीं. ‘यह कैसे हुआ? उसे रिंग क्यों नहीं सुनाई दी? देखने पर पता लगा कि यूनियन ऑफिस में मीटिंग के पहले उसने मोबाइल साइलेंट मोड पर डाला था और बाद में मोड बदलना भूल गई. उसने तुरंत मोबाइल का मोड बदला. मोबाइल से ही पता लगा कि अभी सुबह नहीं हुई है, बल्कि सूरज डूब चुका है और रात होने वाली है. उसे ध्यान आया, ‘कपड़े सूख गए होंगे, उन्हें इस्त्री के लिए डालना है’. तभी मोबाइल पर रिंग बज उठी. आकाश का फोन था.

"हाँ आकाश, बताओ. फ्लैट देख लिए?" प्रिया ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.

“फ्लैट की बात बाद में, पहले ये बताओ कि तुम्हें क्या हो गया है? डेढ़ बजे से अब तक बीस कॉल कर चुका हूँ, तुम फोन क्यों नहीं उठा रही थी?” आकाश की आवाज से लगा वह बुरी तरह झल्ला रहा था. प्रिया को हँसी आ गई.

“कुछ नहीं आकाश, मीटिंग में फोन साइलेंट मोड पर डाल कर पर्स में रख दिया था. वहाँ से आई तो थकी थी. थोड़ी लेटी की आँख लग गई. अभी उठी हूँ तो समझ रही थी कि सुबह हो गई है.” प्रिया फिर हँस पड़ी. हँसते-हँसते ही बोला, “मोबाइल पर टाइम देखा तो पता लगा अभी तो शाम हुई है. इतने में तुम्हारी कॉल आ गई.”

आकाश का गुस्सा उसकी हंसी से पल भर में काफूर हो गया. उसे भी हँसी आ गई. दोनों की हँसी कम हुई तो आकाश बोला, "हाँ प्रिया, डेढ़ बजे तक संदीप ने मुझे करीब सात फ्लैट दिखाए. उन्हें देखने के बाद अब मैं एक अजीब असमंजस में हूँ. दो विकल्प बिल्कुल विपरीत हैं और मैं फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि किसे फाइनल करूँ? मैं चाहता हूँ कि पहले तुम एक बार दोनों फ्लैट देख लो," आकाश की आवाज़ में उलझन साफ़ महसूस हो रही थी.

"ऐसी भी क्या दुविधा है, आकाश?"

"एक फ्लैट पवई में है—पूरी तरह फर्निश्ड. ए.सी., पंखा, फ्रिज, वाशिंग मशीन, पर्दे, बेड से लेकर किचन के तमाम उपकरणों से लैस है. मुझे सिर्फ अपना सूटकेस लेकर जाना है और चादर बदलनी है. सबसे बड़ी बात है कि यह फ्लैट विक्रोली में मेरे नए ऑफिस के बिल्कुल पास है, एकदम वाकिंग-डिस्टेंस. वहाँ जाने-आने का समय और रोज़ का ऑटो का खर्चा बचेगा. लेकिन उसका रेंट थोड़ा अधिक है. दूसरा विकल्प मैंने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा है—एक छोटा 1BHK, जिसका किराया मेरे बजट में है, लेकिन वह पूरी तरह कोरा है. एक बेड के सिवा सब कुछ जुटाना पड़ेगा. ऑफिस से दूर है लेकिन तुम्हारे फ्लैट के नजदीक है," आकाश ने दोनों विकल्प उसके सामने रख दिए.

प्रिया उसकी बात सुनकर मन ही मन मुस्कुराई. पवई की कॉरपोरेट चमक और आधुनिक सुविधाएँ एक तरफ थीं, और अंधेरी का बजट तथा उसका सामीप्य दूसरी तरफ. उसने कुछ पल सोचा और कहा, "ठीक है आकाश, तुम कल दोनों फ्लैट मालिकों से दोपहर दो बजे बाद का समय ले लो. मैं कल सुबह यूनियन ऑफिस की एक ज़रूरी मीटिंग के बाद सीधे मेरे फ्लैट पर पहुँचती हूँ, हम वहीं से दोनों फ्लैट देखने चलते हैं."

रविवार सुबह दस बजे आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर में ईसीआई यूनियन के करीब बीस कार्यकर्ता मौजूद थे. कणिका जोशी ने प्रश्नावली के फार्म न केवल तैयार कर लिए थे बल्कि उनकी करीब चार सौ प्रतियाँ करवा कर लाई थी और अब बोर्ड के पास खड़ी होकर सर्वे का 'प्रोटोकॉल' समझा रही थी. वह कार्यकर्ताओं को जो खुद भी उसी कारखाने के मजदूर थे, अपने साथी मज़दूरों से उनके मनोवैज्ञानिक स्तर पर जाकर बात करने, उनका भरोसा जीतने और बिना किसी पूर्वाग्रह के सांख्यिकीय डेटा दर्ज करने का तरीका सिखा रही थी. प्रिया वहाँ बैठकर कणिका को देखते हुए सीख रही थी कि सर्वे का वैज्ञानिक तरीका क्या है. वह जरूरी बिंदुओं को अपनी नोटबुक में नोट भी करती जा रही थी. बाद में उसने प्रश्नावली फार्मों को व्यवस्थित करने और प्रत्येक कार्यकर्ता को उसकी जिम्मेदारी सौंपने में कणिका की मदद की. ट्रेनिंग मीटिंग खत्म हुई तब एक बज चुका था.

प्रिया ने आकाश को फोन लगाकर पूछा, “दोनों फ्लैट मालिकों से समय तय हुआ?”

“हाँ मैं तुम्हारे फ्लैट पर डेढ़ बजे पहुँच रहा हूँ, पास वाले फ्लैट का मालिक दो बजे वहीं मिलेगा. लेकिन पवई वाले ने शाम साढ़े तीन बजे का टाइम दिया है.”

“ये तो बढ़िया है? तुमने लंच किया या नहीं?”

“नहीं, सोचा था साथ कर लेंगे.”

“फिर ऐसा करते हैं, हम पहले अंधेरी का फ्लैट देखेंगे. पवई के रास्ते में रामजी काका के ‘एमबी’ पर लंच करेंगे और फिर साढ़े तीन बजे पवई वाला फ्लैट देखेंगे. ठीक?”

