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मंगलवार, 3 मार्च 2026

सामाजिक लक्ष्य

पिंजरा और पंखा-46

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
जुलाई में अच्छी बारिश हो गयी थी. सदियों से न जाने कितनी प्यास इस धरती के पास जमा है कि चाहे कितनी ही बरसात हो, सारा पानी घंटों में पी जाती है. बनस्थली और आसपास के इलाके में हरियाली अपनी पूरी रंगत में थी. रेतीली जमीन पर हरियाली की चादर बिछ गई थी. शगुन की व्यस्तता बढ़ गयी थी. ऑनर्स मनोविज्ञान में उसका आखिरी साल था. समय निकाल पाना बहुत कठिन था. लेकिन उसका मन रह-रहकर आयुष के ईमेल के इर्द-गिर्द घूमता रहता.

उस दोपहर, डिपार्टमेंट की लाइब्रेरी में बैठी शगुन को फिर से आयुष के ईमेल की याद आई. उसने कंप्यूटर पर जाकर फिर से अपना ई-मेल अकाउंट खोला और इस बार आयुष का ई-मेल को प्रिंट कमांड दिया. थोड़ी देर में प्रिंट उसके हाथ में था. वह उसे फिर से पढ़ने लगी.— "दीदी, यहाँ सब कुछ शून्य (0) और एक (1) के बीच है. लेकिन लगभग कुछ समय लैब में गुजारना पड़ता है. ड्राइंग्स ही ड्राइंग्स, रेखाएँ खींचने के बीच यहाँ की उमस पसीना बहाने लगती है. ऐसा लगने लगता है कि इंजीनियर बनने से पहले मजदूर होना जरूरी है. अब समझ आ रहा है कि बहुत सारे आविष्कार अनपढ़ और अल्पपढ़ मजदूरों ने कैसे कर दिखाए?"

शगुन के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत रिप्लाई (Reply) बटन दबाया और लिखा:

"प्रिय आयुष, तुमने जो महसूस किया है, वही शिक्षा का असली 'क्यूआर कोड' है. जब हाथ श्रम से काले होते हैं, तभी मस्तिष्क में विचारों की उजली लकीरें उभरती हैं. यह घिसना बंद मत करना, हीरा रगड़ खाकर ही अपनी चमक पाता है."

ईमेल भेजकर शगुन ने अपनी 'ऑनर्स प्रोजेक्ट' की फाइल खोली. विषय था, "पितृसत्ता में स्त्री शिक्षा का वैचारिक संघर्ष". डॉ. शास्त्री ने उसे आगाह किया था कि यह विषय अकादमिक से ज़्यादा व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन शगुन अड़ी रही. उसे लगा कि जो लड़ाई वह घर के भीतर लड़ रही है, उसे शब्दों में ढालना ही उसका असली 'संबल' होगा. जब वह प्रोजेक्ट करने लगी तो उसे महसूस हुआ कि केवल उसके परिवार के तथ्य पर्याप्त नहीं होंगे. शेष तथ्य कहाँ से लाए जाएँ? फिर उसे होस्टल मेस में काम करने वाली नाथी का ध्यान आया. वह विद्यापीठ परिसर से बाहर बसे बनस्थली गाँव से आती थी. उसने उससे बात की तो उसने महसूस किया कि उसे उसके गाँव जाकर कुछ स्त्रियों से बात करनी चाहिए. नाथी उसे गाँव की स्त्रियों से बात कराने को तैयार हो गयी. एक मंगलवार साप्ताहिक अवकाश के दिन जब नाथी का भी अवकाश था, शगुन बनस्थली गाँव गई. उसने चार घंटे वहाँ बिताए और बहुत सारी स्त्रियों से बात करने के बाद बहुत से तथ्य एकत्र किए. उसने महसूस किया कि यह संघर्ष जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत अधिक कठोर है. लेकिन अब प्रोजेक्ट लगभग तैयार था, बस एक बार डॉ. शास्त्री को दिखाने भर की देर थी.

शाम को फोन पर मम्मा से बात हुई. उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोश बेचैनी थी. "शगुन, तू ठीक तो है न? पढ़ाई पर ध्यान देना, और... और अनिल चाचा ने आज फिर पापा से तेरे बारे में कुछ बात की थी." मम्मा की आधी-अधूरी बात ने शगुन के कान खड़े कर दिए. "क्या बात मम्मा? क्या फिर से कोई रिश्ता आया है?"

मम्मा ने लंबी साँस ली, "उनका कोई जानकार है, अच्छे लोग हैं, लड़का बैंक में है. चाचा कह रहे थे कि शगुन की पढ़ाई अब पूरी होने को है, तो क्यों न सगाई कर दी जाए? शादी का बीएससी का रिजल्ट आने के बाद देख लेंगे."

शगुन का गला सूख गया. वह जानती थी कि आयुष की सफलता ने चाचा के अहंकार को शांत जरूर किया था, लेकिन बदला नहीं था. अब वे शगुन की 'आज़ादी' को 'विवाह' की लक्ष्मण रेखा में बाँधकर अपना खोया हुआ वर्चस्व वापस पाना चाहते थे.

"मम्मा, आप पापा से कहिएगा कि मेरी उड़ान अभी बाकी है. अभी तो मुझे एमएससी (M.Sc) करनी है," शगुन ने दृढ़ता से कहा. "बेटा, मैं तो तेरे साथ हूँ, पर चाचा की बात टालना पापा के लिए मुश्किल होता जा रहा है. वे कहते हैं कि आयुष पर इतना खर्च हो रहा है, तो बेटी की ज़िम्मेदारी से जल्दी मुक्त होना ठीक है."

फोन रखने के बाद शगुन बहुत देर तक हॉस्टल की बालकनी में खड़ी रही. दूर क्षितिज पर चमकती बिजलियाँ उसे संकेत दे रही थीं कि रामगंजमंडी में एक बार फिर 'विचारों का युद्ध' छिड़ने वाला है. लेकिन वह सब सवालों का उत्तर जरूर देगी, चाचा को भी और जरूरत पड़ी तो पापा को भी. उसने सुना था कि बनस्थली में पोस्ट ग्रेजुएट छात्राओं को रिसर्च असिस्टेंट, टीचिंग असिस्टेंट आदि का काम मिल जाता है जो एक छात्रा के लिए पर्याप्त होता है. वह इसके लिए बात करेगी और अपने लिए काम प्राप्त करने की बात पुख्ता करके रखेगी. उसे विश्वास था कि पापा चाचा की बात को दरकिनार करके उसी की बात को तरजीह देंगे और चाची भी जरूर उसका साथ देंगी. वह इन छोटी चीजों के लिए अपने सामाजिक लक्ष्यों को नहीं छोड़ सकती. वह हार नहीं मानेगी.

अपने निश्चय को दृढ़ करके उसने आयुष को फोन किया.

“कैसी हो दीदी?” उधर से आयुष की आवाज आई.”

“मैं ठीक हूँ, तू तेरा बता. कैसा चल रहा है.”

“सब बढ़िया चल रहा है. थोड़ा मुश्किल तो लगता है. भागदौड़ और मेहनत खूब है. पर मजा भी खूब आ रहा है. नयी चीजें सीखने को मिल रही हैं. पढ़ने को खूब किताबें हैं, खेलने को खेल के मैदान हैं. वातावरण और मौसम तो जबर्दस्त है.”

“थोड़ी बहुत मौज-मस्ती ठीक है, तू भी करता है कि नहीं?”

“अभी नहीं दीदी, अभी तो मैं समझ रहा हूँ, एक बार अपना स्थान बना लूँ. फिर सब देखेंगे.”

“तू बहुत समझदार हो गया है.”

“अपनी दीदी का भाई जो हूँ.”

“अब रखती हूँ, आयुष. मैस जाने का वक्त हो गया. लड़कियाँ बुला रही हैं. फिर फोन करूंगी.”

मैस से आने के बाद उसने आयुष का 'संबल' रजिस्टर याद आया जो अब गुवाहाटी में था. उसे लगा कि अब उसे भी अपने लिए भी एक नया “संबल रजिस्टर” खुद तैयार करना होगा.
... क्रमशः

सोमवार, 2 मार्च 2026

क्यू आर कोड

पिंजरा और पंखा-45

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
'कामाख्या एक्सप्रेस' के कोटा जंक्शन से रवाना होते ही आयुष को विस्थापन का अहसास हुआ. वह घर से बहुत दूर, दो हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर गुवाहाटी जा रहा था. वहाँ उसे आईआईटी में कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग पढ़ना है. इससे उसे एक खास कुशलता मिलेगी जो एक अच्छी नौकरी हासिल करने में उसे मदद करेगी. उसके परिवार की आकांक्षाएँ पूरी होंगी. लेकिन उसकी खुद की आकांक्षाओं का क्या? तभी उसकी नजर उबासी लेते पापा पर पड़ी.

“पापा, आप लेट जाएँ, कुछ नींद ले लें, रात भर ठीक से सोए नहीं हैं.” आयुष ने सीट से खड़े होकर कहा.

“सही है, तुम भी मिडिल बर्थ खोल लो और लेट जाओ, दो-एक घंटे की नींद ले लेंगे तो सहज हो जाएंगे.”

आयुष ने मिडिल बर्थ खोल ली और वह उस पर चला गया. गुप्ताजी लोअर बर्थ पर लेट गए. दोनों पिता-पुत्र को दो दिन और दो रातों तक सफर करना था.

17 जुलाई की सुबह जब ट्रेन 'कामाख्या स्टेशन' पर रुकी, तो बाहर की नमी और पहाड़ियों की धुंध ने उन्हें चकित कर दिया. टैक्सी से ब्रह्मपुत्र का पुल पार कर जब वे अमिन्गाँव आईआईटी कैंपस पहुँचे, तो उसकी विशालता देख दोनों हतप्रभ रह गए.

उसे 'बराक' (Barak) हॉस्टल के बी-ब्लॉक में कमरा नंबर 112 मिला. इस होस्टल में सभी कमरे एक-एक स्टूडेंट के लिए बने थे. वह अपना सामान अपने कमरे में ले आया. पापा को कैम्पस के गेस्ट हाउस में स्थान मिला. 18 से 20 जुलाई के बीच 'एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक' की लंबी कतारों में खड़े होकर आयुष ने दस्तावेजी कार्रवाई पूरी की, गुप्ताजी उसके साथ लगे रहे. वे मन ही मन आयुष पर गर्व कर रहे थे कि आयुष ने खुद अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँचने की योग्यता हासिल की. उन्हें विश्वास था कि वह यहाँ भी अच्छा ही करेगा.

