@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: 2026

सोमवार, 12 जनवरी 2026

नियमावली

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

स्कूल की आखिरी घंटी बजने वाली थी, शगुन की नज़र खिड़की से बाहर उड़ती एक चिड़िया पर टिकी थी, पर कान वैल्यू एजुकेशन की क्लास में प्रिंसिपल मैडम के शब्दों पर थे, उनकी आवाज़ में एक ऐसा आग्रह था जो सुझाव नहीं, बल्कि एक कठोर नियम लगता था.

"और याद रखना, लड़कियों, असली सुंदरता चेहरे पर नहीं, चरित्र में होती है. एक अच्छी लड़की की पहचान उसकी विनम्रता, उसका संयम और परिवार के प्रति त्याग है."

शगुन की उँगली अनायास ही अपनी नोटबुक पर खिसक गई, जहाँ उसने सुबह मनोविज्ञान की क्लास में एक शब्द नोट किया था: "सामाजिक अनुकूलन". उसकी परिभाषा याद आई: “व्यवहार को सामाजिक मानदंडों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया.” एक ठंडी सिहरन सी उसकी रीढ़ में दौड़ गयी. मैडम के शब्द अचानक एक प्रोसेस का हिस्सा लगने लगे, कोई शाश्वत सत्य नहीं. वह एक कुम्हार को प्रतिमाएँ गढ़ने के पहले मिट्टी को तैयार करने में लगा था, बस.

"खुश रहना सीखो," मैडम ने बोलना जारी रखा, "घर की खुशहाली तुम्हारे हाथ में है. एक चिड़चिड़ी, हर बात पर सवाल उठाने वाली लड़की पूरे वातावरण को दूषित कर देती है."

शगुन ने अपने आस-पास देखा. कई सिर गंभीरता से हिल रहे थे. उसने सोचा, क्या वे सब इस 'एक खास साँचे में ढाले जाने’ के प्रोसेस को महसूस नहीं कर पा रही थीं? या फिर, वे पहले ही साँचे में ढल चुकी थीं?

अगले दिन सुबह की असेंबली में, जब सब लड़कियाँ लाइन में खड़ी थीं. एक अलग तरह का पाठ शुरू हुआ. वाइस-प्रिंसिपल, जिनकी नज़रें हमेशा ही छात्राओं को स्कैन करती रहती थीं, अचानक प्रिया के सामने रुक गईं. उन्होंने उसकी स्कर्ट के किनारे को उँगलियों से पकड़कर खींचा.

"यह क्या है?" उनकी आवाज़ कर्कश थी, "स्कर्ट इतनी छोटी क्यों है? और यह ब्लाउज़... क्या यह तुम्हें टाइट नहीं लग रहा?"

प्रिया का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया. तमाम छात्राओं की नज़रें उस पर टिक गईं. मैडम ने सबकी तरफ देखा, यह सबक सब छात्राओं के लिए था.

"लड़कियों, तुम्हारा ध्यान पढ़ाई और संस्कारों पर होना चाहिए, न कि ऐसी चीज़ों पर जो अनुचित ध्यान आकर्षित करें. तुम्हारे शरीर की हर अभिव्यक्ति एक संदेश है. यह संदेश सही होना चाहिए."

उनके शब्द हवा में लटक गए. प्रिया अब सिकुड़ी हुई, अपने आप में समाई खड़ी थी. शगुन के मन में कल पढ़ा हुआ एक और शब्द उभरा” "वस्तुकरण". प्रिया का शरीर, उसकी पोशाक, एक समस्या बन गई थी. एक ऐसी वस्तु जिसका विश्लेषण, आलोचना और सार्वजनिक सुधार किया जा सकता था, ताकि वह देखने वालों को 'उचित संदेश’ दे. शगुन ने अपनी स्कर्ट को नीचे खींच लिया, यह एक स्वचालित, आत्म-सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया थी. डर का यह वायरस छूत की तरह फैल गया था.

घर पर चाची की वापसी नई ही थी. विवाह के बाद जब चाचा-चाची के बीच अनबन होने के कारण वह मायके चली गई थीं, अब धुंधली याद बन चुके थे. "मामला सुलझ गया," बस इतना ही कहा गया था, और चाची वापस आ गई थीं. शायद उन नियमों को मान कर, जिन्हें तोड़ना उनके लिए संभव नहीं था.

शाम को एक पारिवारिक समारोह था. माँ ने एक सुंदर, हल्की ज़री वाले सलवार-सूट को हाथ में लेकर वापस रख दिया. वही सूट जो शगुन को पसंद था.

"नहीं बेटा, यह वाला ज़रूरत से ज़्यादा आकर्षक है. तुम्हारी उम्र में सुंदर दिखना अच्छा है, पर 'बहुत' सुंदर दिखने को लोग गलत समझ सकते हैं. बेवजह लोग तुम्हें घूरेंगे. तुम्हारी पढ़ाई और समझदारी ही तुम्हारे लिए असली सुंदरता है."

तभी चाची चाय का कप हाथ में लिए कमरे में आईं. उन्होंने स्थिति भाँप ली और माँ के शब्दों पर मुहर लगा दी, "सही कहा भाभी ने. हम लड़कियों को खुद अपनी सीमाएँ तय करनी पड़ती हैं. वरना ... बाद में पछताना पड़ता है." उनकी आवाज़ के आखिरी शब्दों में थकान और विवशता झलकी, जिसे देख शगुन का दिल एक पल के लिए भारी हो गया. चाची ने यह पाठ शायद स्वयं जीकर सीखा था.

शगुन के भीतर एक तीखा प्रतिवाद उठा. तो क्या सुंदरता एक अपराध है? क्या डर हमारी नियति है? पर उसने कुछ नहीं कहा. उसके चेहरे पर उभरी इस कुंठा और क्रोध को माँ ने भाँप लिया.

माँ उसे खिड़की के पास ले गईं, धीमी आवाज में समझाने लगीं, "मैं समझती हूँ तुम्हें अच्छा नहीं लगा. पर देखो बेटा, आज फंक्शन है. सारे रिश्तेदार वहाँ रहेंगे. ऐसे मौकों पर माहौल खुशनुमा रहना चाहिए. तुम्हारी नाराजगी या जिद से बात बिगड़ सकती है. हम लड़कियों को थोड़ा सहना पड़ता है, ताकि सब की खुशी बनी रहे. तुम्हारी नाराजगी सिर्फ तुम्हारी नहीं रह जाती. उसका असर सब पर पड़ता है."

यह पाठ अब सिर्फ कपड़ों के बारे में नहीं था. यह उसकी खुद की भावनाओं के बारे में था. उसके क्रोध, उसकी इच्छा को दबाकर, दूसरों की सुविधा और 'शांति' को तरजीह देना. उसे सिखाया जा रहा था कि उसकी व्यक्तिगत भावनाएँ सामूहिक भावनात्मक जिम्मेदारी के आगे गौण हो गयी थी. यह आत्म-दमन का पाठ था.

शगुन ने चुपचाप सादा सूट पहन लिया. उसका मन उसके बैग में रखी मनोविज्ञान की किताब में था. किताब में ये सभी शब्द थे, 'सामाजिक अनुकूलन', 'वस्तुकरण', 'आंतरिककरण उत्पीड़न' (Internalized Oppression). वे सिर्फ शब्द नहीं थे; वे चाबियाँ थीं, जो उसकी ज़िंदगी के बक्सों पर ताले लगा रही थीं.

पर इस ज्ञान ने शगुन को अकेलेपन की पीड़ा दी. इसे साझा करने के लिए उसके निकट कोई नहीं था. न प्रिया के साथ, न माँ के साथ, और न चाची के साथ था, जो खुद इसी व्यवस्था की पूर्व-छात्रा और अब सहायक-शिक्षिका बन चुकी थीं.

फंक्शन में जाने से पहले शगुन ने अपने बैग को देखा मनोविज्ञान की किताब वहीं थी. से छूकर उसे कुछ शान्ति मिली. वह जान गई थी कि ये नियम स्वाभाविक नहीं हैं, बनाए गए हैं. वह उन्हें तोड़ नहीं सकती थी. नहीं, अभी नहीं. अभी तो उसने बस उन्हें जानना शुरू किया था.

और पहला पाठ यही था: तुम्हारा शरीर तुम्हारा नहीं, तुम्हारी भावनाएँ तुम्हारी नहीं. दोनों पर नियंत्रण बाहरी है.
उसने सोचा, कल स्कूल में वह अपनी मनोविज्ञान की किताब फिर खोलेगी. शायद अगला अध्याय उसे कोई माकूल जवाब दे.

रविवार, 11 जनवरी 2026

पाठ

 लघुकथा  :  दिनेशराय द्वि्वेदी

ट्रेन की खिड़की से बाहर धुँधले उजाले में खेत-पेड़ गुजर रहे थे. आयुष की नजर उन पर थी, पर दिख कुछ नहीं रहा था. आँखों के सामने शगुन का चेहरा था, उस आखिरी रात का, जब उसने पूछा था, "क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुम खुद को खो रहे हो?"

सवाल अब भी कानों में सरसरा रहा था. उसने जवाब नहीं दिया था. बस चिल्ला दिया था, और चिल्लाने के बाद की चुप्पी सीने पर पत्थर-सी पड़ी थी.

ट्रेन रुकी. बोर्डिंग स्कूल का स्टेशन था. प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही एक गंध ने घेर लिया; पसीना, फिनाइल, पुरानी किताबों की गंध. हॉस्टल की गंध. एक अजीब सी राहत मिली. यहाँ सब स्पष्ट था. नियम, पदानुक्रम, मजाक. यहाँ शगुन जैसे सवाल नहीं थे. यहाँ सब कुछ सतह पर था, और सतह पर ही निपट जाता था.

हॉस्टल के कमरे में राजन ने उसका स्वागत एक गाली से किया. आयुष बेमन से मुस्कुरा दिया. यह रस्म थी. विजय ने बैग की ओर देखा, "घर से मिठाई?"

"कुछ खास नहीं," आयुष ने कहा. बैग में माँ के हाथ के लड्डू थे, पर उन्हें निकालना अब कमजोरी लगता.

शाम को डिनर हॉल में उसने एक नया चेहरा देखा; नौवीं कक्षा का पतला-दुबला लड़का, समर.

"अरे देखो, नया 'कुमारी' आ गया है!" राजन ने ऊँची आवाज़ में कहा.

"क्यों भई, तेरा नाम तो लड़कियों जैसा है," विजय ने कहा, "कविता पढ़ता होगा न?"

समर ने सिर उठाकर देखा, फिर नीचे झुक गया. उसकी चुप्पी और भड़काने वाली थी.

उस रात के बाद समर "सिस्सी" बन गया. धीरे चलना, शर्माना, वगैरा; उसकी हर छोटी हरकत पर टिप्पणी होती. आयुष देखता रहा.

यह इस सत्र का पहला पाठ था: स्त्रीलिंग विशेषताएँ उस पर चस्पा कर दी गईं. समर का "इलाज" शुरू हुआ. उसे जबरन क्रिकेट खिलाया गया, गालियाँ रटाई गईं.

एक दिन लाइब्रेरी में आयुष ने समर को कविता की किताब छुपाते देखा. नजरें मिलीं. समर की आँखों में सवाल था; ‘तुम क्यों नहीं कुछ कहते?’ आयुष ने तुरंत नजरें फेर लीं. उसकी चुप्पी एक सुरक्षा-दीवार थी.