“ठीक.” आकाश ने कहा.

“तो मैं अपने फ्लैट के लिए निकलती हूँ.”

ठीक दो बजे, प्रिया और आकाश ने अंधेरी ईस्ट की उस सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल वाला फ्लैट देखा. दिन के उजाले में वह 1BHK और भी छोटा लग रहा था. दीवारें खाली थीं और कमरा पूरी तरह सूना था. सामान रखने पर और भी छोटा दिखने लगता. दोनों ने ‘एमबी’ में लंच किया और वहाँ से निकलकर वे दोनों पवई वाले उस आधुनिक फ्लैट में पहुँचे. फ्लैट साफ-सुथरा था, खिड़की से बाहर का दृश्य बेहतर था. घर के सारे उपकरण चमचमा रहे थे. आकाश ने खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, "देखो प्रिया, यहाँ से मेरा ऑफिस सिर्फ दस मिनट की दूरी पर है. बस समस्या इसके थोड़े अधिक रेंट की है."

प्रिया ने फ्लैट का एक चक्कर लगाया, उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और उसका इंजीनियरिंग बैकग्राउंड तुरंत सक्रिय हो गया. उसने अपने बैग से एक छोटा नोटपैड और पेन निकाला और आकाश के सामने खड़े होकर कहा, "आकाश, मेरे विचार से तुम्हें यह पवई वाला फ्लैट ही किराए पर लेना चाहिए."

आकाश ने चकित होकर उसे देखा, "लेकिन इसका किराया बहुत है, प्रिया?"

"यही तो मुंबई का भ्रम है, आकाश," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा. "अब मेरा गणित सुनो. यदि तुम अंधेरी में रहते हो, तो तुम्हें यहाँ से रोज़ पवई जाना और आना पड़ेगा. मुंबई के इस ट्रैफिक में रोज़ आने-जाने में तुम्हारे कम से कम दो से तीन घंटे सफर में बर्बाद होंगे. अगर तुम ऑटो का रोज़ का खर्च जोड़ो, तो महीने में कम से कम 3 से 5 हज़ार रुपये तो सिर्फ किराए और ट्रैवलिंग में ही अतिरिक्त खर्च हो जाएंगे."

प्रिया ने कमरे के खाली कोनों की तरफ इशारा करते हुए आगे कहा, "दूसरी बात, अंधेरी वाला फ्लैट पूरी तरह खाली है. वहाँ रहने लायक बुनियादी सुविधाएँ जुटाने के लिए—जैसे फ्रिज, वाशिंग मशीन, बेड और किचन का सामान—तुम्हें तुरंत अपनी जेब से कम से कम 50 हज़ार रुपये एकमुश्त खर्च करने पड़ेंगे. यहाँ पवई में वो सारा 'कैपेक्स' (कैपिटल एक्सपेंडीचर) बचा हुआ है. पवई का फ्लैट दिखने में महंगा है, लेकिन समय, ऊर्जा और तात्कालिक खर्च के हिसाब से यह तुम्हें बिल्कुल महंगा नहीं पड़ेगा. यहाँ रहना तुम्हारे लिए मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से बेहतर रहेगा और तुम अपनी नई नौकरी पर पूरा ध्यान दे सकोगे."

आकाश विस्मय से प्रिया को देखता रह गया. वह उसकी तार्किक क्षमता, वित्तीय समझ और इतनी बारीक व्यावहारिक सोच का कायल हो गया. उसके मन का सारा असमंजस और कशमकश पल भर में दूर हो गए. उसे समझ आ गया कि प्रिया ने भावुकता से ऊपर उठकर उसके आराम और भविष्य के हक में फैसला दिया था. अब उसका नया आशियाना लगभग तैयार था.

उसने तुरंत जेब से मोबाइल निकाला और प्रॉपर्टी डीलर संदीप का नंबर डायल किया, "हेलो संदीप, मैं पवई वाला फ्लैट फाइनल कर रहा हूँ. ओनर से बात करके सोमवार सुबह रेंट एग्रीमेंट तैयार रखिएगा."

फोन रखकर उसने प्रिया की ओर देखा. दोनों के चेहरों पर एक बड़ा काम मुकम्मल होने का अनकहा सुकून तैर रहा था.
... क्रमशः

बुधवार, 20 मई 2026

रिसर्च की तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 54
अकेले रहने वालों के लिए वीकेंड कुछ राहत लेकर आता है, उन्हें उन दो दिनों में ऑफिस नहीं जाना होता. लेकिन घर के काम भी बहुत होते हैं. फ्लैट की सफाई करनी है, कपड़े धोने हैं, यदि किचन, बाथरूम, वार्डरोब वगैरा में चीजें खत्म हो रही हैं तो उन्हें लाना है या किसी से मिलने जाना है. प्रिया की भी लगभग ऐसी स्थिति थी. फिर भी वह तमाम काम करते हुए अपनी रुचि के कामों के लिए समय निकाल लेती थी. इस शनिवार दोपहर एक बजे रिसर्च एनालिस्ट को आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर आना था. वह उससे मिलने को उत्सुक थी. वह जानना चाहती थी कि आखिर ये दुनिया भर के अध्ययन (स्टडी) कैसे होते हैं? उसे पढ़ी हुई किताबें भी यूनियन लाइब्रेरी में लौटानी थीं और नई लानी थीं. वह आधे घंटे पहले ही वहाँ पहुँच गई. दफ्तर का माहौल शांत था. वह सीधे यूनियन की लाइब्रेरी वाले कमरे की ओर बढ़ गई. उसके हाथ में लौटाए जाने वाली तीन पुस्तकें थीं. इन किताबों को पढ़ने के बाद मनुष्य समाज और प्रकृति तथा उसके सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को देखने का उसके नजरिए में बहुत परिवर्तन आया था.

वह अभी अपनी पुस्तकें जमा ही करा रही थी कि तभी प्रशांत बाबू ने लाइब्रेरी में प्रवेश किया. प्रिया को देखकर वे मुस्कुराए. जमा कराए जाने वाली किताबें देखकर उन्होंने उत्साह से पूछा, “एंगेल्स की इन दोनों पुस्तकों को पढ़ने से कैसा लगा?”

