पेज

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

कटघरे में झूठ

देहरी के पार, कड़ी - 30
19 अप्रैल, 2019 शुक्रवार.

असिस्टेंट सैक्रेटरी लेबर (ASL) के कार्यालय का सुनवाई वाला इजलास आज छोटा लग रहा था. आगे की दो बैंचों को छोड़कर बाकी सभी पर मजदूर बैठे थे. यहाँ तक कि इजलास की बैंचों के दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर जो तीन-तीन फुट के करीब स्थान था उसमें भी मजदूर खड़े थे. इजलास के बाहर की गैलरी और उसके आगे जो खुली जगह थी वहाँ सभी ओर मजदूर ही मजदूर थे. आगे दो बैंचों में से दायीं ओर की बैंचों पर प्रबंधन के गवाह, फैक्ट्री का लीगल मैनेजर, वकील मनोज भट्ट और उसके दो सहायक थे. बायीं और की बैंचों पर वकील रमेश चव्हाण, एक सहायक और दूसरे सहायक के रूप में प्रिया अपने वकील वाले आउट फिट में, , प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष, सचिव बैठे थे. वकील रमेश चव्हाण अपनी फाइलों के साथ जिरह के लिए एकदम तैयार थे. प्रिया का दिल आज एक अलग ही लय में धड़क रहा था. यह डर नहीं, बल्कि उस सच को बाहर लाने का रोमांच था जिसे उसने दस्तावेजों के ढेर से खोद निकाला था. इजलास में उपस्थित लोगों की आपसी बातचीत से हॉल में मधुमक्खियों के झुंड जैसी आवाज गूंज रही थी.

एएसएल ने कमरे में प्रवेश करते ही यह आवाजों की गूंज थम गई. एएसएल कुर्सी पर बैठे, कार्यवाही शुरू हुई. “मिस्टर भट्ट आपके गवाह तैयार हैं.” एएसएल ने पूछा.

“हाँ बिलकुल तैयार हैं.” मिस्टर भट्ट ने कहा, और फैक्ट्री के जनरल मैनेजर (GM) को इशारा किया वह कटघरे में आकर खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर वही पुराना आत्मविश्वास था, जो फैक्ट्री में और पिछली कई सुनवाइयों से मजदूरों को डराने के काम आता रहा था.

वकील चव्हाण ने जिरह शुरू की. शुरुआती सवाल सामान्य थे, जैसे प्रबंधन को ढीला छोड़ने की रणनीति हो. उन्होंने इन सवालों के जवाबों से यह स्थापित कर लिया कि फैक्ट्री में सिलिकॉन वेफर्स कच्चे माल के रूप में काम में लिए जाते हैं. और कारखाने के कामों में जो भी काम किए जाते हैं उनके लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत बिजली है. यहाँ तक कि बिजली चले जाने जैसी आपात स्थितियों के लिए कारखानों में दो डीजल जनरेटर स्थापित हैं जो काम कर रहे हैं.

अचानक चव्हाण साहब ने एसीएल से उनकी केस फाइल ली और उसमें से गवाह का शपथ-पत्र निकाल कर पूछा, "मिस्टर जीएम, यह आपका शपथ पत्र है आपने इसके पैरा 4 में कहा है कि पिछले तीन महीनों से कच्चा माल, विशेषकर सिलिकॉन वेफर्स की वैश्विक कमी के कारण उत्पादन पूरी तरह ठप है. क्या यह सही है?"

जीएम ने गला साफ किया, "जी, बिल्कुल सही है. माल ही नहीं था तो फैक्ट्री में उत्पादन कैसे होता?"

चव्हाण साहब ने एक ग्राफ एएसएल की मेज पर रखा, "देखिए मिस्टर जीएम यह दस्तावेज आपके उद्योग के स्टॉक का ही ग्राफ है?”

“जी हाँ, यह हमारे ही स्टॉक का ग्राफ है.”

“इस ग्राफ में मार्च 2019 के क्लोजिंग स्टॉक में सिलिकॉन वेफर्स की 5,000 यूनिट्स का बैलेंस दिख रहा है, उसका क्या हुआ? क्या वह हवा में गायब हो गया?”

सवाल सुन कर जीएम के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आई, गला सूख गया, हालाँकि एसीएल का इजलास पूरा एयरकंडीशंड था. उसने जेब से रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा और अपने सहायक को इशारा किया कि उसे पानी लाकर दे.

सहायक के पास टेबल के नीचे ही पानी की बोतल रखी थी. लेकिन या तो उसे उसकी याद नहीं आई, या फिर वह अधिक समय लेना चाहता होगा. उसने तुरन्त अपने साथ के एक क्लर्क को पानी लाने को कहा. क्लर्क तुरन्त उठकर पानी लेने बाहर भागा. चव्हाण के सहायक ने जीएम के सहायक को इशारा किया कि उनकी पानी की बोतल टेबल के नीचे रखी है. जीएम का सहायक सकपका गया. उसने टेबल के नीचे से पानी की बोतल निकाल कर जीएम को दी. जीएम ने पानी के चार-छह घूँट गले से नीचे उतारे. वे फिर सवालों के जवाब देने को तैयार थे.

चव्हाण ने एक और चार्ट फाइल से निकाल कर जीएम को दिखाया. “देखिए, क्या यह बिजली की खपत का चार्ट आपकी फैक्ट्री का ही है?”

“जी, हाँ हमारी फैक्ट्री का ही है.” जीएम ने उत्तर दिया.

“गौर से देखिए, क्या यह सही है कि, इसमें फैक्ट्री की मार्च 2019 में बिजली खपत जनवरी और फरवरी की बिजली खपत से कुछ अधिक ही दर्ज है?”

“जी, सही है.”

“तो फिर, आप अदालत को समझाएँ, कि यदि उत्पादन ठप था, तब भी मार्च 2019 में फैक्ट्री की बिजली की खपत 'पीक' पर कैसे थी? क्या आपकी मशीनें बिना उत्पादन के ही बिजली पी रही थीं?"

जीएम के माथे पर पसीने की पहली बूंद चमकी. उनके वकील, मनोज भट्ट ने आपत्ति जताने की कोशिश की, लेकिन एएसएल ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया.

चव्हाण साहब ने आवाज़ और बुलंद की, "हुज़ूर, असलियत यह है कि उत्पादन बंद नहीं था. उत्पादन को 'ऑफ द रिकॉर्ड' किया जा रहा था. यह साइफनिंग ऑफ स्टॉक (Siphoning of Stock!) है. तैयार आईसी (IC) को 'वेस्ट डिस्पोजल' के फर्जी बिलों के नाम पर फैक्ट्री से बाहर भेजा गया और मुनाफे को शेल कंपनियों में डाइवर्ट किया गया. यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसे 'क्रिएट' किया गया है ताकि इन 350 मजदूरों की 'फेयर वेजेज' की मांग को कुचला जा सके."

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया. एएसएल ने चश्मा उतारकर जीएम की ओर देखा, "मिस्टर जीएम, क्या आपके पास बिजली के इन बिलों और गायब हुए 5,000 वेफर्स का कोई तार्किक जवाब है?"

जीएम अपने वकील की ओर देखने लगे, लेकिन भट्ट साहब खुद फाइलों में कुछ ढूंढने का नाटक कर रहे थे. प्रिया ने गौर किया कि जीएम के हाथ कांप रहे थे.

चव्हाण साहब ने अंतिम प्रहार किया, "हुज़ूर, यह मामला केवल क्लोजर का नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक अपराध और Siphoning of Funds का है. प्रबंधन ने पिछले तीन साल से अकाउंट्स को दूषित किया है ताकि मजदूरों को उनके स्वाभिमान की कीमत न चुकानी पड़े."

एएसएल ने गंभीर मुद्रा में नोटिंग की और आदेश दिया, "मैनेजमेंट सोमवार तक इन विसंगतियों पर चाहे तो अपना लिखित स्पष्टीकरण पेश कर सकता है."

कोर्ट रूम से बाहर निकलते समय मजदूरों ने चव्हाण साहब और प्रिया को घेर लिया. रामजी काका की आँखों में आँसू थे. उन्होंने प्रिया के सिर पर हाथ रखा, "बिटिया, आज तुम्हारी मेहनत ने उन चूल्हों में फिर से आग जला दी है जो बुझने वाले थे."

“नहीं काका, यह मेरी अकेले की मेहनत नहीं है. इसमें राहुल, स्नेहा और आदित्य का भी बराबर का योगदान है.”
... क्रमशः

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

आँकड़ों के पीछे

देहरी के पार, कड़ी - 29
वकील रमेश चव्हाण के ऑफिस से बाहर निकलकर प्रिया ने देखा कि घड़ी में साढ़े नौ बज रहे हैं. घर जाकर खाना बनाने में ग्यारह बज जाएंगे. वहाँ से ऑटो पकड़कर वह एमबी (मेवाड़ भोजनालय) पहुँची. रामजी काका काउंटर पर ही मिल गए. डिनर का पीक टाइम था. दोनों हॉल खचाखच भरे थे. उसने स्थिति देखकर कहा, “काका, आज बहुत भागदौड़ हो गयी है. सुबह एएसएल का ऑफिस, फिर अपना ऑफिस, फिर चव्हाण साहब के यहाँ. अब इन्तजार करना मुश्किल है. आप खाना पैक करवा दो.”

“बिटिया, तुम्हारे लिए एमबी में हमेशा जगह है. तुम्हें पता है पीछे यहाँ काम करने वालों का रेस्टरूम है, इस वक्त खाली है तुम वहाँ पहुँचो, मैं वहीं खाना लगवाता हूँ. बस बता दो क्या खाओगी?”

भोजन की व्यवस्था ऐसे होगी. प्रिया ने सोचा नहीं था. वह भोजन करके सीधे अपने फ्लैट पहुँची. शरीर की थकान कह रही थी कि वह कपड़े बदले बिना ही सो जाए. लेकिन दिमाग कहता था कि एक बार सरसरी तौर पर शपथ पत्र और उनके साथ पेश किए दस्तावेज देख लिए जाएँ, जिससे उन पर सोचने की प्रक्रिया आरंभ हो ले. वह जानती थी कि दिमाग कभी विश्राम नहीं करता. सोते समय वह मेमोरी को संगठित करके पक्का (Memory Consolidation) करता है. दिन भर की जानकारियों को छांटता है. जरूरी बातें लॉन्ग-टर्म मेमोरी में भेजता है और फालतू चीजें हटा देता है. इसके अलावा वह नींद में भी सक्रिय रूप से समस्याओं और प्रश्नों के समाधान तलाशता है.

प्रिया ने शपथ पत्र पढ़े और साथ के साथ जहाँ उनमें दस्तावेजों का उल्लेख आता गया वह दस्तावेजों को भी संदर्भ के साथ देखती गयी. रात बारह बजे बाद जब वह सोने गई तब उसके दिमाग में पूरा ख़ाका बन गया था कि प्रबंधन इनसे क्या साबित करना चाहता है. अब उसके दिमाग में प्रश्न था कि उसे कौनसी सूचनाएँ तलाशनी चाहिए जिनसे वह प्रबंधन के मुद्दों को असिद्ध कर सके और श्रमिक पक्ष को सिद्ध कर सके. इसी प्रश्न को जेहन में लिए उसे नींद आ गई.

पूरे सात घंटे की नींद लेकर सुबह सवा सात बजे उसकी नींद खुली. नित्य की तरह दो गिलास पानी पीकर उसने गैस पर चाय के लिए पानी चढ़ाकर, मंजन करते करके उसे ध्यान आया कि फैक्ट्री इलेक्ट्रॉनिक सर्किट (IC) बनाती है, इसलिए यहाँ काम आने वाला कच्चा माल सिलिकॉन वेफर्स और फोटोरेसिस्ट केमिकल्स जैसे संवेदनशील सामान की हेरफेर को पकड़ना ही प्रबंधन को बेनकाब करने का रास्ता हो सकता है. आज यदि वह सुबह का नाश्ता एमबी में करे तो उसे समय मिल जाएगा. जिसमें वह कल मिले दस्तावेजों की सामग्री को डिजिटल डाटा में बदल सकती है. इस डाटा और शपथ पत्रों की प्रतियों को वह राहुल, स्नेहा और आदित्य को भी दे दे तो वे भी कोई काम की चीज तलाश सकते हैं. इससे आज की शाम चार लोग काम करके कुछ न कुछ ऐसा जरूर तलाश सकते हैं जो प्रबंधन के गवाहों के लिए सरप्राइजिंग हो और जिससे क्लोजर के आधार को मिथ्या सिद्ध किया जा सके. उसने यही किया. उस शाम चारों ने एमबी से अपना डिनर पैक करवाया और घर जाकर इस काम में जुट गए.

रात दस बजे आदित्य की वीडियो काल आई, उसने चारों को कॉन्फ्रेंस पर ले रखा था.

“ईसीआई फैक्ट्री के 'इन्वेंट्री डेटा' और 'परचेज़ लेज़र' के डाटा को एक साथ खोल कर देखो.” आदित्य ने कहा.

तीनों ने अपने लैपटॉप पर इन्हें खोला.

“अब शपथ पत्र से इन्हें मिलाकर देखो.”