हफ्ते बीते. बातें गहरी और विकृत होती गई. अब सिर्फ हीरोइनें नहीं, सोशल मीडिया की अनजान लड़कियों के प्रोफाइल तोड़े जाते. "देखो इसका नया डीपी. क्या रेटिंग दोगे?"

लड़के स्क्रीन के इर्द-गिर्द झुंड बना लेते. लड़की का चेहरा, उसकी पोस्ट; सब एक कोड की तरह तोड़ा जाता. उसकी इच्छा, व्यक्तित्व सब गायब. वह शारीरिक अंगों का एक सेट बन जाती. जो सबसे "बोल्ड" टिप्पणी करता, वह नायक बन जाता. आयुष चुप रहता. उसकी चुप्पी असहमति नहीं, सहमति थी. यह दूसरा पाठ था: स्त्री एक वस्तु है, और उसका 'ज्ञान' ही पुरुषत्व की पूंजी है.

एक शाम "विशेष व्याख्यान" हुआ. एक बुजुर्ग शिक्षक बोले, "याद रखो, लड़कियाँ ध्यान भटकाने का सबसे बड़ा साधन हैं. प्रेम-प्रसंग मीठा जहर है. अच्छा लड़का वही है जिसका ध्यान केवल पढ़ाई, व्यायाम और खेल पर टिका रहे."

हॉल में सन्नाटा था. आयुष के मन में विचार कौंधा: अगर लड़कियाँ इतनी खतरनाक हैं... तो क्या यह स्त्री-विहीन दुनिया एक लाभ नहीं? हम बचाए गए हैं? यह विचार वीभत्स था, पर उसमें एक सच्चाई भी थी. यह तीसरा पाठ था: स्त्री एक बाहरी खतरा है. यह दुनिया हमारा 'सुरक्षित क्षेत्र' है.

इन पाठों के बीच आयुष ने एक और पाठ सीखा. हॉस्टल की महिला कर्मचारियों के प्रति. वे झाड़ू लगाती थीं, बर्तन साफ करती थीं. पर वे होते हुए भी अदृश्य थीं. लड़के उनसे आँख नहीं मिलाते थे, नाम नहीं जानते थे. उनका श्रम चाहिए था, उनकी मानवता, उनकी संवेदनाएँ नहीं. वे सिर्फ मशीन थी.

फिर वह रात आई. अँधेरे कमरे में केवल मोबाइल स्क्रीन की रोशनी थी. राजन ने एक वीभत्स वीडियो दिखाना शुरू किया. समर फुसफुसाया, "बंद करो... यह गलत है."

कमरे में सन्नाटा. फिर राजन हँसा, "अरे! हमारी 'कुमारी' को तो 'गलत' लगता है!" वह मुड़ा, "अरे आयुष, तेरी बहन है न? कभी उसकी सहेली की फोटो दिखाई है?"

प्रश्न बिजली-सा गुजरा. आयुष के मन में दो छवियाँ टकराईं: उसकी सगी बहन शगुन, और इस कमरे की भाषा की "बहन". एक वस्तु, एक मजाक.

सब की नजरें उस पर थीं. यह परीक्षा थी. शगुन का चेहरा आँखों के सामने तैरा. “तुम खुद को खो रहे हो?”

आयुष ने एक सेकंड के लिए आँखें बंद कीं. जब खोलीं, तो चेहरे पर कोई भाव नहीं था. एक खाली मुस्कुराहट होंठों पर चिपक गई. उसकी आवाज़ सपाट निकली:

"अरे, वो’ वो बहुत साधारण है. बस पढ़ाई में लगी रहती है. कोई फोटो नहीं."

उसने जानबूझकर उसे 'उबाऊ' बना दिया. इस एक झूठ में, आयुष ने हॉस्टल के मूल्यों को अपने सबसे पुराने रिश्ते से ऊपर रख दिया.

कमरे में तालियाँ बजीं. आयुष ने इम्तिहान 'पास' कर लिया था. उसकी जगह सुरक्षित हो गई.

रात को सपना आया. शगुन धुंधली परछाई सी खड़ी थी, "आयुष, तुम कहाँ खो गए?"

आयुष जवाब देना चाहता था, पर मुहँ से वही गालियाँ निकलने लगीं. शगुन की छवि चीखती हुई गायब हो गई.

आयुष हाँफता हुआ जाग गया. कमरे में खर्राटे गूँज रहे थे. उसने अपने हाथ देखे. वही हाथ जिसने शगुन की गुड़िया थामी थी. आँखों में जलन उभरी. गले की पुरानी गाँठ फूल गई. एक सिसकी सीने से टकराकर ऊपर आई. उसने तकिए को जोर से पकड़ लिया. और फिर, बिना आवाज किए, तकिए में मुहँ दबाकर, उसने वह पहला और आखिरी आँसू रोया जो बारह साल की उम्र के बाद कभी नहीं आया था. शरीर एक झटके में काँपा, फिर शांत हो गया.

सुबह जब वह उठा, तो सकी आँखें सूखी और चेहरा पत्थर की तरह सख्त था. दर्पण के सामने यूनिफॉर्म के बटन लगाते हुए उसने अपनी ओर देखा. भीतर का वह लड़का, जिसने रात को आँसू बहाए थे, अब गायब था. उसकी जगह एक खोखला, सही ढंग से ढला हुआ खोल था, जो सभी पाठ याद कर चुका था.

उसने दर्पण से नजर हटा ली, और कमरे से बाहर कदम रख दिया. दिन का पहला पाठ शुरू होने वाला था.

शनिवार, 10 जनवरी 2026

चिनगारी

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

आयुष के बोर्डिंग स्कूल चले जाने के बाद शगुन को कई नए काम मिल गए. पहले आयुष बाहर के छोटे-मोटे काम कर देता था. अब उनमें से अधिकांश उसे करने पड़ते थे. उसका स्कूल के अलावा मोहल्ले की सीमा से बाहर जाना सिमट गया. पहले वह जाती तो आयुष को साथ ले जाती थी. अब उसे अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी. शगुन 'घर की बड़ी बेटी' होने का अर्थ समझ रही थी, उसका अपना समय सिकुड़ गया था. उसकी दुनिया अब अधिक से अधिक घर की चारदीवारी में सिमट रही थी. जिज्ञासावश खरीदी गई उसकी विज्ञान की किताबें वह यदा-कदा ही पढ़ पाती थी.

शगुन ने सैकण्डरी स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी. गणित और विज्ञान के अंकों ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था. अब उसे अध्ययन के लिए अपनी स्ट्रीम चुननी थी. वह जीव विज्ञान लेना चाहती थी. सोचती, यदि डॉक्टर बन सकी तो परिवार और लोगों के काम आ सकती हूँ. खुद का और परिवार का नाम भी रोशन होगा.

चाचा स्कूल से उसका प्रवेश फॉर्म ले आए. रात के खाने के समय पिता और चाचा बैठे थे. वह रसोई में रोटियाँ बेल रही थी, माँ परोस रही थी. अचानक माँ ने कहा, “रोटियाँ मुझे बेलने दे, खाना तू परोस दे. पापा तेरे एडमिशन के बारे में बात करना चाहते हैं.”

उसने बेलन माँ को थमाया, आटा सने हाथ धोए और गर्म रोटियाँ लेकर डाइनिंग में पहुँची.

"आर्ट्स ही ठीक रहेगा," पिता ने शगुन को बिना देखे ही कहा, "लड़कियों के लिए आसान है. इतिहास-समाजशास्त्र शादी के बाद बच्चों को पढ़ाने में भी काम आएंगे."

सुनकर शगुन की साँसें थम सी गईं. “पर पापा, मेरे सबसे ज़्यादा नंबर तो साइंस और गणित में आए हैं," उसने पिता और चाचा की थाली में रोटियाँ परोसते हुए कहा, "मैं बायोलॉजी पढ़ना चाहती हूँ.”

“अब तक की जो साइंस-गणित तुमने पढ़ी, वह प्रारंभिक थी, जो सब को सीखनी चाहिए," चाचा ने बिना रुके कह दिया, "आगे जब ये मुख्य विषय होंगे तो बहुत मुश्किल होंगे. आयुष भी यहाँ नहीं है. घर के इतने काम करते हुए तुम बायोलॉजी नहीं कर सकोगी. एक बार फेल हुई तो बहुत इज्ज़त खराब होगी.”

“पर गणित में मैं कभी 90-95 प्रतिशत से कम नहीं लाई. वह मेरी पसंदीदा है," शगुन ने हिम्मत जुटाकर कहा.

“क्या?” पिता की आवाज़ कड़ी हो गई, “तुम बायोलॉजी लेकर क्या करोगी? मेडिकल के लिए प्री-मेडिकल देना पड़ेगा, कोचिंग करनी पड़ेगी, बहुत मेहनत. और कॉम्पिटीशन निकाल भी लिया तो मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी है. एक-सवा करोड़ खर्च होता है. हम जैसे मध्यवर्गीय के बस की बात नहीं.”

“और डॉक्टर बन भी गई तो शादी में कितना दहेज देना होगा, पता है?” चाचा ने आगे जोड़ा, “आजकल तो डेढ़-दो करोड़ मांग चल रही है. मेडिकल की तो हम सोच भी नहीं सकते.”

शगुन का गला रुंध गया. उसकी सारी हसरतों पर पानी फिर चुका था. तभी उसके मन में एक तर्क कौंधा ‘आजकल आर्ट्स में ऑप्शनल गणित या मनोविज्ञान भी ले सकते हैं. मनोविज्ञान से तर्कशक्ति बढ़ती है... वह विज्ञान का ही एक हिस्सा है.’

“तो... क्या मैं आर्ट्स में मनोविज्ञान ले सकती हूँ?” उसकी आवाज़ धीमी, पर स्पष्ट थी, “वह भी तो... विज्ञान जैसा ही है.”

पिता और चाचा ने एक दूसरे की ओर देखा. एक क्षण की चुप्पी के बाद पिता बोले, “ठीक है... मनोविज्ञान ले सकती हो.”

चाचा की भृकुटियाँ तन गईं, पर वे चुप रहे.

शगुन डाइनिंग रूम छोड़कर सीधे अपने कमरे में गई और बिस्तर पर गिरकर तकिए में मुँह दबा रोने लगी. उसका मुख्य सपना तो टूट गया था, पर एक खिड़की... एक छोटी सी खिड़की खुली रह गई थी. “मनोविज्ञान”.

खाना खाने वह नीचे नहीं लौटी. सब काम निपटाने के बाद माँ उसके कमरे में आई. जैसे-तैसे समझाया और नीचे लाकर खाना खिलाया.

अगली सुबह शगुन नीचे नहीं उतरी. माँ उसे बुला कर लाई. पिता ने समझाना शुरू किया, “हम मध्यवर्गीय लोग हैं, बेटा. अपनी गुदड़ी देखकर चलना पड़ता है...” आखिरकार, शगुन आर्ट्स लेने को राजी हो गई, बशर्ते मनोविज्ञान उसका विषय हो.

दिन में चाचा के साथ वह स्कूल गई और आर्ट्स स्ट्रीम में मनोविज्ञान चुनते हुए आवेदन जमा करा दिया.

