देहरी के पार, कड़ी - 67
प्रिया ने लैपटॉप की स्क्रीन पर 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' का फाइनल ड्राफ्ट पढ़ लिया. सब कुछ ठीक था. कुछ भी ऐसा न था जिसे जोड़े जाने का सुझाव वह दे सकती. उसने स्क्रीन से नजरें हटाकर मयंक की तरफ देखा, वह अभी भी बिस्तर पर अपने पैर फैलाए बेखबर सो रहा था. ‘मुंबई पहली बार हर किसी को थका डालती है.’ यह सोचकर वह मुस्कुराई और नहाने चली गई. वह तैयार होकर फिर से हॉल में आई, तब भी मयंक वैसे ही सो रहा था. रसोई में जाकर उसने नाश्ते के लिए मयंक की पसंद का पोहा तैयार करके दो प्लेटों में सजाया ऊपर से कोटा से मयंक के लाए रतलामी सेव से गार्निशिंग कर डाइनिंग पर रखे. फिर मयंक के कंधे को धीरे से हिलाकर उसे जगाते हुए कहा, "उठ भाई, निपट ले. सूरज कब का सिर पर आ गया है."
मयंक आँखें मलते हुए उठा और दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा. "ओह! नौ बज गए. दीदी, आज तो मैं वाकई घोड़े बेचकर सोया. कल की थकान ही ऐसी थी कि कुछ होश ही नहीं रहा."
"कोई बात नहीं, चाय और नाश्ता तैयार है. तुम जल्दी से ब्रश कर लो," प्रिया ने टेबल पर प्लेटें सजाते हुए कहा.
दोनों नाश्ते के बाद चाय पीते हुए बातें कर ही रहे थे कि प्रिया के फोन की रिंगटोन बज उठी. स्क्रीन पर आकाश का फोटो था. प्रिया ने कॉल रिसीव किया तो उधर से आवाज आई, "गुड मॉर्निंग प्रिया! संडे स्पेशल का क्या कार्यक्रम है आज?"
प्रिया ने हँसते हुए जवाब दिया, "गुड मॉर्निंग आकाश! कार्यक्रम का हाल यह है कि तुम्हारा मयंक भैया अभी-अभी सोकर उठा है और नाश्ता कर रहा है. उसे नहाने और तैयार होने में कम से कम एक घंटा लगेगा. तब तक ग्यारह बज चुके होंगे."
"एक काम करो, मैं फोन मयंक को देती हूँ. तुम दोनों बात करके तय कर लो कि क्या करना है. जो भी तुम दोनों तय करोगे, मैं उसमें शामिल हो जाऊँगी," प्रिया ने फोन मयंक की तरफ बढ़ा दिया.
मयंक ने फोन कान से लगाया, "हेलो आकाश भैया! ..... भैया, कल की भागदौड़ और सफर मैं तो बुरी तरह थक गया. अभी सोकर उठा हूँ, दीदी न जगातीं तो न जाने कब तक सोता रहता. मेरा तो शरीर भी अकड़ा पड़ा है. आज दिनभर धूप में घूमने के बजाय क्यों न आराम किया जाए? घूमना अगले वीकेंड तक के लिए पोस्टपोन कर देते हैं. आज शाम को हम सब साथ मिलकर कहीं बढ़िया डिनर कर लेंगे."
आकाश भी तुरंत सहमत हो गया. उसने कहा, "तुम्हारा यह विचार बिल्कुल उत्तम है. तो फिर डिनर के लिए 'एमबी' (मेवाड़ भोजनालय) सबसे बढ़िया रहेगा. इसी बहाने तुम रामजी काका से भी मिल लोगे और वहाँ घर जैसा और स्पेशल दोनों तरह का खाना मिल जाएगा है." मयंक ने प्रिया की और देखकर बताया कि आकाश भैया कह रहे हैं कि दिन में आराम करें और शाम को एमबी में डिनर कर लें. प्रिया ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया. शाम का कार्यक्रम तय हो चुका था.