प्रिया ने मिलान करके देखा तो वह उछल पड़ी. वहाँ जीएम के शपथ-पत्र में लिखा था, 'सिलिकॉन वेफर्स' की वैश्विक कमी के कारण उत्पादन ठप पड़ा है. लेकिन मार्च के 'स्टॉक रजिस्टर' 5,000 यूनिट्स का ओपनिंग बैलेंस दिखा रहा था. उधर अप्रैल की शुरुआत में कोई 'सेल्स एंट्री' नहीं थी. अगर माल नहीं बना, तो ये वेफर्स कहाँ गायब हो गए थे?"

“ये तो बहुत जबर्दस्त बात है. मैं नोट कर रही हूँ.”

“इसके आगे कुछ और भी है,” आदित्य ने कहा. “प्रिया, IC बनाने में इस्तेमाल होने वाले फोटोरेसिस्ट रसायनों की शेल्फ-लाइफ बहुत कम होती है. हड़ताल के कारण फैक्ट्री में तो उत्पादन बंद था. फिर पिछले हफ्ते इन महंगे रसायनों को 'डिस्पोज' करने का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं है? फैक्ट्री में चोरी छिपे तो उत्पादन हो नहीं सकता. मजदूर गेट से चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं. यह माल जरूर कहीं और डाइवर्ट किया जा रहा है."

“तुम ठीक कह रहे हो आदित्य. सुबह चव्हाण साहब को बताते हैं. किसी और के पास और कुछ न हो तो अब काम बन्द करके सोने जाया जाए?”

“हाँ बिलकुल.” सबने उत्तर दिया. कॉन्फ्रेंस समाप्त हुई.

अगली सुबह जयपुर से आकाश का फोन आया. वह पिछले दो दिनों से कोटा में प्रिया के घर के आसपास ही था. उसने बताया कि वह काली संदिग्ध गाड़ी अब वहाँ नहीं दिख रही है. आकाश ने मयंक और पापा को स्थानीय पुलिस स्टेशन ले जाकर 'सर्विलांस' की अनौपचारिक शिकायत दर्ज करवा दी थी.

आकाश ने प्रिया को ढाढस बंधाया, "प्रिया, यहाँ अब सब शांत है. मयंक अब डरा हुआ नहीं है, बल्कि वह उन जासूसों की फोटो खींचने की ताक में है. तुम मुंबई की इस कानूनी लड़ाई पर ध्यान दो. कल 19 अप्रैल का दिन तुम्हारा होना चाहिए."

उस शाम, प्रिया ऑफिस से लौटते हुए यूनियन ऑफिस पहुँची, वहाँ उसने देखा कि रामजी काका और प्रशांत बाबू कुछ पर्चियों का मिलान कर रहे थे. यह हड़ताल का 38वां दिन था और मजदूरों के सब्र का बाँध अब टूटने को था.

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराकर प्रिया को बताया, "आइडिया (IIDEA) से जुड़ी अन्य यूनियनों ने हमारे 350 परिवारों के लिए रसद का इंतजाम किया है. आज रात दस बजे बाद अनाज के बीस-बीस किलो के कट्टे मजदूरों के घरों तक पहुँचना शुरु हो जाएंगे."

रामजी काका ने भावुक होकर कहा, "बेटा, पेट की आग बड़ी जालिम होती है. प्रबंधन ने सोचा था कि भूख हमें घुटनों पर ले आएगी, पर अब कल तुम जब कॉमरेड चव्हाण के साथ अदालत में खड़ी होगी, तब इन 350 परिवारों की एकता की तुम्हारे साथ होगी."

कुछ ही देर बाद वकील रमेश चव्हाण वहाँ पहुँच गए. प्रिया ने 19 अप्रैल के लिए उनके सामने अपना नोट रख दिया जिसमें तीन मुख्य सवाल थे:

1. यदि उत्पादन बंद था, तो क्लीन रूम (Clean Room) को मेंटेन करने के लिए बिजली की खपत 'पीक' पर क्यों थी?

2. स्टॉक रजिस्टर से गायब हुए 5,000 सिलिकॉन वेफर्स का विधिक स्पष्टीकरण क्या है?

3. क्या 'वेस्ट डिस्पोजल' के नाम पर असल में तैयार IC को फैक्ट्री से बाहर भेजा गया?

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की लाइटें जल रही थीं. उसे यकीन हो गया कि कल की जिरह केवल एक विधिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की स्थापना होगी जिसे प्रबंधन ने फाइलों के नीचे दबा रखा था.
... क्रमशः

रविवार, 19 अप्रैल 2026

कानूनी बिसात

देहरी के पार, कड़ी - 28
मंगलवार, 16 अप्रैल, 2019.

सुबह के 11 बज चुके थे. एएसएल (Assistant Secretary Labour) के दफ्तर में आज का माहौल पिछली पेशी से भी ज्यादा तनावपूर्ण था. करीब सवा सौ मजदूर. दफ्तर के अहाते में खड़े थे. वकील चव्हाण, प्रशांत बाबू , प्रिया, और यूनियन के अध्यक्ष व सचिव एएसएल के इजलास में सुनवाई शुरू होने का इन्तजार कर रहे थे. कंपनी की टीम, उनका वकील और उसके सहायक अभी तक नहीं आए थे और असिस्टेंट सेक्रेटरी भी अभी अपने चैंबर में थे.

प्रिया कल रात आकाश से कोटा के अपडेट लेती रही थी, आज थोड़े कम उत्साह में थी. लेकिन उसकी आँखों में जिद और संकल्प वैसे ही थे. घर की देहरी लांघने के बाद के संघर्ष ने उसे अनेक नए पाठ सिखाए थे. वह जानने लगी थी कि संघर्ष में साथ और एकता जरूरी चीजें हैं. उसके संघर्ष में लोगों ने उसका साथ दिया था क्योंकि वे एक जैसे लोग थे; उनके संघर्ष एक थे. आज उसे मजदूरों की बड़ी एकता में अपना योगदान करना था. यही एकता उन्हें मजबूत और भयमुक्त बनाती थी. आकाश कल रात कोटा पहुँच गया था और उसने बताया था कि वह गाड़ी 'स्थानीय' नहीं थी. आकाश की उपस्थिति और जानकारियों से मयंक अब थोड़ा राहत महसूस कर रहा था.

कंपनी की टीम अपने वकील के साथ सवा ग्यारह के बाद इजलास में दाखिल हुई. उन्हें देख कर रीडर ने एएसएल को सूचना दी. दस मिनट बाद वह इजलास में था.

जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, एएसएल ने कड़क लहजे में पूछा, "मिस्टर भट्ट, पिछली पेशी पर हर्जाने की शर्त के साथ आपको आज शपथ पत्र (Affidavits) और उनकी कॉपियाँ यूनियन को देनी थी. क्या वे तैयार हैं?"

प्रबंधन के वकील, मनोज भट्ट ने एक भारी फ़ाइल मेज पर रखी, "जी हुज़ूर, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से हम केवल मुख्य डायरेक्टर का ही शपथ पत्र तैयार कर पाए हैं. बाकी दो के लिए हमें थोड़ा और समय चाहिए."

वकील चव्हाण तुरंत अपनी जगह से खड़े हुए, "सर! यह साफ़ तौर पर 'डिले टैक्टिक्स' है. 14 मई की डेडलाइन नजदीक है और ये जानबूझकर मामले को खींच रहे हैं. पिछली बार का 10 हजार रुपये का हर्जाना भी इन्होंने अदा नहीं किया है."

एएसएल ने जीएम की ओर देखा, जो पसीना पोंछ रहे थे. "मिस्टर जीएम, कानून किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. आप क्लोजर का आवेदन लेकर आए हैं. साढ़े तीन सौ से अधिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी दाँव है. मुझे 60 दिन पूरे होने से पहले अपने फैसले की कॉपी आपके हाथ में देनी है. आज 32वाँ दिन है मेरे पास सुनवाई के लिए 25 दिन भी नहीं बचे हैं. मुझे निर्णय देना है. मैं ढाई बजे फिर बैठूंगा. तब तक सभी गवाहों के शपथपत्र यहाँ रिकॉर्ड पर होने चाहिए और उनकी कॉपियाँ चव्हाण साहब के पास. हर्जाना अदा किया हुआ होना चाहिए.”

“जी", एएसएल की बात को अब तक चुपचाप सुन रहा प्रबंधन का वकील बोला. “हम ढाई बजे यहाँ होंगे हुजूर. तब हम जो भी शपथ पत्र हमें पेश करने हैं पेश कर देंगे.”

प्रबंधन की टीम इतना कहकर दफ्तर से बाहर निकल आई.

“चव्हाण सर.” प्रिया बोली. “अब आज केवल शपथ पत्र ही आएंगे. जिरह के लिए संभवतः शुक्रवार की पेशी दी जाएगी. आज मेरा कोई काम नहीं है. अभी 12 नहीं बजे हैं. मैं आधे घंटे में अपने ऑफिस पहुँच जाउंगी. मैं आज की छुट्टी बचा सकती हूँ?”

“हाँ, तुम जा सकती हो. आज शपथ पत्र आ जाएंगे. तुम अपने ऑफिस से निकलो तो मेरे ऑफिस होते हुए घर जाना. मैं वहाँ तुम्हें शपथ पत्रों की प्रतियाँ दे दूंगा. तुम उस पर अपनी रिसर्च शुरू कर सकती हो.”

“जी सर, मैं शाम में आपके ऑफिस आती हूँ.” इतना कहकर प्रिया तेजी से वहाँ से निकल गई.

...

अपने ऑफिस से निकलकर रात साढ़े आठ बजे प्रिया चव्हाण साहब के ऑफिस पहुँची. चव्हाण साहब के चैंबर में कोई और मुवक्किल बैठा था. प्रशांत बाबू बाहर उनके वेटिंग रूम में मिल गए. प्रिया ने उनसे पूछ लिया, “ढाई बजे क्या रहा?”

“ज्यादा कुछ नहीं, उन्होंने तीन शपथ पत्र और कुछ दस्तावेज पेश किए हैं. दस हजार रुपए हर्जे के अदा किए हैं. चव्हाण साहब ने तुम्हारे लिए उनकी कॉपियाँ करवा दी हैं. तुम ले लेना जिससे तुम उनकी खोजबीन कर सको.” प्रशांत बाबू ने बताया.

“और हाँ, पेशी होने के बाद हम लोग बाहर निकले तो प्रबंधन के वकील का जूनियर बाहर ही खड़ा था. उसने बताया कि जीएम साहब और वकील भट्ट कैंटीन में ही बैठे हैं, आपसे बात करना चाहते हैं. हम कैंटीन में गए. वहाँ उनसे बात हुई.”

“क्या कुछ पॉजिटिव बात हुई?”

प्रशांत बाबू मुस्कुराते हुए बताने लगे. “भट्ट ने मुझे कहा कि, “प्रशांत बाबू, क्यों न हम इस मामले को बाहर ही सुलझा लें? क्लोजर तो होकर रहेगा, लेकिन अगर आप और आपके वकील साहब मान जाएँ, तो हम मजदूरों के मुआवजे में थोड़ी बढ़ोतरी कर सकते हैं. आखिर कब तक ये लोग भूखे पेट पिकेटिंग करेंगे?"

“मैंने उनसे पूछा था कि, ‘यदि मजदूर क्लोजर को मान लें तो वे कितना मुआवजा और दे सकते हैं?’ तो वह बता रहा था कि वे सामान्य छंटनी के मुआवजे से दुगना दे सकते हैं.”

“फिर आपने क्या कहा?” प्रिया ने पूछा.

“मैंने कहा, ‘एक तो क्लोजर को मानने का फैसला हम नहीं बल्कि मजदूर उनकी आमसभा में लेंगे. दूसरा यह कि मुश्किल है कि मजदूर इतने मुआवजे पर क्लोजर को मान ले. हमें मजदूरों की आमसभा में उनकी राय लेनी पड़ेगी.’ मेरे इतना कहने पर वे कहने लगे ‘आप अगली पेशी के पहले आमसभा करके हमें बता सकते हैं’ इस पर मैंने उसे कह दिया कि हम कोशिश करेंगे.”

चव्हाण साहब अपने क्लाइंट से फ्री हो लिए थे वे दोनों उनके पास जा बैठे. उन्होंने प्रिया को शपथ पत्रों और दस्तावेजों की प्रतियाँ दीं. प्रिया ने उनसे पूछ लिया, “सर, उन्होंने प्रशांत जी को प्रस्ताव दिया है उस बारे में आपकी क्या राय है?”

“कुछ नहीं, वे फिलहाल हमारा ध्यान क्लोजर की सुनवाई से भटकाना चाहते हैं. लेकिन हम समझौते का रास्ता भी बंद नहीं करेंगे. इसलिए हम अपना पूरा ध्यान सुनवाई पर रखते हुए उनसे बात करते रहेंगे.”

“और हाँ प्रिया, चव्हाण साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “वकील भट्ट तुम्हारे लिए पूछ रहा था कि, ‘आपकी नयी असिस्टेंट दिखाई नहीं दी.’ मैंने उसे कह दिया कि उसे किसी काम से हाईकोर्ट भेजा है.”

इस पर प्रिया को भी हँसी छूट गई. वह कहने लगी, “आपने तो मुझे सचमुच का वकील बना दिया उनके लिए.”

“और मैं क्या कहता?”