क्रिसमस की छुट्टियों में आयुष घर लौटा. वह लंबा हो गया था, बात करने का अंदाज़ भी बदल गया था. वह बोर्डिंग स्कूल के किस्से सुनाता — कंप्यूटर लैब, हॉस्टल की शरारतें. पूरा परिवार मंत्रमुग्ध सुनता रहता.

"देखो, कितना कुछ सीख रहा है!" माँ गर्व से कहतीं.

एक शाम चाचा ने वह तुलना फिर दोहराई, "आयुष को दुनिया देखने-सीखने को मिल रही है. शगुन, तुम्हें भी अब अपनी दुनिया, घर-परिवार को बेहतर सीखना है."

शगुन ने आयुष की ओर देखा. पर आयुष बेखबर अपनी प्लेट में खाना परोस रहा था. रात को दोनों जब अपने कमरे में सोने गए, तो शगुन ने पूछा, "बोर्डिंग स्कूल... कैसा लगा तुम्हें?"

आयुष ने कंधे उचकाए, "ठीक है. पर खाना बहुत बेकार है."

उसकी शिकायतें सतही थीं. शगुन की आँखों के गहरे सवालों को, उस चुप्पी के भार को, वह नहीं पढ़ पाया. उनके बीच नई दीवार अब देखी जा सकती थी.

छुट्टियाँ खत्म हुईं. आयुष वापस जाने के लिए तैयार हुआ. इस बार शगुन स्टेशन नहीं गई. वह अपनी खिड़की से उसे जाते देखती रही.

जब वह नज़रों से ओझल हुआ, तो उसकी नज़र अपनी अलमारी पर पड़ी जिसमें उसकी शौकिया तौर पर खरीदी विज्ञान पुस्तकें थी. फिर अपने स्कूल बैग पर, जिसमें मनोविज्ञान की नई किताब थी. वह अपने आप से ही कहने लगी, “पाठ्यक्रम में नहीं तो क्या हुआ? स्कूल लाइब्रेरी से लाकर विज्ञान की किताबें पढ़ सकती हूँ. इसी से मेरा ज्ञान बढ़ेगा.

उसने तय किया, वह ऐसा करती रहेगी. यही छोटी सी आदत, यही अध्ययन की ललक... उसकी चिंगारी को बचाए रखेगी.

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

बोर्डिंग या जेल

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

जब आयुष प्राथमिक विद्यालय की अंतिम कक्षा में था तभी अनिल चाचा उसे नवोदय विद्यालय में प्रवेश की तैयारी करा रहे थे. प्रवेश के लिए आवेदन किया और उसे वहाँ प्रवेश मिल गया. यह एक बोर्डिंग स्कूल था. उसके वहाँ जाने के पहले मम्मा ने उसके लिए बेसन के लड्डू और मठरियाँ बनाईं उन्हें नए एयरटाइट डब्बे मंगवा कर उनमें पैक किया. उसके सूटकेस में हर चीज सावधानी से रखी गई. कपड़े, किताबें और भी बहुत कुछ. पापा ने सभी दस्तावेज अच्छी तरह जाँच कर रखे. मम्मा-पापा दोनों उसे बोर्डिंग स्कूल तक छोड़ कर गए शगुन और अनिल चाचा उन्हें स्टेशन छोड़ने आए. ट्रेन में चढ़ने के बाद वह अपनी सीट पर खिड़की के पास जा बैठा. ट्रेन चलने तक खिड़की से बाहर झाँकता रहा. शगुन चुप थी लेकिन एकटक उसे देखे जा रही थी, जैसे सोच रही हो कि आयुष नहीं उसका बचपन जा रहा है. अनिल चाचा ने ट्रेन में चढ़ने के पहले आयुष के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, "बेटा, बोर्डिंग स्कूल से तुम्हें मर्द बन कर निकलना है."

जब ट्रेन ने रवाना होने की सीटी दी तो शगुन ने धीमे से उसे कहा, “आयुष वहाँ से मुझे पत्र लिखना.

"हाँ, जरूर लिखूंगा", आयुष ने कहा. तभी ट्रेन चल दी. वह शगुन और चाचा की ओर तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक कि वे उसकी नजरों से ओझल न हो गए.


आयुष को बोर्डिंग स्कूल छोड़ कर माता-पिता वापस घर पहुँचे. शगुन ने दरवाजा खोला और माँ के हाथ से बैग ले लिया. सामान रखने के बाद माँ ने शगुन की ओर देखा, और हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया और बोली, "अब आयुष दूर है, उसकी याद आएगी. अब तुम्हें भी समझदार बनना होगा. घर के काम-काज में तुम्हारी ज्यादा हिस्सेदारी रहेगी. पर मैं धीरे-धीरे सब सिखा दूँगी."

अनिल चाचा ने सहमति में सिर हिलाया, "बिल्कुल सही. लड़कियों को घर की जिम्मेदारियाँ सीखनी ही चाहिए. आयुष को तो बाहर की दुनिया का अनुभव करना है."

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने महसूस किया कि अब उसकी अपनी भूमिका भी बदल रही थी. वह "घर की बड़ी बेटी" हो गयी थी. एक ऐसा अलंकरण जिसमें आज़ादी नहीं, जिम्मेदारियों का बोझ था.

बोर्डिंग स्कूल पूरी तरह ‘मर्दों की दुनिया था. वहाँ कहीं लड़कियाँ, स्त्रियाँ नहीं थीं, न शिक्षक, न रसोइया, न और कोई. उनके न होने पर यहाँ गर्व किया जाता था, मानो स्त्रियाँ तपस्या भंग कर डालने वाली व्यवधान हों. कुछ दिन बाद ही आयुष ने महसूस किया कि स्त्रियों का यह अभाव बहुत भारी था.

रात दस बजे हॉस्टल का वार्डन लाइट बंद करके चला जाता था. उसके बाद आवाज़ें ज़ोर पकड़ने लगतीं थी. छात्रों के बीच "दुनिया" पर चर्चा होने लगती. ऐसी दुनिया जिससे आयुष यहाँ आने तक पूरी तरह अनजान था.

"अरे यार, तुझे मेरे दोस्त अमित की बहन का फोटो दिखाता हूँ?" राजन ने चारपाई पर पलटते हुए कहा, “क्या क्लासिक ब्यूटी है."

"ब्यूटी क्या होती है, असली देखी है कभी?" विजय ने कहा" फिल्मों हीरोइनें ही तो ब्यूटी हैं."

आयुष चुपचाप लेटा सब सुन रहा था. उसके लिए "लड़की" शब्द अब तीन हिस्सों में बंट गया था.

एक, स्कूल की ऊँची दीवारों से दूर वाली एक अमूर्त अवधारणा. जिसकी भाषा उसे नहीं आती थी.

दो, होस्टल की अंधेरी कोरिडोरों और शौचालयों की दीवारों पर लिखे गंदे किस्से और फोन नंबर. जिनकी लड़की एक रहस्य थी, एक पाप, एक गुप्त कोड.

तीन, उसकी बहन शगुन, जिसकी पीठ पर बैठ वह घोड़ा-घोड़ा खेलता था. पर अब उसकी घर की यादें पुराने एलबम की तस्वीर जैसी फीकी पड़ रही थी. उनके बीच का अंतिम सार्थक बात कब हुई थी? शायद उस दिन जब उसने शगुन की गुड़िया लौटाई थी. उसके बाद केवल गर्मियों की छुट्टियों की औपचारिक बातें ही रह गई थीं. अब वह सोलह की है. वह कैसी होगी? उसे कुछ भी पता नहीं था.

"सुनो आयुष," राजन ने रोबदार अंदाज में कहा, "तूने कभी किसी लड़की से बात की है? असली वाली से?"

सवाल सुनकर आयुष का दिमाग़ खाली हो गया. "बात?" उसने कहा, "मेरी... बहन से मैंने खूब बातें की हैं."

कमरे में एकाएक ठहाका फूट पड़ा. "अरे यार, बहन नहीं! बहन तो परिवार वाली होती है. असली लड़की. जैसे किसी दोस्त की बहन. या... कोई और."

आयुष के पास कोई जवाब नहीं था. उसके पास "असली" का कोई अनुभव नहीं था. उसकी पूरी जानकारी सुनी सुनाई थी. फिल्मी गानों, दोस्तों की डींगों और दीवारों पर लिखे शब्दों से मिली हुई. एक दिन विजय ने अपने फोन पर एक फोटो दिखाई, "देखो, मेरे बड़े भाई की गर्लफ्रेंड."

लड़कों का झुंड उस छोटी सी स्क्रीन के इर्द-गिर्द जमा हो गया. आयुष भी झाँका. तस्वीर में एक लड़की बिलकुल फेशनेबल कपड़ों में पेड़ के सहारे खड़ी थी.

"वाह! क्या फिगर है!"

"ऐसी गर्लफ्रेंड मिले तो जिंदगी बन जाए!"

आयुष ने ध्यान से देखा. लड़की के चेहरे पर एक भाव था, शायद खुशी का. पर झुंड की टिप्पणियों ने उस भाव को नष्ट कर दिया. वह तस्वीर अब एक "फिगर" बन गई थी. एक मापदंड. किशोर बच्चों की गोसिप्स का विषय.

रात को, जब बातें शांत हो गईं, आयुष ने अपनी आँखें बंद कीं. उसे शगुन याद आई. उसे याद आया कि कैसे उसने चाचा के जाने के बाद उसकी गुड़िया उसे लौटा दी थी, और कैसे अगले दिन उससे दूरी बना ली थी. अगर शगुन की तस्वीर किसी लड़के के फोन में होती तो? क्या वह भी ऐसी ही टिप्पणियों का विषय बनती?

एक अजीब सी ग्लानि ने उसे घेर लिया. उसने सोचा, "हम लड़कियों के बारे में कुछ नहीं जानते. बस, बातें बनाते हैं. और ऐसे ही एक काल्पनिक दुनिया गढ़ लेते हैं."

उसकी यह सोच अकेलेपन में दब गई. अगली सुबह दर्पण के सामने यूनिफॉर्म में खड़े आयुष ने अपने कंधे सीधे किए। शीशे में वह खुद को नहीं, अपनी नई भूमिका को देख रहा था. एक ऐसी भूमिका जिसमें अभिनेता की खुद की आवाज़ दब रही थी। उसकी दुनिया में लड़कियाँ केवल तस्वीरें, किस्सों और दीवारों पर लिखे नंबर थीं। वह सोच रहा था की जेलें भी स्कूल और होस्टल जैसी ही होती होंगी. आयुष को फिलहाल उसी हवा में सांस लेनी थी.