होस्टल में पास का कमरा नं. 111 कार्तिक को मिला था. वह हैदराबाद से था. कार्तिक की टूटी-फूटी हिंदी और आयुष की खामोशी के बीच पहले दो दिन केवल 'औपचारिक हेलो' में बीते. 23 जुलाई को पापा उसे गले लगाकर वापस राजस्थान के लिए रवाना होने लगे तो दोनों की आँखें नम थी. ट्रेन के रवाना होने के बाद पहली बार आयुष को अपने सीने पर एक भारी पत्थर जैसा महसूस हुआ. वह घर से हज़ारों मील दूर, बिल्कुल अकेला था. वह रात बहुत मुश्किल से गुजरी.

अगला दिन ओरिएन्टेशन का था. 'ऑडिटोरियम' में डीन का भाषण, परिचय का शोर. इन सबके बीच आयुष का ध्यान वहाँ के माहौल पर था. उसके स्कूल में अनुशासन का मतलब 'सजा' था, यहाँ अनुशासन का मतलब 'जिम्मेदारी' लग रहा था. लेकिन उसे सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात से हुई थी कि हर होस्टल का अपना रीडिंग रूम था, जहाँ हर तरह की सैंकड़ों ताजा पत्रिकाएँ हर समय उपलब्ध थीं. इसके साथ ही आईआईटी की अपनी सेंट्रल लायब्रेरी थी, जिसमें सवा लाख से ऊपर पुस्तकें थीं. केवल विज्ञान से संबंधित नहीं बल्कि विश्व के हर तरह के ज्ञान से भरपूर. इसके अलावा कम्प्यूटरों के जरीए वे दुनिया भर की डिजिटल लायब्रेरियों से जुड़ा जा सकता था.

शाम को मेस में कार्तिक ने उसे एक पुराने छात्र से मिलवाया. उससे चेतावनी मिली, "भाई, कल से असली खेल शुरू होगा. ड्राइंग बोर्ड और वर्कशॉप के जूते तैयार रखना." इस चेतावनी ने आयुष की धड़कनें बढ़ा दीं.

अगले दिन 25 जुलाई को सुबह 8:00 बजे पहली क्लास शुरू हुई, “मैथेमेटिक्स-I (MA101)”. लेक्चर हॉल (L-2) में करीब 200 छात्र थे. प्रोफेसर ने आते ही बोर्ड पर 'कैलकुलस' के ऐसे जटिल समीकरण लिखने शुरू किए कि आयुष को लगा कि उसकी 1176वीं रैंक भी शायद कम पड़ जाएगी.

दोपहर के सत्र में उसकी पहली लैब थी, “इंजीनियरिंग ड्राइंग (ME111)”. आयुष ने बड़े से 'ड्राइंग बोर्ड' पर अपनी सफेद शीट लगाई. उसे 'पेंसिल ग्रेड' और 'प्रोजेक्शन' की सूक्ष्मताओं को समझना था. राजस्थान की सूखी गर्मी में पलने वाले आयुष के लिए गुवाहाटी की उमस में पसीना पोंछते हुए 'टी-स्क्वायर' संभालना भारी पड़ रहा था.

"यार, ये सीएसई (CSE) वालों को ड्राइंग क्यों सिखा रहे हैं? हमें तो कोड लिखना है," कार्तिक ने बगल वाली टेबल से फुसफुसाकर कहा.

आयुष मुस्कुराया. उसे शगुन दीदी की बात याद आई, "विराट हर जगह है." उसने मन ही मन सोचा कि शायद ये बारीक लकीरें भी उस विराट सत्य का ही हिस्सा हैं. ये कोड भी ड्राइंग ही हैं. वह कार्तिक की ओर मुस्कुरा कर रह गया. तभी उसे जापानी इंजीनियर ‘मासाहिरो हारा’ का ध्यान आया जिसने ‘क्यूआर कोड’ जैसी भाषा का आविष्कार किया है, जो एक ड्राइंग ही होती है. वह सीधा हो गया.

“तुमने ‘क्यूआर कोड’ सुना है? वह एक ड्राइंग ही होता है.” आयुष ने कार्तिक को जवाब देते हुए सवाल कर डाला.”

“ओह¡ ‘मासाहिरो हारा’, समझ गया. ड्राइंग सीखनी ही होंगी.” यह कह कर कार्तिक फिर से अपनी ड्राइंग पर झुक गया.”

शाम को वह वर्कशॉप (ME110) देखने गया. वहां की 'फोर्जिंग' और 'फिटिंग' शॉप से आती लोहे की महक ने उसे रामगंजमंडी की याद दिला दी, जहाँ अक्सर कहीं न कहीं मरम्मत का काम चलता रहता था.

रात 9:00 बजे, मेस से खाना खाकर जब वह कमरे में लौटा, तो थकान से चूर था. उसने अपना कंप्यूटर चालू किया. कैंपस के LAN (लोकल एरिया नेटवर्क) की जादुई रफ्तार ने उसे एक नई दुनिया से जोड़ दिया. उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, यहाँ सब कुछ बहुत 'टेक्निकल' है. पहले दिन कोडिंग नहीं, बल्कि हाथ में पेंसिल और दिमाग में 'मैथेमेटिक्स' लेकर बैठा हूँ. गुवाहाटी की बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही, जैसे यहाँ की पढ़ाई भी कभी नहीं रुकेगी."

खिड़की के बाहर 'बराक' हॉस्टल के पीछे पहाड़ियों पर बादल मंडरा रहे थे. आयुष ने 'संबल' रजिस्टर खोला और आज की तारीख के नीचे लिखा, "सफलता का मतलब केवल कंप्यूटर नहीं, बल्कि हर विषय की गहराई को समझना है." उसे एहसास हुआ कि आईआईटी का पहला साल उसे सिखाएगा कि 'इंजीनियर' बनने से पहले एक 'मजदूर' होना जरूरी है.
... क्रमशः

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

नई दिशा

पिंजरा और पंख-44

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
शगुन और आयुष के वाक् साहस ने अनिल चाचा के मन को गहरा आघात दिया था. अगली सुबह ही आयुष की आईआईटी-जी में सफलता की सूचना ने उन्हें गर्व से भर दिया. ऑफिस के लिए घर से निकले, रास्ते में पान की दुकान पर, फिर ऑफिस में उन्होंने आयुष की सफलता का गर्व से उल्लेख किया. जल्दी ही यह सफलता रामगंजमंडी जैसे छोटे शहर का गर्व बन गई. गुप्ता परिवार के घर बधाइयों का ताँता लग गया.

काउंसलिंग 18 से 22 जून तक थी. आयुष को 19 जून को आईआईटी दिल्ली पहुँचना था. गुप्ताजी और आयुष 18 जून की शाम दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठ गए. अगले दिन आईआईटी दिल्ली में मूल दस्तावेजों की जाँच हुई, आयुष ने सेंटर एलॉटमेंट के लिए चॉइस शीट भरी और उसी शाम उन्होंने वापसी की ट्रेन पकड़ ली.

अब आयुष को जिज्ञासा थी कि उसे किस ब्रांच में और कहाँ प्रवेश मिलता है? वह रोज वेबसाइट देखता. 29 जून को काउंसलिंग का परिणाम आया. उसे इच्छित ब्रांच कंप्यूटर साइंस एण्ड इंजीनियरिंग (सीएसई) मिल गयी थी. लेकिन उसे गुवाहाटी आईआईटी में प्रवेश मिला था. उसके लिए यह केवल आईआईटी प्रवेश की सूचना नहीं थी, बल्कि एवरेज के ठप्पे से सदा के लिए बाहर निकल जाने का प्रमाण पत्र था. उसे एक नयी दिशा मिली थी. आयुष ने अपना एलॉटमेंट लेटर डाउनलोड करके प्रिंट किया. गुवाहाटी जाने की सूचना से मम्मा और चाची उदास हो गयी. अब आयुष को पढ़ाई के लिए बहुत दूर जाना पड़ेगा. वह साल में दो- एक बार ही मुश्किल से घर आ सकेगा.

गुप्ताजी ने आयुष का एलॉटमेंट लेटर देखा और धीरे से उसे मेज पर रख दिया. उनकी आँखें पुत्र की सफलता से सजल हो गयीं. लेकिन उनमें बेटे के घर से दूर एक अनजान शहर में विद्या अध्ययन के लिए जाने का डर भी था. पत्नी की चिन्ता के जवाब में उन्होंने यही कहा, “कोई बात नहीं कैम्पस में ही तो रहना है. फिर फोन है, रोज बात की जा सकती है.”

अब तक अनिल चाचा की आयुष और शगुन से नाराजगी कम हो चुकी थी. धीरे-धीरे वे समझने लगे थे कि पुत्रेच्छा ने उन्हें उतावला बना दिया था. अगले स्वस्थ बच्चे के लिए उन्हें अभी कम से कम दो वर्ष रुकना ही होगा. उन्होंने तत्काल स्टेशन जाकर पता किया कि गुवाहाटी के लिए कोटा से सीधी साप्ताहिक ट्रेन है, गुप्ताजी से सलाह करके दोनों का जाने का और गुप्ताजी का वापसी का रिजर्वेशन भी करवा आए. अब दोनों को 15 जुलाई रविवार सुबह कोटा से निकलना था, उससे पहले 2 जुलाई को शगुन को बनस्थली छोड़ने जाना था.

बनस्थली जाने से एक दिन पहले शगुन ने सहेज कर रखा हुआ आयुष का पुराना 'संबल' वाला रजिस्टर निकाल कर उसे दिया.

"इसे गुवाहाटी साथ लेकर जाना आयुष," शगुन ने कहा. "आईआईटी में तुम्हें बहुत तेज़ दिमाग मिलेंगे, लेकिन याद रखना, वहां जाकर केवल 'मशीन' नहीं बन जाना है. जो संवेदनशीलता तुमने यहाँ सीखी है, उसे वहां भी सहेज कर रखना."

"दीदी, अगर आप नहीं होतीं, तो शायद मैं आज किसी गुमनाम से कॉलेज में अपनी किस्मत को कोस रहा होता. आपने मुझे केवल पढ़ना ही नहीं, मुश्किलों से लड़ना भी सिखाया है." शगुन ने देखा आयुष की आँखें नम थीं.

अगली सुबह घर से निकलते समय दरवाजे पर खड़ी चाची ने हाथ हिला कर शगुन को विदा करने लगी तो उनकी गोद में नन्ही मुक्ति भी अनुसरण करते हुए मुस्कुराई और अपना हाथ हिलाया. कार में बैठते समय शगुन ने खिड़की से बाहर देखा—रामगंजमंडी की वही धूल भरी सड़कें अब उसे छोटी लग रही थीं. उसे पता था कि एक साल बाद जब वह बीएससी करके लौटेगी, तो घर के समीकरण बदल चुके होंगे. कार फिर से हाईवे पर थी. इस बार इस यात्रा में पापा-मम्मा के साथ आयुष भी था.