“इन्हें पढ़ने का अनुभव बहुत ही जबर्दस्त है. मेरा नजरिया डार्विन और लुइस हेनरी मॉर्गन जैसा होता जा रहा है. मुझे मॉर्गन की Ancient Society हिन्दी में ऑनलाइन ‘प्राचीन समाज' के नाम से मिल गई है. मैंने इसे ऑर्डर भी कर दिया है.”

“क्या? यह किताब हिन्दी में उपलब्ध है तो मुझे भी बताओ, मैं एक अपने लिए और एक यहाँ लायब्रेरी के लिए मंगाता हूँ. यह मनुष्य और परिवार के विकास को समझने के लिए जरूरी किताब है. यहाँ होनी चाहिए.”

प्रशांत बाबू ने मेज पर हाथ टिकाते हुए बहुत आत्मीय स्वर में कहा, "और के. दामोदरन की किताब भारतीय चिंतन परंपरा कैसी लगी?”

“यह भी बढ़िया और जरूरी किताब है, पूरी नहीं पढ़ पायी, लेकिन यह मेरे पास होनी चाहिए, इसलिए मैंने इसे भी ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया है.”

“प्रिया, मुझे लगता है अब तुम्हें मार्क्स-एंगेल्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’, कार्ल मार्क्स की 'फ्रांस में गृहयुद्ध' और लेनिन की 'राज्य और क्रांति' जरूर पढ़नी चाहिए. ये बुनियादी किताबें हैं जो मनुष्य समाज में वर्ग पैदा हो जाने से लेकर आज तक मौजूद रहे वर्ग संघर्ष को समझने में मदद करती हैं.”

प्रिया ने उत्सुकता से उनकी ओर देखा. प्रशांत बाबू ने शेल्फ से ये तीनों किताबें निकालीं और मेज पर रख दीं.

"इनको पढ़ने के बाद तुम जान सकोगी कि मज़दूरों की लड़ाई केवल वेतन और अपने लिए सुविधाएँ हासिल करने तक की नहीं है, अपितु यह व्यवस्था के चरित्र को बदलने के ऐतिहासिक दायित्व तक जाती है," प्रशांत बाबू ने कहा. प्रिया ने सम्मान और कौतुक के साथ उन किताबों को छुआ और तीनों पुस्तकें अपने नाम पर इश्यू करवा लीं. उन किताबों को अपने बैग में रखते हुए उसे महसूस हुआ कि ज्ञान अर्जित करने की कोई सीमा नहीं, मनुष्य जीवन में प्रत्येक समय ज्ञान अर्जित कर रहा होता है, यदि उसने अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ ही अवरुद्ध न कर रखी हों.

एक बजे की बैठक के लिए प्रशांत बाबू, और सचिव शिंदे पहले से ही मेज के गिर्द कुर्सियों पर बैठे थे. प्रिया वहाँ आयी और बैठने को थी कि कॉमरेड कुलकर्णी ने करीब 25 वर्ष उम्र की साँवली लड़की के साथ कमरे में प्रवेश किया. उन्हें देख सभी खड़े हो गए, कॉमरेड कुलकर्णी को अभिवादन किया, वे कुर्सी पर बैठे और सबको बैठने को कहा. कुलकर्णी जी ने लड़की का परिचय दिया, “ये कणिका जोशी, मेरी भांजी है. इसने अभी साल भर पहले पॉपुलेशन साइंस (जनसंख्या विज्ञान) में मास्टर डिग्री की है और अपने इंस्टीट्यूट के ही एक प्रोजेक्ट में काम कर रही है. यह इस तरह की रिसर्च के लिए प्रोफेशनली ट्रेंड है. यह हमारे अध्ययन को पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से करने में हमारी मदद करेगी. यह खुद भी इस रिसर्च के लिए बहुत उत्सुक है.”

सभी ने कणिका को अभिवादन किया और फिर अपना-अपना परिचय उसे दिया. प्रिया का परिचय सुनकर कणिका के मुँह से निकला, “अरे वाह! आपसे तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“अभी तो मैं यहाँ आपसे सीखने के लिए आई हूँ.” प्रिया ने उत्तर दिया. उसे लगा कि मुंबई में उसे एक स्थानीय मित्र मिलने वाली है.

कणिका ने सबसे पहले प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी से सर्वे के मूल उद्देश्य को समझा. उसने पूछा, "हमें यह डेटा सिर्फ आंतरिक रणनीति के लिए चाहिए या कोर्ट और इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में चल रहे मुकदमों में अपना पक्ष साबित करने के लिए भी?"

कुलकर्णी जी ने जवाब दिया, "दोनों के लिए, कणिका. लेकिन मुख्य उद्देश्य ट्रिब्यूनल में यह साबित करना है कि मैनेजमेंट मजदूरों की आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें जबरन वीआरएस (VRS) की तरफ धकेल रहा है."

इसके बाद प्रश्नावली पर चर्चा शुरू हुई. कणिका ने अपनी वैज्ञानिक समझ के हिसाब से कुछ बेहतरीन प्रश्नों का सुझाव दिया जो मजदूरों की जन-सांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति को सांख्यिकीय (Statistical) रूप से पुख्ता करते थे. प्रिया ने भी बीच में हस्तक्षेप करते हुए कुछ अत्यंत व्यावहारिक प्रश्नों का सुझाव दिया, जो उसने पिछले दिनों मज़दूरों की बस्तियों और रामजी काका के यहाँ बातचीत के दौरान महसूस किए थे—जैसे ट्रक सिस्टम के कारण उन पर बढ़ा साहूकारों का कर्ज और बच्चों की पढ़ाई का खर्च.

कणिका, प्रिया की इस जमीनी पकड़ से बहुत प्रभावित हुई. उसने अपने नोट्स समेटते हुए कहा, "उद्देश्य अब पूरी तरह स्पष्ट है. आज रात मैं इन सभी बिंदुओं को मिलाकर अंतिम प्रश्नावली और डेटा फॉर्म तैयार कर लूंगी. कल, यानी रविवार को, मैं सर्वे के लिए जाने वाले यूनियन के कार्यकारिणी सदस्यों के साथ बैठक करूंगी. मैं उन्हें यह फॉर्म सौंपूंगी और बाकायदा ट्रेनिंग दूंगी कि मज़दूरों के घरों या चालों में जाकर उनसे कैसे मिलना है, उनका भरोसा कैसे जीतना है और बिना किसी पूर्वाग्रह के इस प्रश्नावली को सही-सही कैसे भरवाना है."