गुरुवार, 8 जनवरी 2026

बीज

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

शगुन चार बरस की होने को थी. दीवाली के पहले पापा कपड़े खरीद कर लाए. उसके लिए एक खूबसूरत गुलाबी चमकदार फ्रॉक थी जिस पर मखमली कपड़े के बने फूल लगे थे. उसे पसंद आई थी. लेकिन उसने उसे छूकर छोड़ दिया. गर्मियों में जब मामा के घर थी तब मामा भी उसके लिए फ्रॉक ही लाए थे और मुन्नू भैया के लिये टी शर्ट और पैंट. मुन्नू भैया उन कपड़ों में बहुत सुन्दर लग रहे थे. तब उसने लौट कर पापा से कहा भी था कि उसे भी टी शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा फिर फ्रॉक ले आए. वह रूठ गयी कि उसे तो शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा ने उसे मनाते हुए कहा था. पैंट शर्ट लड़कों की ड्रेस है उसमें वह अच्छी नहीं लगेगी. लड़कियाँ तो फ्रॉक में ही सुन्दर सजीली लगती हैं. उसे नहीं मनाया जा सका तो उन्होंने कोशिश छोड़ दी और मम्मा से कहा कि इसे समझाओ, ऐसी जिदें ठीक नहीं. शगुन को पहली बार समझ आया कि : कुछ चीजें लड़कियों के लिए नहीं हैं.

सात साल की होते होते, उसके पास दो दुनियाएँ थीं एक घर के दरवाजे के अन्दर और एक बाहर. बाहर की दुनिया में उसका दखल सीमित था. जबकि एक तरफ छोटा भाई आयुष था, जो शाम को मैदान में खेल रहे लड़कों के पास जा बैठता और उन्हें देखता. जब भी उसे मौका मिलता वह फुटबॉल को किक मारता. दूसरी तरफ वह थी, दादी रंगोली के डिब्बे लाकर उससे बोलती-"चलो, तुम्हें रंगोली बनाना सिखाऊँ. खूबसूरत बनाओगी तो सब की प्रशंसा मिलेगी. लड़कों का क्या, उनके लिए सड़कों-मैदानों की धूल और कीचड़ ही भले हैं. अभी आयुष धूल-मिट्टी में सन कर आएगा और मम्मा की डाँट खाएगा उसे ठंडे पानी से हाथ पैर धोने पड़ेंगे तब नानी याद आ जाएगी."

शगुन ने रंगों के डब्बे थाम लिए और रंगोली बनाना सीखा. बाहर से आयुष की खिलखिलाहट आती. उसने सीखा: खूबसूरती गढ़ना उसका काम था और उसकी जगह घर के भीतर थी.

आठ बरस की उम्र में उसने 'हक' का पहला पाठ पढ़ा. दिवाली पर माँ ने बेसन के लड्डू बनाए. पहला लड्डू आयुष की थाली में रखा गया.

"लड़का है, पहले उसका हक बनता है," चाचा ने कहा, जैसे कोई पुराना नियम सुना रहे हों.
दूसरा लड्डू शगुन को मिला. मिठाई तो एक जैसी थी, पर वह पल उसे अलग कर रहा था. उसने सीखा: उसका हक... दूसरे नंबर पर आता है.

वह नौ की हुई. उसे गुस्सा आया तो उसने ऊँची आवाज में कह दिया, "मैं नहीं करुँगी!"

माँ ने फौरन उसे तीखी आवाज में उसे डाँटा, "शगुन! इतनी तेज़ आवाज़? तुम्हें शर्म नहीं आती इतना जोर से बोलते हुए? लड़कियाँ ऐसे नहीं बोलतीं. उन्हें आहिस्ता बोलना चाहिए. उसकी आवाज़ पर लगाम कस दी गई.

उसी हफ्ते आयुष किसी बात पर चिल्लाया, तो पापा ने मम्मा से कहा, "देखो, कितना जोश है बेटे में!"

शगुन ने सीखा: उसकी आवाज़ का स्वर कोमल और धीमा होना चाहिए. उसका गुस्सा 'अशोभनीय' था, जबकि भाई का गुस्सा 'जोश'.

ग्यारह बरस की उम्र में उसने आयुष की साइकिल ली और चलाना सीखने लगी. उस का संतुलन बिगड़ा और वह गिर पड़ी, घुटने में खरोंच आ गई. उसका पायजामा घुटने पर से रगड़ खाने से फट गया और पता नहीं कैसे उसी समय कुर्ता भी कंधे के यहाँ से उधड़ गया, उसका कंधा दिखने लगा.

पिता खबर मिलते ही दौड़े आए, चेहरे पर चिंता थी. पर चिंता के साथ आया एक वाक्य जो चोट से ज्यादा गहरा था: "देखो, इसीलिए कहता था, लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए. खतरा होता है."
फौरन डिस्पेंसरी ले जाया जाता उसके पहले मम्मा ने यह कहते हुए कि उसका कंधा दिख रहा है, उसके कपड़े बदलवा दिए. उसके घुटने पर पट्टी कराई गयी, एटीएस इंजेक्शन लगा और खाने को दवाएँ दी गयीं. साइकिल चलाने की अनुमति जो कभी उसे नहीं मिली थी, उससे छिन गई.

उसने सीखा: 'सुरक्षा' के नाम पर लड़कियों की दुनिया सिकुड़ी हुई होती है. उसकी हिम्मत, उसकी जोखिम उठाने की क्षमता का कोई अर्थ नहीं. उस पर सभी लड़कियों की तरह एक लेबल चिपकी थी : 'नाजुक' और उसके शरीर के हिस्से नहीं दिखने चाहिए.

बारहवाँ साल चल रहा था. एक दोपहर वह माँ के साथ किचन में बैठी थी, आलू छील रही थी. एक सहज प्रश्न उसके मन में उठा. वह पूछ बैठी, मम्मा कभी साइकिल चलाई है, तुमने?

काम करती हुई माँ के हाथ रुक गए. एक पल को वह चुप रह गयी, फिर बिना शगुन की ओर देखे, धीरे से बोलीं, "नहीं बेटा... हमारे ज़माने में तो लड़कों को भी साइकिल नहीं मिलती थी. हमारे तो वह सपने में भी नहीं थी."

फिर माँ ने तुरंत टॉपिक बदल दिया, "ये लो, आलू छील लो, तो प्याज़ भी काट देना."

उस पल शगुन को एक झटका-सा लगा. यह सिर्फ उसके लिए नहीं था. ये नियम... ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे, वे एक विरासत थे. परिवार और समाज जिन्हें चुपचाप नयी पीढ़ी को सौंप देता था. इस विरासत में डर, सीमाएँ और 'नहीं' शब्द भरे हुए थे. उसकी माँ भी इसी कंडीशनिंग का उत्पाद थीं, और अब अचेतन में, उसी विरासत को आगे बढ़ा रही थी.

शाम को अपने कमरे में, शगुन छोटे से आईने के सामने खड़ी हुई. उसमें वह बच्ची नहीं दिख रही थी जिसे रंगोली बनाना अच्छा लगता था. एक नई चेतना की किरण उसकी आँखों में थी. उसे एहसास हो रहा था कि उसका जीवन एक पूर्व-लिखित पटकथा का हिस्सा था, जिसके संवाद उसे बचपन से ही प्यार, डाँट, चिंता और परंपरा के माध्यम से याद करा दिए गए थे.

लड़कियाँ ऐसे नहीं करतीं.

तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं.

शर्म नहीं आती?

वह आईने में अपनी परछाईं से आँख मिलाती रही. उसके भीतर एक सवाल ने जन्म लिया, धीमा पर स्पष्ट: "क्या मैं इस पटकथा को ही याद करती रहूँगी... या खुद इसे दोबारा लिख सकती हूँ?"


आईने में उसकी छवि मुसकुराई नहीं. बस, एक गहरी, शांत जिज्ञासा से देखती रही. अंकुरण के लिए छटपटा रहा एक बीज न जाने कहाँ से आ गया था. अब वह अंकुराएगा या उसे दबा दिया जाएगा? यह भविष्य के गर्भ में छिपा था.

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बेटा

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

आठ साल का आयुष अपनी बहन शगुन की पीठ पर सवार होकर घोड़ा-घोड़ा खेल रहा था. शगुन दस साल की थी, पर आयुष के मुकाबले हड्डियों में हल्की-सी थी. फिर भी वह अपने भाई को पीठ पर लादकर पूरे कमरे का चक्कर लगा रही थी, और दोनों के खिलखिलाहट से कमरा गूंज रहा था.

"घोड़ा रुक! अब मैं राजा बनूंगा!" आयुष ने कहा और शगुन की पीठ से कूदकर बिस्तर पर चढ़ गया. उसने चादर को कंधों पर लपेटा और माथे पर कागज़ का ताज रख लिया. शगुन ने अपनी चुनी हुई गुड़िया को गोद में उठा ली. वह रानी बनी.

तभी दरवाज़ा खुला और उनके चाचा अनिल अंदर आए. उनकी नज़र सबसे पहले आयुष पर पड़ी, जो चादर ओढ़े खड़ा था, फिर शगुन पर जो गुड़िया को सुला रही थी.


चाचा का चेहरा कड़क हो गया. "आयुष! लड़के चादर नहीं ओढ़ते. लड़के घोड़ा-घोड़ा नहीं खेलते. तुम्हें पढ़ना चाहिए, क्रिकेट खेलना चाहिए."

आयुष स्तब्ध रह गया. "और तुम, शगुन, भाई को पीठ पर लादती हो? लड़कियाँ इतना शोर नहीं करतीं. जाओ, माँ के पास रसोई में मदद करो."

शगुन ने गुड़िया वहीं छोड़ी और बिना एक शब्द कहे कमरे से बाहर चली गई. आयुष ने देखा कि उसकी आँखें नम थीं.

"चाचा, हम तो बस खेल रहे थे," आयुष ने कहा, उसकी आवाज़ में एक कंपन था.

"खेल भी सीखना पड़ता है, बेटा," चाचा ने कहा, "तुम लड़के हो. तुम्हें मज़बूत बनना है. लड़के रोते नहीं, लड़के डरते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."



चाचा के जाने के बाद, आयुष अकेला कमरे में खड़ा रहा. उसने चादर उतारकर बिस्तर पर फेंक दी. फिर उसने शगुन की छोड़ी हुई गुड़िया उठाई.

वह गुड़िया लेकर रसोई में गया. शगुन बर्तन साफ़ कर रही थी, उसकी आँखें अब भी लाल थीं.

"यह लो," आयुष ने गुड़िया बढ़ाते हुए कहा.

शगुन ने गुड़िया ले ली, पर उसने आयुष की आँखों में नहीं देखा.

"चाचा ने कहा लड़के रोते नहीं," आयुष ने कहा, "पर तुम रो सकती हो, है न?"

शगुन ने सिर हिलाया, "लड़कियाँ रो सकती हैं. पर खेल नहीं सकतीं."



अगली सुबह, शगुन ने फिर से अपना खिलौना लेकर आयुष के कमरे में दस्तक दी. "चलो, आज मैं राजा बनूँगी!" वह बोली.

आयुष ने उसे देखा. फिर अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर गई—जहाँ कल चाचा खड़े थे. एक क्षण के लिए, उसके मन में चाचा की आवाज़ गूँज उठी. उसने शगुन की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया.

"नहीं... मुझे पढ़ना है," आयुष ने कहा, और किताबें लेकर बैठ गया.

शगुन कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर धीरे से चली गई. आयुष किताब की ओर देखता रहा, पर अक्षर धुंधले पड़ गए थे.



चार साल बाद, आयुष बारह साल का हो गया.

स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन में उसका नाम नहीं आया. वह पूरा दिन मैदान में बैठा रहा, टीम की प्रैक्टिस देखता रहा. घर लौटते हुए, उसकी आँखों में पानी भर आया. गले में एक गाँठ सी बन गई, जो साँस लेने में रुकावट डाल रही थी.