“ठीक है सर, मैं शपथ पत्र और दस्तावेज ले जा रही हूँ. इन्हें डिजिटाइज करके अपना काम शुरू करती हूँ. शुक्रवार में केवल दो दिन बीच में हैं. मुझे तेजी से काम करना होगा. कोटा की मुझे अब फिक्र नहीं है, आकाश ने वहाँ संभाल लिया है. अब मेरा पूरा ध्यान इन कागजों में छिपे उन झूठों को पकड़ने पर है जिनके सहारे वे साढ़े तीन सौ से अधिक परिवारों का भविष्य लील जाना चाहते हैं."
... क्रमशः

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

परछाइयों का पीछा

देहरी के पार, कड़ी - 27
जनरल मैनेजर से सफल जिरह के बाद ईसीआई के मजदूरों का मनोबल सातवें आसमान पर था. एएसएल के दफ्तर से बाहर निकलने के बाद मजदूरों के लगाए नारों में जो खनक थी, वह सालों के शोषण के विरुद्ध एक हूँकार जैसी लग रही थी. शामियाने के नीचे अब डर की जगह जीत की चर्चा थी. वह अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि एक 'कम्युनिटी सेंटर' बन चुका था जहाँ मजदूर अपने हक की बारीकियाँ समझ रहे थे.

प्रिया वहीं से अपने फ्लैट के लिए रवाना हुई. रास्ते भर वह जिरह के दृश्यों को जेहन में दोहराती रही. उसे अपनी नई पहचान—काली पैंट, सफेद शर्ट और वह कोट—किसी कवच जैसी लग रही थी. उसने महसूस किया कि वह 'विक्रांत के डर' की देहरी के बहुत पार निकल आई है. अब उसे विक्रांत की याद डराती नहीं, बल्कि उसकी बेवकूफी भरी हरकतों पर उसे हँसी आने लगी थी.

गुरुवार, 11 अप्रैल को मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के यहाँ समझौता वार्ता नियत थी. प्रबंधन दो बार से वार्ता में नहीं आ रहा था. इसे कलेक्टिव बारगेनिंग में असहयोग मानते हुए श्रम विभाग अनुचित श्रम आचरण के लिए फैक्ट्री की मालिक कंपनी के निदेशकों पर अपराधिक मुकदमा चला सकता था. प्रशांत बाबू और यूनियन की टीम को उम्मीद थी कि आपराधिक मुकदमे के डर से शायद प्रबंधन बातचीत की मेज पर आ जाए. लेकिन जैसा कि अंदेशा था, प्रबंधन नदारद रहा. रामजी काका ने जब शाम को फोन पर प्रिया को बताया कि श्रम आयुक्त ने जनरल मैनेजर और डायरेक्टरों को 'आपराधिक नोटिस' जारी कर दिए हैं, तो प्रिया को एक विधिक जीत का अहसास हुआ. इसका मतलब था कि अब प्रबंधन पर मजदूरों को अंतरिम राहत देने के लिए दबाव बढ़ेगा.

शुक्रवार की रात जब प्रिया अपने फ्लैट पर लौटी, तो थकान के बावजूद उसने वकील चव्हाण से फोन पर बात की. उन्होंने एक नई चुनौती सामने रख दी, "प्रिया, आज प्रबंधन ने शपथ पत्र पेश नहीं किए. उन्होंने चतुराई से समय मांग लिया. हालांकि एएसएल ने उन पर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है, लेकिन असली खेल 'समय' का है. 15 मार्च को नोटिस मिला था और 14 मई की डेडलाइन में अब सिर्फ 29 दिन बचे हैं. वे मामले को लटकाना चाहते हैं ताकि 'डीम्ड क्लोजर' (Deemed Closure) की कानूनी अनुमति मिल जाए."

रविवार की शाम IIDEA ऑफिस में जब बैठक चल रही थी, तभी प्रिया का फोन घनघना उठा. कोटा से पापा की कॉल थी. प्रिया का दिल धड़क गया, क्योंकि पापा उसे रात नौ बजे से पहले कभी फोन नहीं करते थे.

प्रिया ने कांपते हाथों से फोन उठाया और उसे स्पीकर पर लिया. "बेटा, कल से घर के बाहर एक काली गाड़ी खड़ी है," पापा की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, "आज दो आदमी आए थे, पूछ रहे थे कि क्या तुम वाकई किसी लॉ फर्म में काम कर रही हो? वे मयंक के बिजनेस के बारे में भी सवाल पूछ रहे थे. मयंक थोड़ा डरा हुआ है."

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब ने एक-दूसरे की ओर देखा. प्रिया को समझ आ गया कि 9 अप्रैल की जिरह के बाद प्रबंधन ने उसकी 'जड़ें' खोदना शुरू कर दिया है. वह विधिक लड़ाई को व्यक्तिगत हमले से रोकने की कोशिश में जुटा था.

प्रिया ने तुरंत जयपुर से आकाश को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया. आकाश ने स्थिति की गंभीरता भांपते हुए कहा, "प्रिया, तुम विचलित मत हो. मैं आज रात की बस से कोटा निकल रहा हूँ. मैं देखूँगा कि ये 'जासूस' किस एजेंसी के हैं. मयंक और अंकल अकेले नहीं हैं. तुम बस अपनी इस लड़ाई पर ध्यान दो."

आकाश के आश्वासन ने प्रिया को संबल दिया, पर उसे अहसास हुआ कि ईसीआई प्रबंधन अब केवल उसके 'डेटा' से नहीं, उसके 'अस्तित्व' से लड़ रहा है.

बैठक खत्म होने के बाद जब यूनियन के सदस्य चले गए, तब रामजी काका और प्रशांत बाबू अकेले रह गए. रामजी काका ने धीमी आवाज़ में अपना डर साझा किया, जो पिछले कुछ दिनों से उन्हें खाए जा रहा था.

"प्रशांत, हड़ताल को आज 35 दिन पूरे हो गए. मार्च की आखिरी पगार जो मजदूरों को मिली थी, वह अब अंतिम सांसें ले रही है. कल फैक्ट्री गेट की पिकेटिंग पर कल्ला और रामदीन राशन की मदद के बारे में पूछ रहे थे. शिंदे सही कहता था, मुंबई की दूरियों में 'सामूहिक रसोई' संभव नहीं है, लेकिन हमें इन 350 परिवारों तक आटा-दाल पहुँचाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा. स्वाभिमान की लड़ाई भूखे पेट नहीं लड़ी जा सकती."

प्रशांत बाबू ने लंबी सांस ली, "यह दोहरी घेराबंदी है काका. एक तरफ क्लोजर की कानूनी डेडलाइन और दूसरी तरफ मजदूरों की खाली होती रसोइयाँ. इन्होंने प्रिया के परिवार को डराकर उसे तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है. सरकार मामले को एक दो रोज में न्याय निर्णयन के लिए लेबर कोर्ट को भेजेगी, हड़ताल और तालाबंदी पर पाबंदी लगाएगी. ऐसे में मजदूरों को काम पर जाना होगा. बस मिनिस्टर दबाव डालकर कुछ अंतरिम राहत दिला दे तो ठीक, नहीं तो हमें आइडिया से सम्बद्ध यूनियनों से मदद लेनी पड़ेगी."

प्रिया, जो फाइलें समेटने के लिए कमरे में दाखिल हुई थी, उसने यह बात सुन ली. उसकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि एक योद्धा वाली चमक थी. उसने मेज पर अपना लैपटॉप रखते हुए कहा, "सर, अगर वे मेरे घर तक पहुँच रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हम जीत रहे हैं. वे बुरी तरह डरे हुए हैं. जिरह के दौरान जब उनकी चोरी पकड़ी गई, तभी उन्होंने यह रास्ता चुना है. अब हमें रुकना नहीं है."

प्रिया ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब और भी मजबूती से 'निजी दौरों और फर्जी खर्चों' का ब्यौरा अदालत के पटल पर रखने की तैयारी करेगी. उसे अहसास हुआ कि उसकी जड़ें केवल कोटा की मिट्टी में नहीं, बल्कि मुंबई के उन मजदूरों के चूल्हों की आग में भी हैं जो आज उसकी ओर उम्मीद से देख रहे थे.

प्रिया ने मन ही मन खुद से कहा— 'देहरी के उस पार का डर अब बीत चुका है, अब इस पार की ज़मीन को मज़बूत करना ही मेरा इष्ट है.'
... क्रमशः

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

खेद

कथा श्रृंखला : देहरी के पार
प्रिय पाठकों,

मेरा मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है. मैंने बचपन से ही बहुत पढ़ा, और जब भी विदेशी साहित्य पढ़ा तो उनकी 'तथ्यात्मक सटीकता' ने मुझे प्रभावित किया. इसके उलट, अक्सर भारतीय फिक्शन, सिनेमा और टीवी में स्थान, काल, विज्ञान और विशेषकर 'कानूनी प्रक्रियाओं' को लेकर गंभीर त्रुटियाँ देखने को मिलती हैं. एक पाठक अक्सर इन जानकारियों को सत्य मान लेता है, जिसका खामियाजा उसे वास्तविक जीवन में उठाना पड़ सकता है.

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती है—लिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

परंतु, कभी-कभी शोध की गहनता या कुछ अपरिहार्य व्यवधानों के कारण यह लय टूट जाती है. कल इसी कारण और कुछ प्रोफेशनल व्यस्तता के कारण श्रृंखला की अगली कड़ी समय पर प्रकाशित नहीं हो सकी. मुझे पता है कि आप उत्सुकता से इसका इंतज़ार करते हैं और आपके व्यक्तिगत संदेशों ने मुझे आपकी इसी प्रतीक्षा और स्नेह का अहसास कराया.

आपके समय और इस 'इंतज़ार' के प्रति मैं अपनी संवेदनशीलता व्यक्त करता हूँ. पाठकों को हुई निराशा के लिए मुझे खेद है. मेरी कोशिश रहेगी कि यह सिलसिला नियमपूर्वक चलता रहे और मैं अपने शोध पूर्ण लेखन के माध्यम से निरंतर आपके साथ बना रहूँ.

स्नेह और आभार,

@दिनेशराय द्विवेदी

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

सचाई का घेरा

देहरी के पार, कड़ी - 26
रविवार को सीनियर वकील रमेश चव्हाण के साथ हुई मीटिंग में तय हुआ कि एएसएल (असिस्टेंट सैक्रेटरी लेबर) के यहाँ जीएम से जिरह में प्रशांत बाबू वकील साहब के साथ रहेंगे. वकील चव्हाण का आग्रह था कि ‘यदि प्रिया अपने एनालिसिस के चार्टों और ग्राफों सहित उनकी सहायक के रूप में उपस्थित रहे तो बेहतर होगा.’ यह कहते ही प्रशांत बाबू यूनियन के अध्यक्ष और मंत्री प्रिया की ओर देखने लगे. अभी तक प्रिया को एक्सपोज नहीं करना तय था. लेकिन ऐसा करने से वह एक्सपोज हो सकती थी. तभी प्रिया खुद बोल पड़ी. “मैं तैयार हूँ. बस मुझे एक छुट्टी लेनी पड़ेगी, वह मैं ले लूंगी.”

“नहीं प्रिया, अभी तुम्हारा एक्सपोजर ठीक नहीं होगा.” प्रशांत बाबू ने कहा.

“कामरेड, मैं उस फेज से निकल चुकी हूँ, मुझे अब अपने एक्सपोजर का कोई भय नहीं, और उसके बिना काम को आगे बढ़ाना भी संभव नहीं होगा.”

“कोई बात नहीं, हम प्रिया को एक्सपोज नहीं होने देंगे.” वकील चव्हाण बोले, “प्रिया तुम्हारे पास सफेद शर्ट और काली पैंट तो होगी ही, काला कोट या स्लीवलेस जैकेट भी हो तो और बढ़िया.”

“मैं समझ गयी.” प्रिया ने मुसकुराते हुए कहा, “आप मुझे अपना असिस्टेंट वकील दिखाना चाहते हैं. बस एक कोट की कमी है, तो कल मैं एक काला समर कोट खरीद लूंगी. अब तक यूनियन दफ्तर में जिन्होंने मुझे देखा है वे भी मुझे आपका असिस्टेंट वकील समझने लगेंगे.”

तय हुआ कि जिरह के वक्त प्रिया वकील के आउटफिट में चव्हाण की सहायता के लिए उपलब्ध रहेगी.

मंगलवार की सुबह मुंबई के एएसएल के दफ्तर में भारी गहमागहमी थी. प्रिया वकील चव्हाण की सहायक वकील के आउटफिट में मौजूद थी. बाहर चिलचिलाती धूप में ईसीआई फैक्ट्री के करीब साठ-पैंसठ मज़दूर शांत खड़े थे. वे नारेबाजी करते हुए वहाँ पहुँचे थे, लेकिन दफ्तर के बाहर पहुँचते ही उन्होंने नारेबाजी बंद कर दी थी. उनकी खामोश उपस्थिति भी अधिकारियों पर एक नैतिक दबाव बना रही थी.

अंदर, एएसएल के कक्ष में एयर-कंडीशनर की आवाज़ के बीच तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था. मेज के एक तरफ फैक्ट्री के जनरल मैनेजर (GM) और उनके कानूनी सलाहकार बैठे थे, और दूसरी तरफ वकील चव्हाण के साथ प्रशांत बाबू और प्रिया.

कार्यवाही शुरू हुई. वकील चव्हाण ने प्रिया का तैयार किया गया चार्ट पेश किया, जिसमें 'मैनेजमेंट कंसल्टेंसी' के नाम पर हुए खर्चों का ब्यौरा था.