बनस्थली विद्यापीठ पहुँचे तो एक बज चुके थे. गेट रजिस्टर पर प्रवेश पंजीकरण के बाद वे सीधे शगुन के हॉस्टल शांता निकेतन गए. शगुन अपने कमरे में जाकर सामान रख आई, मम्मा मदद के लिए साथ गई. आयुष और पापा को रिसेप्शन में ही रुकना पड़ा. गेस्ट हाउस में कमरा लेकर सामान रखा. वहीं कैंटीन में भोजन किया. शगुन बोली, “पापा आपने ड्राइव किया है, थके हैं तो आप सब आराम करें तब तक मैं ऑफिस जाकर फीस जमा करके लौटती हूँ.”

“मैं भी साथ चलूँ दीदी? इस बहाने विद्यापीठ देख लूंगा.”

ऑफिस करीब आधा किलोमीटर दूर था. दोनों पैदल गए. वहाँ सब ओर लड़कियाँ और महिलाएँ नजर आईँ. पुरुष बस इक्का-दुक्का दिखे. आयुष को फौरन अपने बोर्डिंग स्कूल और होस्टल की याद आए. जहाँ केवल पुरुष ही पुरुष थे, सफाई आदि के लिए इक्का-दुक्का महिलाएँ ही दिखती. वह भी सामान्य नहीं था और यह भी. दोनों ही शिक्षा के साथ संस्कारित करने का दावा करते थे. लेकिन दोनों खूबसूरत नामों वाले बन्दीघर थे. जिनमें पितृसत्ता को सुरक्षित रखने की ठीक-ठीक व्यवस्था थी. उसे तत्काल आईआईटी गुवाहाटी का खयाल आया, क्या वहाँ भी सब ऐसा ही होगा?

ऑफिस का काम निपटा कर शगुन ने उसे विद्यापीठ का हवाई अड्डा दिखाया. वहाँ एक छोटा हवाई जहाज भी खड़ा था. फिर वे हॉर्स ग्राउंड गए जहाँ छात्राएँ घुड़सवारी सीखती थीं. रास्ते में पड़ती इमारतों के बारे में शगुन बताती जाती थी कि वे हॉस्टल हैं या इन्स्टीट्यूट हैं, या फिर कर्मचारियों के आवास. घूमते हुए जब वे थक गए तो वापस लौटे. रास्ते में सड़क और हॉस्टलों की कतार के मध्य लगे वृक्षों के बीच एक अस्थायी स्ट्रक्चर दिखाई दिया. आयुष के पूछने पर शगुन ने बताया कि ये होस्टलों के बीच कुछ कैंटीन बनाए गए हैं. जिनमें खाने पीने की वस्तुएँ मिल जाती हैं. फिर शगुन उसे उस कैंटीन तक ले गयी. दोनों ने वहाँ कॉफी का आर्डर दिया. आयुष को देख एक लड़की ने शगुन से आँखों के इशारे में आयुष के बारे में पूछा. शगुन ने बताया कि भाई है, इसे आईआईटी गुवाहाटी में सीएसई ब्रांच में प्रवेश मिला है. लड़कियों ने आयुष से ‘हाय’ बोल कर अभिवादन किया.

कैंटीन की कॉफी पीकर वे वापस गेस्ट हाउस पहुँचे. मम्मा-पापा तैयार थे. शगुन को हॉस्टल छोड़ कर वे वापस मंडी के लिए रवाना हो गए.
... क्रमशः

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

वाक्-साहस

पिंजरा और पंख-43

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

मई का महीना आधा गुजर चुका था. मानसून दूर था, पर हवाओं पर सवार कुछ उतावले बादल तेजी से  आते और फिर उतनी ही तेजी से निकल जाते. गुप्ता परिवार में हर कोई बेचैनी से आईआईटी-जी के रिजल्ट का इन्तजार कर रहा था. इस बेचैनी के पीछे एक और खामोश तूफान आकार ले रहा था. शगुन ने पिछले कुछ दिनों में गौर किया था कि चाची की आँखों के नीचे काले घेरे गहरे होते जा रहे हैं और वे अक्सर गुमसुम रहती हैं.

एक दोपहर, जब चाचा ऑफिस में थे और मम्मा सो रही थीं, शगुन ने देखा कि चाची रसोई में गयी हैं. वह भी उनके पीछे रसोई में  पहुँच गयी. "चाची मुक्ति के लिए गैस पर दूध गर्म करने के लिए चढ़ा रही थीं". तभी शगुन के कानों में सिसकी जैसी आवाज आई. उसने गौर से देखा तो वह चाची थीं जो सिसक रही थीं. शगुन ठिठक गई. आखिर चाची सिसक क्यों रही हैं?

"क्या हुआ चाची? आप ठीक तो हैं?" शगुन ने उनके कंधे पर हाथ रखा. चाची पहले तो चुप रहीं.

“बताइए ना चाची, क्या बात आपको सता रही है?”

शगुन का स्पर्श पाकर उनका बांध टूट गया. वे शगुन के गले लगीं और फूट-फूट कर रोने लगीं. शगुन ने चाची को ढाढ़स बंधाया तब जा कर वे रुकीं और बताने लगीं कि अनिल चाचा पर फिर से 'वंश’ बढ़ाने का भूत सवार हो गया है. मुक्ति अभी पैरों पर खड़ी होना सीख रही थी, उसने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था कि वे अगले बच्चे के लिए दबाव बना रहे थे. "शगुन, डॉक्टर ने कहा था कि मेरी सेहत के लिए अभी कम से कम तीन-चार साल का अंतर होना ज़रूरी है, पर वे सुनते ही नहीं. कहते हैं—बेटा जल्दी ही होना चाहिए ताकि खानदान आगे बढ़े."

चाची की बात सुन कर शगुन का खून खौल उठा. उसे वनस्थली की वह 'लक्ष्मण रेखा' और डॉ. शास्त्री की बातें याद आईं. एक तरफ वह और आयुष विज्ञान और तर्क की दुनिया में ऊँची उड़ान भर रहे थे, और दूसरी तरफ उनके अपने ही घर में एक स्त्री को केवल 'वंश बढ़ाने की मशीन' समझा जा रहा था.

शगुन ऊपर अपने कमरे में पहुँची. आयुष अपने बिस्तर पर लेटा कोई पुस्तक पढ़ रहा था. उसने यह बात आयुष को बताई. सुन कर वह भी सन्न रह गया. "दीदी, जिस 'विराट' को मैंने विज्ञान की मदद से प्रकृति में देखा. अब चाचा उसे एक नन्ही जान और चाची की जान की कीमत पर पाना चाहते हैं? लगता है, चाचा बिलकुल पगला गए हैं."

“आयुष, इस बार हम दोनों को साथ बोलना पड़ेगा.” शगुन ने कहा तो आयुष ने सहमति दे दी, “जरूर दीदी, वरना वे रुकने वाले नहीं.

उस शाम, चाचा घर आए, माहौल भारी था. शगुन और आयुष ने मौका देखते ही वे बात करेंगे.

रात को पापा, चाचा, शगुन और आयुष डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे. चाची रोटियाँ बना रही थी और मम्मा मुक्ति को लेकर छत पर टहल रही थी.

“आयुष, कल तेरा आईआईटी-जी का रिजल्ट आने वाला है, कल पता लगेगा कि तू वाकई मर्द बनने जा रहा है या नहीं.” चाचा ने आयुष की ओर देख कर कहा. आयुष तो पहले ही अवसर की तलाश में था.

“क्या चाचा? आप पर हमेशा ही यह मर्द बनाने की बात क्यों सवार रहती है? परिवार में आप एक मर्द हैं, वही बहुत नहीं है क्या?”

“तुम नहीं समझते आयुष, वंश तो चलाने के लिए हर आदमी को ‘मर्द’ होना चाहिए, तभी वह परिवार चला सकता है वंश को बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकता है.”

चाचा ने फिर से वही 'वंश' वाली बात छेड़ी, तो शगुन ने सीधे उनकी आँखों में देखकर कहा, "चाचा, क्या मुक्ति हमारे वंश का हिस्सा नहीं है? क्या उसकी मुस्कान इस घर के लिए काफी नहीं है, जो आप अभी से चाची पर अगली सन्तान के लिए दबाव बना रहे हैं?"

चाचा चौंक गए. उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि शगुन इस मसले पर इतना खुल कर बोलेगी. वे अपनी आवाज थोड़ी ऊँची करके बोले "शगुन, तू अभी बच्ची है, बड़ों के मामलों में मत बोल." देवर की तेज आवाज श्रीमती गुप्ता तक पहुँची तो वे भी मुक्ति को साथ ले छत से नीचे उतर आयीं.

"मैं बच्ची नहीं हूँ चाचा, मैं शिक्षित हूँ," शगुन की आवाज़ में वही ठहराव था जो उसने वनस्थली की परिचर्चा में दिखाया था. "और विज्ञान कहता है कि चाची की सेहत इस वक्त सबसे ज़रूरी है. अगर आप 'वंश' के नाम पर उनकी जान जोखिम में डाल रहे हैं, तो यह प्रेम नहीं, यह आपकी क्रूरता है."

आयुष ने भी हिम्मत जुटाई और कहा, "चाचा, अगर मुझे आईआईटी में रैंक मिल भी गई, तो उस सफलता का क्या मोल अगर मेरे अपने ही घर में 'मुक्ति' को कमतर और चाची को बेबस समझा जाए?"

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया. पापा और मम्मा भी अवाक थे. चाचा का चेहरा गुस्से से लाल हुआ, लेकिन आयुष और शगुन की आँखों में जो वैचारिक दृढ़ता थी, उसने उन्हें निरुत्तर कर दिया. वे बिना कुछ कहे उठ कर अपने कमरे में चले गए.

चाची की आँखों में उस रात पहली बार डर की जगह एक कृतज्ञता थी. उन्हें समझ आया कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि अपनों के हक के लिए खड़े होने का साहस भी है.

इसी भारी माहौल के बीच, अगली सुबह तीस मई की तारीख आई. जब आयुष ने अपना कंप्यूटर खोला तो आईआईटी-जी का रिजल्ट आ चुका था. उसका नाम 1176वीं रैंक पर था. उसने सबसे पहले शगुन को बताया और शगुन ने सबको. पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई. लेकिन शगुन और आयुष, दोनों के लिए यह रैंक केवल एक नंबर नहीं था, यह उस 'पितृसत्तात्मक व्यवस्था' को एक करारा जवाब था जो केवल बेटों में भविष्य देखती थी.