वह बाथरूम में गया और शीशे के सामने खड़ा हो गया. आँखें लाल थीं, गाल गीले हो रहे थे. तभी उसके कानों में अपने चाचा की आवाज गूंजी, साफ़ और कठोर: "लड़के रोते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."

उसने अपने सब ओर देखा, चाचा कहीं नहीं थे. पर कानों में उनकी आवाज गूंज रही थी.

आयुष ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं. नाखून हथेलियों में चुभने लगे. उसने अपना सिर ऊपर उठाया, आँखें फैलाकर ताका जिससे आँसू बहने न पाएँ और एक गहरी, कँपकँपी भरी साँस ली.

फिर उसने नल खोला और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया. पानी और आँसू एक हो गए. जब वह बाहर आया, तो उसके चेहरे पर कोई नमी नहीं थी. केवल एक खालीपन था, जैसे किसी ने उसके भीतर का एक कोना साफ़ कर दिया हो.



उस रात खाने की मेज़ पर शगुन ने पूछा, "टीम में चुन लिए?"

आयुष ने सिर हिलाया, "नहीं. कोई बात नहीं."

उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो. शगुन ने उसे देखा, उसकी पीठ एकदम सीधी थी और होंठ जैसे हिले ही न हों. वह कुछ कहना चाहती थी, पर चुप रही. उसे पता था, आयुष अब वह बच्चा नहीं रहा जो गुड़िया वाली बात करता था.

आयुष ने अपनी प्लेट साफ़ की. उस दिन वह रोया नहीं था, और उस दिन के बाद भी वह कभी नहीं रोया.

लड़के रोते नहीं.

और उसने सीख लिया था.

और शगुन समझ गयी थी कि अब वह और आयुष अपने माता पिता के बच्चे होते हुए भी बेटी और बेटे हो गए हैं.

सोमवार, 5 जनवरी 2026

अपनी ही ज़मीन

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

जब दुर्घटना ने पति को निगल लिया, तो नियति का 'नाम' भी अँधेरे में खो गया. अब वह 'विधवा' थी. उसे एक ऐसा नया संबोधन मिला था जिसकी चुभन उसकी पहचान से ज़्यादा गहरी थी. सात वर्ष के वैवाहिक जीवन ने उसे एक और चुपचाप सहे जाने वाला दर्द दिया था. वह माँ नहीं बन पाई थी. इस 'कमी' ने उसके और सास-ससुर के बीच धीरे-धीरे एक अदृश्य खाई खोद दी थी. अब वह दर्द एक 'दोष' बन गया. "हमारा तो वंश ही बूढ़ गया, अब और न जाने कितने दिन हमारे सिर बनी रहेगी?" सास की यह फुसफुसाहट दीवारों के पार से भी साफ़ सुनाई देती थी.

घर की दीवारों ने उसके बदन पर 'अशुभ', 'बोझ' और 'वंश चलाने में अक्षम' शब्द उकेर दिए. जिस घर को उसने सात सालों तक अपनी साँसों से सींचा था, कानून की किताबें कहतीं कि उसमें उसका कोई हिस्सा नहीं. एक दिन वह अपने पहनने के कपड़े लिए उस आंगन की और चल पड़ी जिस पर उसके असंख्य पद चिन्ह छपे हुए थे.

जहाँ उसने अपनी गुड़िया की शादी रचाई थी, उसी आँगन ने अब उसकी वापसी पर एक लंबी और ठंडी साँस छोड़ी. अब वहाँ हवा में तैरती बचपन की खुशबुओं के बीच एक अदृश्य दीवार थी, जो दिखती नहीं थी, लेकिन महसूस होती थी. माँ का आंचल तो उसके हाथ पीले होने के पहले ही छिन चुका था, पिता की मृत्यु ने भाइयों, दिनेश और महेश के भीतर के लालच को नंगा कर दिया था.

"बहनें विदा हो जाएँ तो घर की दीवारों से उनका हक भी मिट जाता है, नियति." दिनेश ने एक दिन दफ्तर से लौटने के बाद चाय का सिप लेते हुए दो-टूक कह दिया. "और तू तो... जानती ही है, तेरे हिस्से का वारिस भी कोई है नहीं." उसकी आवाज़ में उपहास का एक तीखा स्वर था.

नियति ने शांत भाव से उसे देखा. यह शांति एक तूफान के बाद की शांति थी. उसकी आवाज़ में कोमलता थी, पर लौह जैसी दृढ़ता भी: "भैया, कानून कहता है कि 1956 के पूर्व पिता को उत्तराधिकार में अपने पुरुष पूर्वज से मिली सहदायिक संपत्ति में बेटियों का जन्म से अधिकार है, पिताजी की कोई वसीयत भी नहीं है, इसलिए उनकी स्वअर्जित संपत्ति में भी मेरा हिस्सा बराबर है.

महेश ने चाय का कुछ कप टेबल पर पटकते हुए कहा, "कानून और शास्त्र अलग होते हैं. बड़े शहर के ससुराल से क्या लौटी, ज़बान कैंची की तरह चलने लगी है तुम्हारी. इस सप्ताह में तुम अपनी राह देख लेना, वरना..."

उसने हार नहीं मानी थी. वह चुपचाप कब की शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन कर चुकी थी, साक्षात्कार हो चुका था. बस निर्णय आना शेष था. उसी सप्ताह उसे नौकरी मिल गयी. अगले सप्ताह उसने नगर के निकट ही एक गाँव के स्कूल में शिक्षक का पद संभाल लिया. उसे अपनी लड़ाई लड़ने के लिए संबल मिल गया था.

घर के भीतर छिड़ा युद्ध अब भाभियों की ज़ुबान पर आ गया था. उनके ताने हवाओं में तीर की तरह तैरते थे; "अपना तो वंश ही नहीं चला सकी, अब बाप की संपत्ति हड़पने चली है." नियति के लिए उसके भतीजे-भतीजियाँ मरहम बने. वे बच्चे, जो राजनीति नहीं जानते थे, शाम को छिपकर अपनी बुआ के पास पहुँच जाते.

इस संघर्ष में उसका सहारा बना आर्यन, उसके वकील का सहायक. एक रोज़ कोर्ट की कैंटीन में, भावनाओं के उफान में, नियति ने अपने मन की बात कहनी चाही, तो आर्यन ने कोमलता से उसे रोक दिया.

"नियति," आर्यन ने पूरी गरिमा के साथ कहा, "मैं तुम्हारे संघर्ष का हिस्सा हूँ, लेकिन तुम मेरी क्लाइंट हो. आज अगर हम किसी रिश्ते में बँधते हैं, एक तो यह मेरे पेशे की शुचिता के विपरीत होगा. तुम्हारे भाइयों को भी तुम्हारी शुचिता पर कीचड़ उछालने का अवसर मिलेगा. हम इंतज़ार करेंगे. जिस दिन तुम यह मुकदमा जीतोगी, मैं तुम्हारा वकील न रहूंगा, उस दिन मैं एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह तुम्हारा हाथ चाहूंगा."

मुकदमा लंबा चला. भाइयों ने पिता की कोई वसीयत ले आए थे. उसी के आधार पर उनके वकील ने उनका पक्ष प्रस्तुत किया. "माननीय, परिवार में कोई सहदायिक संपत्ति नहीं है. परिवार की पुश्तैनी जमीन कब की बिक चुकी थी. जो हैं वे सब पिता की स्वअर्जित संपत्तियाँ हैंपिता की वसीयत रिकार्ड पर मौजूद है जिसमें पिता ने अपनी बेटी का उल्लेख तक नहीं किया है. यदि इसका कोई हिस्सा है तो इसके पति के परिवार की संपत्तियों में है. यह वहाँ अपना हिस्सा मांगे. इसे अपने पिता की संपत्तियों पर कोई अधिकार नहीं. लिहाजा दावा खारिज किया जाए."

नियति के वकील चट्टान की तरह डटे रहे. अदालत के फैसले ने सदियों पुरानी पितृसत्ता की जड़ें हिला दीं. अदालत ने प्रारंभिक डिक्री पारित कर सहदायिक और पिता की स्वअर्जित संपत्तियों में दोनों भाइयों के समान हिस्सा तय किया और उसके एक तिहाई हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार को मान लिया गया. उसे संपत्तियों का बँटवारा अंतिम होने तक पैतृक घर में सम्मान पूर्वक अबाध निवास करने के उसके अधिकार को स्पष्ट करते हुए. उसके निवास में किसी तरह की बाधा न डालने की हिदायत देने वाली स्थायी निषेधाज्ञा भी जारी की.

अदालत की सीढ़ियों से उतरते हुए नियति ने देखा, दिनेश और महेश हार के बोझ से दबे तेज़ कदमों से निकल गए. वे पीठ पर अब भी नफरत लादे हुए थे.

पीछे खड़े आर्यन के चेहरे पर मुस्कराहट थी. नियति ने उसकी ओर देखा, और फिर उस धूल भरी सड़क की ओर जो उसके स्कूल को जाती थी. उसने अपना हिस्सा जीत लिया था, पर वह जानती थी कि असली लड़ाई तो अब शुरू होगी.

नियति ने अपना बैग सँभाला. हवा में घुली भाइयों की नफरत अब उसे प्रभावित नहीं कर रही थी. उसकी साँसों में आज़ादी तैर रही थी. उसने न केवल सिर्फ़ कानूनी लड़ाई जीती थी, बल्कि उस सामाजिक कलंक को भी अपने शरीर से अलग कर दिया था जो एक स्त्री को उसके शरीर के आधार पर परिभाषित करता है. आँगन अब भी वही था, पर उस पर उसके हिस्से के अधिकार की मुहर लग चुकी थी. वह उसकी जमीन ही जमीन थी.

रविवार, 4 जनवरी 2026

नई जनता बना लेंगे

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
कंप्यूटर मॉनिटर स्क्रीन पर नीली रोशनी फैली हुई थी. रिकार्डो की उंगलियाँ कीबोर्ड पर एक लयबद्ध ताल बजा रही थीं. उसके सामने, कोड की लाइनें एक जीवित प्राणी की तरह सरक रही थीं—“जीरो, इफ-एल्स लूप्स, न्यूरल नेटवर्क आर्किटेक्चर”. यह कोई साधारण प्रोजेक्ट नहीं था. इस प्रोजेक्ट में थिरेनियन सागर के मेडीसी द्वीप की सरकार अपने नागरिकों की सूची में से सरकार समर्थकों, सरकार विरोधियों और तटस्थ व्यक्तियों की पृथक सूचियाँ बनवा रही थी. फ़ाइल का नाम था: “ऑपरेशन_क्लीनस्लेट.पीवाई”.

"तुम्हारा एल्गोरिदम 'शोर' को 'सिग्नल' से अलग करने में कितना कारगर है, रिकार्डो?" एलेसेंड्रा की आवाज़ ठंडी और स्टील के ब्लेड सी तीखी थी.

"99.8 प्रतिशत," रिकार्डो ने बिना स्क्रीन से नज़र हटाए जवाब दिया. "यह सोशल मीडिया पोस्ट, लाइब्रेरी इश्यू रिकॉर्ड, ऑनलाइन गतिविधि और एसोसिएशन मैपिंग को क्रॉस-रेफरेंस करता है. अवांछित विचार पैटर्न को पहचानता है."