दिन भर के आराम के बाद मयंक ने शाम को स्नान किया और तैयार होने लगा. रात साढ़े आठ बजे आकाश का फोन आया कि वह विक्रोली से सीधे 'एमबी' के लिए निकल रहा है. इधर प्रिया और मयंक अपने फ्लैट नीचे आकर फुटपाथ पर किसी टैक्सी या ऑटो का इंतज़ार करने लगे. मुंबई की शाम ढल चुकी थी और सड़कों पर रात की रोशनियाँ बिखर गई थीं. तभी एक ऑटो रिक्शा की रफ्तार धीमी हुई और ठीक उनके सामने आकर रुक गया.
ड्राइवर की सीट पर बैठे अधेड़ शख्स ने अपना सिर ऑटो से बाहर निकाला और प्रिया से मुस्कुराकर पूछा, "नमस्ते दीदी! कहाँ चलना है?" वे बब्बन भाई थे.
"नमस्ते बब्बन भाई! हम 'एमबी' तक जा रहे हैं वहीं छोड़ दीजिए," प्रिया ने ऑटो में बैठते हुए कहा. मयंक भी उसके पीछे ही आ बैठा.
ऑटो जैसे ही मुख्य सड़क पर दौड़ा, प्रिया ने आगे झुककर पूछा, "और सुनाइए बब्बन भाई, आजकल सब कैसा चल रहा है?"
बब्बन भाई ने सामने देखते हुए ऑटो चलाते हुए बोले, "अपना तो बताता हूँ दीदी, पहले आप बताइए... आपके साथ यह छोटा भाई है न?"
"हाँ, बब्बन भाई, आपने सही पहचाना, यह मेरा छोटा भाई मयंक है, परसों कोटा से आया है," प्रिया ने मयंक की तरफ देखा और फिर मयंक से कहा, "मयंक, ये बब्बन भाई हैं. तुम्हें जो मैंने मुंबई ऑटो रिक्शा यूनियन के बारे में बताया था, ये उसके उपाध्यक्ष हैं." मयंक ने अचरज और गहरे आदर के साथ बब्बन भाई की तरफ देखा. एक आदमी मुंबई जैसे महानगर के हजारों ऑटो चालकों की यूनियन का उपाध्यक्ष है और खुद सभी की तरह आटो चला रहा है. ‘नमस्ते बब्बन भाई, मैं आपको नहीं जानता था इसलिए पहले नमस्ते नहीं किया.
बब्बन भाई ने मुस्कुराकर शीशे में मयंक को देखा और फिर बोले, “कोई बात नहीं मयंक भैया. अब आगे से मिलें तो पहचान लेना और नमस्ते भी कर लेना.” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रिया से बोले "दीदी, मुंबई तमाम ऑटो रिक्शा चालकों और मालिकों के संगठनों ने मिलकर 'ऑटो रिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती' के नाम से संयुक्त मोर्चा बना लिया है. हमने इसी 9 जून को सरकार को 'हड़ताल का नोटिस' दे दिया है. इस बार हम आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं हम लोग."
"9 जून को हड़ताल का नोटिस दे दिया है? और मुझे अभी तक पता नहीं लगा. प्रशान्त बाबू ने भी जिक्र नहीं किया. हो सकता है ट्रिब्यूनल के लिए ईसीआई का क्लेम तैयार करने की बात में भूल गए हों. खैर, बब्बन भाई, आपकी मांगें क्या हैं?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.
बब्बन भाई ने विस्तार से समझाते हुए कहा, "मांगें बिल्कुल जायज और कानूनी हैं दीदी. पहली तो यह कि बढ़ती महंगाई के अनुपात में हमारी किराया दर (Fare Rate) तुरंत बढ़ाई जाए. दूसरी, हम चालकों के सामाजिक और आर्थिक भविष्य की सुरक्षा के लिए एक 'कल्याण बोर्ड' (Welfare Board) का गठन हो. और तीसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो निजी वाहन बिना कमर्शियल परमिट के, अवैध रूप से सार्वजनिक परिवहन का काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ सरकार जिला स्तर पर एक गश्ती दल बनाए और उनका संचालन तुरंत रोके. वे हमारे पेट पर लात मार रहे हैं."