... क्रमशः

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

प्रेम और मुक्ति

पिंजरा और पंख-42

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
8 अप्रेल 2007. सुबह आयुष की आँख खुली, उसने घड़ी देखी, छह बजने में तीन मिनट. उसने अपनी दिमागी घड़ी को धन्यवाद दिया और अलार्म बन्द किया. आज शरीर बहुत हल्का लगा उसमें मॉक टेस्ट के दिनों जैसा भारीपन नहीं था. पैरों में चप्पल डाल कर वह बाहर आया तो देखा होस्टल में सभी छात्र न केवल जाग चुके थे, बल्कि कुछ परीक्षा केन्द्र जाने के लिए तैयार हो रहे थे तो कुछ अभी से तैयार होकर नोट्स देखने में लगे थे. वह तसल्ली से सीढ़ियाँ उतर कर नीचे मैस में गया. पारलेजी का सबसे छोटा बिस्कुट पैक लिया और चाय के साथ गटके. फिर एक चाय और लेकर पी. लौटते ही बाथरूम में घुसा. वह ठीक आठ बजे बिलकुल तैयार था. उसकी नजर दीवार पर लगे कैलेंडर पर पड़ी जिस पर आठ अप्रेल के नीचे उसने लाल स्केच पेन से लिखा था— "सत्य से साक्षात्कार का दिन, युद्ध का नहीं." उसके चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गयी. उसने महसूस किया कि पिछले दो सालों में उसने जो हज़ारों पन्ने काले किए थे, वे सिर्फ फॉर्मूले नहीं थे, वे प्रकृति की भाषा को समझने की कोशिश थी.

परीक्षा आरंभ होने के पच्चीस मिनट पहले वह परीक्षा हॉल में था. जब पहला पेपर सामने आया, तो चारों ओर पन्ने पलटने की सरसराहट और छात्रों की तेज होती सांसें सुनाई देने लगीं. आयुष ने कलम उठाई. जटिल कैलकुलस के सवालों के बीच वह उलझा नहीं, बल्कि उसे उनमें एक लय (Rhythm) दिखाई देने लगी. उसे लगा जैसे संख्याएँ उससे बात कर रही हैं.तीन घंटे कब बीते, पता नहीं चला.

अगला पेपर दो घंटे बाद दो बजे था. बीच के अंतराल में बाहर की सड़कों पर किसी मेले जैसा माहौल था, छात्र दूसरे के उत्तरों को 'चेक' कर रहे थे. आयुष इस शोर से दूर, एक रेस्टोरेंट में बैठा, उसने हल्का भोजन किया, कॉफी पी और एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया. उसने आँखें मूँद लीं. उसे शगुन से कही अपनी ही बात याद आई—"मैंने विज्ञान में विराट देखा है. क्या नहीं है वहाँ" आयुष के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गयी, विज्ञान की ये तमाम थ्योरियाँ इस विराट प्रकृति की व्याख्या के सिवा और क्या हैं. विज्ञान 'सत्य की तलाश' ही तो था. हर नया सत्य एक और नए सत्य की तलाश के रास्ते खोल देता है. उसे पिछले साल के शुरू में रैंक की जो चिन्ता होती थी वह याद आई, फिर उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी. वह 'रैंक' की चिंता अब एकदम तुच्छ चीज लग रही थी.

इस दौरान उसका मन एकदम साफ था. फिजिक्स के पेचीदा सवालों को हल करते वक्त उसे लगा था जैसे वह कोई युद्ध नहीं जीत रहा, बल्कि एक पुराने दोस्त से सुलह कर रहा है. शाम पाँच बजे की 'लॉन्ग बेल' बजी, उसके पहले आयुष की आज की आखिरी आंसर शीट तैयार थी. उसने पेन अपनी जेब में लगाया और एक लंबी, गहरी सांस लेकर उठा, आंसर शीट परीक्षा निरीक्षक के हवाले हॉल से बाहर निकला तो उसका शरीर में थकान तो थी, लेकिन कोई बोझा नहीं. वह परिणाम के बोझ, 'एवरेज' होने के भय और दूसरों की उम्मीदों से पूरी तरह मुक्त था.

हॉल से एक साथ निकलने के कारण परीक्षार्थी एक छोटी भीड़ में बदल गए थे. उसे बाहर जाने की कोई जल्दी नहीं थी. वह धीरे-धीरे परीक्षा केन्द्र से बाहर निकला. धूल, धुएँ और शोर के बीच उसने खुद को अकेला महसूस किया. उसके दिमाग में अब बस एक ही बात थी—होस्टल से बैग उठा कर बस स्टैंड जाना है, रामगंजमंडी के लिए बस पकड़नी है.

तभी भीड़ के उस पार उसे पहचानी सी 'कोरल रेड मारुति 800' दिखी. कार के पास सफेद शर्ट में खड़े उसके पापा ही थे. उनके बगल में खड़ी शगुन, पागलों की तरह उसकी तरफ हाथ हिला रही थी.

आयुष की आँखों में अचानक नमी उतर आई. यह वही 'रामगंजमंडी में स्टोन-डस्ट मिली धूल से सना हुआ लड़का था, जो आज खुद को ‘प्रकृति' का हिस्सा महसूस कर रहा था. जब वह पास पहुँचा, तो शगुन ने उसे लपक कर गले लगा लिया. आयुष की थकान शगुन की इस झप्पी ने हवा में उड़ा दी.

पापा ने बस इतना पूछा, "थक गया होगा?" आयुष बस मुस्कुरा दिया. पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा, इस हाथ में उसे आज पहली बार 'दबाव' नहीं, बल्कि 'सराहना' थी.

वे होस्टल पहुँचे, आयुष ने अपना बैग लिया और कुछ ही देर में उनकी कार झालावाड़ रोड पर थी. पौन घंटे बाद गुप्ताजी ने कार दरा-स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे लगाई. लाला जी का होटल सामने ही था. कारीगर ने कढ़ाई से गर्म-गर्म कचौड़ियाँ अतिरिक्त तेल हट जाने के लिए निकाल कर झारी पर ही रख रखी थीं. गुप्ताजी ने सभी को दो-दो कचौड़ियाँ देने के लिए कहा. कुछ ही समय में कचौड़ियाँ खट्टी-मीठी चटनियों के साथ उनकी टेबल पर थीं. तभी शगुन ने पूछा, “यहाँ का तो कलाकंद भी मशहूर है न पापा?

गुप्ताजी ने शगुन के सवाल के जवाब में सभी के लिए कलाकंद भी मंगा लिया. चाय पीकर जब वे खड़े हुए तो. शगुन ने कहा, “पापा कलाकंद वाकई बहुत स्वादिष्ट है. गुप्ताजी ने किलो भर कलाकंद घर के लिए और लिया. कार ने रामगंजमंडी में प्रवेश किया तब रात के आठ बज रहे थे. जैसे ही कार घर के सामने रुकी, मम्मा दरवाज़े पर खड़ी मिलीं. उनकी गोद में नन्ही 'मुक्ति' थी.

आयुष ने कार से उतरकर मम्मा के पैर छुए और फिर मुक्ति को अपनी बाहों में ले लिया. वह आयुष की गोद में आते ही मुस्कुराई. मुक्ति की इस छोटी सी मुस्कान ने जैसे आयुष के 'सत्य-साक्षात्कार' पर अपनी मुहर लगा दी. उसे अहसास हुआ कि विज्ञान का असली आनंद तो इस 'प्रेम' और 'मुक्ति' में ही छुपा है.

उस रात रामगंजमंडी के उस पुराने घर में 'आईआईटी' की कोई चर्चा नहीं हुई. वहाँ सिर्फ एक परिवार था, जो महीनों बाद एक साथ खाना खा रहा था—एक ऐसे आयुष के साथ, जो अब 'रैंक' की रेस से आज़ाद हो चुका था. 
... क्रमशः

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

विराट

पिंजरा और पंख-41

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
8 अप्रैल 2006, वनस्थली में सूरज की पहली किरण के साथ ही शगुन उठ बैठी. अपने रूम में वह अकेली थी.. यह उसके कोटा जाने का दिन था. प्रियंका, किरण और सीमा कल ही जा चुकी थी. गुप्ताजी बेटी को लेने रात आठ बजे पहुँचे. रात गेस्ट हाउस में रुके. सुबह तैयार हो कर चाय पी और ठीक 10 बजे शगुन के होस्टल पहुँच गए. शगुन ने अपना सारा सामान कार की डिक्की में सहेज दिया. होस्टल वार्डन को नमस्ते कह दोनों कार में आ बैठे. शगुन के मन में रह-रहकर आयुष का ख्याल आ रहा था. ठीक इसी समय, कोटा के किसी परीक्षा केंद्र में आयुष अपना पहला पेपर दे चुका होगा.

"पापा, थोड़ा जल्दी निकलें? हमें 5:00 बजे तक कोटा पहुँचना ही होगा," शगुन ने कार में बैठते हुए कहा.

“हमारे पास बहुत समय है” कहते हुए पापा ने मुस्कुराकर इग्निशन चालू किया. वनस्थली विद्यापीठ की मुख्य सड़क से होते हुए वे गेट से बाहर आ गये. शगुन विद्यापीठ में अपने जीवन के 2 महत्वपूर्ण साल बिता चुकी थी. हाईवे पर आने के बाद भी गुप्ताजी कार को आराम से चला रहे थे. करीब 11 बजे वे टोंक पहुँचे. हाईवे के किनारे एक साधारण से रोड-साइड रेस्टोरेंट पर गुप्ताजी की कोरल रेड मारुति 800 रुकी. दोनों ने वहाँ गर्म समोसे खा कर कॉफी पी और आगे बढ़ गए.

"अभी दूसरा पेपर शुरू होने वाला होगा," पापा ने पहली बार आयुष का ज़िक्र किया. उनकी आवाज़ में वह पुरानी कड़क नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी थी. शगुन ने देखा कि पापा ने अपना चश्मा उतारकर रुमाल से साफ़ किया—यह घबराहट छुपाने का उनका पुराना तरीका था.

कल शाम ही आयुष से बात हुई थी. उसके स्वर में परीक्षा का बिलकुल तनाव नहीं था. कह रहा था, “दीदी मैंने पूरी कोशिश की है. जितना कोर्स है उस सबको खूब अच्छी तरह समझा है. मुझे इस तैयारी के बीच समझ आया कि साइंस क्या है? वह तो असली जीवन की खोज है. हर कहीं जीवन है. जिसे हम निर्जीव पदार्थ कहते हैं उसके भी कण-कण में गति है, जीवन है. मैंने बहुत दिन पहले किसी कहानी में पढ़ा था कि यशोदा ने कृष्ण के मुख में विराट को देखा था. मैंने विज्ञान में विराट देखा है. क्या नहीं है वहाँ? वह सीखने और आगे बढ़ने का रास्ता है.”

आयुष की बातें सुन कर वह दंग रह गयी थी. आखिर इसने विज्ञान के संसार में घुसने में सफलता पा ली. अध्ययन और परीक्षा के बीच की दूरी तय कर ली. आयुष ने कहा था, “अब परिणाम से मुझे बिलकुल डर नहीं लगता. वह मेरे लिए बेमतलब है. जो कुछ मैंने जान लिया है उसे बुरा परिणाम नहीं छीन सकता. अच्छा परिणाम मुझे कुछ सिखा नहीं सकता.” इस बात के बाद उसे आयुष की चिन्ता नहीं रही थी. उसने ऐसा रास्ता पकड़ लिया था जो उसे कभी धोखा नहीं दे सकता था.