दोपहर डेढ़ बजे आकाश अंधेरी ईस्ट में सातवाँ फ्लैट देखने के बाद नीचे सड़क पर आया. वह एक अजीब कशमकश और असमंजस में घिरा हुआ था. उसने आज दो बिल्कुल विपरीत विकल्प देखे थे. पहला विकल्प पवई में था—एक बेहद सभी जरूरी सुविधाओं और आधुनिक उपकरणों ए.सी., पंखे, फ्रिज, वाशिंग मशीन, बेड, किचन के सभी उपकरणों से लैस फ्लैट था जिसमें उसे केवल बेड के चादर बदलने थे और अपना सूटकेस जाकर रखना था. यह विक्रोली में उसके नए ऑफिस के बिल्कुल नजदीक था. वहाँ जाने-आने का समय और खर्चा बचता, लेकिन उसका रेंट अधिक था.

दूसरा विकल्प उसने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा था—सीलन की हल्की गंध वाला छोटा 1BHK, जिसका किराया उसके बजट में था. हालांकि वह ऑफिस से दूर था, लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि यह इलाका प्रिया के फ्लैट के बेहद नजदीक था. पवई की सुख-सुविधाएं और ऑफिस की नजदीकी एक तरफ थीं, और प्रिया का सामीप्य तथा बजट दूसरी तरफ.

आकाश इस दुविधा का फैसला अकेले नहीं कर पा रहा था. वह चाहता था कि कोई भी निर्णय फाइनल करने से पहले वह ये दोनों फ्लैट एक बार प्रिया को दिखाए और उसकी राय ले. उसने अपनी इस कशमकश को साझा करने के लिए जेब से मोबाइल निकाला और प्रिया का नंबर डायल किया...
... क्रमशः

रविवार, 17 मई 2026

तलाश

देहरी के पार, कड़ी - 53
सोमवार सुबह प्रिया की आँखें खुलीं तो उसने आदत के मुताबिक बेड साइड टेबल पर रखा मोबाइल उठा कर समय देखा, ठीक छह बजे थे. उठने का समय हो गया था, लेकिन उसे लगा कि अभी शरीर से थकान पूरी तरह निकली नहीं है. अगले शुक्रवार तक उसके पास रूटीन कामों के सिवा करने को कुछ नहीं था. उसने फिर से करवट लेकर आँखें मूंद लीं. सोने की कोशिश करने पर भी दुबारा आँख नहीं लगी. आखिर आधे घंटे में ही उठकर चाय के लिए पानी चढ़ा दिया और खुद बाथरूम के बाहर वाले वाशबेसिन पर खड़ी होकर ब्रश करने लगी. आकाश को आज अपनी नई नौकरी पर जॉइन करना है. उसे अपने रहने के लिए जल्दी ही कोई फ्लैट भी देखना होगा. उसे ध्यान आया कि किचन और बाथरूम में बहुत से सामान समाप्त होने को हैं. पूरे सप्ताह वह घर से बाहर वाले कपड़े नहीं धो पाई थी, उन्हें धोना है. यूनियन ऑफिस की लायब्रेरी से वह कुछ पुस्तकें लाई थी, उन्हें भी पढ़कर लौटाना है. चाय का कप लेकर बैठी तो वह मन ही मन हँस पड़ी कि वह सोचती थी, इस सप्ताह खूब फुरसत रहेगी. लेकिन जब खुद अपने बारे में सोचा तो इतने काम निकल आए जो उसे पूरे सप्ताह व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त थे.

आकाश ने सोमवार सुबह जॉइन कर लिया. ऑफिस में अपने बैठने की जगह और कंप्यूटर संभाला, ऑफिस के सहकर्मियों से परिचय किया और काम की प्रकृति को समझने की कोशिश की. इसी में दिन पूरा हो गया. उसकी किस प्रोजेक्ट पर क्या भूमिका होगी, यह अगले कुछ दिनों में तय होना था. ऑफिस से निकलकर वह गेस्ट हाउस पहुँचा तो रात के नौ बज चुके थे. उसने कपड़े बदले, गेस्ट हाउस कैंटीन को फोन करके रात के खाने के लिए ऑर्डर किया. तभी फोन की घंटी बज उठी, प्रिया थी.

"नमस्ते आज का दिन कैसा रहा, आकाश?" दिनभर की थकान के बाद फोन पर प्रिया की आवाज़ सुनना ऐसा लगा जैसे अजनबियों के साथ यात्रा करते हुए बीच के किसी स्टेशन पर अचानक कोई परिचित सामने आ खड़ा हुआ हो.

“नमस्ते प्रिया, दिन बिलकुल वैसा ही था जैसा किसी भी नई नौकरी में होता है, बिलकुल रूटीन. ऐसा लगता है यह सप्ताह तो नई कंपनी और नए काम को समझने में निकल जाएगा. असली काम तो अगले सप्ताह तक ही शुरू होगा.” आकाश ने उत्तर दिया.

“फ्लैट के बारे में क्या सोचा?”

“ऑफिस के लोगों ने अंधेरी से पवई तक के बीच काम करने वाले दो प्रोपर्टी डीलरों के नंबर दिए हैं. सुबह आठ से नौ के बीच उनसे बात करूंगा, उसके बाद देखता हूँ कब फ्लैट देखने जा सकूंगा. मुझे लगता है यह शनिवार के पहले संभव नहीं होगा.” आकाश ने हंसते हुए कहा, लेकिन प्रिया ने उसकी आवाज़ में एक अनजानी घबराहट साफ़ की.

“तुमने कल रामजी काका का नंबर लिया था. उनसे फोन पर पूछना. वे उसी इलाके में काम करने वाला प्रोपर्टी डीलर बता देंगे. वे लंबे समय से इस इलाके में हैं, प्रोपर्टी डीलर उनका लिहाज भी करेगा.” प्रिया ने सुझाया.