मयंक चुपचाप बब्बन भाई की बातें सुन रहा था. उसे अहसास हो रहा था कि इस चमक-दमक वाले महानगर का हर एक पहिया, चाहे वह मिल के चक्के हों या ऑटो रिक्शा के टायर, गहरे आर्थिक और विधिक संयोजनों के सहारे घूम रहे हैं. जैसे ही इनमें कोई संयोजन बिगड़ता है, ये चरमराने लगते हैं. उन्हें फिर से संयोजित करना पड़ता है.
'एमबी' आ गया था. बब्बन भाई ने अपना ऑटो रोक दिया. मीटर पढ़कर प्रिया ने भाड़ा चुकाया. तभी बब्बन भाई ने प्रिया से आग्रह किया, "दीदी, इस बार हमारी मीटिंग में आइए न. आपके आने से हमारे चालकों का हौसला बहुत बढ़ जाएगा."
प्रिया ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, "बब्बन भाई, मैं भी कंपनी की नौकरी करती हूँ. शनिवार और इतवार के अलावा मेरे लिए समय निकालना बहुत मुश्किल होता है."
बब्बन भाई ने तुरंत कहा, "दीदी, अगले रविवार को ही हमारे ऑफिस में हमारी यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक है. आप उसमें आ जाएँ तो हमारा उत्साह दोगुना हो जाएगा, आप हमारी कार्यकारिणी के बाकी मेंबरों से भी मिल लेंगी."
प्रिया ने मयंक की तरफ देखा और फिर बब्बन भाई से कहा, "अगले रविवार का कार्यक्रम मैं आपको शनिवार को ही पक्का बता पाऊँगी. आजकल मयंक भी यहीं आया हुआ है."
"कोई बात नहीं दीदी, मैं शनिवार को खुद आपको फोन करके पूछ लूंगा," बब्बन भाई ने हाथ की मुट्ठी बना कर अभिवादन किया प्रिया ने वैसे ही उसका जवाब दिया. बब्बन भाई अपना ऑटो लेकर आगे बढ़ गए.
प्रिया और मयंक जैसे ही 'एमबी' में दाखिल हुए, उन्होंने देखा कि आकाश पीछे एक बीच की टेबल पर पहले से मौजूद था. होटल में कदम रखते ही काउंटर पर बैठे रामजी काका के चेहरे पर वात्सल्य उभर आया. उन्होंने ज़ोर से कहा, "आओ बिटिया! आओ आज तो मयंक भैया भी साथ हैं." मयंक को आश्चर्य हुआ कि उन्होंने उसे पहचाना कैसे और उसका नाम कैसे याद है.
होटल में सिर्फ रामजी काका ही नहीं, पानी की बोतल लाने वाले लड़के से लेकर ऑर्डर लेने वाले वेटर तक, होटल का सारा स्टाफ प्रिया को देखते ही बेहद आदर से 'दीदी, नमस्ते' कहने लगा. उनके लहजे में वही अपनापन था, जो किसी सगे भाई की आवाज़ में होता है. वे कोने की टेबल पर आकाश के पास आ बैठे. उनके पीछे ही रामजी काका भी आए और कहने लगे. मयंक, बेटा, ‘एमबी’ को अपनी ही जगह समझो और मुझे अपना चाचा। मैं भी कोटा के पास भैंसरोड़गढ़ से ही हूँ.
मयंक अपनी डाइनिंग चेयर पर बैठा, चुपचाप चकित होकर चारों ओर देख रहा था. वह भीतर तक निःशब्द था. कोटा से अपनी अनचाही शादी को ठुकरा कर आधी रात को घर से निकल जाने वाली उसकी दीदी प्रिया इस अजनबी, विशाल और क्रूर माने जाने वाले मुंबई महानगर के आम मेहनतकशों, दुकानदारों और मज़दूरों के दिलों में अपने लिए इतना गहरा, सम्मान और स्थान बना लेगी, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. दीदी के इस वृहत और सम्माननीय व्यक्तित्व को देखकर मयंक को उस पर गर्व हो रहा था. वह सोच रहा था कि काश मम्मी-पापा यहाँ आएँ और देखें कि उनकी बेटी क्या है.
... क्रमशः
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