चव्हाण साहब ने कड़क आवाज़ में पूछा, "मिस्टर जीएम, पिछले साल आपकी कंपनी ने 'एस.आर. एसोसिएट्स' को 18 लाख रुपये का भुगतान किया. क्या आप बता सकते हैं कि इस फर्म ने आपको क्या विशेष सलाह दी थी जिससे उत्पादन बढ़ा?"

जीएम साहब थोड़े हकलाए, "वह एक तकनीकी सलाहकार फर्म है. हमने उनसे सलाह ली थी कि हम कैसे प्रोडक्शन की लागत कम कर सकते हैं. जिससे हमारा घाटा समाप्त हो सके."

चव्हाण साहब ने तुरंत एक कागज़ मेज पर पटका, "मजे की बात यह है कि इस फर्म का पता वही है जो आपकी पत्नी के मायके का है, और इसकी एकमात्र डायरेक्टर आपकी पत्नी स्वयं हैं. क्या यह मजदूरों का पैसा निकालकर अपनी जेब भरने की 'फाइनेंशियल इंजीनियरिंग' नहीं है?"

पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया. एएसएल ने चश्मा उतारकर जीएम को गौर से देखा. प्रबंधन के वकील ने हस्तक्षेप करना चाहा, लेकिन एएसएल ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया.

“क्या यह सही है?”, इस बार खुद एएसएल ने जीएम से पूछा.

“जी यह बात सही है. लेकिन उस फर्म ने तकनीकी सलाहकारों की सलाह पर ही रिपोर्ट दी थी.”

“क्या आप अपनी पत्नी और उन तकनीकी सलाहकारों को उस रिपोर्ट के साथ पेश कर सकते हैं?” एएसएल ने पूछा?

“मुझे अपनी पत्नी से पूछना पड़ेगा. उनके द्वारा एंगेज किए गए सलाहकार अब भी उनके साथ काम कर रहे हैं या नहीं.”

“ठीक है, आप कोशिश कीजिए.”

सुनवाई के दौरान जब 15 मिनट का ब्रेक हुआ, तो प्रिया गलियारे में आकर खड़ी हुई. तभी उसके फोन की घंटी घनघना उठी. जयपुर से आकाश का कॉल था.

"हेलो प्रिया! जयपुर में बहुत गर्मी है, पर सुना है मुंबई में तुम्हारी बहस ने गर्मी बढ़ा रखी है?" आकाश की आवाज़ में हमेशा की तरह वही बेफिक्री थी.

प्रिया ने लंबी सांस ली, "आकाश, यहाँ हम सच के बहुत करीब हैं. आज पहली बार उन सफ़ेदपोश चोरों के चेहरे पीले पड़े देखे. बस दुआ करो कि ये विधिक लड़ाई समय पर पूरी हो जाए. और तुम्हें एक बात और बताऊँ. मैं आज सुनवाई में सीनियर वकील चव्हाण के असिस्टेंट वकील के आउटफिट में हूँ. इस नए रोल में मजा आ रहा है."

"दुआ साथ है प्रिया. वैसे, कोटा से मयंक का मैसेज था कि तुम बहुत थकी हुई लग रही हो. ध्यान रखना, जीत तब तक अधूरी है जब तक तुम खुद स्वस्थ न रहो. जयपुर आने पर पार्टी पक्की है, पर अभी लड़ाई जीतो!"

आकाश की बातों ने प्रिया के चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी. उसे लगा कि जयपुर की दोस्ती और कोटा की ममता उसके साथ यहाँ मुंबई में इस सुनवाई में मौजूद हैं.

ब्रेक के बाद, प्रिया की टीम ने 'विदेशी यात्राओं' के बिलों का बम फोड़ा. साबित हो गया कि फैक्ट्री के खर्चे पर डायरेक्टर यूरोप की सैर कर रहे थे. एएसएल ने सख्त लहजे में कहा, "प्रबंधन को इन सभी खर्चों का विस्तृत स्पष्टीकरण शपथ पत्र पर देना होगा. क्लोजर की अनुमति केवल घाटा होने पर नहीं, बल्कि 'ईमानदार घाटा' होने पर मिल पाएगी."

शाम चार बजे जब वे एएसएल के दफ्तर से बाहर निकले तो प्रशांत बाबू ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा, "प्रिया, तुम्हारी डेटा माइनिंग ने आज हमें वह बढ़त दिला दी है जिसकी उम्मीद प्रबंधन ने सपने में भी नहीं की होगी. तुम्हारी मेहनत के कारण ईसीआई का मजदूर आज सीना ताने अपने नियोजक के सामने खड़ा है."

प्रिया ने देखा कि सारे मजदूर दफ्तर के गेट के बाहर खड़े हो गए हैं. जैसे ही वे गेट के बाहर उनके बीच पहुँचे उन्होंने जोर से नारा लगाया, “इंकलाब जिन्दाबाद” “हम झूठ को हराएंगे-सचाई को लाएंगे.” प्रशांत बाबू ने अपने दोनों हाथ ऊँचे किए तो मजदूर चुप हुए. उनकी आँखें अब एक नई उम्मीद से चमक रही थीं.
... क्रमशः

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

हमारी जड़ें

देहरी के पार, कड़ी - 25
यह शनिवार प्रिया को करीब एक माह बाद नसीब हुआ था. उसे कहीं नहीं जाना था. लेकिन मुंबई के अंधेरी ईस्ट के जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहाँ उसके लिए बहुत था. फ्लैट की सफाई करनी थी, कपड़ों की धुलाई करनी थी. किराना और दूसरा जो भी सामान समाप्त हो गया था या होने वाला था और जरूरत का जो सामान वह मुम्बई आने के बाद से नहीं खरीद पाई थी, उसकी सूची बनानी थी. समय मिलने पर बाजार से खरीदकर लाना भी था. पिछले चार वीकेंड से वह यूनियन ऑफिस और ईसीआई फैक्ट्री के कामों में व्यस्त रही थी. फिलहाल इन कामों से उसके निजी जीवन का कोई वास्ता न था. लेकिन उसे इन कामों में सुकून मिल रहा था. वह समझ रही थी कि वह जो कर रही है, वह एक सही दिशा में बदलाव के लिए काम है. जिनके साथ वह काम कर रही थी उन्हीं लोगों ने उसे विक्रांत से लड़ने की हिम्मत दी थी और बराबर साथ दिया था. इसी कारण वह उससे निजात पा सकी थी. उसे तो अभी पता तक नहीं था कि विक्रांत अभी भी जेल में है अथवा जमानत पर छूटकर बाहर आ चुका है.

सुबह आठ से दस बजे तक उसने अपनी मैड के साथ मिलकर उसने फ्लैट की सफाई की. इससे उसे यह ठीक-ठीक पता भी लग गया कि उसे बाजार से किन वस्तुओं की खरीद करनी है. सामानों की सूची बनाकर ग्यारह बजे वह बाजार के लिए निकली तो सामान खरीदते हुए करीब एक बजे उसे भूख लगने लगी थी. वह पास ही मेवाड़ भोजनालय जा पहुँची.

रामजी काका वहाँ नहीं थे. लेकिन स्टाफ ने बेटी की तरह उसका स्वागत हुआ. उसने तुरंत खाना लगाने को कहा. उसने खाना शुरू भी नहीं किया था कि रामजी वहाँ पहुँच गए. जब तक उसने खाना खाया, उसके साथ बैठे बात करते रहे. उन्होंने उसके माता-पिता और भाई के बारे में पूछा. आकाश उसके माता-पिता और बहिन तान्या के बारे में पूछा. उसे पिछले दिनों अपनी प्रोफेशनल चुनौतियों और यूनियन के कामों के बीच उन सबसे बात करने का ध्यान ही नहीं रहा था. उधर से भी बस माँ के सिवा किसी का फोन इस बीच नहीं आया था. उसने रामजी काका को यह बात बताई तो वे बहुत नाराज हुए. कहने लगे, “हम बहुत ही अच्छे काम कर रहे हों. लेकिन हमें उन लोगों को कभी भूलना नहीं करना चाहिए जिनसे हमारी जड़ें जुड़ी हैं. थोड़ा सा समय निकाल कर उनसे भी बात करो. जब कुछ नहीं बचता वे ही काम आते हैं.”

काका की बात सुनकर उसकी आँखें नम हो गईं. उसे बहुत संतोष भी हुआ कि यहाँ मुम्बई में कोई तो है जो उसे परिवार के बुजुर्ग की तरह टोक सकता है और सलाह दे सकता है.

वह जब भी कोटा की बात करती तो अक्सर माँ के फोन पर कॉल करती. उसी पर पापा और मयंक से बात हो जाती थी. लेकिन शाम को उसने मयंक को फोन लगाया.

"नमस्ते दीदी! आज आपको मैं कैसे याद आ गया. मैं तो समझा था आप मुझे भूल ही गईं. सुना है आप वहाँ किसी 'मज़दूर नेता' के साथ मिलकर फैक्ट्री बंद करवा रही हैं?" मयंक की आवाज़ में छोटे भाई वाली शरारत थी, तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई, "अरे उसे डरा मत, पूछ खाना खाया कि नहीं!"

प्रिया मुस्कुरा दी. कोटा की उस स्थिर ज़िंदगी और मुंबई के इस उबलते संघर्ष के बीच का अंतर उसे आज साफ़ महसूस हुआ. "मयंक, मैं फैक्ट्री बंद नहीं करवा रही, जो बंद करना चाहते हैं उनसे लड़ रही हूँ. तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. और पापा को मदद करता है या नहीं? और मम्मी को बता दे कि मैं खाने में कभी चूक नहीं करती. आज भी खा लिया है.”

"ये सही है, तू टाइम से खा लिया कर वरना माँ हमें बात नहीं करने देंगी.”

“तू तेरी पढ़ाई की बता”

“दीदी, पढ़ाई भी ठीक है, पापा की मदद भी करता हूँ. अब तो वे कहते हैं, तेरी एम.कॉम. छोड़ और बिजनेस संभाल अब मुझसे इतना काम नहीं होता.”

“वे तो कहेंगे जब तक तू सब नहीं संभाल लेता. पर तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे और इसे पूरा कर. पता नहीं कब ये काम आ जाए.”

“देता हूँ पर आप जल्दी -जल्दी मुझे फोन किया करो. जयपुर से आकाश भाई का फोन आया था वह भी कह रहे थे कि प्रिया को क्या 'कानूनी भूत' सवार हो गया है जो फोन भी नहीं उठाती."

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की चिमनियाँ रात के अंधेरे में किसी खामोश पहरेदार जैसी लग रही थीं. "मयंक, यहाँ जो मैं देख रही हूँ, वह किसी किताब में नहीं लिखा. जब हज़ारों लोगों का हक छीना जाता है, तो चुप रहना अपराध लगता है. माँ से कहना मैं ठीक हूँ. उनसे कल बात करूंगी."

अगली शाम को यूनियन ऑफिस में एक गंभीर बैठक हुई. रामजी ने सुझाव रखा, "प्रशांत बाबू, हड़ताल को चार सप्ताह हो चुके हैं. मजदूरों के घरों में राशन कम होने लगा होगा. क्यों न हम फैक्ट्री गेट पर जहाँ पिकेटिंग करते हैं वहीं 'सामूहिक रसोई' शुरू कर दें?"

प्रशांत बाबू ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और कुछ देर सोचा. यूनियन के सचिव शिंदे ने तुरंत टोक दिया, "काका, विचार अच्छा है पर व्यावहारिक नहीं. हमारे मज़दूर कल्याण और टिटवाला तक फैले हैं. वे यहाँ अकेले खाने आएंगे तो पीछे परिवार क्या करेगा? और आना-जाना खाने से महँगा पड़ेगा. अभी तो पिछले महीने की पगार हाथ में है, सबने हाथ खींचकर खर्च किया है, इसलिए एक महीना तो निकल जाएगा."

शिंदे की बात में दम था. रामजी काका थोड़ा ठिठके, "बात तो सही है शिंदे. लेकिन अगले 40-50 दिनों बाद जब जेब पूरी खाली होगी, तब क्या करेंगे? हमें कोई ऐसा तरीका सोचना होगा जिससे राशन हर घर तक पहुँचे, न कि लोग राशन तक आएँ."

तभी प्रशांत बाबू बोल उठे. “उस बारे में हम अगले सप्ताह बात करेंगे, रामजी. आज हमें क्लोजर वाले मुकदमे की रणनीति पर बात करनी है. चव्हाण भाई नीचे ऑफिस में प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह मीटिंग हमें यहीं खत्म करनी होगी.”
... क्रमशः

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

कानूनी तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 24
शुक्रवार लंच के बाद से यूनियन के सैक्रेटरी अपने चार मजदूर साथियों के साथ एडीशनल सैक्रेटरी लेबर (एएसएल) के दफ्तर में बैठे हुए थे. यह दिन ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था. आज शाम तक एएसएल के सख्त आदेश के दबाव में उन्हें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के बिल-वाउचर्स की फाइलें जमा करानी थीं. वे ठीक पौने पाँच बजे पहुँचे, दो बोरे दस्तावेजों से भरे हुए थे, एएसएल के स्टाफ ने एक बोरा अपने यहाँ जमा किया और दस्तावेजों की लिस्ट फाइल के साथ नत्थी कर दी. दूसरा बोरा और दस्तावेजों की सूची यूनियन सैक्रेटरी को दी.

“क्या ये सारे दस्तावेज आपके पास डिजिटल फॉर्म में नहीं हैं?” एएसएल ने पूछा.