“हाँ, यह ठीक है. मैं उनसे भी बात करता हूँ.” आगे बात हो पाती उससे पहले ही फोन वाइब्रेट करने लगा, जयपुर से माँ का फोन था. उसने प्रिया को कहा, “जयपुर से माँ का फोन आ रहा है. उसे लेता हूँ. हम कल बात करते हैं” और फोन काट दिया.

वह पूरे सप्ताह समय के पहिये के साथ चलता रहा. ग्यारह से आठ कॉर्पोरेट शिफ्ट को साधना, आकाश की पहली जरूरत थी. रात गेस्ट हाउस पहुँचकर खाने का ऑर्डर करना, फ्रेश होकर खाने के इंतजार में टीवी देखना. खाने के बाद पंद्रह मिनट में उसे नींद आने लगती. वह सो जाता फिर सुबह छह बजे ही उसकी आँखें खुलतीं. नया प्रोजेक्ट, नए कलीग और उनके बीच खुद को साबित करने की होड़. इस पूरे मशीनी चक्र के बीच, उसके भीतर एक छटपटाहट लगातार बनी हुई थी—जल्द से जल्द इस शहर में अपना एक खूँटा गाड़ना, एक अदद फ्लैट ढूँढना.

प्रिया की स्थिति उससे कुछ अलग नहीं थी. ऑफिस से लौटकर वह खाना बनाती, खाती तब तक रात के दस बज जाते. बरतन और किचन साफ करके वह किताब लेकर बिस्तर पर लेट जाती और नींद आने तक पढ़ती रहती. उसने सुबह के समय लगातार दो दिन अपने बाहर वाले कपड़ों की धुलाई करके उन्हें प्रेस के लिए दिया. सामानों की सूची बनाई जिन्हें उसे अगले शनिवार बाजार से लाना था. उसने इस सप्ताह फ्रेडरिक एंगेल्स की दो किताबें ‘वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका’ और ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ पढ़ डाली थी. इन दोनों किताबों ने उसकी आँखें खोल दीं. वह अब जानती थी कि श्रम ने ही मनुष्य को मनुष्य बनाया और कैसे मानव परिवार विकसित होते हुए आज के समाज में बदला. इन दो किताबों को पढ़कर उसने अपने सोचने के नजरिए में गहरा बदलाव महसूस किया था. दूसरी किताब का एक आधार अमरीकी नृवंशशास्त्री लेविस हेनरी मोर्गन की लंबे शोध के बाद लिखी पुस्तक ‘प्राचीन समाज’ (Ancient Society) थी. इनके साथ ही वह के. दामोदरन की पुस्तक ‘भारतीय चिंतन परंपरा’ भी लाई थी. लेकिन वह उसके दो ही अध्याय पढ़ सकी. उसे लगा कि ये चारों किताबें हमेशा पास होना चाहिए. चारों किताबें इंटरनेट पर उपलब्ध मिल गयीं. उसने चारों ऑर्डर कर दीं. अब वह इन किताबों को लौटाकर कुछ दूसरी किताबें और ला सकती थी. इस व्यस्त हफ्ते में आकाश और प्रिया के पास एक-दूसरे के लिए सिर्फ रात के साढ़े नौ बजे के बाद के कुछ मिनट ही होते थे, जब दोनों फोन पर मिलते.

आखिर शुक्रवार की शाम मुम्बई की नम और पसीना टपकाती गर्मी में ठंडी फुहार की तरह आई. दोनों ने समय निकाला और रात के नौ बजे 'मेवाड़ भोजनालय' में मिले. रामजी काका ने दूर से ही दोनों के चेहरों की थकान भाँप ली थी. उन्होंने बिना पूछे ही उनके लिए आमरस और भात के साथ सादा भोजन लगवा दिया. वहाँ कोई लंबी वैचारिक या दार्शनिक बातें नहीं हुईं. बस, अपने घर जैसे खाने, आत्मीयता भरी गपशप और एक-दूसरे के साथ का सुकून मिला. वहीं रामजी काका से आकाश के लिए फ्लैट तलाश करने और प्रोपर्टी डीलर बताने की बात भी हुई.

डिनर के बाद बाहर निकलते हुए आकाश ने कहा, "प्रिया, कल जब मैं फ्लैट देखने निकलूंगा, तो मुझे ऐसा लगेगा जैसे मैं इस शहर का नागरिक होने की कवायद कर रहा हूँ." प्रिया ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, "कल ही यूनियन ऑफिस में एनालिस्ट आने वाला है. उसके साथ बैठकर मजदूरों की राय जाने के लिए होने वाले सर्वे का कायदा और प्रश्नावली तय करनी है. मुझे अनेक नई बातें सीखने को मिलेंगी.”

खाने के बाद जब वे अपने-अपने आशियाने के लिए रवाना हुए, तो दोनों के मन में शनिवार को लेकर एक अजीब सा प्रतीक्षा और परीक्षा का भाव था.

शनिवार की सुबह ठीक दस बजे, आकाश के फोन की घंटी बजी. कोई प्रोपर्टी डीलर संदीप था जिसे रामजी काका ने उसका नंबर दिया था. कुछ ही देर में वह हाथ में चाबियों का एक बड़ा गुच्छा लिए अपनी कार सहित गेस्ट हाउस में था.

"सर, बजट के हिसाब से कुछ 1BHK मैंने शॉर्ट लिस्ट किए हैं, वे इन्हीं तीनों इलाकों में हैं. मुंबई में जगह छोटी मिलती है, लेकिन यहाँ लाइफ बड़ी है" संदीप ने अपनी पेशेवर मुस्कान के साथ कहा.

आकाश को संदीप ने डेढ़ बजे तक तीनों इलाकों में करीब सात फ्लैट दिखाए. अंत में उसने अंधेरी की एक सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल के एक फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर भीतर कदम रखा. कमरा इतना छोटा था कि कोटा या जयपुर के किसी बड़े मकान का छोटे से छोटा कमरा भी इससे बड़ा होता. दीवारें सीलन की हल्की गंध और मुंबई की हवा की नमी से भरी थीं. उसने खिड़की खोलकर बाहर देखा—सामने इमारतों का एक अनंत जंगल था, जिसमें हर खिड़की के पीछे एक अलग संघर्ष चल रहा था.