"अवांछित नहीं, रिकार्डो. जोखिम भरा," एलेसेंड्रा ने सुधारा. "हम एक स्वस्थ राजनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे हैं. गेहूँ में से कंकड़ अलग कर रहे हैं."

रिकार्डो ने सिर हिलाया. उसने खुद को यही समझाया था—यह सिर्फ़ डेटा था. बस आँकड़े. वे किसी को नुकसान नहीं पहुँचा सकती थीं.


पहली पायलट रन रिपोर्ट सुबह पाँच बजे आई. रिकार्डो ने कॉफ़ी का घूँट लिया और पीडीएफ़ खोला. पहले पन्ने पर एक ग्राफ़ था: "जोखिम स्कोर बनाम जनसंख्या घनत्व." वह आगे बढ़ा. नामों की सूची शुरू हुई.

नाम #127: एंटोनियो रोस्सी. कारण: 'क्रान्ति' शब्द का अत्यधिक उपयोग.

नाम #128: सोफिया कोंटे. कारण: विरोध प्रदर्शनों की फ़ोटो लाइक करना.

फिर नाम #129 आया.

एनरिको रोस्सी. आयु: 64. जोखिम स्कोर: 8.7/10.

रिकार्डो का दिल एक धड़कन के लिए रुक सा गया. उसकी सांसें अटक गईं.

कारण-

1. सार्वजनिक पुस्तकालय में साप्ताहिक उपस्थिति 95% (सामान्य से 400% अधिक).
2. पठन सामग्री: इतिहास, राजनीतिक सिद्धांत, नाटक. उप-श्रेणी: व्यंग्य.
3. स्थानीय नगर परिषद बैठकों में 12 बार प्रश्न पूछे गए.
4. ऑनलाइन खोज इतिहास में "जनतंत्र में जवाबदेही" शब्द समूह शामिल.

रिकार्डो ने माउस को स्क्रोल किया. स्क्रीन धुंधली हो गई. यह उसके पिता थे. इतिहास के सेवानिवृत्त प्रोफेसर. वह व्यक्ति जिसने उसे पढ़ना सिखाया था, जो उसे हर रविवार को पुस्तकालय ले जाता था.

उस रात रिकार्डो बिना बताए पिता के घर पहुँचा. ड्राइंग रूम में पुराने कागज़ और किताबों की गंध थी. एनरिको चश्मे के ऊपर से देखते हुए एक किताब पढ़ रहे थे.

"बेटा, इतनी रात को? कुछ हुआ तो नहीं?"

"नहीं पापा... बस... आप से मिलने आ गया."

रिकार्डो की नज़र डेस्क पर पड़ी एक फटी हुई, पीली पड़ चुकी किताब पर गई. —"जनता पागल हो गयी है — शिवराम."

"आप यह क्या पढ़ रहे हैं?" रिकार्डो ने पूछा, आवाज़ में एक कंपकंपी.

"अरे, एक पुराना भारतीय नाटक है. पचास साल पहले लिखा गया. लेखक का नाम है शिवराम, देख." पिता ने किताब खोली. एक पन्ना मुड़ा हुआ था, एक पैराग्राफ पर पेंसिल से गहरी रेखाएँ खिंची हुई थीं.

रिकार्डो ने पढ़ा:

"सरकार : मर जाने दो... हम और नई जनता बना लेंगे.

पूंजीपति: हाँ हम नई जनता बना लेंगे, और जनता चुन लेंगे..."

उसके शरीर में बिजली-सी दौड़ गई. यह वही शब्द थे जो एलेसेंड्रा ने इस्तेमाल किए थे—"नई जनता". पचास साल पहले एक भारतीय नाटककार ने भविष्यवाणी कर दी थी जो आज हकीकत बन रही थी.

"यह... यह क्या है, पापा?"

"इतिहास, बेटा. या शायद भविष्य का आईना. जब सत्ता जनता से डरने लगे, तो वह उसे बदलने की कोशिश करती है. तुम्हारा काम कैसा चल रहा है? तुम्हारा वह 'स्पेशल प्रोजेक्ट'?"

रिकार्डो ने जवाब नहीं दिया. वह केवल उस पन्ने को देखता रहा, जहाँ शब्द उसकी आँखों के सामने नाच रहे थे.

अगले दिन ऑफिस में, एलेसेंड्रा ने उसे कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाया.

"रिपोर्ट देखी? कल तक फाइनल लिस्ट चाहिए. प्रोडक्शन में डालनी है."

"एलेसेंड्रा... इस लिस्ट में... मेरे पिता का नाम है."

एलेसेंड्रा की आँखों में कोई हलचल नहीं हुई. "तो क्या हुआ? एल्गोरिदम तटस्थ है. इमोशनल बायस मत डालो."

"पर वे कोई खतरा नहीं हैं! वे सिर्फ एक शिक्षक हैं जो पढ़ना पसंद करते हैं!"

"पढ़ना खतरनाक हो सकता है, रिकार्डो. विचार संक्रामक होते हैं. अब तुम यह तय करो—क्या तुम इस प्रोजेक्ट के लिए कमिटेड हो या नहीं? तुम्हारा कोड, या तुम्हारी भावनाएँ?"

उस पल, रिकार्डो को पिता की किताब वाला पन्ना याद आया. "हम नई जनता बना लेंगे." वह एक मशीन नहीं था. वह एक इंसान था.

"मैं इसे ठीक कर दूँगा," उसने धीरे से कहा.

रात के दो बजे थे. रिकार्डो अकेला ऑफिस में था. स्क्रीन पर उसका कोड खुला हुआ था. उसने एक नई फ़ाइल खोली—"क्लीनस्लेट_फिक्स.पीवाई".

उसने एक फ़ंक्शन लिखा. नाम दिया: इनोसेंट_अंडर_स्कोर. यह फ़ंक्शन, मास्टर एल्गोरिदम चलाने से पहले, डेटाबेस में हर नाम के साथ एक छोटा, अदृश्य बिट जोड़ देगा. यह बिट, रिपोर्ट जनरेट होते समय, डेटा को ऐसे मिला देगा कि हर व्यक्ति का 'जोखिम स्कोर' एक सामान्य सीमा में दिखेगा. गेहूँ और कंकड़ का अंतर धुंधला हो जाएगा. पूरी फसल एक जैसी दिखेगी.

यह एक वायरस था, लेकिन नैतिकता का. एक डिजिटल विद्रोह.

उसने 'रन' बटन दबाया. प्रोग्राम चलने लगा. "सिलेक्टिंग न्यू पीपल... प्रक्रिया रद्द." फिर एक एरर मैसेज: "दूषित डेटा. कोई स्पष्ट पैटर्न नहीं."

रिकार्डो ने एक लंबी सांस ली. उसने सारा कोड, सारी फाइलें एक यूएसबी ड्राइव पर कॉपी कीं. फिर अपनी निजी मेल पर एक मेल ड्राफ्ट तैयार किया, जिसमें सभी फाइलें अटैच थीं.

रिसीवर: कुछ चुनिंदा पत्रकार. विषय: "ऑपरेशन क्लीन स्लेट: कैसे आपका देश आपको चुन रहा है."

सेंड बटन पर उंगली रखने से पहले, उसने अपने फोन से पिता को मैसेज किया: "पापा, आप ठीक कहते थे. कभी-कभी किताबें, कोड से ज्यादा ताकतवर होती हैं."

एक सप्ताह बाद, अखबार की सुर्खियाँ थीं: "बड़ा डाटा स्कैंडल: सरकारी ठेकेदार नागरिकों को 'रिस्क' के आधार पर चिन्हित कर रहा था!"

रिकार्डो अपने पिता के साथ पुस्तकालय में बैठा था. उनके सामने शिवराम का वही नाटक खुला हुआ था.

"तुमने जो किया, वह साहसिक था, बेटा," पिता ने कहा.

"मैंने सिर्फ एक बग ठीक किया, पापा. सिस्टम में नहीं... अपने अंदर के सिस्टम में."

बाहर, सूरज निकल रहा था. लोग सामान्य जीवन जी रहे थे, इस बात से अनजान कि उनके नाम एक डिजिटल सूची से हटा दिए गए हैं. रिकार्डो ने किताब के अंतिम पैराग्राफ को देखा, जहाँ जनता चिल्लाती है:

"मत भूलो जुल्म जब हद से गुजरता है तो मिट जाता है... जनता पागल हो गई है..."

उसने मुस्कुराते हुए पन्ना पलट दिया. असली नई जनता को बनाने की ज़रूरत नहीं थी. उसे बस पुरानी, सच्ची जनता को उसके मूल स्वरूप में रहने देने की ज़रूरत थी. और कभी-कभी, उसकी रक्षा के लिए, एक आदमी को अपने कोड में एक छोटा सा, नेक बग डालना पड़ता है.

शनिवार, 3 जनवरी 2026

रास्ता

 लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

अवनि उस रात के बाद कभी नहीं सो पायी. जिस रात डीजल पम्प की चौंधियाती रोशनी में उसकी बहन तारा को विक्रम सिंह के बेटे और उसके दोस्त उसे उठा कर पीछे जंगल में ले गए थे... फिर कुछ घंटों बाद न जाने कैसे वह घिसटते हुए सड़क तक पहुँची थी. पीसीआर वैन ने उसे अस्पताल पहुँचाया था. उस दिन के बाद से तारा की आँखें नाइट बल्ब की मद्धिम रोशनी को एक टक देखा करतीं — जैसे वह रोशनी ही अब उसकी एकमात्र गवाह हो, जो उसके जागते सवालों का जवाब दे सके. देखने वाले को पता नहीं लगता कि वह सो रही है या जाग रही है.

पुलिस दरोगा उसी पर सवाल दाग रहा था, "अच्छी लड़कियाँ शाम ढलने के बाद वहाँ क्यों जाती हैं?" मीडिया ने सुर्खी बनाई: "दोनों पक्षों में समझौते की बातचीत जारी." समाज ने... सिर्फ अपने कपाट बंद कर लिए.

तारा की एक दम चुप थी. उसकी यह चुप्पी अब एक जीवित, साँस लेता ज़ख़्म थी, जिससे हर पल नई पीड़ा रिस रही थी. उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक ऐसा शून्य था जिसने उसका होना ही उससे छीन लिया था. वह अब सिर्फ एक खोल थी, जिसकी आत्मा उसी डीजल पम्प की रोशनी में कहीं छूट गई थी.

पुलिस स्टेशन के सामने का नज़ारा देखकर अवनि और उसके पिता पत्थर हो गए. विक्रम सिंह का बेटा, गले में मालाएँ डाले, मीडिया के कैमरे के लैंस में अपनी आँखें डालकर कह रहा था—"यह मेरे खिलाफ राजनीतिक साजिश है." पीछे खड़े विक्रम सिंह की मुस्कुराहट में जीत का उल्लास सहज दिखाई दे रहा था.

उसी शाम, "शहर का सम्मान बचाना है" के नारे लगते हुए जुलूस निकला रहा था. उसमें वही सब चेहरे थे जो कभी लड़कियों के 'छोटे कपड़ों' पर टिप्पणी करते थे और वेलेंटाइन डे पर जोड़ों को पकड़ कर तंग करते थे. आज वे ही 'शहर के कथित भविष्य' को बचाने के 'महान कार्य' पर निकले थे.