“सर हैं तो, पर आपने दस्तावेज पेश करने को कहा था. डिजिटल फॉर्म में पेश करने की हिदायत होती तो हम उसे पेश कर देते.” फैक्ट्री से आए लीगल मैनेजर मनोज भाट ने कहा.

“कोई बात नहीं, हम अब आदेश दे रहे हैं. आप उक्त सभी दस्तावेज डिजिटल फॉर्म में पेन ड्राइव में सेव करके दो प्रति में पेश करें. साथ में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) की धारा 63 (4) का प्रमाण पत्र भी पेश करें.” एएसएल ने कहा. फिर पूछा, “कब तक कर देंगे?”

“सर, अगली डेट पर पेश कर देंगे.”

“ठीक है, अगले शुक्रवार तक पेश करें?”

“सर, इस आवेदन का फैसला 60 दिन में करके प्रबंधन को सूचित करना है. वरना डीम्ड परमिशन हो जाएगी. पूरे सप्ताह की तारीख देना उचित नहीं होगा. इसे सोमवार को रख लें.” यूनियन सैक्रेटरी ने सप्ताह भर बाद की पेशी नियत करने पर आपत्ति की. फिर भी एएसएल ने यह कहते हुए मंगलवार की तारीख दी कि वे केवल दो ही दिन यहाँ बैठते हैं, शेष दिन उन्हें सेक्रेट्रिएट में बैठकर मंत्रालय का काम निपटाना होता है. उन्होंने आश्वासन दिया कि वे 60 दिन नहीं होने देंगे.

शनिवार दोपहर प्रशांत बाबू, वकील चव्हाण और प्रिया यूनियन दफ्तर में मिले. दस्तावेजों का बोरा खोलकर देखा गया. दस्तावेज बहुत थे; फिजिकल जाँच में कई दिन लग सकते थे. तय किया गया कि डिजिटल रिकॉर्ड मिलने पर ही जाँच की जाए.

प्रिया ने बताया कि, “डिजिटल कॉपी मंगल को मिलेगी. शुक्रवार तक सभी दिन वर्किंग होंगे. उसकी टीम यदि रोज थोड़ा-थोड़ा 'डिटेल्स' मिलान करे तब भी शनिवार के पहले फाइनल करना संभव नहीं होगा.”

वकील चव्हाण साहिब ने बताया कि, “उसके बाद हमें जवाब तैयार करने में दो दिन लग सकते हैं. इसलिए बेहतर है कि जवाब पेश करने की तारीख अगले मंगलवार की ही लें. हम उस दिन जवाब पेश कर देंगे तो प्रबंधक की साक्ष्य के शपथ पत्र पेश करने के लिए फिर शुक्रवार की तिथि मिलेगी. तब तक हड़ताल शुरू हुए 27 दिन और क्लोजर के आवेदन को 20 दिन हो जाएंगे. हमें साक्ष्य के समय बहुत जल्दी करनी पड़ेगी, वरना डीम्ड परमिशन का संकट खड़ा हो सकता है और उसका कोई तोड़ नहीं है.”

मंगलवार को पेन ड्राइव में डिजिटल रेकॉर्ड मिल गया. क्लोजर परमिशन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत करने के लिए योजनानुसार अगले मंगल की पेशी तय कर दी गयी. डिजिटल रिकॉर्ड की पेन ड्राइव उसी दिन प्रिया को पहुँचा दी गयीं. प्रिया ने उसकी चार प्रतियाँ तैयार करके एक खुद रखी और बाकी राहुल, स्नेहा और आदित्य को बाँट दी.

प्रिया को डिनर के बाद रात दस बजे समय मिला. उसने पेन ड्राइव को लैपटॉप में लगा कर दस्तावेज देखना शुरू किया तो उसकी आँखें खुली रह गईं. पिछले पाँच वर्षों में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' को लगातार बढ़ाया गया था. जिस तरह हर साल खर्चे बढ़ते गए थे, उससे यह स्पष्ट हो चुका था कि ये जानबूझकर किया गया है.

अगले शनिवार चारों प्रिया के फ्लैट पर मिले. उन्होंने दस्तावेजों का अपने डिजिटल एनालिसिस रिपोर्ट से अंतिम मिलान शुरू किया. जैसे-जैसे बिलों का मिलान होता गया, सच की परतें खुलती चली गईं. चारों ने मिल कर लंच तक यह काम पूरा कर लिया. चारों बहुत थक गए थे उन्होंने लंच बाहर से मंगा लिया. प्रशांत बाबू से मीटिंग शाम पाँच बजे यूनियन ऑफिस में तय हुई.

यूनियन ऑफिस की मीटिंग में प्रशांत बाबू, ईसीआई यूनियन के अध्यक्ष और सैक्रेटरी तो मौजूद थे ही, उन्होंने वकील चव्हाण साहब को भी बुला लिया था. प्रिया ने उत्साह से बताना शुरू किया, "कॉमरेड प्रशांत, ये देखिए! मैनेजमेंट ने जिस 'कंसल्टेंसी फीस' के नाम पर जिस फर्म को लाखों रुपये भुगतान करना दिखाया है, वह असल में मालिक की पत्नी की एक कागजी फर्म है. ये 'ट्रैवल एक्सपेंस'? ये मजदूरों और स्टाफ के लिए नहीं, बल्कि डायरेक्टरों की विदेश यात्राओं के टिकट हैं जिन्हें कंपनी का बिजनेस खर्च में दिखा दिया गया है."

वकील रमेश चव्हाण ने डिजिटल दस्तावेज वाली पेन ड्राइव और उनके मिलान की पेन ड्राइव अपने ब्रीफकेस में रखते हुए कहा, "हम हर हाल में मंगलवार को प्रबंधन के क्लोजर की परमिशन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत कर देंगे. अगली पेशी पर वे गवाहों के शपथपत्र प्रस्तुत करेंगे. हमें अपने सीए से समान खर्चों के अन्य उद्योगों के ऑडिटेड दस्तावेज प्राप्त करने के लिए केवल एक सप्ताह का समय मिलेगा. जिससे अगली पेशी पर हम प्रबंधकों के गवाहों से जिरह कर सकें. हम यह मिलान और दूसरे उद्योगों के दस्तावेज जिरह के दौरान ही प्रस्तुत करेंगे, उस समय प्रबंधन की ओर से आए लोगों के चेहरे देखने लायक होंगे.”

मंगलवार को वकील चव्हाण ने यूनियन के अध्यक्ष के साथ एएसएल दफ्तर जाकर क्लोजर परमिशन की प्रबंधन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत कर दिया. उससे अगले शुक्रवार की पेशी पर प्रबंधन ने अपनी साक्ष्य में अपने जनरल मैनेजर और सीए के शपथ पत्र प्रस्तुत किए.

इसी शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के यहाँ मजदूरों के मांग पत्र पर समझौता वार्ता थी. लेकिन प्रबंधन की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ. समझौता अधिकारी ने उन्हें टिप्पणी प्रस्तुत करने के लिए सोमवार की पेशी तय कर दी. मजदूर यूनियन की ओर से प्रशांत बाबू ने प्रबंधन के रवैये पर कड़ी आपत्ति करते हुए कहा कि “मजदूरों की हड़ताल वाजिब है और जारी है. इसलिए आपको सोमवार को कुछ न कुछ निर्णय लेना पड़ेगा.”
... क्रमशः

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दोहरी लड़ाई

देहरी के पार, कड़ी - 23
'इलेक्ट्रो सर्किट इंडिया' (ECE) उद्योग के मजदूरों की आमसभा जज्बे और जोश के साथ हड़ताल को जारी रखने के निर्णय के साथ समाप्त हुई थी. रविवार का दिन आराम का नहीं बल्कि आगे की रणनीति तय करने और उस पर काम करने का था. प्रशांत बाबू, प्रिया, यूनियन के अध्यक्ष व मंत्री और सीनियर वकील रमेश चव्हाण के बीच लंबी बैठक चली.

राज्य के श्रम विभाग से फैक्ट्री के क्लोजर की अनुमति वाले मामले में अभी सुनवाई की तारीख की कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई थी. वकील चव्हाण का सुझाव था कि, “हमें आवेदन की सूचना प्राप्त हो चुकी है, सुनवाई की तारीख तय हो उससे पहले हमें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स मैनेजमेंट से पेश कराए जाने और उनकी प्रतियाँ यूनियन को उपलब्ध कराने के लिए श्रम विभाग को आवेदन पेश कर देना चाहिए. इस रेकॉर्ड के मुकाबले अन्य उद्योगों के ऑडिटेड रिकार्ड से तुलना करके हम फर्जी बिलों के जरीए बड़े मुनाफे को घाटे में दिखाए जाने वाले फर्जीवाड़े को साबित कर सकेंगे. हम यह आवेदन कल ही दे दें तो हमारा समय बचेगा. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि सुनवाई आवेदन के 50वें दिन तक पूरी हो जाए जिससे डीम्ड क्लोजर की संभावना नहीं रहे.”

सुझाव एकदम सही था, सभी इससे सहमत थे. प्रशांत बाबू ने एक समस्या सामने रख दी. “लेकिन कॉमरेड चव्हाण, हम अन्य उद्योगों के खर्चों के ऑडिटेड रिकॉर्ड कहाँ से लाएंगे?”

“उसके लिए मैं एक सीए फर्म को जानता हूँ , जो अनेक उद्योगों का ऑडिट करती है. वह इस तरह का रिकार्ड उपलब्ध करवा सकती है और प्रमाणित करने वाला सीए यह बयान भी दे सकता है कि ये खर्चे उसने खुद उस कंपनी की बुक्स का ऑडिट करके प्रमाणित किए हैं. बस उसे इसका कुछ शुल्क देना पड़ेगा.”

“शुल्क हम यूनियन फंड से दे देंगे, बहुत अधिक तो नहीं होगा न?” यूनियन अध्यक्ष शिंदे ने पूछा.

“नहीं बहुत अधिक नहीं होगा. वे सीए मजदूरों के हमदर्द हैं. हमारी पार्टी को नियमित रूप से चंदा भी देते हैं. उनकी फीस बहुत मामूली होगी, वह भी रिकार्ड के लिए.” वकील चव्हाण ने कहा.

अगले दिन सुबह ग्यारह बजे ही यूनियन के अध्यक्ष और मंत्री वकील चव्हाण के साथ श्रम विभाग गए और एडीशनल सेक्रेटरी लेबर से मिलकर अपना आवेदन पेश किया. इतना ही नहीं उन्होंने क्लोजर परमिशन के आवेदन पर पहली सुनवाई के लिए तारीख तय करा दी और मैनेजमेंट तक नोटिस पहुँचाने की व्यवस्था भी कर आए. नोटिस में यह भी हिदायत दी थी कि वे उनके द्वारा पेश की गई बैलेंस शीटों में दिखाए गए 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स प्रस्तुत करें या यूनियन के आवेदन का जवाब दें. अब गेंद प्रबंधन के पाले में थी.

बुधवार की दोपहर ईसीई फैक्ट्री के गेट पर लगे शामियाने में एक सरकारी चपरासी ने आकर यूनियन अध्यक्ष शिंदे को एक पत्र दिया. श्रम विभाग ने सूचना भेजी थी कि मजदूरों के मांग पत्र और हड़ताल के मामले में प्रबंधन और यूनियन दोनों के प्रतिनिधि समझौता वार्ता के लिए जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में पहुँचें.

शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में भारी तनाव था. एक तरफ प्रबंधन के सूट-बूट पहने प्रतिनिधि थे, दूसरी तरफ प्रशांत बाबू और यूनियन के पदाधिकारी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन प्रतिनिधि ने अपनी लिखित टिप्पणी प्रस्तुत की. उनका प्रस्ताव चालाकी से भरा था. प्रबंधन प्रतिनिधि ने मौखिक रूप से कहा, "हम 'ट्रक सिस्टम' को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते, लेकिन इसमें सुधार के लिए तैयार हैं. हम सामानों की एक सूची बनाएंगे—रोजमर्रा की जरूरत का किराना, स्टेशनरी आदि चीजें 'एम्पलॉइज शॉप' पर दस साल पहले वाली कीमतों पर मिलती रहेंगी, और बाकी चीजों के बदले हम वेतन में भत्ता (Allowance) जोड़ देंगे. लेकिन मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए हम मूल वेतन (Basic Salary) बढ़ाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं."

समझौता अधिकारी (Conciliation Officer) ने प्रबंधन की टिप्पणी को गौर से देखा. उन्होंने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और दो टूक लहजे में कहा, "देखिए, हमारा विभाग किसी भी ऐसी व्यवस्था को मान्यता नहीं देगा जो 'ट्रक सिस्टम' के किसी भी रूप को बरकरार रखती हो. यह पद्धति हमारी सरकार पूरी तरह से अनुचित घोषित कर चुकी है. वह इसके किसी भी रूप को बनाए रखने के लिए तैयार नहीं है. हम ऐसा कोई समझौता नहीं रजिस्टर नहीं करेंगे जिसमें मजदूरों को मजबूरन कंपनी की दुकान से सामान खरीदना पड़े. ट्रक पद्धति को तो खत्म करना ही होगा, इस पर किसी तरह का कोई मोलभाव नहीं होगा."

प्रबंधन प्रतिनिधि ने कुछ कहना चाहा, लेकिन अधिकारी ने उन्हें रोक दिया. "फिलहाल आप ट्रक पद्धति के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करें. वेतन वृद्धि और अन्य मांगों पर हम अगली बैठक में बात करेंगे."