देवली पहुँचे तब एक बज रहा था. यह खाने का समय था. गुप्ताजी ने कार को एक ढाबे पर रोका. दोनों नीचे उतरे. गुप्ताजी ने नल पर जाकर हाथ मुहँ धोए, ड्राइविंग की थकान कुछ कम हुई. ढाबे की दाल और चपाती का स्वाद अलग ही था. खाने के साथ शगुन ने सड़क पर जाते ट्रकों के पीछे उड़ती धूल देखी. उसे याद आ गया कि कैसे आयुष बचपन में ज़रा सी धूल से डरता था, आज वही आईआईटी-जी की तपती 'रेसिंग ट्रैक' पर दौड़ रहा है.

शाम के जब कार ने कोटा शहर की सीमा में प्रवेश किया तो 4:30 बज रहे थे. कोचिंग के बड़े-बड़े होर्डिंग्स और छात्रों की भीड़ बता रही थी कि यह शहर केवल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि उम्मीदों और दबावों का शहर है. पापा ने गाड़ी सीधे आयुष के परीक्षा केंद्र के बाहर पहुँच कर स्थान देख कर पार्क कर दी.

अभी शाम का आखिरी पेपर खत्म होने में बीस मिनट थे. केंद्र के बाहर अभिभावकों का हुजूम बढ़ता जा रहा था. कोई-कोई ठंडे पानी की बोतल लिए हुए थे. शगुन और गुप्ताजी कार में बैठ कर परीक्षा केन्द्र के लोहे के भारी दरवाज़े के खुलने का इन्तजार करने लगे.

"पापा, आयुष थक गया होगा न? सुबह 9 बजे से, शाम के 5 बजने वाले हैं... दो पेपर, वह भी आईआईटी के," शगुन ने फुसफुसाकर कहा.

पापा ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप गेट की ओर देखते रहे. सूरज ढलान पर था, मई की धूप कमजोर पड़ गयी थी और सताने की क्षमता खो चुकी थी. शगुन को लगा जैसे वह 5 बजने की घंटी का इंतज़ार नहीं कर रही, बल्कि अपने उस भाई के 'पुनर्जन्म' का इंतज़ार कर रही है जिसे उसने महीनों पहले इस शहर को सौंपा था.

भीड़ में हलचल शुरू हुई. अंदर से 'लॉन्ग बेल' की आवाज़ आई—परीक्षा समाप्त हो गई थी. शगुन की साँसें थम गईं. लड़के-लड़कियाँ अंदर भवन से बाहर मैदान में आने लगे. कुछ ही देर में वे एक बड़े समूह में बदल गए. लोहे का भारी दरवाजा खुला. बाहर निकलते चेहरों के हुजूम में वह उस एक चेहरे को ढूंढने लगी जिसे यह अंदाज़ा भी नहीं होगा कि उसके 'शब्दों का संबल' उसके स्वागत के लिए दरवाज़े पर ही खड़ा है.
... क्रमशः

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

प्रश्न-स्वातंत्र्य

 पिंजरा और पंख-40

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली विद्यापीठ में वार्षिक परीक्षाओं की आहट थी. देर रात तक होस्टलों की रोशन खिड़कियाँ बताती कि छात्राएँ परीक्षा की तैयारी में जुट गयी हैं. मार्च के मध्य में गर्म हवा भी दस्तक देने लगी थी. इस बीच कैंपस में 'नारी शक्ति' पर एक विशेष व्याख्यान सभा का आयोजन किया गया. सभा में आमंत्रित विदुषी जो एक प्रतिष्ठित समाजशास्त्री थी, बोलने खड़ी हुई. शगुन सभागार के एक कोने में बैठी वक्ताओं को सुन रही थी. समाजशास्त्री बड़े गर्व से कह रही थीं, "वनस्थली की बेटियाँ सशक्त हैं क्योंकि वे परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम हैं. वे कंप्यूटर भी चलाती हैं और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी जानती हैं."

शगुन को व्याख्यान का 'लक्ष्मण रेखा' शब्द खटक गया. उसकी आँखों के सामने डॉ. शास्त्री का चेहरा आ खड़ा उन्होंने कहा था कि “शब्द अक्सर बेड़ियाँ बनकर आते हैं”. उस रात शगुन जब सोने के लिए बिस्तर पर गयी तब भी उसके दिमाग में ‘लक्ष्मण रेखा’ शब्द गूंज रहा था.

दो दिन बाद कॉलेज की पत्रिका के लिए एक परिचर्चा थी, विषय था—'शिक्षित नारी : समाज का आधार'. बेबाक विचारों वाली शगुन की सहेली, अनन्या ने अपना हाथ उठाया.

"मैम, मेरा एक सवाल है," अनन्या ने शांत स्वर में कहा. "यहाँ हमें सिखाया जाता है कि शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है. लेकिन क्या यह आत्मनिर्भरता सिर्फ आर्थिक है? अगर मैं अपनी पसंद का जीवन साथी चुनना चाहूँ, या शादी के बाद अपना उपनाम न बदलना चाहूँ, या 'कन्यादान' जैसी प्रथा को अपनी गरिमा के विरुद्ध मानूँ—तो क्या हमारा यह सिस्टम मेरा साथ देगा? या तब मुझे 'अमर्यादित' और 'विद्रोही' कहकर चुप करा दिया जाएगा?"

सभागार में एक सन्नाटा पसर गया. मंच पर बैठी पत्रिका की संपादक और कुछ वरिष्ठ शिक्षिकाओं के माथे पर सिलवटें उभर आईं. संपादक ने माइक संभाला और मुस्कराते हुए कहा, "अनन्या, शिक्षा हमें विनम्र बनाती है, उद्दंड नहीं. हमारी संस्कृति हमें त्याग और सामंजस्य सिखाती है. सवाल पूछना अच्छा है, लेकिन परंपराओं की नींव खोदना प्रगति नहीं है. एक अच्छी शिक्षित स्त्री वह है जो घर को जोड़कर रखे."

शगुन सोच रही थी, वह बोले या न बोले? वह तनिक ठिठकी. लेकिन फिर उससे रहा नहीं गया. वह अपनी जगह पर खड़ी हुई. सबकी निगाहें उस पर टिक गईं.

"मैम, सामंजस्य और समर्पण सिर्फ स्त्रियों के लिए ही क्यों हैं?" शगुन की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था. "अगर शिक्षा हमें केवल 'बेहतर होम-मेकर' या 'संस्कारी बहू' बनने के लिए तैयार कर रही है, तो यह सशक्तिकरण कैसे है? यह तो कंडीशनिंग का एक और परिष्कृत रूप है. क्या यह अंतर्विरोध नहीं है कि एक तरफ हम लड़कियों को ऊँचे आसमान में उड़ने के सपने दिखाते हैं, और दूसरी तरफ उनके पंखों पर 'मर्यादा' का भारी वजन बाँध देते हैं? असली मुक्ति तो तब होगी जब सवाल पूछने वाली लड़की को 'उद्दंड' नहीं, बल्कि 'जागरूक' माना जाएगा."

संपादक का चेहरा सख्त हो गया. "शगुन, यह बहस का मंच नहीं है. हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए."

"मैम, जड़ें हमें पोषण देने के लिए होती हैं, जकड़ने के लिए नहीं," शगुन ने शालीनता से जवाब दिया और बैठ गई.

उस शाम अनन्या शगुन के कमरे में आयी. अनन्या ने बताया कि उसे संपादक मेम ने ऑफिस बुलाकर 'अनुशासन' का पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि विद्यापीठ में इस तरह किसी भी परिचर्चा में विषय से इतर प्रश्न करना अनुशासन के विपरीत है और यह दोहराया गया तो विद्यापीठ उसके अभिभावकों को लिख सकता है.

दोनों देर बात करती रहीं. फिर तय किया कि वे डॉ. शास्त्री से मिलेंगी. अनन्या के जाने के बाद शगुन की निगाह खिड़की से बाहर गयी. बाहर सड़क पर लड़कियाँ आ जा रही थीं. उसे लगा कि वनस्थली की यह विशाल चारदीवारी, जो कभी उसे सुरक्षा का अहसास देती थी, वही आज उसे फिर से एक ‘सोने का पिंजरा’ लग रही थी.

उसने अपनी डायरी निकाली और लिखा— "सिस्टम हमें पंख तो देता है, पर उड़ान की दिशा खुद तय करना चाहता है. लेकिन जिसे आज़ाद होना है, उसे अपनी उड़ान का नक्शा खुद बनाना होगा."

उसे रामगंजमंडी में पालने में सोई अपनी नन्ही बहन 'मुक्ति' का ख्याल आया. उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह कोशिश करेगी कि मुक्ति को ऐसी शिक्षा मिले जो उसे सिर्फ 'उत्तर' देना ही नहीं, बल्कि सबसे कठिन 'सवाल' पूछने का साहस भी दे.

लंच ब्रेक में शगुन और अनन्या डॉ. शास्त्री से मिलीं. वे उनकी गंभीर शक्लें देखकर मुस्कुराईं. शगुन ने संक्षेप में कल की घटना और संपादक मैम की चेतावनी के बारे में बताया.

डॉ. शास्त्री ने अपना चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और कुछ देर शांत रही. फिर धीमे स्वर में बोलीं, "तुम्हें दुखी नहीं बल्कि खुश होना चाहिए. तुम शिक्षा के असली उद्देश्य तक पहुँच गई हो. सिस्टम जब तुम्हें 'अनुशासन' और 'परंपरा' के नाम पर डराने लगे, तो समझ लेना कि तुम्हारे तर्क बहुत गहरे हैं."

अनन्या ने धीरे से पूछा, "पर सर, क्या सवाल पूछना सच में उद्दंडता है?"

डॉ. शास्त्री ने उसे गौर से देखा, "अनन्या, समाज हमेशा उन लड़कियों से डरता है जो सोचती हैं. 'लक्ष्मण रेखा' का उपयोग सुरक्षा के लिए कम और नियंत्रण के लिए ज़्यादा किया जाता है. वनस्थली जैसे संस्थान तुम्हें कौशल (Skills) तो दे देंगे, पर वे 'स्वतंत्र विचार' देने से कतराएंगे, क्योंकि स्वतंत्र विचार अक्सर स्थापित ढाँचों को हिला देते हैं. याद रखना, असली विद्रोह चिल्लाने में नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक स्पष्टता पर टिके रहने में है. वे तुम्हारी बात मैगजीन में नहीं छापेंगे क्योंकि वे नहीं चाहते कि यह आग दूसरी लड़कियों के मन तक पहुँचे."