घटना का बस एक गवाह मिला—बूढ़ा मास्टर राजन, जो उस रात सड़क किनारे अपनी साइकिल ठीक करवा रहा था. एकमात्र साहसी आवाज़ जिसने पुलिस को अपराधियों के नाम बताए. पर अदालत की पहली तारीख पर ही वह गायब था. अगले दिन अखबार के एक कोने में खबर थी: "वृद्ध शिक्षक अचानक बीमार हुआ, उसे विशेषज्ञों के पास भेजा गया."

अवनि समझ गई. यह गवाह की बीमारी नहीं थी, उसके लिए एक संदेश था, “वह चुप हो जाए, अपनी लड़ाई को यहीं समेट ले”.

साल दर बीतते गए. तारा की आँखों का खालीपन अब पूरे घर में फैल चुका था. पिता की नौकरी जा चुकी थी—"कंपनी की प्रतिष्ठा का सवाल जो था." माँ का शरीर रोज़ एक नया पीड़ा से पिराने लगा था. और अदालत का कमरा... वहाँ केवल पंखे की घरघराहट और कागज़ों की सरसराहट सुनाई देती थी. यह वह जगह थी जहाँ समय रुक जाता था, जहाँ हर तारीख एक नई कब्र बन जाती थी. एक श्मशान, जहाँ न्याय के शवों का अन्तिम-संस्कार धीमे-धीमे चलता ही रहता था. कभी-कभी अवनि को लगता, वह अपने ही भविष्य की कब्र खोदने आई है.

एक दिन, जमानत पर आजाद हुए आरोपी को अवनि ने एक विशाल राजनीतिक रैली में मंच से भाषण देते देखा. उसकी आवाज़ गूँज रही थी—"मैं युवा शक्ति का नेता हूँ, समाज का नया सवेरा लाऊँगा!" उसके साहस को ऊँचाइयाँ देने को जन-समुद्र गर्जना कर उठा था.

उसी रात, अवनि ने अपनी डायरी लिखना शुरू किया.

पहला पन्ना:

"हम वह समाज हैं जो बेटियों को गर्भ में ही मार दिया करते हैं, और बलात्कारी को गर्भनाल से ही पालते हैं — वे हमारे वंश के वृक्ष की जड़ें हैं, हम उन्हें काट नहीं सकते. हम वह समाज हैं जो धर्म के नाम पर खून तो बहा सकते हैं, लेकिन एक बेटी के आँसू पोंछने का धर्म — एक सनातन मानवीय धर्म — भूल चुके हैं."

उसने ये शब्द सोशल मीडिया के अपने सभी अकाउंट पर अपलोड किए. पहले कुछ घंटे सन्नाटा रहा. फिर एक आवाज़ ने दस्तक दी... फिर दस... फिर सैकड़ों की आवाज गूँजने लगी.

फिर वह दिन आया. राजन मास्टर अब व्हीलचेयर पर, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे. उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर हर शब्द लोहे की तरह था:

"मैंने देखा है. मैं घटना का आई विटनेस हूँ. और अगर इस नगर में अब भी कोई इंसान बचा है, तो उसे भी यह कहना होगा—'मैंने देखा है'. हम सब गवाह हैं. हमारी चुप्पी ही हमारा सबसे बड़ा अपराध है."

चुप्पी का बाँध अब टूट चुका था. अवनि अकेली नहीं थी. अनेक ताराएँ, अनेक राजन, अब एक मानव-श्रृंखला बनाकर खड़े थे.

अब उनके हाथों में आँसू बहाती मोमबत्तियाँ नहीं, मशालें थीं. उनकी लपटें न केवल अँधेरा लील रही थीं, बल्कि चुप्पी के बवंडर को भी उन्होंने जला दिया था. समाज का वह घिनौना मौन, जो किसी जघन्य अपराध से कम नहीं था, अब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर रहा था. न्याय अभी बहुत दूर था, पर उस तक पहुँचने वाला रास्ता अब बन रहा था — एक ऐसा रास्ता जो चुप्पी के जंगलों को चीरता हुआ, डर के दलदलों को पार करता हुआ, सीधे हमारे अपने घर के दरवाज़े तक आता था. लोग उसे लक्ष्य तक पहुँचाने को जुट पड़े थे. और एक भरोसा कि, इस बार, यह रास्ता टूटेगा नहीं.

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

तारों और न्यूरॉन्स के बीच

लघुकथा :  दिनेशराय द्विवेदी 
डॉ. आर्यन मिश्रा ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली और कम्प्यूटर स्क्रीन से नज़र हटाकर प्रोफेसर राजीव सेठ की ओर देखा. "सर, कल रात मैंने एक कहानी 'घिरनियाँ' पढ़ी. उसमें प्रोफेसर पात्र का वह कथन – 'सारे विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं' – मुझे मेरे न्यूरोसाइंस के शोध का सार प्रतीत हुआ."
प्रोफेसर सेठ मुस्कुराए. "तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे शोध के निष्कर्ष उस साहित्यिक कथन की वैज्ञानिक पुष्टि करते हैं?"

"बिल्कुल!" आर्यन उत्साहित हो गया. "हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स हैं, सर. ये आपस में करीब 1000 ट्रिलियन कनेक्शन बनाते हैं. यह आकाशगंगा के तारों से भी जटिल नेटवर्क है. और हर विचार..." आर्यन ने अपनी उँगलियों से हवा में एक जाल सा बनाया, "सिर्फ इन न्यूरॉन्स के बीच इलेक्ट्रोकेमिकल संकेतों का एक विशिष्ट पैटर्न है. बिल्कुल 'घिरनियाँ' कहानी के उस गियर सिस्टम की तरह, जहाँ एक घिरनी की गति दूसरी को चलाती है, और यह शृंखला एक विचार या क्रिया को जन्म देती है."

"विस्तार से समझाओ," प्रोफेसर ने कहा, अपनी कुर्सी पर आराम से बैठते हुए, उनकी आँखों में एक जिज्ञासु चमक थी. वे जानते थे कि आर्यन न सिर्फ़ एक होनहार शोधकर्ता था, बल्कि विज्ञान के दर्शन पर गहराई से विचार करने वाला दिमाग़ भी था.

आर्यन ने एक नोटबुक खोली, जिसमें रंग-बिरंगे डायग्राम और समीकरण भरे हुए थे. "देखिए सर, एक न्यूरॉन आराम की अवस्था में -70 मिलीवोल्ट पर होता है. जब उसे संकेत मिलता है, तो सोडियम आयन अंदर आते हैं – इस तरह डिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया आरंभ होती है. एक सीमा पार करते ही +40 mV एक्शन पोटेंशियल बनता है, जो एक विद्युत तरंग की तरह एक्सॉन के सहारे दौड़ता है. फिर एक समय के बाद पोटेशियम आयन बाहर जाने लगते हैं – इस तरह रिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, और न्यूरॉन फिर से आराम की अवस्था में लौट आता है. यही चक्र... यही भौतिक प्रक्रिया हर विचार, हर अनुभव, हर सपने की नींव है. जब आप अभी 'घिरनियाँ' शब्द सुन रहे हैं, तो आपके मस्तिष्क के वर्निके एरिया (Wernicke's Area) में न्यूरॉन्स का एक विशिष्ट समूह इसी तरह के इलेक्ट्रोकेमिकल तूफान से गुजर रहा है."

"प्रभावशाली," प्रोफेसर ने कहा, अपनी उँगलियों को एक पिरामिड की शक्ल में जोड़ते हुए. "पर कौशिक नामक वह छात्र जब पहली बार गियर को छूता है, तो उसे एक 'अहसास' होता है – एक आंतरिक झनझनाहट, एक जागृति. तुम्हारी FMRI और EEG मशीनें उस 'अहसास' को कैसे मापती हैं? क्या वह महज न्यूरल फायरिंग का एक और पैटर्न है, या कुछ और?"

आर्यन कुछ पल को चुप रहा, कॉफ़ी के मग को घूमता हुआ देखने लगा. "सर, हम न्यूरल एक्टिविटी के कोरेलेट माप सकते हैं. प्रेम के लिए ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन का स्राव, डर के लिए एमिग्डाला की सक्रियता, ध्यान के लिए प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स का दोलन... पर..."

"पर 'अहसास' स्वयं?" प्रोफेसर ने पूछा, अपनी आवाज़ को कोमल बनाते हुए. "वह 'मैं' जो इन रसायनों को 'अपना' अनुभव बताता है? वह घिरनी जो सभी घिरनियों के घूमने को देख रही है, और अपने घूमने को भी महसूस कर रही है? वह चेतना, जो इन सब भौतिक प्रक्रियाओं का साक्षी है – क्या वह भी एक घिरनी है, या घिरनियों के जाल से उपजी कोई नई, अदृश्य वास्तविकता?"

शाम की लाली खिड़की से उनके कमरे में घुस रही थी, दीवारों को एक नारंगी आभा से रंगते हुए. प्रोफेसर ने खिड़की की ओर इशारा किया, जहाँ आकाश धीरे-धीरे गहरा हो रहा था. "देखो, 'घिरनियाँ' कहानी सरल थी – एक गियर सिस्टम, एक कुएँ की घिरनी. पर उसका सिद्धांत गहरा था. आज तुम मुझे मस्तिष्क की घिरनियाँ दिखा रहे हो – न्यूरॉन्स, सिनैप्स, न्यूरोट्रांसमीटर. और बाहर... ब्रह्मांड की घिरनियाँ."

"सितारे?" आर्यन ने पूछा, उसकी नज़र भी अब खिड़की के बाहर टिक गई थी.

"हाँ. मिल्की वे में 100 से 400 अरब तक तारे हैं. हमारे दिमाग़ में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स. क्या यह महज संयोग है?" प्रोफेसर ने अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए. "या फिर जटिलता का एक सार्वभौम नियम है – कि जब भी अरबों इकाइयाँ आपस में जुड़ती हैं, तो कुछ 'नवीन' का उद्भव होता है? तारों के जाल से ग्रह और जीवन उभर आया... न्यूरॉन्स के जाल से... चेतना उभर आई? क्या यह सब एक ही महा-प्रक्रिया के विभिन्न स्तर हैं? जैसे फ्रैक्टल पैटर्न, जो हर स्केल पर खुद को दोहराते हैं?"

डॉ. आर्यन ने गहरी साँस ली. उसके मन में एक साथ कई विचार-घिरनियाँ घूमने लगी थीं. "तो आप कह रहे हैं कि चेतना, भौतिक प्रक्रियाओं का ही एक ऐसा उच्चस्तरीय गुण है, जिसे हम अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं? जैसे पानी के अणुओं की व्यवस्था से 'तरलता' का गुण उभरता है, वैसे ही न्यूरॉन्स की अत्यंत जटिल व्यवस्था से 'चेतना' उभर आती है?"

"हाँ," प्रोफेसर ने कहा, वापस अपनी कुर्सी की ओर मुड़ते हुए. "मैं यह नहीं कहता कि कोई गैर-भौतिक आत्मा है, जो मशीन में घुसी हुई है. मैं कहता हूँ कि भौतिकता ही इतनी जटिल, इतनी सुंदर हो सकती है कि वह... स्वयं को देखने लगे. 'घिरनियाँ' कहानी का वह प्रोफेसर सही था – “सभी विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं”. पर वह यथार्थ इतना विशाल, इतना गहरा है, इतना परस्पर जुड़ा हुआ है कि उससे 'चेतना' जैसा अद्भुत, रहस्यमय गुण उभर आया है. और शायद, हमारी यह चेतना ही उस यथार्थ को समझने की कोशिश कर रही है – यह एक दर्पण में दर्पण को देखने जैसा है."