उधर, एडीशनल सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से भी प्रबंधन को तगड़ा झटका लगा. उन्हें आदेश मिला कि, “शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करें.”

फैक्ट्री गेट पर पिकेटिंग कर रहे मजदूरों को जब खबर दी गयी कि श्रम विभाग ने 'ट्रक सिस्टम' को सिरे से खारिज कर दिया है और एडीशनल सैक्रेटरी ने प्रबंधन को शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करने का आदेश दिया गया है, तो वे उत्साह से भर उठे. पंडाल में मजदूरों के आपस में बोलने से कोलाहल बढ़ गया. इस शोर तथा मजदूरों को फिर से सभा के अनुशासन में लौटने के लिए सैक्रेटरी ने जोर से नारा लगाया.

“इंकलाब – ज़िंदाबाद.”

मजदूरों ने बिखरा सा उत्तर दिया, “इंकलाब जिन्दाबाद”.

सैक्रेटरी ने तीन बार यही नारा लगाया. हर बार मजदूरों की आवाज बढ़ती रही. चौथी बार में नारे ने औद्योगिक क्षेत्र गुंजा दिया.

इसी बीच मजदूरों के बीच किसी पंजाबी मजदूर ने नारा लगाया, “साड्डा हक़ ले के रहेंगे.”

“ले के रहेंगे... ले के रहेंगे. ” तमाम मजदूरों ने पूरे जोश से उत्तर दिया.
... क्रमशः

रविवार, 12 अप्रैल 2026

जज़्बा

देहरी के पार, कड़ी - 22
प्रशांत बाबू, प्रिया और उसके साथी लंच के दौरान भी ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के फर्जीवाड़े की बारीकियों पर बात करते रहे. फर्जीवाड़ा सामने आने से उनका हौसला बढ़ गया था. सबके चेहरों पर एक नई चमक थी. प्रशांत बाबू के पास आज कार थी. पाँचों उसी से फैक्ट्री गेट पहुँचे. चार बजने में समय था. आमसभा की तैयारी पूरी थी. दोनों शामियाने एक ही ओर तान कर एक लंबा पंडाल बना दिया गया था. अब उसमें ढाई सौ से अधिक लोग बैठ सकते थे. इतने ही मजदूरों के एकत्र होने की संभावना थी. लेकिन चार बजते-बजते पंडाल पूरा भर गया. उसके बाद भी मजदूर आते जा रहे थे. मंच से आग्रह हुआ कि लोग बीच की जगह को कम करते हुए आगे खिसकें. जिससे बाद में आने वालों को बैठने में परेशानी न हो. मजदूरों ने आगे खिसककर जगह बनाई तो आने वाले कुछ मजदूर वहाँ बैठ गए. फिर भी काफी लोग खड़े रह गए.

हड़ताल का सातवाँ दिन था. उमस भरे दिन और खाली जेबों की चिंता के बीच मज़दूरों के चेहरों पर एक गंभीर सन्नाटा था. 'ट्रक सिस्टम' के शोषण ने उनके पास बचत के नाम पर कुछ नहीं छोड़ा था. 'अगली 10 तारीख' का डर सबके मन में था, जब उन्हें मासिक वेतन नहीं मिलने वाला था. यदि क्लोजर मंजूर हो जाता तो छंटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी का पैसा उसके भी 65 दिन बाद उन्हें मिलता. इस तरह उनके सामने दो माह से अधिक घर चलाने की समस्या थी. सभी मजदूर वैसे ही बमुश्किल जी रहे थे. हड़ताल के दिन से ही उन्होंने हर तरह के खर्च पर लगाम लगा ली थी. खाने-पीने के बजट तक में कटौती कर दी थी.

प्रिया की टीम ने सभास्थल से 50 फुट दूर एक चाय की गुमटी के बाहर रखी बेंचों में से एक पर अपना अड्डा जमा लिया था. कुछ देर बाद रामजी काका भी आ गए वे भी उनके साथ बेंच पर बैठ गए और गुमटी वाले को पाँचों के लिए चाय देने को कहा.

यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."

उन्होंने प्रिया की टीम की तैयार की हुई 'एनालिसिस रिपोर्ट' हवा में लहराई. "हमारे तकनीकी विशेषज्ञ मित्रों ने 24 घंटों से भी कम में कंपनी की बैलेंस शीटों का पोस्टमार्टम करके साबित कर दिया है कि जिसे ये 'घाटा' बता रहे हैं, वो असल में ''ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' के नाम पर की गई चोरी है. जिस साल आपका वेतन स्थिर रहा, उसी साल इन अफसरों के खर्चे चार गुना बढ़ गए! यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसको मेन्युफेक्चर किया गया है. हमारे साथियों ने मैनेजमेंट के सारे फर्जीवाड़े को उजागर कर दिया है."

जैसे ही 'आंकड़ों के फर्जीवाड़े' की बात हुई, मज़दूरों के बीच एक गुस्से की लहर दौड़ गई. जो मज़दूर अब तक क्लोजर के नाम से डरे हुए थे, उनकी आँखों में अब गुस्से की चमक थी. एक ने नारा लगाया, "शेम-शेम" सबने ऊंची आवाज में  उसका उत्तर दिया, "शेम-शेम".

प्रशांत बाबू माइक पर आए. वे इस उद्योग के मजदूरों की यूनियन के सदस्य या पदाधिकारी न होते हुए भी मजदूरों के बीच सर्वप्रिय नेता थे, मजदूरों का उन पर भरोसा था. उन्होंने सीधा सवाल किया, "अगले माह वेतन नहीं मिलेगा. प्रबंधन ने क्लोजर का जाल बिछाया है ताकि आप डरकर घुटने टेक दें. यह भी हो सकता है कि सरकार क्लोजर की मंजूरी दे दे और 90 दिन बाद कारखाना बंद हो जाए. वैसी स्थिति में आपको छँटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी ही मिलेंगे. प्रोविडेंट फंड तो वैसे भी आपका ही है. इसलिए हमें एक बार फिर याद करना पड़ेगा कि इस सप्ताह के शुरू में जब हमने हड़ताल शुरू की थी तब आपने ही एक स्वर में कहा था कि, “हम ‘ट्रक सिस्टम’ समाप्त होने और फेयर वेजेज लागू किए बिना काम पर नहीं जाएंगे. चाहे नौकरी क्यों न चली जाए.”

अब हमारे पास दो रास्ते हैं—या तो हम इस फर्जीवाड़े के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ते हुए हड़ताल जारी रखें, या फिर फिलहाल पुरानी शर्तों पर काम पर लौट जाएं. और क्लोजर पर सरकार के फैसले तक इंतजार करें. इससे आपको अगले तीन माह के वेतन मिल जाएंगे. फैसला आपका है."

सभा में एक पल के लिए भारी खामोशी छा गई. तभी एक अधेड़ उम्र का मज़दूर, जिसके हाव-भाव से ही अनुभव और गंभीरता का अहसास होता था खड़ा हुआ माइक हाथ में लिया.

"साथियों," उन्होंने गूँजती आवाज़ में कहा, "मालिक कहता है कि कारखाना उसका है. अरे, इस कारखाने की एक-एक मशीन हमने अपने हाथों से लगाई है, इस कारखाने की ईंट-ईंट हमारे पसीने से भीगी है. जब हम निर्माण कर सकते हैं, तो हम मजदूर इसके असली मालिक हैं. और जो मालिक कहलाता है, वह बकौल बापू गांधी केवल ट्रस्टी है. अब ये ट्रस्टी एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर हमारे हक को निगल रहे हैं?"

मज़दूरों के बीच से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा गूँजा. अधेड़ मज़दूर ने आगे कहना जारी रखा, "उस 'ट्रक सिस्टम' की गुलामी में वापस जाने से बेहतर है कि हम बाहर फावड़ा चला लें, गड्ढे खोद लें. हम इस बेईमान मैनेजमेंट के आगे अपना आत्मसम्मान नहीं खोएंगे. हड़ताल जारी रहेगी और अब हम क्लोजर का जवाब कोर्ट में देंगे!"

मज़दूरों को हड़ताल होने से पहले की मीटिंग याद आई. जब फैसले के लिए हाथ उठवाए गए कि हड़ताल जारी रखी जाए या स्थगित कर दी जाए तो बहुमत ने एक स्वर में हड़ताल जारी रखने का निर्णय लिया. रामजी काका, सोच रहे थे, अब जब मजदूरों के घरों की रसोइयों पर संकट गहराएगा, तब 'सामूहिक रसोई' चालू करनी ही पड़ेगी.

प्रिया ने दूर से ही प्रशांत बाबू को सिर हिलाकर संकेत दिया. उसे अहसास हुआ कि कोडिंग और डेटा एनालिसिस केवल कागज थे, असली ताकत तो शोषण के विरुद्ध खड़े होने का वह 'जज़्बा' है जो इन मज़दूरों को खाली जेब होने के बावजूद सीना तानकर खड़े रहने की शक्ति दे रहा था.
... क्रमशः

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

कच्चा चिट्ठा

देहरी के पार, कड़ी - 21
मेवाड़ भोजनालय से निकलने के पहले प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य ने आपस में बात करके एनालिसिस का तरीका तय किया. प्रिया ने दो-दो बैलेंस शीटें तीनों को बाँट दीं. तीनों को सोने के पहले इनके सैकड़ों पन्नों पर छपे डेटा को डिजिटल फॉर्म में और सर्च करने योग्य सॉफ्ट कापी में बदलना था. चारों ने सुबह नौ बजे ऑनलाइन मीटिंग मिलना तय किया. प्रिया ने अपने पास कोई बैलेंस शीट नहीं रखी थी. वह फैक्ट्री के क्लोजर की अनुमति का आवेदन और उसके साथ के दूसरे दस्तावेजों को अपने साथ ले आई थी. उसे इनका अध्ययन कर एनालिसिस के लिए आधार बिन्दु तैयार करने थे.

चारों अपने-अपने घर पहुँचकर सक्रिय हो गए. प्रिया ने क्लोजर के आवेदन की फाइल का अध्ययन आरंभ किया तो शेष तीनों टाटा की हाई-रीजोल्यूशन स्कैनिंग करने में जुट गए. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उन सैकड़ों पन्नों के डेटा को प्रिंट से डिजिटल फॉर्म में बदलकर सर्च करने योग्य बनाना था. स्कैनिंग के बाद ओसीआर (Optical Character Recognition) सॉफ्टवेयर के ज़रिए उन जटिल सारणियों को टेक्स्ट फाइलों और एक्सेल शीटों में बदलना शुरू किया. देर रात जब वे सोने के लिए गए, उसके पहले तमाम बैलेंस शीटों की सॉफ्ट कॉपियाँ तैयार हो चुकी थीं.

शनिवार सुबह वे चारों ऑनलाइन मीटिंग में मिले. तीनों ने अपने पास की सॉफ्ट कॉपियाँ प्रिया को भेज दीं. उसने अगले दस मिनट में तमाम सॉफ्ट कॉपियों को कंपाइल करके शेष तीनों साथियों को भेजा. अब सभी के पास उनकी एक-एक सॉफ्ट कॉपी थी.

प्रिया ने कहा, "हम इन आंकड़ों को 'पीछे से आगे' (Reverse Chronology) के क्रम में देखेंगे. छठे साल के घाटे से शुरू करके वापस पहले साल के मुनाफे तक जाएंगे, तभी हमें प्रबंधन की 'फाइनेंशियल इंजीनियरिंग' पकड़ में आएगी."

जैसे-जैसे डेटा साफ होता गया, चारों की आँखें फटती चली गईं.

प्रिया ने स्क्रीन शेयर करते हुए एक ग्राफ दिखाया, "देखो, पिछले छह सालों में मज़दूरों के वेतन और उनके कल्याण पर होने वाले खर्च का प्रतिशत (Percentage of Labour Cost) वार्षिक खर्चों का 3% के आसपास रहा है. यह या तो स्थिर था या उसमें मामूली गिरावट आई. यह साफ़ बताता है कि मज़दूरों की 'ट्रक सिस्टम' को समाप्त करने और 'फेयर वेजेज' की लड़ाई एकदम जायज थी. मालिक उन्हें एक धेला भी एक्स्ट्रा नहीं दे रहा था."

लेकिन असली 'झोल' कहीं और था. आदित्य ने 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' के कॉलम को हाईलाइट किया. "यहाँ देखो! तीसरे साल के बाद से ऑफिस के खर्चे, मैनेजमेंट की फीस, और 'कंसल्टेंसी चार्जेज' जो कभी भी 3% से अधिक नहीं रहे, बढ़ते-बढ़ते पिछले तीन वर्षों से चार गुना बढ़कर 11 से 13 प्रतिशत के बीच झूल रहे हैं. जिस दौरान फैक्ट्री को 'घाटे' की ओर धकेला जा रहा था, उसी दौरान प्रबंधन खुद पर होने वाले खर्च को बेतहाशा बढ़ा रहा था."

स्नेहा ने डेटा का विश्लेषण करते हुए बताया, "यह कोई प्राकृतिक घाटा नहीं है. इन्होंने जानबूझकर संभावित मज़दूर आंदोलन को भांपते हुए बैलेंस शीट को 'मैन्युपुलेट' किया है और मुनाफे को खर्चों के नाम डाल दिया है जिससे उसे 'घाटा' दिखाया जा सके.