शगुन को लगा जैसे उसके मन का बोझ उतर गया हो. डॉ. शास्त्री ने आगे कहा, "मुक्ति का रास्ता हमेशा 'असुविधाजनक' होता है शगुन. तुम जो आज कर रही हो, वही तुम्हारी बहन 'मुक्ति' के लिए भविष्य का रास्ता साफ करेगा."

वहाँ से निकलते वक्त शगुन के कदमों में एक नई ऊर्जा थी. उसे अब मैगजीन में जगह न मिलने का मलाल नहीं था; उसे खुशी थी कि उसने सिस्टम की उस चुप्पी को तोड़ दिया था जिसे सब 'मर्यादा' समझ बैठे थे.
... क्रमशः

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

शब्दों का संबल

 पिंजरा और पंख-39

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
मार्च का पहला ही सप्ताह था. वार्षिक परीक्षा के टाइमटेबल भी आ गए थे. शगुन का आखिरी पेपर छह अप्रैल को था. उसका मन कर रहा था कि उसी दिन शाम को या अगले दिन दुपहर होते होते वह बनस्थली से घर के लिए निकल ले. फिर उसे फौरन आयुष का ध्यान आया. वह अपने जीवन की पहली बड़ी परीक्षा की दहलीज़ पर खड़ा था. राजस्थान बोर्ड की सीनियर सेकेंडरी 12वीं कक्षा की परीक्षा मार्च के दूसरे सप्ताह से शुरू हो कर मार्च के अंत में समाप्त होनी थी और उसके करीब डेढ़ माह बाद, सात अप्रेल 2007 को वह तारीख थी जिसके लिए कोटा के हज़ारों बच्चे रातों की नींद और दिन का चैन बेच चुके थे—आईआईटी-जी (IIT-JEE).

शगुन ने सोचा क्यों न वह पापा से कहे कि वे सात अप्रेल की रात कार से बनस्थली आ जाएँ, फिर वे आठ अप्रैल को 10-11 बजे बनस्थली से निकलें तो 4, 4:30 बजे तक कोटा पहुँच जाएँ और फिर वहाँ से आयुष को साथ ले कर रामगंजमंडी जाएँ. उसने आयुष को फोन लगाया. दो-तीन रिंग के बाद आयुष ने फोन उठाया. उसकी आवाज़ में वही पुराना भारीपन था जो दिवाली की छुट्टियों के समय गायब हो गया था.

"तैयारी कैसी है आयुष? बोर्ड के एडमिट कार्ड मिल गए?" शगुन ने उत्साह भरने की कोशिश की.

"हाँ दीदी, बोर्ड की तैयारी बिलकुल ठीक है... पर 8अप्रेल वाली बात दिमाग से निकल ही नहीं रही. कोचिंग में अब रोज़-रोज़ 'मॉक टेस्ट' हो रहे हैं. रोहित की रैंक अब टॉप-50 में आने लगी है और वह कहता है कि जो आखिरी महीने में नहीं जी-जान लगाएगा, उसका एक साल सीधे बर्बाद होगा. दीदी, क्या सच में एक परीक्षा से साल बर्बाद हो जाता है?" आयुष का स्वर लड़खड़ाया.

शगुन ने गहरी सांस ली. उसने खिड़की से बाहर देखा जहाँ लड़कियां मैदान में खेल रही थीं. उसने डॉ. शास्त्री की उस क्लास को याद किया, जिसमें उन्होंने 'टाइम और वैल्यू' पर बात की थी.

"आयुष, मेरी बात ध्यान से सुन. समय कभी 'बर्बाद' नहीं होता, वह केवल 'अनुभव' में बदलता है. तूने अगस्त में मुझसे एक वादा किया था कि तू विज्ञान को 'अंगीकार' करेगा, उसे परीक्षा के लिए रटेगा नहीं. क्या तुझे अपनी समझ पर भरोसा है?"

"समझ तो है दीदी, पर जब टेस्ट पेपर सामने आता है और घड़ी की सुइयाँ भागने लगती हैं, तब सब धुंधला होने लगता है. ऐसा लगता है जैसे मैं फिर से वही 'एवरेज' लड़का बन रहा हूँ."

"नहीं आयुष!" शगुन ने दृढ़ता से कहा. "तूने दिवाली पर 'मुक्ति' को अपनी गोद में लिया था, याद है? तूने कहा था कि हम उसे लेबल्स से मुक्त रखेंगे. अगर तू खुद को 'एवरेज' के लेबल से मुक्त नहीं कर पाएगा, तो उसे क्या सिखाएगा? आठ अप्रैल एक युद्ध नहीं है, वह सिर्फ तेरे और उन सिद्धांतों के बीच की एक बातचीत है जिन्हें तूने पिछले छह महीनों में जिया है. तू बस उन सिद्धांतों को कागज़ पर उतार देना, परिणाम के बारे में सोचने पर समय खराब मत करना."

फोन के दूसरी तरफ थोड़ी देर सन्नाटा रहा. फिर आयुष की धीमी आवाज़ आई, "दीदी, यहाँ कोटा में सब कहते हैं कि, यही एक मौका है. इसके बाद ज़िंदगी खत्म है."

शगुन मुस्कुराई, "ज़िंदगी  'आठ अप्रैल' से शुरू होगी आयुष, उस पर खत्म नहीं होगी. तूने 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' पढ़ी है, क्या उसके लेखक ‘स्टीफन हॉकिंग’ ने हार मानी थी? तुझे बस 'आज' में रहना है. मार्च की बोर्ड परीक्षा को अपनी नींव बना और आठ अप्रैल को अपना शिखर. तू मेरा वही प्यारा साहसी भाई है जो सच्चाई की खोज में निकला है, न कि किसी रैंक की."

"दीदी... अब थोड़ा हल्का महसूस हो रहा है. मुक्ति न जाने कैसी होगी?" आयुष ने विषय बदलते हुए पूछा.

"मुक्ति अब पहचानने लगी है. कल मम्मा से बात हुई थी, वे कह रही थीं कि मुक्ति तेरी तस्वीर को देख कर मुस्कुराती है. वह अपने 'आईआईटी वाले भैया' का इंतज़ार कर रही है, लेकिन इसलिए नहीं कि तू उसे कोई रैंक दिखाए, बल्कि इसलिए कि तू घर लौटकर आए और उसे फिर से अपनी गोद में ले."

आयुष ने फोन रख दिया. वह अपनी मेज़ पर रखे उस पुराने चार्ट को देखने लगा. उसने टेबल से लाल स्याही का पेन उठाया और ‘आठ अप्रैल’ की तारीख के नीचे छोटे अक्षरों में लिखा—"मेरा सत्य से साक्षात्कार का दिन, युद्ध का नहीं."

आयुष ने पेन वापस मेज़ पर रखा. अजीब बात थी, हर बार, जब वह 'आठ अप्रैल' के बारे में सोचता था, उसके हाथ काँपने लगते थे, लेकिन आज उसकी हथेलियाँ स्थिर थीं. उसने कमरे की खिड़की खोल दी. सड़क पर कुछ छात्र भारी बैग टाँगे, झुके हुए कंधों के साथ जा रहे थे. आयुष को उन पर तरस आया; वे छात्र नहीं, 'रैंक के बोझे’ से दबे हुए लड़के लग रहे थे.

उसने अपनी फिजिक्स की किताब उठाई. इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म का एक जटिल सवाल, जो सुबह उसे उलझा रहा था, अब उसे एक 'दुश्मन' की तरह नहीं लगा, बल्कि 'सत्य' का एक हिस्सा लग रहा था. उसने अपनी आँखें मूँद लीं और फिजिक्स के नियमों को महसूस किया—जैसे वे नियम उसके आसपास की हवा में तैर रहे हों. शगुन ने सही कहा था, विज्ञान रटने की चीज़ नहीं, जीने की चीज़ है.

आयुष ने सवाल हल कर लिया था. सोने का समय था. उसने कमरे की लाइट बंद कर दी. कमरा फिर भी पूरा अंधेरा नहीं था. खिड़की के शीशों से रोशनी छन कर आ रही थी. दीवार पर चिपके फॉर्मूला चार्ट अब उसे डरावने विज्ञापनों जैसे नहीं, बल्कि पुराने परिचित दोस्तों जैसे लग रहे थे. उसे लगा जैसे 'मुक्ति' उसके बगल में सोई हुई है, और उसकी सांसों की लय के साथ उसके मन में भरा हुआ 'एवरेज' होने का तमाम शोर शांत हो गया है. उस रात, महीनों बाद आयुष कोई सपना नहीं देखा. वह बिना किसी डर के गहरी नींद सोया.

अगली सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह पूरी तरह तरोताजा था.  'आठ अप्रैल' अब उसके लिए डर की रेखा नहीं रह गया था. अब उसे खुद को साबित करना था, और उसके लिए वह बिलकुल तैयार था.
... क्रमशः

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

मुक्ति

  पिंजरा और पंख-38

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
अस्पताल के लेबर रूम से बाहर आकर नर्स वहीं दरवाजे के बाहर खड़ी रह गयी. उसके चेहरे पर थकान के चिन्ह थे, साथ ही एक संतोष की मुस्कान भी. श्रीमती गुप्ता, अनिल चाचा, आयुष और शगुन उसे देख एक झटके में अपनी बेंच से उठ खड़े हुए. उनके चेहरे पर एक ही प्रश्न था.

"बधाई हो! दीवाली के दिन लक्ष्मी आई है... बहुत सुंदर स्वस्थ बिटिया हुई है,"नर्स ने अपनी आवाज़ में एक स्वाभाविक उत्साह भरने की कोशिश की.”

शगुन ने मम्मा के चेहरे की ओर देखा. उस एक पल के लिए मम्मा के चेहरे पर वही भाव आया जिसे डॉ. शास्त्री 'अनकही निराशा' कहते थे. यह वर्षों की उस कंडीशनिंग का स्वाभाविक प्रभाव था, जो 'लड्डू गोपाल' के आगमन की रट लगा रही थी.

अगले ही पल, नर्स ने कहा, “जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं”.

चाची की सलामती की खबर ने मम्मा के चेहरे पर आए उस निराशा भाव को ढक लिया.

कुछ ही देर में लेबर रूम से एक ट्रॉली बाहर निकली. उस पर चाची लेटी थीं, आँखें बन्द किए हुए. ट्रॉली को उन्हें एलॉट हुए कमरे की ओर ले जाया जाने लगा. नर्स ने बताया कि बच्ची को वे लेकर आ रहीं हैं.

कमरे में लाकर चाची को ट्रॉली से उनके बिस्तर पर शिफ्ट किया गया. कमरा अचानक डिटॉल की गंध से भर गया. चाची के चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जैसे वे बहुत बड़ा युद्ध जीत कर लौटी हों. श्रीमती गुप्ता ने पूछा, कैसी हो नीतू? चाची ने आँखें खोली ठीक हूँ, लेकिन मेरी बच्ची?