आकाश ने गहरी सांस ली और सोचने लगा, "क्या इस माचिस की डिब्बी जैसे स्पेस में मैं अपना घर देख पाऊँगा? क्या यही वह देहरी है, जहाँ से मुझे अपने नए जीवन की शुरुआत करनी है?"
... क्रमशः

शुक्रवार, 15 मई 2026

माँ से बात

देहरी के पार, कड़ी - 52
आकाश को मैसेज करने के बाद प्रिया ने किचन में जाकर देखा. चाय तैयार थी, बल्कि कुछ ज्यादा उबल चुकी थी. चाय छानकर, मग हाथ में लिए वह बिस्तर पर आ गई. आज पूरे दिन उसे व्यस्त रहना पड़ा था. सुखद बात यह थी कि दिन के अधिक समय वह आकाश के साथ थी. उसने नोट किया था कि जितनी देर आकाश उसके साथ रहा, सकुचाता रहा. आखिर उसे किस बात का संकोच था? और मैसेज में वह डर वाली बात, आखिर वह किस बात से डर रहा था? उसने याद करने की कोशिश की कि वह जितनी देर आकाश के साथ रही, क्या-क्या हुआ था?

‘हो सकता है उसके अलसुबह जल्दी बोरिवली स्टेशन पहुँच जाने से वह आश्चर्यचकित हुआ हो. कोटा और जयपुर में एक अकेली लड़की का सुबह पाँच बजे किसी हमउम्र लड़के को रिसीव करने के लिए स्टेशन पहुँचना अजूबा होता. लेकिन मुंबई में तो यह सहज सामान्य बात थी. उसे अपने फ्लैट में ले आना और पाँच घंटों से अधिक एक साथ रहना भी शायद उसे अजीब लगा हो. वहाँ जयपुर या कोटा में यह निश्चित ही संभव नहीं होता. हो सकता है उसके फ्लैट में रहने के दौरान वह इस बात से डर रहा हो कि कहीं कोई उसके फ्लैट की घंटी न बजा बैठे और उन दोनों को अकेले देख उनके बारे में कुछ ऊट-पटांग न सोचने लगे..’ वह मन ही मन हँस पड़ी. ‘तब तो जब वे यहाँ से एमबी के लिए निकले तब आकाश ने ज़रूर राहत की साँस ली होगी. उसके बाद रामजी काका और उनके स्टाफ का व्यवहार, और फिर बब्बन भाई के साथ ऑटो का सफर, पता नहीं बब्बन भाई ने उससे न जाने क्या बातें की होंगी.”

‘तो क्या यहाँ यूनियन के लोगों के साथ उसके संबंध बनना और यूनियन के कामों में उसकी तन मन से संलिप्तता ने उसे डराया होगा? ... खैर वह इतना क्यों सोच रही है, मिलने पर सब कुछ साफ हो जाएगा. यदि उसने स्पष्ट नहीं किया तो वह खुद पूछ लेगी कि वह किस बात से डर रहा था.’

उसने उठकर चाय का प्याला सिंक में रखा. सोचने लगी शाम के खाने में क्या बनाए. फिर उसने थोड़े से चावल निकालकर कुकर में पकने के लिए गैस पर चढ़ाया और अरहर की दाल को कटोरी में भीगने के लिए छोड़ दिया.

वह वापस अपने बिस्तर पर पहुँची. उसे ध्यान आया कि कितने ही दिन हो गए हैं, माँ से बात नहीं हुई है. उसने फोन उठाकर माँ को लगाया. पूरी घंटी जाने पर भी फोन रिसीव न होने पर उसने फोन रख दिया. हो सकता है माँ किसी काम में व्यस्त हो और फोन न उठा पा रही हो. तभी फोन की घंटी बज उठी. माँ ही थी.

“हेलो मम्मी कैसी हैं?”

“मैं ठीक हूँ पर तुझे आज कैसे मेरी याद आ गई? पता है पूरे आठ दिन हो गए हैं बात किए हुए. लगता है तू मुझे तो बिलकुल भूल ही गई है.” माँ ने उलाहना दिया.

“कैसी बात करती हो मम्मी? अपनी माँ को कोई भूल सकता है क्या? बस कुछ कामों में व्यस्त रही तो बात नहीं कर पाई. अब आज मैंने ही तो फोन किया न?”

“हाँ हाँ ठीक है, जब तुझे याद आ जाती है तो फोन करती है. वैसे तो भूल ही गई है.” इस बात पर प्रिया को हँसी आ गयी.

“अच्छा ये बता, पापा कैसे हैं?”

“ठीक हैं, रोज मंडी जाते हैं. कारोबार पूरी तरह संभाल लिया है, मयंक को पढ़ाई के लिए बिल्कुल फ्री कर दिया है. आज दिनभर से घर पर ही थे. अभी शाम को सात बजे निकले हैं अपने दोस्तों से मिलने. अब आने में रात के दस बजेंगे.”

“और मयंक कैसा है?”

“बिलकुल ठीक है, वह भी घूमने गया है. वह भी वही दस बजे तक लौटेगा. तूने सबकी पूछ ली, अब तेरी भी बता. तेरा क्या चल रहा है? तेरी नौकरी कैसी चल रही है? मयंक ने बताया था कि तू किसी यूनियन के काम में पड़ गई है. उसमें किसी तरह के लड़ाई-झगड़े तो नहीं होते न? यहाँ पहले कारखानों में एक से ज्यादा यूनियनें थीं. वे आपस में लड़ते थे तो खून-खच्चर हो जाते थे. वैसा वहाँ तो नहीं है न? तू फालतू ही इस पचड़े में पड़ गई है. तुझे यूनियन से क्या काम? अच्छी खासी नौकरी करती है, बढ़िया तनखा है, जैसे भी हो इससे दूर ही रहना चाहिए.” माँ ने चिंता व्यक्त की.

“नहीं माँ ऐसा कुछ नहीं है. पता नहीं मयंक ने आपको क्या कह दिया है. जब मैं यहाँ आई और विक्रांत ने मुझे परेशान करने की कोशिश की तो इन्हीं यूनियन वालों ने बिना किसी स्वार्थ के मेरा साथ दिया और विक्रांत को जेल की हवा खानी पड़ी. अब वे अपने वेतन और नौकरी के लिए लड़ रहे हैं, तो मैं लिखने-पढ़ने में उनकी मदद कर देती हूँ. किसी तरह की कोई रिस्क नहीं है. तू चिन्ता मत कर. और हाँ, आप जयपुर वाले आकाश को जानती हैं न? वही, जो मेरा लैपटॉप लेने आया था.”