आर्यन ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली, जो अब पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ. "शायद हमारा काम इस भौतिक यथार्थ को समझने की कोशिश जारी रखना है – एक स्तर से दूसरे स्तर तक. हर नया शोध, हर नया तथ्य... एक नई घिरनी शुरू करता है, जो दूसरी घिरनियों को चलाती है, और ज्ञान का एक नया चक्र आरंभ होता है. और शायद, एक दिन, हम उस अंतिम घिरनी तक पहुँच जाएँगे... या फिर पाएँगे कि घिरनियों का अंत ही नहीं है, बस अनंत संपर्क है."

"बिल्कुल," प्रोफेसर ने कहा, एक संतुष्ट मुस्कान के साथ. "और सबसे सुंदर बात यह है कि ये सभी घिरनियाँ – मस्तिष्क की, ब्रह्मांड की, विचारों की, भावनाओं की – आपस में जुड़ी हैं. हम स्वयं उस संपर्क का प्रमाण हैं. एक ऐसा बिंदु जहाँ ब्रह्मांड स्वयं को प्रतिबिंबित करने लगा है. तारों की धूल से बने इस शरीर में, तारों जितने ही न्यूरॉन्स घूम रहे हैं, और उनसे उपजी चेतना, तारों के रहस्यों को जानने की चाह रखती है. यह एक स्व-संदर्भित कविता है, आर्यन, और हम उसके शब्द हैं."

बाहर, पहला तारा टिमटिमाया – शायद वह भी कोई दूर का सूर्य था, जिसके चारों ओर ग्रह घूम रहे होंगे, और शायद किसी ग्रह पर कोई और प्राणी, किसी और प्रयोगशाला में, इसी पल न्यूरॉन्स और तारों के बीच के संबंध पर विचार कर रहा होगा. अंदर, उस शांत कमरे में, दो वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में, अरबों न्यूरॉन्स की घिरनियाँ एक नए, गहरे विचार को जन्म दे रही थीं. वही पुराना सिद्धांत था, पर एक नए, विस्तृत स्तर पर – कि सभी घिरनियाँ एक दूसरे से जुड़ी हैं, और हर घूर्णन, हर संपर्क, इस विशाल ब्रह्मांडीय ताने-बाने में एक थ्रेड है. और शायद, चेतना ही वह वह चमकदार धागा है जो इन सभी थ्रेड्स को एक सार्थक पैटर्न में बुनता है – अस्थायी रूप से, नाज़ुक रूप से, अद्भुत रूप से.

नोट : डॉक्टर मित्र Navmeet Nav को धन्यवाद करते हुए. इस कहानी के लिए तकनीकी जानकारी प्राथमिक रूप से उन्हीं के एक लेख से प्राप्त हुई हैं.

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बयान

'लघुकथा'  
: दिनेशराय द्विवेदी

अशोक ने अपनी कार रोकी. सामने घर के दरवाजे से वही मिट्टी का आँगन था, जहाँ उसकी लाड़ली भाँजी प्रिया दौड़ती हुई ‘मामा’ कह कर उसके दौड़ती हुई उसके गले लग जाती थी. आज वह आँगन सूना था. सोलह साल की प्रिया, नर्स बनने का सपना देखने वाली. अब केवल एक पुलिस फाइल, एक पोस्टमार्टम नंबर और तालाब किनारे चाक से खींची गई रेखा हो कर गयी थी. वह भांजी की वीभत्स मृत्यु से दुःखी अपनी बहिन के दुःख और दर्द को बाँटने को आया था.

अंदर आंगन में पहुँचने पर जीजा शिवदीन की निगाहें उस पर पड़ी. उसने देखा, वे बिलकुल टूटे हुए लग रहे थे. उनकी आँखों में कोई आशा नहीं, बस एक गहरी थकान थी. कमला दीदी चूल्हे के पास बैठी थीं. उसे देखते ही उनकी रुलाई फूट पड़ी. क्षण भर में ही उसकी तीव्रता ने अशोक का मन चीख उठा. वह दौड़ कर कमला दीदी के पास पहुँचा और उसे अपने सीने से चिपका लिया. बमुश्किल चार-पाँच मिनट रो लेने के बाद दीदी के मुहँ से बोल निकले, “तेरी प्यारी प्रिया चली गयी”. वह देर तक कमला को ढाढ़स दिलाता रहा. फिर जीजा के पास जाकर बैठा.
"जीजा, आप बताइए... सब कुछ, "अशोक ने नोटबुक खोली.

"क्या बताएँ, बेटा?" शिवदीन की आवाज़ टूटी हुई थी. "हमने मना किया था. उम्र थी उसकी... पंद्रह साल से ज्यादा का फर्क. ब्याहता था वो आदमी. पर बेटी कहती थी — 'बाबू, वह मेरी मदद करेगा. पढ़ाएगा. शहर ले जाएगा.' हम क्या कहते? हमारी हैसियत में सपने देखना भी पाप होता है?"

कमला दीदी ने अचानक फुसफुसाकर कहा, "उस... उस रंजन साहब के घर की औरत... उसने प्रिया को गली में रोक-रोक कर डाँटा था. कहा था — 'अपनी औकात याद रखो. हमारे घर की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत?'

अशोक ने अपनी डायरी में नोट किया: 'प्यार का झाँसा? नहीं. जाति और सत्ता का हथियार.'


अगला पड़ाव सरोज थी, प्रिया की सहेली. उससे गाँव से दूर, एक सूखे पेड़ के नीचे मुलाकात हुई. सरोज की आँखों में डर का साया था.

"सरोज, मुझ पर भरोसा करो. मैं तुम्हारा रिश्तेदार हूँ, और वकील भी."

सरोज ने गहरी साँस ली. "उस रात... हम दोनों गए थे. मैं पीछे रुक गयी थी. प्रिया कुछ दूर पेड़ों के झुरमुट में बैठ बातें करने ही लगे थे. अचानक पाँच लोग आ गए... करन चाचा सबके आगे थे."

"करन? पंचायत वाले?" अशोक ने पूछा.

"हाँ. वे चिल्लाए, 'हमारी बहन-बेटियों को भ्रष्ट करोगे? इस गाँव की मर्यादा मिट्टी में मिला दोगे?' फिर... मारना शुरू कर दिया. दोनों को."

सरोज की आवाज़ लड़खड़ा गई. "प्रिया के सिर पर... करन चाचा ने खुरपी से वार किया. वह चीखी... और फिर गिर गई. खून... बहुत खून था."

"फिर?" अशोक ने कोमलता से पूछा.

"फिर..." सरोज ने आँखें मूँद लीं, जैसे उस दृश्य को भगाना चाहती हो. "जब वह बेहोश पड़ी थी... तब... उनमें से दो... महेश और बलवंत... उन्होंने उसे... छुआ. उसके कपड़े... फाड़े. मैं दूर झाड़ियों में छिपी थी... रो भी नहीं सकी. सब देखा. फिर वे सब, खुसर-फुसर करते हुए, चले गए. रंजन साहब वहीं ज़मीन पर बैठे थे... डरे हुए, काँपते हुए."

अशोक का दिल ज़ोर से धड़का. पुलिस रिपोर्ट में बलात्कार का जिक्र तक नहीं था. यह सामूहिक हिंसा का चरम, 'मर्यादा' के नाम पर किया गया सामूहिक अधिकार जताना था. उसने डायरी में नोट किया: 'मर्यादा = सामूहिक हिंसा + सामूहिक बलात्कार का बहाना.'

"तुमने पुलिस को यह क्यों नहीं बताया, सरोज?"

"कौन सुनता?" सरोज की आँखों में आँसू आ गए. "करन चाचा कहते, अगर किसी ने मुँह खोला, तो उसका वही हाल होगा. और पुलिस... पुलिस तो उनकी ही सुनती है."

अशोक समझ गया. पुलिस बलात्कार से इनकार कर रही थी क्योंकि आरोपी 'गाँव के सम्मानित' लोग थे. प्रिया का शोषण शुरू हुआ था एक सवर्ण पुरुष के झाँसे से, और पूरा हुआ था गाँव के दंबंगों की सामूहिक क्रूरता से. और अंत में, रंजन ने, उस सामूहिक हिंसा के बाद, सिर्फ अपने बचाव के लिए, उसी लड़की का गला घोंट दिया जिससे वह 'प्यार' करने का नाटक करता था. शव तालाब में फेंक दिया, जैसे कोई कूड़ा.


उस रात, अशोक का छोटा सा कार्यालय रोशनी से जगमगा रहा था. दीवार पर प्रिया की एक धुंधली सी तस्वीर टंगी थी. उसके सामने तीन कॉलम बने थे:

पहला ¬: रंजन: छल, शोषण, हत्या.
दूसरा : करन और गिरोह: सामूहिक हिंसा, सामूहिक बलात्कार (छिपाया हुआ), धमकी.
तीसरा : पुलिस जानबूझकर लापरवाही, सबूत दबाना.

वह जानता था, कोर्ट में सिर्फ पहला कॉलम ही चलेगा. दूसरा गाँव की सामूहिक चुप्पी और डर में दफन रहेगा. तीसरा सिस्टम की लाचारी कहलाएगा.

तभी उसकी नज़र अपनी पुरानी पत्रकारिता की डायरी पर पड़ी. पहले पन्ने पर लिखा था: "सच कोई तथ्य नहीं, एक प्रतिबद्धता है."

उसने फोन उठाया. राहुल का नंबर डायल किया, वह उसका पुराना साथी था, अब एक बड़े अखबार का निर्भीक एडिटर.

"राहुल, तैयार हो जाओ."

"क्या हुआ, अशोक? फिर किसी केस में उलझ गए?"

"यही समझ लो.”

“इस बार मेरी खुद की भांजी का मामला है.”

"क्या?

"सच का जिसे दफनाने की पूरी कोशिश हुई है. एक दलित लड़की के सपनों, उसके शोषण और उसकी हत्या का. और सिर्फ एक इंसान की नहीं... एक पूरे तंत्र की हत्या का."

फोन के दूसरे छोर पर एक पल की चुप्पी थी. फिर राहुल की आवाज़ आई, दृढ़ और स्पष्ट.

"बताओ क्या करना है?"

"मैं रिपोर्ट भेजता हूँ.

...........

अशोक ने प्रिया की तस्वीर की ओर देखा. वह अब केवल एक वकील नहीं था. वह कमला दीदी और जीजा शिवदीन के दर्द, सरोज के डर, और अपने ही समुदाय के अपमान का जीता-जागता साक्षी था. उसे अब खुद उस सिस्टम से लड़ना होगा, जो जाति के नाम पर हिंसा को अनदेखा कर देता है.

उसने कलम उठाई. शिकायत का मसौदा शुरू किया. पहली पंक्ति लिखी:

"यह केवल एक हत्या का मुकदमा भर नहीं होगा. यह सदियों पुरानी सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ, एक साक्षी का बयान होगा..."