“चाची, उसे नर्स लेकर आ ही रही है.” शगुन की आवाज सुनकर चाची की आँखों में चमक आ गयी.

कुछ ही देर में नर्स एक गुलाबी कपड़े में लिपटे हुए शिशु को अपनी गोद में लेकर आयी और चाची की बगल में लिटा दिया. वह नन्हा सा वजूद बिलकुल चुप था.

मम्मा ने नर्स की ओर देखा. “खूब रो ली है, थक कर सो गयी है.” मम्मा ने संतोष की साँस ली.

तभी चाचा अंदर आ गए. श्रीमती गुप्ता ने पूछा, “अनिल जी, आपके भैया को फोन कर दिया कि नहीं?”

“कर दिया है पर वे तब आएंगे जब यहाँ से कोई घर जाएगा. दीवाली के दिन घर खाली कैसे छोड़ेंगे?” जवाब देते वक्त उनकी निगाहें बिस्तर की ओर थीं. चाचा, जो हमेशा 'खानदान के वारिस' की बातें करते थे, अपनी बेटी को देखकर सन्न रह गए थे. मम्मा समझ गयीं. उन्होंने नन्ही सी जान को बड़ी सलाहियत से उठाया और चाचा की गोद रख दिया. चाचा की भारी मूंछों के नीचे दबी मुस्कान और गीली होती आँखें बता रही थीं कि उनके भीतर का 'पितृसत्ता-जनित अहंकार' कुछ तो पिघला है.

शगुन ने आयुष की कोहनी को छुआ. आयुष मंत्रमुग्ध होकर उस बच्ची की मुड़ी हुई नन्ही उँगलियों को देख रहा था.

"देख रहे हो आयुष? यह इस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर इंसान है," शगुन ने फुसफुसाते हुए कहा.

"क्यों दीदी?" आयुष ने अपनी नज़रें बच्ची से बिना हटाए पूछा.

"क्योंकि इसके पास अभी कोई नाम नहीं है, कोई जाति नहीं है, और न ही कोई रैंक है. यह एक कोरी स्लेट है. न यह 'एवरेज' है, न 'एलीट'." शगुन की आवाज़ में एक दृढ़ता थी.

आयुष बुदबुदाया, "सच दीदी... पर क्या हम इसे ऐसे ही रहने देंगे? कल जब यह बड़ी होगी, क्या मम्मा और चाची इसे रसोई के सबक नहीं देंगी? क्या चाचा इसे भी किसी रेस का हिस्सा नहीं बनाएंगे?"

शगुन ने चाची की ओर देखा, जिन्होंने अपनी थकी हुई आँखों से शगुन को ही निहारा था. उन आँखों में एक मौन सहमति थी.

शगुन ने आयुष से कहा, "यह हमारे ऊपर है आयुष. हम इसे एक 'डिजिट' या 'लेबल' नहीं बनने देंगे. हम इसे 'इंसान' बनना सिखाएंगे."

तभी मम्मा ने पास आकर कहा, "नाम क्या सोच रखा है, अनिल जी? यह पहली संतान है, कुछ अच्छा सा नाम होना चाहिए."

चाचा ने अपनी रुँधी हुई आवाज़ में कहा, "शगुन बताएगी... आखिर इसके आने से सबसे ज़्यादा खुश वही है."

शगुन ने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ दीवाली की रात अब ढल रही थी. बिजली की रोशनियाँ बरकरार थीं, कुछ मिट्टी के दीपक अभी भी टिमटिमा रहे थे, सुबह का हल्का उजाला क्षितिज से बाहर निकलने लगा था. उसने मुस्कुराकर कहा, " चाचा, इसका नाम 'मुक्ति' कैसा रहेगा? पूर्वाग्रहों से मुक्ति, लेबल्स से मुक्ति."

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया. यह नाम घर के पुराने ढाँचे के लिए भारी था, लेकिन तभी नन्ही जान के पहली किलकारी निकली, जैसे उसने इस सन्नाटे को नामंजूर कर दिया. आयुष और शगुन की खुशी का कोई ठिकाना न था. उन्हें लगा, जैसे उनके मन में दीवाली के पटाखे फूट रहे हैं—खुशी के, उम्मीद के.
... क्रमशः 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

रोशनियों के बीच

  पिंजरा और पंख-37

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

 दीवाली की छुट्टियाँ शुरु हो गयी थीं. घर के दोनों किशोर छुट्टियाँ बिताने और त्यौहार मनाने आ चुके थे. घर में हलचल बढ़ गयी थी और माहौल में उत्सुकता. पिछली मई-जून में आयुष और शगुन कोटा और वनस्थली गए तब घर की परिस्थितियाँ अलग थीं. घर की देहली पर खड़ी शगुन को सब कुछ पहले जैसा ही लग रहा था, लेकिन मन में डॉ. शास्त्री के समझाए हुए 'लेबल्स' और 'पूर्वाग्रह' शब्दों के अर्थ गूंज रहे थे.

चाची को नौवां महीना शुरू हो गया था. वे लिविंग रूम में सोफे पर बैठी बेसन के लड्डू बांध रही थीं. इस बीच मम्मा दो-तीन बार रसोई से निकलकर उनके पास आयी थीं. पहली बार उन्होंने चाची को डाँटा था, “ये लड्डू तुझे बांधने की क्या जरूरत है. तुझे आराम करना चाहिए.” चाची ने “काम में मन लगा है, और काम भारी नहीं है” कहकर वापस कर दिया. दूसरी बार आईं तो चाची को सीधे आराम की हिदायत दे डाली. तब चाची ने “बस थोड़े से और हैं इन्हें बांधकर चली जाऊंगी” कहा. तीसरी बार मम्मा गुस्सा हो गयीं, “तू उठ, बाकी के लड्डू शगुन बांध लेगी”. तब शगुन ने माँ को समझाया, “माँ थोड़ा बहुत काम करते रहना अच्छा होता है, पेशियाँ मजबूत बनी रहती हैं और डिलीवरी आसान हो जाती है. मैं उनका साथ दे ही रही हूँ.”

"अभी भारी काम मत कर, बस दो चार दिन की बात है. फिर घर में 'लड्डू गोपाल’ आएंगे, दीवाली की खुशियाँ चौगुनी हो जाएंगी.

'लड्डू गोपाल', बस यही शब्द शगुन को खटक गया. उसने देखा कि मम्मा जिस तरह चाचा और पापा से बातें करती उनसे होने वाले बच्चे का जेंडर तय कर दिया गया था. यदि लड़की हुई तो क्या उससे खुशियाँ कम हो जाएंगी? उसका मन खराब हो गया. उसने नीतू चाची की ओर देखा. आँखें मिलीं तो चाची समझ गयीं. बोलीं, “भाभी की बातों पर तू ध्यान मत दे. कंडीशनिंग झेलते उनकी उम्र गुजर गयीं, वे आदतन ऐसा कहती हैं. और मुझे इन बातों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता. तेरे चाचा भी अब मेरे सामने लड़का या लड़की होने की बात नहीं करते. हाँ, बाहर जरूर डींगें हाँकते होंगे.”

तभी आयुष जीने से नीचे उतरा. उसके हाथ में इस बार 'संबल' कोचिंग के नोट्स की जगह एक किताब थी, 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम'. शगुन ने उसे गौर से देखा; उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे लगभग गायब थे और वह पहले से कहीं अधिक शांत दिख रहा था.

"दीदी, मांडणा बहुत सुंदर बनाई है, आपने," आयुष ने शगुन की बनाई रंगोली देख कर मुस्कुराते हुए कहा.

"थैंक्यू आयुष! कोटा की क्या खबर है? इस बार रैंक क्या रही? डर तो नहीं लगा?" शगुन ने धीरे से पूछा.

"दीदी, रैंक अब बस एक नंबर है. आपने सही कहा था, जब से मैंने फॉर्मूले रटने के बजाय नियमों और सिद्धांतों को समझना शुरू किया, तब से फिजिक्स के प्रश्न पहेली लगने लगे हैं, जिन्हें सुलझाने में मज़ा आता है. मैं सच को अंगीकार कर रहा हूँ.”

“तू इधर-उधर की बातें करने के बजाय ये बता कि तेरी रैंक का क्या हाल है?

“बस दीदी, ये समझ लो कि रोहित अब मुझे 'एवरेज' नहीं कहता, और मुझे अब रैंक से कोई फर्क नहीं पड़ता.”

“मतलब, तू बताएगा नहीं?” यह कहते हुए शगुन खड़ी हो गयी, “पहले की तरह तेरे कान उमेठूँ”

“नहीं दीदी, उसमें बहुत दर्द होता है.” इतना कह कर वह शगुन के नजदीक गया और कान में फुसफुसाकर कहा, “89 आयी है.”

“अरे वाह, क्या बात? फिर तो आज डबल जश्न होगा.”

“हुआ क्या है? कुछ मुझे भी बताओगे?” चाची ने हाथ से लड्डू का चूरमा झाड़ते हुए पूछा.”

“अरे चाची, खबर ही ऐसी है कि आप नाचने लगेंगी.” शगुन की आवाज रसोई में मम्मा तक पहुँच गयी. वे बाहर निकलीं और दोनों को डाँटने लगीं. “तुम दोनों चाची को तंग मत करो. परेशानी हो जाएगी.”

“भाभी, कोई परेशानी नहीं होगी, हम केवल बातें कर रहे हैं.” चाची ने हँसते हुए कहा.”

शगुन बहुत खुश थी, उसका भाई न केवल चक्रव्यूह से निकल आया था, बल्कि प्रगति पर भी था.

शाम को घर दीयों और बिजली की रोशनियों से जगमगा उठा. सबने एक साथ बैठ कर लक्ष्मी पूजन करके भोजन किया. बाहर पटाखे चलने लगे. शगुन और आयुष सोच ही रहे थे कि शहर की रोशनी देख आएँ. तभी कमरे से चाची की चीख सुनाई दी. उत्सव पल भर में तनाव में बदल गया. चाची को दर्द शुरू हो गए थे.

आनन-फानन में चाचा ने मारुति बाहर निकाली. मम्मा ने सहारा दे कर चाची को पिछली सीट पर बिठाया और खुद साथ बैठ गयी. पापा ने स्टीयरिंग संभाली, चाचा पास बैठे. पटाखों के धमाकों के बीच कार अस्पताल की और बढ़ चली. घर पर आयुष और शगुन ही रह गए. कुछ देर बाद पापा ने लौटकर बताया कि डाक्टर ने कहा अभी कुछ घंटे लगेंगे. शगुन ने उनसे पूछा कि आप घर पर हैं तो मैं और आयुष अस्पताल चले जाएँ? गुप्ताजी ने, “वैसे भी वहाँ मेरी कोई जरूरत नहीं”, कहते हुए अनुमति दे दी.