“हाँ, जानती हूँ. वह अभी कुछ दिन पहले भी आया था. जब एक काली गाड़ी अपने मकान के सामने खड़ी रहने लगी थी.”

“हाँ वही, अब वह वहाँ आपकी तसल्ली के लिए आया था न, बस ऐसे ही हम एक दूसरे की मदद करते हैं. आकाश ने कंपनी बदल ली है और यहाँ दूसरी कंपनी में जॉइन करेगा. आज ही मुंबई पहुँचा है.”

“यह तो अच्छा हुआ, कम से कम वहाँ एक आदमी तो जान पहचान का हुआ.” माँ ने ऐसे कहा जैसे उन्हें आकाश के मुंबई पहुँचने की खबर से उसे बहुत तसल्ली हो गयी हो. प्रिया की हँसी फूट पड़ी.

“मम्मी, तू भी न. यहाँ बहुत जान पहचान वाले हैं. तू मुम्बई आकर देख, सबसे मिलाऊंगी, तो तेरी पूरी तसल्ली हो जाएगी. अच्छा मम्मी मैं रखती हूँ, मयंक आए तो कहना मुझ से बात कर लेगा.”

माँ से बात करके प्रिया ने खुद को बहुत हल्का महसूस किया. कुकर पर्याप्त सीटी ले चुका था. उसने कुकर को गैस से उतारकर देखा. चावल पक गए थे. उसने उन्हें अलग बरतन में निकाल कर उसी कुकर में दाल पकने को चढ़ा दी.

सोमवार सुबह आकाश विक्रोली की उस ऊँची कॉरपोरेट बिल्डिंग के रिसेप्शन पर खड़ा था, जिसमें उसकी नयी एम्पलॉयर कंपनी का कार्यालय था. यहाँ पहुँचकर उसे अहसास हुआ कि अब उसके जीवन का एक और नया अध्याय शुरू हो चुका है. ग्यारह से आठ की शिफ्ट, बीच में घंटे भर का विश्राम—एक ऐसा चक्र जो अब उसकी रोज की जिन्दगी का हिस्सा बनने वाला था. नई कंपनी में नया प्रोजेक्ट, उसके लिए नई प्रोफेशनल चुनौतियाँ लाएगा. फिलहाल उस पर सबसे बड़ा दबाव—जल्द से जल्द एक स्थाई आशियाना तलाशना था. गेस्ट हाउस में न तो अधिक दिन रह सकते हैं और न ही वहाँ अपने घर जैसा अहसास होता है. उसे सुबह ऑफिस जाने से पहले ही किसी प्रॉपर्टी डीलर से मिलकर बताना होगा कि उसे किस तरह का आवास चाहिए.
... क्रमशः

बुधवार, 13 मई 2026

समानांतर मोर्चे

देहरी के पार, कड़ी - 51
आकाश को प्रिया ने आटोरिक्शा में बिठाकर विदा किया तो वह भी बाहर सिर निकालकर उसे ओझल होने तक देखता रहा. बब्बन भाई ने कुशलता से अपना रिक्शा अंधेरी की भीड़भाड़ वाली सड़क से निकालकर विक्रोली की ओर मोड़ दिया. आकाश की आँखों में उसे विदा करती प्रिया की छवि अब भी तैर रही थी.

प्रिया की छवि ने आकाश के मन में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी थी. उससे पहली बार कोटा में प्रत्यक्ष मिलने के बाद तीन रात जयपुर में साथ बिताने के बीच प्रिया उसे अच्छी लगने लगी थी. लेकिन कंपनी के नियमों के चलते वह उसकी चाहत के उस दायरे से बाहर रही जो उसे जीवनसाथी बनाने की ओर बढ़ता.. लेकिन जैसे ही आकाश ने कंपनी स्विच की, प्रिया उसकी चाहत के उस दायरे में प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया को उसने अब तक केवल एक गंभीर प्रोफेशनल और संकट में घिरी एक युवती के रूप में देखा था, लेकिन आज मुंबई की सड़कों पर उसकी 'पहुँच' और लोगों का उसके प्रति 'सम्मान' देखकर वह चकित था. बब्बन भाई जैसे मेहनतकश का उसे 'दीदी' कहना और रामजी काका का उस पर अगाध भरोसा—आकाश को समझ आ रहा था कि प्रिया ने इस शहर में आकर सिर्फ नौकरी नहीं की थी, बल्कि अपने आचरण से एक स्थान हासिल कर लिया था. वह मुम्बई में रोजगार के लिए आकर रहने वाली सामान्य लड़की नहीं लगती थी, बल्कि ऐसा लगता था जैसे वह यहीं कहीं पैदा हुई, और पली बढ़ी थी. उसमें इस शहर के प्रति अजनबीपन पूरी तरह समाप्त हो चुका था. उसे ऐसा लगा कि वह जयपुर में उसके जितने निकट आई थी उतनी ही दूर चली गई थी.

विक्रोली के गेस्ट हाउस पहुँचते-पहुँचते आकाश के मन में यह विचार पुख्ता हो गया कि प्रिया के साथ जुड़ना आसान नहीं होगा. प्रिया के विस्तृत और संघर्षशील व्यक्तित्व को स्वीकार करना होगा. इसके लिए उसे प्रिया को और गहराई के साथ समझने की कोशिश करनी होगी. उसे खुद भी अपने व्यक्तित्व को विस्तार देना होगा और उसके व्यक्तित्व से दूरी कम करनी होगी. उसने अपना सामान कमरे में रखा और खिड़की से बाहर फैली मुंबई की इमारतों की ऊँचाइयाँ देखते हुए सोचा, "क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ? क्या मैं यह कर सकूंगा?"

आईआईडीईए के उस छोटे हॉल में कुछ कुर्सियाँ बढ़ा दी गई थीं, अब वहाँ 24 लोग बैठ सकते थे. कार्यसमिति के 21 में से 19 सदस्य ही आए थे. एक सदस्य के रिश्ते में किसी का देहान्त हो गया था और एक किसी जरूरी काम से मुंबई से बाहर था. बैठक में प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी सहित 21 व्यक्ति थे. कमरे में ज्यादा लोगों के कारण उमस बढ़ गई थी, पंखा अपनी पूरी रफ्तार से चलते रहने के बावजूद उसे कम करने में नाकाम था.