राहुल कहने लगा खर्चों के नाम पर डाली गयी यह बड़ी धनराशि जो हर साल मजदूरों पर खर्च होने वाली राशि की लगभग तीन गुना है और किसी न किसी की जेब में काला धन बन कर गयी होगी. इसने उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को मालामाल कर दिया होगा. इधर बढ़ता हुआ घाटा दिखा कर हर साल मजदूरों को क्लोजर (Closure) का डर दिखाया जाता रहा और उनकी मजदूरी बढ़ाने की न्यायोचित मांग दबा दी गयी. यह एक सोची-समझी विधिक चाल ही नहीं बल्कि बड़ा घोटाला है और आर्थिक अपराध भी है."

प्रिया की टीम ने एक विस्तृत 'एनालिसिस रिपोर्ट' तैयार की, जिसमें हर उस फर्जीवाड़े को चिन्हित किया गया था जहाँ आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ हुई थी. प्रिया ने रिपोर्ट की दो कॉपी प्रिंट कर लीं. एक बजे से ऊपर का समय हो चुका था. चारों ने सुबह से चाय-ब्रेड-बिस्कुट के सिवा कुछ नहीं लिया था. उन्होंने तय किया कि वे मेवाड़ भोजनालय जाकर लंच करेंगे और वहीं से शाम की आमसभा देखने के लिए फैक्ट्री गेट पहुँचेंगे.

वे मेवाड़ भोजनालय पहुँचे तो दो बजे से अधिक समय हो चुका था. प्रशांत बाबू मेवाड़ भोजनालय के उसी पिछले कमरे में मिले जहाँ विक्रांत की गिरफ्तारी के बाद सबने डिनर किया था. प्रिया ने रिपोर्ट की फाइल उनके सामने रख दी. उन्होंने फाइल को तुरंत अपनी टेबल पर फैलाया और उसे पढ़ने लगे. वे रिपोर्ट के नोट्स पढ़ते जाते थे और उनसे संबंधित डाटा का ग्राफ गौर से देखकर समझने की कोशिश कर रहे थे. भोजनालय का कर्मचारी पानी लेकर आया तो प्रिया ने सभी के लिए लंच ऑर्डर कर दिया. प्रिया की टीम एक अलग टेबल पर आ गयी, वे धीमी आवाज में बातें करने लगे जिससे प्रशांत बाबू के काम में व्यवधान न हो.

अचानक प्रशांत बाबू बोल उठे. "कॉमरेडों, तुमने कच्चा चिट्ठा तैयार करके जबर्दस्त काम किया है. फैक्ट्री प्रबंधन के लिए यह डेथ वारंट जैसा साबित होगा.. हमने साबित कर दिया है कि फैक्ट्री मुनाफे में चल सकती है, बस मालिक की नीयत खोटी है." उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी.

"शानदार! यह काम एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की टीम हफ़्तों में करती. अब हमारे पास आम सभा में मज़दूरों को देने के लिए केवल ही भाषण नहीं, बल्कि ठोस सबूत हैं."
... क्रमशः

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

अदृश्य हमला

देहरी के पार, कड़ी - 20
प्रशांत बाबू ने पिछली रात ही प्रिया को फोन पर बता दिया था कि, “तैयार रहना, ईसीआई इंडस्ट्री का मालिक कल कोई बड़ा धमाका करने वाला है." काम पर पहुँचते ही उसने आदित्य, स्नेहा और राहुल को भी सूचना दे दी कि आज कुछ बड़ा हो सकता है, और हमें कोई नया टास्क मिल सकता है. अब वे इस बड़ी की सूचना के इन्तजार में थे.

ईसीआई फैक्ट्री के गेट पर शुक्रवार की सुबह एक अजीब सी उदासी के साथ शुरू हुई, पिकेटिंग स्थल पर मज़दूरों की गतिविधियाँ उनकी दिनचर्या बन चुकी थी. अदालती आदेश ने जो 'सौ मीटर' की लक्ष्मण रेखा खींची थी, उसके दोनों ओर मज़दूर शामियानों पर शांति से बैठे थे. दूसरे शामियाने के लिए ऑफिस का साउंड सिस्टम ले आया गया था. अब दोनों ओर से नारेबाजी, भाषण, क्रान्तिकारी गीत बारी-बारी से गूंजने लगे थे. एक ओर का स्पीकर बंद होता तो दूसरी ओर का शुरू हो जाता. कभी दोनों ओर से सवाल जवाब होने लगते.

सुबह नौ बजे फैक्ट्री में जब जनरल शिफ्ट का स्टाफ—मैनेजर, सुपरवाइजर और अकाउंट विभाग के लोग गेट के अंदर दाखिल हुए, तो मज़दूरों ने कोई नारेबाजी नहीं की. वे बस उन्हें देखते रहे. मजदूरों के मन में नौकरी खोने का कोई भय नहीं था, बल्कि एक गहरी विरक्ति थी. वे उस 'ट्रक पद्धति' से इतने तंग आ चुके थे कि उनके लिए कारखाना चालू रहना या बंद होना, दोनों ही संघर्ष के दो अलग रास्ते थे. वे महंगाई के इस दौर में केवल अपने पसीने की सही कीमत 'फेयर वेजेज' चाहते थे.

दोपहर बाद चार बजे तक माहौल सामान्य था. तभी सड़क के दक्षिणी छोर से एक डाकिया अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ पिकेटिंग स्थल पर आया. उसके पास 'स्पीड पोस्ट ए.डी.' का एक भारी-भरकम पीला लिफाफा था. डाकिया अक्सर खुशियाँ लाता है, पर उस लिफाफे पर 'जनरल मैनेजर' की सील देखकर यूनियन कार्यसमिति के सदस्य सतर्क हो गए. अध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर ए.डी. का कार्ड लौटा दिया. यूनियन कार्यसमिति के सभी सात सदस्य एक शामियाने में गोल घेरा बनाकर बैठ गए.

लिफाफा खुला और उसके साथ ही प्रबंधन का वह 'अदृश्य हमला' सबके सामने आ गया. प्रबंधन ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-O का सहारा लेते हुए राज्य सरकार को उद्योग बंद करने (Closure) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था. आवेदन के साथ पिछले छह वर्षों की बैलेंस शीटों का एक पूरा जखीरा नत्थी किया गया था.

प्रशांत बाबू को तुरंत खबर दी गयी. वे अपने काम से जल्दी छूट कर शाम छह बजे पहुँचे. उन्होंने डाक से मिले दस्तावेजों को सरसरी तौर पर देखा. उनकी आँखों के सामने पिछले छह सालों का एक सुनियोजित 'वित्तीय प्रपंच' घूमने लगा. प्रबंधन ने आंकड़ों को बड़ी सफाई से पेश किया था, पहले दो वर्ष: मुनाफ़े को धीरे-धीरे गिरता हुआ दिखाया गया. तीसरे वर्ष एक 'मामूली लाभ' की तस्वीर पेश की गई. चौथे से छठे वर्ष तक एक खड़ी ढलान की तरह बढ़ता हुआ घाटा दिखाया गया था.

प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में साथियों को समझाया, "यह आंकड़ों की बाजीगरी है. प्रबंधन ने सरकार को यह दिखाने की कोशिश की है कि यह संस्थान अब 'इकोनॉमिकली वायबल' नहीं रहा. और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को इसपर फैसला सुनाकर उसकी सूचना इस आवेदन को देने के 60 दिनों के भीतर फैक्ट्री प्रबंधन को देनी है. अगर साठ दिन बीत गए और सरकार ने प्रबंधन को कोई जवाब नहीं दिया, तो कानूनन इसे उद्योग को बंद करने की 'डीम्ड परमिशन' मान लिया जाएगा. उसके बाद आवेदन प्रस्तुत करने से 90 दिन बाद उद्योग को बंद कर दिया जाएगा.”

यूनियन अध्यक्ष ने यह खबर मजदूरों को दी तो उनमें से कोई भयभीत नहीं हुआ. बल्कि उनके बीच से किसी ने नारा लगाया, “इंकलाब ज़िंदाबाद.” मजदूरों ने पूरी बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया.

“हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है.” यह दूसरा नारा था जिसका और जोश के साथ मजदूरों ने जवाब दिया.

नारों के बाद एक पुराने मज़दूर ने खड़े होकर अध्यक्ष के हाथ से माइक ले लिया. कहने लगा, साथियों हमें कारखाने के बंद हो जाने का कोई डर नहीं है. हम वेतन के ‘ट्रक सिस्टम’ में घुट-घुट कर मर जाने से बेहतर समझते हैं कि एक बार में ही हिसाब हो जाए. जितना ये हमें वेतन देते हैं, उससे अधिक तो हम फुटकर मजदूरी करके भी कमा लेंगे. अगर कारखाना बंद होता है तो हम इस कैद से आज़ाद हो जाएंगे.”

पुराने मजदूर के चुप होते ही मजदूरों ने फिर से नारा लगाया, “इंकलाब जिन्दाबाद.”

इस बार तमाम मजदूरों ने पहले से भी अधिक बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया. ...

ज़्यादातर मज़दूर पुरानी वेतन पद्धति से इतने परेशान थे कि अब वे 'फेयर वेजेज' से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं थे. हाँ, कुछ युवा मज़दूर थोड़े विचलित ज़रूर थे कि अचानक काम बंद हुआ तो शहर में गुज़ारा कैसे होगा, लेकिन सामूहिक स्वर 'आर या पार' का ही था.

कार्यसमिति ने प्रशांत बाबू के साथ मिल कर तय किया कि शनिवार शाम चार बजे पिकेटिंग स्थल पर ही मज़दूरों की 'आम सभा' बुलाई जाए. उन्हें इस कानूनी आवेदन का तकनीकी सच बताना ज़रूरी था.

प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.

प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मेन्युफेक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों को अपने साथ ले जा सकते हैं?”

“हाँ, बिलकुल ले जाएँ, पर हमें एनालिसिस कल दो-तीन बजे तक मिल जाए.” प्रशांत बाबू ने कहा. “पर तुम लोग अब मुझे ‘सर’ कहने से मुझे मुक्ति दो. हम एक दूसरे के साथी हैं. तुम सब मुझे ‘कॉमरेड’ कह सकते हो.”

‘बिलकुल, हम आपको अपना एनालिसिस कल दो बजे तक दे देंगे, कॉमरेड.” प्रिया ने ‘कॉमरेड’ इतना सहज तरीके से कहा था कि बाकी चारों की हँसी छूट पड़ी और ठहाके में बदल गयी.

तभी रामजी काका भी आ गए. भोजनालय के कर्मचारी उनके लिए खाना लगाने लगे.
... क्रमशः

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

निषेधाज्ञा

देहरी के पार, कड़ी - 19
मंगलवार की सुबह भी प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी की उसी शांत सड़क पर, कारखाने के गेट से कुछ दूर उसी बेंच पर आकर बैठे. लेकिन कुछ ही मिनट बाद प्रिया का फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे. उन्होंने कहा, "बैठने का स्थान बदलो, जरूरी है." वे तुरंत वहाँ से उठकर फैक्ट्री गेट के सामने होते हुए दूसरी और पहुँचे वहाँ ऐसी ही एक बैंच देखकर बैठ गए. हड़ताल का जोश दूसरे ही दिन एक 'अनुशासन' में बदल चुका था. गेट पर मज़दूरों की टोलियाँ शांतिपूर्ण तरीके से वहाँ लगाए गए शामियाने में बैठी रहीं. मजदूरों के पास लाउडस्पीकर सिस्टम था. कोई न कोई उस पर भाषण देता रहता. बीच-बीच में जोशीले नारे भी लगते. मजदूरों के बीच बहुत से अच्छे गायक भी थे, वे क्रांतिकारी गीत गाते. इसी तरह उनका समय गुजरता. शाम छह बजे पिकेटिंग समाप्त कर दी जाती. दस-पंद्रह लोग शामियाने में रात रहते. मजदूरों की आँखों में दृढ़ संकल्प दिखाई देता.

बुधवार सुबह आठ बजे के कुछ पहले प्रशांत बाबू पिकेटिंग के स्थान से टहलते हुए उस बेंच तक पहुँचे, जहाँ प्रिया और उसके साथी बैठे थे. उन्हें देख राहुल और आदित्य खड़े होने लगे तो उन्होंने इशारे से मना कर दिया. फिर खड़े-खड़े ही उन्होंने गंभीरता से कहा, "साथियों, अब तुम्हें यहाँ आने की जरूरत नहीं है. तुमने तीन दिन इस संघर्ष को जीकर महसूस कर लिया है. यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं, तुम 'अदृश्य' रहकर हमारे सूचना तंत्र को संभालो.” चारों स्तब्ध होकर सुन रहे थे. “मैं यहाँ से टहलते हुए कुछ दूर जाकर वापस लौटूंगा. मैं वापस शामियाने तक पहुँच जाऊँ, तब तुम यहाँ से निकल लेना. रामजी काका ने तुम्हें याद किया है उनसे मिलते हुए जाना.”

वहाँ से वापस लौटते हुए चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे. रामजी काका उन्हें देखते ही चहक उठे. “आओ बच्चों, लगता है आज सुबह-सुबह रास्ता भूल गए हो, मैं तो तुम्हें देखने को ही तरस गया था.”

“नहीं काका, हम सुबह तो रोज वैसे ही लेट उठते हैं और जैसे तैसे समय से काम पर पहुँचते हैं. यह तो तीन दिनों से हम जल्दी उठकर छह बजे ही ईसीआई के मजदूरों की हड़ताल देखने पहुँच जाते थे. वहाँ से वापस घर होकर ऑफिस पहुँचते थे. सुबह जल्दी उठने की वजह से शाम को ऑफिस से छूटते ही सीधे घर पहुँचना ही सूझता था. आज भी वहीं गए थे, प्रशांत बाबू ने ही कहा कि हम लौटते हुए आपसे मिलकर जाएँ. आप हमें बहुत याद कर रहे हैं.” प्रिया ने सफाई देने की कोशिश की.

“हाँ बिटिया, प्रशांत बाबू न भेजते तो तुम लोग तो आज भी नहीं आते. खैर छोड़ो, तुम अंदर चलकर बैठो, आज तुम सबका ब्रेक फास्ट यहीं है. मैं भी आता हूँ.

वे अंदर जाकर बैठे. कुछ देर बाद रामजी भी वहाँ आ गए. तब तक सबके लिए पोहा और जलेबी का नाश्ता आ गया था.

“देखो बच्चों, तुम अभी वाकई नासमझ हो।” रामजी काका ने परिवार के बुजुर्ग की तरह बोलना शुरू किया. “तुम तीन दिन से हड़ताल देखने जा रहे हो, यह ठीक नहीं है. जो काम तुम अपने ऑफिस या घर से कर सकते हो, उसके लिए हड़ताल की जगह जाना जरूरी नहीं. यह पूंजीपति और मजदूरों की लड़ाई है और निजाम पूरी तरह पूंजीपति का है. वह अभी तुम पर हाथ नहीं डालेगा. लेकिन जैसे ही उसे पता लगेगा कि तुम मजदूरों के संघर्ष को धारदार बनाते हो, तो वह तुम्हें नहीं बख्शेगा. इसलिए जरूरी है कि इस लड़ाई का हर सिपाही यथाशक्ति इसके लिए काम भी करे और खुद को बचाकर भी रखे. तुम अब मजदूर वर्ग के सिपाही हो, तुम्हें उसी के हिसाब से सोचने की आदत डालनी चाहिए. तुम शाम के समय यहाँ आ सकते हो. तुम्हें हड़ताल की सारी सूचनाएँ यहीं मिलेंगी.”

चारों अवाक थे कि 'रामजी मजदूरों की लड़ाई के बारे में इतने गंभीर कैसे हैं?' रामजी उनकी जिज्ञासा समझ कर बोले. “अभी मेरे बारे में कुछ मत पूछना. तुम्हें घर होकर अपने ऑफिस जाना है. मेरी कहानी फिर किसी दिन फुरसत में सुनाऊंगा.”

नाश्ता करके चारों चल दिए.

गुरुवार सुबह आठ बजे, जब मज़दूर रोज़ की तरह गेट पर जमा थे, अचानक दो पुलिस गाड़ियाँ वहाँ आकर रुकीं. इस बार पुलिस का रवैया सख्त था. इंस्पेक्टर ने हाथ में एक कागज़ लहराते हुए यूनियन अध्यक्ष और सैक्रेटरी को बुलाया.

"यह सिविल कोर्ट का अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) आदेश है," इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज़ में कहा. "कारखाना मालिक की अर्जी पर अदालत ने आदेश दिया है, 'कोई भी मज़दूर या प्रदर्शनकारी कारखाने के मुख्य द्वार के 100 मीटर के दायरे में पिकेटिंग नहीं करेगा.' आप लोग तुरंत पीछे हटिए, वरना हमें बल प्रयोग करना पड़ेगा."

यूनियन अध्यक्ष ने कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) पढ़ी. उन्होंने देखा कि कानून की कलम ने मज़दूरों को उनके अपने ही कारखाने की देहरी से 'दूर' कर दिया था.

अब मज़दूरों ने अपनी पिकेटिंग को दो हिस्सों में बाँट लिया. अनुशासन ऐसा था कि बिना किसी शोर-शराबे के, आधे मज़दूर सड़क के उत्तरी छोर पर चले गए और आधे दक्षिणी छोर पर. 100 मीटर की वह खाली सड़क अब 'मालिक के अहंकार' और 'मज़दूरों के धैर्य' के बीच की एक सरहद बन गई थी.

प्रिया को यह खबर अपने ऑफिस के केबिन में मिली. उसने राहुल को मैसेज किया— "कोर्ट के आदेश ने मजदूरों को शारीरिक रूप से दूर किया है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि डिजिटल दुनिया में 100 मीटर की दूरी का कोई अस्तित्व नहीं है."

प्रिया की टीम ने तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर एक नया संदेश प्रसारित किया: "दूरी बढ़ी है, हौसला नहीं. हम गेट से दूर हुए हैं, लक्ष्य से नहीं."

शाम को मेवाड़ भोजनालय में रामजी काका ने प्रशांत बाबू से कहा, "बाबू, 100 मीटर दूर होने से क्या होता है? हमारी निगाहें तो अभी भी गेट पर ही हैं. हम गेट पर ही 'सामूहिक रसोई' शुरू करेंगे. हड़ताल करने वाले मजदूर वहीं सड़क के किनारे बैठकर खाना बनाएंगे और खाएंगे."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रिया को फोन किया, "प्रिया, अब असली परीक्षा शुरू हुई है. कल शुक्रवार है, और मुझे लग रहा है कि मालिक कोई बड़ा धमाका करने वाला है. तैयार रहना."
... क्रमशः

रविवार, 5 अप्रैल 2026

टूटती जंजीरें

देहरी के पार, कड़ी - 18
सुबह पाँच बजे, अंधेरी की सड़कें अभी सुबह की पहली किरण की प्रतीक्षा में थीं. राहुल, स्नेहा और आदित्य अपने-अपने आवासों से निकल कर प्रिया के यहाँ पहुँचे थे और वहाँ से वे एक कॉमन टैक्सी लेकर रवाना हुए. उनके लिए सोमवार की यह सुबह बहुत खास थी. विक्रांत को छकाने और उसे पकड़कर पुलिस के हवाले करने के दौरान वे सामूहिक कोशिशों की ताकत को समझ चुके थे. उन चारों की टैक्सी 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के मुख्य द्वार से कुछ दूर आकर रुकी. वे चारों उतरकर वहीं पास में एक पेड़ के निकट सड़क के किनारे लगी बेंच पर बैठ गए. वे अपनी पहचान गुप्त रखते हुए उस संघर्ष को अपनी आँखों से देखना और महसूस करना चाहते थे, जिसे उन्होंने अब तक केवल किस्सों, कोडिंग और डेटा में जिया था.

कारखाने का विशाल लोहे का गेट अभी बंद था. सामने वाली पूरी सड़क अभी सन्नाटे में डूबी थी. कुछ ही देर में हलचल होने लगी. दो-दो चार-चार की संख्या में मज़दूर आकर फैक्ट्री के गेट के आसपास जमा होने लगे. कारखाने में प्रोडक्शन की दो ही शिफ्टें चलती थीं. सुबह छह बजे से दोपहर दो बजे तक और दो बजे से रात दस बजे तक. ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों की शिफ्ट सुबह आठ बजे से शाम पाँच बजे तक की होती. छह बजने में अभी देर थी, लेकिन उससे पन्द्रह मिनट पहले ही वहाँ सुबह की शिफ्ट में आने वाले मजदूरों से अधिक मजदूर इकट्ठा हो चुके थे. दूसरी शिफ्ट के भी बहुत मजदूर सुबह ही आ गए थे. तभी एक पुलिस कार वहाँ पहुँची और उससे एक इंस्पेक्टर, एक असिस्टेंट इंस्पेक्टर, एक हेड कांस्टेबल और दो सिपाही उतरे. कार के पीछे ही एक पुलिस बस आकर गेट से कोई पचास मीटर पहले ही खड़ी हो गई. उससे करीब तीस सिपाही नीचे उतरे. उनमें से अधिकांश के कंधे पर पथराव से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बेंत की बनी केन-शील्ड लदी थीं.

“अभी गाँव बसा नहीं कि लुटेरे पहले आ गए.” राहुल ने कहा. “पुलिस पहले ही आ गई. हमारे तो बुलाते-बुलाते नहीं आती.”

प्रिया को अचानक अपने शहर कोटा की याद आई. उसने बचपन में सुना था कि कैसे वहाँ के जे.के. सिंथेटिक्स कारखाने के मज़दूरों ने 1971 में कानूनी सीमा से अधिक बोनस देने की मांग के लिए फौलादी लड़ाई लड़ी थी. जिसे तोड़ने के लिए वहाँ के एसपी के इशारे पर कारखाने के गार्डों ने पिकेटिंग कर रहे मजदूरों पर गोलियाँ चलवा दी थीं और आठ मजदूर शहीद हो गए. आज भी उस उजाड़ फैक्ट्री के दरवाजे के सामने आम सड़क के किनारे उन मजदूरों की याद में शहीद स्मारक खड़ा है जहाँ हर वर्ष गोलीकांड के दिन मजदूर इकट्ठा होकर अपने शहीद साथियों को याद करते हैं.

“पुलिस अपने आप नहीं आई होगी.” प्रिया ने कहा, “इसके लिए जरूर कारखाना मालिक ने पहले से मुंबई पुलिस कमिश्नर को आवेदन किया होगा और एडवांस में खर्चा जमा कराया होगा. हालाँकि पूछने पर पुलिस यही कहेगी कि वह किसी भी संभावित हिंसा की रोकथाम के यहाँ आई है.”

“मुझे तो लगता है जैसी यूनियन और मजदूरों की तैयारी है खाकी वर्दियाँ यहाँ पिकनिक ही मनाकर ही लौटेंगे.” राहुल ने पुलिस की खिल्ली उड़ाने के लहजे में कहा.

“पुलिस की इस तरह खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं. वह हमारी मदद भी करती है, जैसे विक्रांत के मामले में की थी.” आदित्य बोला.

“वह सही है, पर जहाँ मामला किसी पूंजीपति का हो वह उसी का पक्ष लेती है, मजदूरों का साथ देने का उदाहरण तो मैंने कभी नहीं देखा न सुना.” राहुल ने पलट कर जवाब दिया.

“हाँ, ये तो है,” प्रिया ने कहा. आदित्य और स्नेहा ने भी इस पर अपनी सहमति व्यक्त की.

छह बजने के कुछ ही देर बाद राहुल को कंपनी की एक बस कारखाने के पिछले गेट की ओर जाने वाले संकरे रोड पर मुड़ती दिखी. उसमें करीब पंद्रह-बीस मज़दूर थे. जरूर प्रबंधन इन्हें कुछ डराकर और लालच देकर लाया होगा. उसने तुरंत अपने तीनों साथियों को बताया. आदित्य ने अपने मोबाइल से संदेश भेजा. तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर अलर्ट गूँजा. बीस-तीस मज़दूर जो सतर्कता के लिए पिछली गली में तैनात थे, उन्होंने बस को रोक लिया.

कोई हिंसा नहीं हुई, कोई धक्का-मुक्की नहीं. बस तीन-चार वरिष्ठ मज़दूर आगे आए, बस के अंदर झाँका और बड़े धीरज से बोले, "साथियों, आज अंदर जाओगे तो कल की रोटी और महंगी हो जाएगी. आओ, शामियाने में बैठो." वे मज़दूर, जो डर और लालच के मारे आए थे, अपने साथियों का हाथ थामकर बस से नीचे उतर आए. मैनेजर और सुपरवाइजरों को किसी ने नहीं रोका, वे आराम से कारखाने के अंदर पहुँच गए. लेकिन मजदूरों के बिना कोई प्रोडक्शन नहीं हो सकता था. वे किसे सुपरवाइज करते और क्या मैनेज करते. जिन्हें किया था वे तो अपने साथियों के चेहरे देखकर बस से उतर चुके थे.

नौ बजते-बजते यह साफ हो गया कि हड़ताल शत-प्रतिशत सफल है. कारखाने के अंदर सन्नाटा पसरा था. प्रिया और उसकी टीम वहाँ से निकलकर अपने ऑफिस की ओर चल दी. ग्यारह बजे उन्हें अपनी ड्यूटी पर पहुँच कर लॉग-इन करना था.

ऑफिस पहुँचने के बाद भी उनके फोन और लैपटॉप शांत नहीं थे. वे अपने काम के बीच-बीच में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' और 'पर्दाफाश' संदेशों का प्रबंधन कर रहे थे. प्रिया ने गौर किया कि उसके ऑफिस के वातावरण और कारखाने के गेट के उस माहौल में कितनी दूरी थी, फिर भी एक 'श्रम' ही था जो उन्हें आपस में जोड़ रहा था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया "पहला दिन हमने जीत लिया, ज़ंजीरें टूट रही हैं." प्रिया के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई. उसने कोड लिखना शुरू किया. उसे महसूस हुआ कि आज उसकी कोडिंग में एक अलग तरह की ऊर्जा है. वह अब केवल एक 'सॉफ्टवेयर इंजीनियर' नहीं रह गई थी, वह अब उस बड़े 'सिस्टम' का हिस्सा थी जो न्याय की मांग कर रहा था. उसकी आँखों के सामने कतारों में लाल झंडे लिए जलूस निकालते कोटा के मजदूरों की तस्वीरें तैरने लगीं. उसने महसूस किया कि मजदूरों और शहीद स्मारक की यादों ने उसके अंदर एक अजीब सी शांति और साहस भर दिया है.
... क्रमशः