जैसे ही सचिव शिंदे ने 'प्रोफेशनल रिसर्च एनालिस्ट' बुक करने, उससे प्रश्नावली तैयार करवाने और कुछ घंटों की ट्रेनिंग के साथ 'साइंटिफिक सर्वे' का औपचारिक प्रस्ताव रखा, हॉल में विरोध के स्वर उभरने लगे. एक वरिष्ठ सदस्य ने मेज थपथपाते हुए कहा, "शिंदे, हमें इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों की क्या ज़रूरत है? हम बरसों से अपने मजदूर साथियों के साथ जी रहे हैं. हम जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं. यह सर्वे सिर्फ वक्त की बर्बादी है और इससे मैनेजमेंट को हमारी रणनीति का पता चल जाएगा."

बहस गरम हो गई. कुछ सदस्यों को लगा कि यह 'सर्वे' दरअसल उनकी अपनी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. प्रशांत बाबू शांत थे, वे जानते थे कि यह प्रतिरोध होना ही था. उन्होंने सभी सदस्यों को इस विषय पर अपने विचार रखने को कहा. फ्रेक्शन में उपस्थित सदस्यों सहित कुल 9 सदस्यों ने ही इस सर्वे के समर्थन में राय दी, बाकी सबने उसे व्यर्थ बताया. इस मुद्दे पर बहस इतनी तेज हो गई कि दो-तीन मेंबर एक साथ ऊँची आवाज में बोलने लगे.

कॉमरेड कुलकर्णी ने हस्तक्षेप कर ऊँचा बोलने वालों को चुप कराया. “यह बैठक कुछ निर्णय लेने के लिए बुलाई गयी है. उसके लिए विचार विमर्श सहज रीति से हो सकता है. सब अपनी राय शांति से रख सकते हैं. अब जिस बिंदु पर विवाद है, पहले हमें समझ लेने चाहिए उसके बाद हम फिर से राय कर सकते हैं. यहाँ कितने लोग हैं जो एक विज्ञान सम्मत रीति से किए जाने वाले सर्वे के लाभों और नुकसान के बारे में समझते हैं?”

इस प्रश्न से बैठक में एकदम शांति छा गई. उनमें से कोई भी सर्वे के तरीके के बारे में कोई जानकारी नहीं रखता था. कॉमरेड कुलकर्णी ने बोलना जारी रखा. “पहले तो आप सबको यह समझना चाहिए कि यह सर्वे हमारी राय बदलने के लिए नहीं, बल्कि हमारी राय को 'सबूत' में बदलने के लिए है. इसके दो उद्देश्य हैं. एक तो मजदूरों की राय स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ जाए. दूसरे जब इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में बात हो तो हम मैनेजमेंट के तर्क का कि मजदूर खुश हैं हम जवाब दे सकें. तब हमारे पास सबूत होगा. यह सर्वे वह दस्तावेज़ बनेगा जिसे अदालत नकार नहीं सकेगी."

कॉमरेड कुलकर्णी के 'कोर्ट', 'सबूत' और स्पष्ट राय वाले तर्क से विरोधी कुछ शांत हुए. प्रशांत बाबू ने मौके का फायदा उठाते हुए जोड़ा, "अगर हम विज्ञान और डेटा का साथ नहीं लेंगे, तो पूंजीवाद हमें पुरानी तकनीकों की तरह ही कुचल देगा." काफी तर्क-वितर्क के बाद, प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया, हालांकि दो-तीन चेहरे फिर भी तने हुए नजर आते रहे.

फ्रेक्शन मीटिंग से घर लौटते समय शेयरिंग ऑटो में बैठी प्रिया ने अपनी आँखें मूँद लीं. वह आज के दिन के बारे में सोचने लगी. सुबह पाँच बजे उठना, स्टेशन पहुँचकर आकाश को रिसीव करना, उसका छह घंटों का साथ, उसे विदा करने के बाद फ्रेक्शन मीटिंग— सब कुछ उसके मस्तिष्क पटल पर किसी फिल्म के दृश्यों की तरह चल रहा था.

उसे महसूस हुआ कि उसका अपना जीवन अब दो समानांतर मोर्चों पर चल रहा था. एक मोर्चा 'व्यक्तिगत' था, जहाँ आकाश का साथ उसे एक शांत कोमलता से भर देता था, और दूसरा मोर्चा 'सामाजिक' था, जहाँ हर कदम पर वह सहज ही रणनीति का हिस्सा बन जाती थी.

फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही उसे उस सन्नाटे का अहसास हुआ जो आकाश के जाने के बाद और गहरा गया था. उसने चाय के लिए दूध, चीनी, पत्ती और पानी सब एक साथ पतीली में डाल गैस पर चढ़ा दिया और बालकनी में आकर खड़ी हो गई. आज उसने एक बहुत बड़ी जीत हासिल की थी—फ्रेक्शन को एक आधुनिक सोच के लिए मनाना आसान नहीं था.

तभी उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी. आकाश का मैसेज था. "प्रिया, तुम्हें आज मुंबई में फिर से देखा तुम्हारा सुबह जल्दी उठकर बोरिवली स्टेशन पर मुझे लेने आना, अपने घर ले जाना, फिर रामजी का मेवाड़ भोजनालय, तुम्हारा मीटिंग में समय से पहुँचने का जुनून और फिर वे बब्बन भाई जो मुझे छोड़ने आए. इन सब के बीच तुम्हारे व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू आज मैंने देखा, तुम कुछ अपरिचित सी लगने लगी. तुम्हारे इस रूप ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन उसे देख मन कुछ भय भी पैदा हुए. उनपर मिलने पर बात करेंगे. उम्मीद है तुम्हारी मीटिंग सफल रही होगी."

मुस्कुराते हुए मैसेज का जवाब टाइप करने लगी— "मीटिंग सफल रही, आकाश. हम बात करेंगे लेकिन ये मुंबई अभी तुम्हें और भी बहुत कुछ दिखाएगी."
... क्रमशः