थोड़ी देर बाद दोनों अस्पताल में चाची के बिस्तर के पास थे. चाची को दर्द तेज हुआ तो नर्स उनका हाथ पकड़ कर लेबर रूम ले गयीं. मम्मा उनके पीछे गयीं. वे दोनों भी लेबर रूम के बाहर की बैंच पर जा बैठे.

आयुष वहाँ दीवार पर लगा चार्ट देखने लगा जिसमें भ्रूण विकास की प्रक्रिया समझाई गई थी.

"डर लग रहा है आयुष?" शगुन ने पूछा.

"डर नहीं दीदी, बस सोच रहा हूँ कि जो अभी इस दुनिया में आने वाला है, उसे हम सबसे पहले कौन सा लेबल देंगे? क्या उसे भी हम अपनी उम्मीदों के बोझ तले दबा देंगे?"

शगुन ने आयुष का हाथ थाम लिया. उसे अहसास हुआ कि छह महीने पहले जो भाई संबल ढूँढ रहा था, आज वह खुद दूसरों के लिए संबल बन रहा है.

तभी लेबर रूम का दरवाज़ा खुला और नर्स बाहर आई. दोनों की साँसें थम गईं.

... क्रमशः 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

एवरेज

  पिंजरा और पंख-36

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
​अगस्त की उमस भरी दोपहर थी. बादल घुमड़ते थे लेकिन बरसते न थे, धूप निकल आती थी. 'संबल कोचिंग' के नोटिस बोर्ड पर मंथली टेस्ट की रैंकिंग लिस्ट चस्पा कर दी गई थी. आयुष भीड़ से थोड़ा दूर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था. उसके दिल की धड़कनें उसके कानों में साफ़ सुनाई दे रही थीं. जैसे ही भीड़ छंटी, उसने अपनी उंगली लिस्ट पर दौड़ाई.

​रैंक

101’ ... .................

.

.

104’ ... .................

105' ... आयुष गुप्ता

​उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. टॉप-100 रैंक वालों का जो 'एलिट' क्लब बन गया था, वह उससे मात्र पांच कदम दूर रह गया. तभी पीछे से रोहित की आवाज़ आई, "अरे यार आयुष, तू तो 'बॉर्डर-लाइनर' निकला. 105? भाई, कोटा में 100 के बाहर होने का मतलब है 'एवरेज'. और एवरेज लोगों को यहाँ कोई याद नहीं रखता. वे बस भीड़ का हिस्सा होते हैं."

​रोहित का वह 'एवरेज' शब्द आयुष को तीर सा चुभा. उसने मुड़ कर रोहित की आँखों में देखा. वह उसका मखौल उड़ा रहा था. वह बिना कुछ बोले अपने रूम पर आ गया. मेज पर रखी फिजिक्स की मोटी किताबें उसे चिढ़ाने लगीं. उसने पंखे की ओर देखा, जो एक अजीब सी घरघराहट के साथ घूम रहा था—ठीक वैसी ही जैसी उसके दिमाग में चल रही थी. कमरे की दीवारों पर चिपके 'फॉर्मूला चार्ट' उसे अपनी ही असफलताओं के विज्ञापन जैसे लगने लगे. दिन मुश्किल से गुजरा.

​शाम को उसने भारी मन से शगुन को फोन लगाया.

​"दीदी... मेरी रैंक 105 आई है," आयुष की आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था.

​"आयुष, 105 कोई बुरी रैंक नहीं है! हज़ारों बच्चों में तुम यहाँ तक पहुँचे हो," शगुन ने उसे दिलासा देने की कोशिश की.

​"नहीं दीदी, यहाँ सब कहते हैं कि जो टॉप-100 में नहीं, वह रेस से बाहर है. रोहित कह रहा था कि मैं 'एवरेज' हूँ. क्या वाकई मैं बस एक औसत लड़का हूँ? क्या मेरी पहचान सिर्फ इस रैंक से तय होगी?" आयुष का गला भर आया.

​शगुन को तुरंत डॉ. शास्त्री की क्लास याद आ गई. उसने गहरी सांस ली और कहा, "आयुष, मेरी क्लास में 'स्टीरियोटाइपिंग' के बारे में पढ़ाया गया था. कोटा के उस सिस्टम ने तुम पर एक 'एवरेज' होने का लेबल लगा दिया है. यह एक मानसिक साँचा है, जिसमें वे हर उस बच्चे को डाल देते हैं जो उनकी उम्मीदों के मुताबिक 'मशीन' नहीं बन पाता. तुम औसत नहीं हो आयुष, तुम बस एक इंसान हो जिसे इस वक्त रैंक की नहीं, चैन की ज़रूरत है."

​"पर दीदी, यहाँ तो चैन भी रैंक से ही मिलता है," आयुष बुदबुदाया.

​"सुन आयुष," शगुन ने स्वर कोमल करते हुए कहा, "हमें एक असाइनमेंट मिला था—अपने भीतर के पूर्वाग्रहों को पहचानने के लिए. इस असाइनमेंट का उद्देश्य यही था कि छात्राएँ अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना सीखें और उन्हें नष्ट करने की कोशिश करें. मैं पूरी ईमानदारी से यह किया और कर रही हूँ. ये पूर्वाग्रह हमें हमारे परिवार, समाज, यहाँ तक कि स्कूल-कॉलेज भी सिखाते हैं. बेहतर और योग्य इंसान बनने के लिए इनसे मुक्त होना जरूरी है. तुम्हें भी पूर्वाग्रह सिखाए जा रहे हैं, ‘जो टॉप 100 में नहीं है वह एवरेज है’, जो कहता है कि मेरा भाई सिर्फ तभी सफल है जब वह आईआईटी जाए. तू सुन रहा है न? तू आईआईटी न भी जाए, तो भी तू मेरा वही प्यारा आयुष रहेगा. तू कोई अंक (Digit) नहीं है."

“पर दीदी,...”

“तू टॉप 100 में भी आएगा, तू अपने सब्जेक्ट्स के नियमों सिद्धान्तों को समझने की कोशिश कर. विज्ञान सचाई की निरन्तर खोज है, विज्ञान के नियम सचाई हैं, अनेकानेक प्रयोगों ने उन्हें बारंबार सिद्ध किया है, उन्हें हमें सचाई के रूप में अंगीकार करना होगा, केवल परीक्षा के लिए रटना नहीं. एक बार वे समझ आ जाते हैं तो सब आसान होता जाता है, इतना आसान कि तू रोहित को भी पछाड़ सकता है. लेकिन उससे, या किसी और से कंपीटीशन कर के यह नहीं कर सकता. यह खुद को बेहतर बनाकर होगा. तुम्हें खुद पता नहीं लगेगा, तुम कब उससे आगे निकल गए हो.”

“बात तुम्हारी सही लगती है दीदी. पर यहाँ कोचिंग में तो रटने के तरीके खूब सिखाए जाते हैं.”

“वह ठीक है, डाटा रटने पड़ते हैं, पर नियम और सिद्धांत निर्देश हैं और अंगीकार करने से आते हैं. वे सोच का स्थायी अंग बन जाते हैं.

“समझ गया, दीदी यही करता हूँ. अब रखता हूँ.

​फोन रखने के बाद आयुष देर तक खिड़की के बाहर देखता रहा. शगुन की बातों ने उसके भीतर के घाव पर मरहम ही नहीं लगाया था बल्कि, उसे एक नयी बात सिखा दी थी, “विज्ञान सत्य है, अनेकानेक प्रयोगों से बारंबार परखा हुआ. उसे सचाई के रूप में स्वीकार करो, परीक्षा के लिए रटो मत.”

उसने अपनी रफ कॉपी उठाई और गणित के सवालों के बीच, एक खाली पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा—

​"मैं कोई रैंक नहीं, बल्कि इंसान हूँ. मेरा लक्ष्य बेहतर और योग्य इंसान बनना है, विज्ञान एक सचाई है, बारंबार परखी हूई, मुझे उसे रटना नहीं, समझना है. सचाइयों को अंगीकार करना है."

​लिखने के बाद, आयुष कुछ देर सोचता रहा. खिड़की के बाहर आसमान में बादल दिखाई दे रहे थे. एक दिशा में धीरे-धीरे सरकते हुए. फिर बादलों के बीच एक बड़ा सा सूराख आया, और चांद दिखने लगा. वह आधा था. उसे पूरा होने में अभी सात-आठ दिन थे. सात-आठ दिन बाद तो रक्षाबंधन का त्यौहार है. रामगंजमंडी में हमेशा शगुन उसे राखी बांध कर मिठाई मुहँ में रख देती थी. उसे लगा कि दीदी ने यह मिठाई आज ही उसके मुहँ में रख दी है. एक दो दिनों में उसे दीदी की भेजी राखी मिल जाएगी. मम्मा दीदी को देने को हमेशा सौ का नोट उसे देती थी. यहाँ वह क्या देगा? फिर उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी. इस सात दिनों में वह विज्ञान के सच को अंगीकार करने की कोशिश करेगा. तब तक जितने भी सच वह अंगीकार करेगा. वही दीदी के लिए उपहार होंगे.
... क्रमशः

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

दरकती दीवारें

  पिंजरा और पंख-35

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

तीनों जब मेस से अपने रूम में लौटीं तो सब यही बात कर रही थीं कि प्रियंका उनके साथ नहीं खाना चाहती थी. उसका कारण शर्म थी या गुस्सा इसमें तीनों के बीच मतभेद था. प्रियंका जैसे ही खाना खाकर लौटी सब चुप हो गयीं. प्रियंका भी वापस लौट कर चुपचाप कपड़े ले बाथरूम चली गयी. कपड़े बदल कर लौटने पर ‘भगवद्गीता’ निकालकर अपने बिस्तर पर इस तरह करवट लेकर लेटकर पढ़ने लगी कि उसका चेहरा दीवार की ओर रहे.

शगुन ने गौर किया कि पिछले पंद्रह मिनट से प्रियंका ने एक भी पन्ना नहीं पलटा था. वह पढ़ नहीं रही थी, अपितु वह खुद को उस मानसिक हमले से बचाने की कोशिश कर रही थी जो डॉ. शास्त्री के लेक्चर ने उसकी 'पंडिताई' पर किया था.

शगुन अपनी मेज पर बैठी डायरी लिख रही थी, तभी सीमा उसके पास आकर धीरे से बैठ गई. आज उसकी आँखों में हमेशा वाली झिझक नहीं थी.

"शगुन," सीमा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "आज पहली बार ऐसा लगा जैसे क्लास में मेरी ही ज़िन्दगी के बारे में बात हो रही है. मैम ने जब 'लेबल्स' की बात की, तो मुझे लगा जैसे मेरे कंधे से सदियों पुराना कोई बोझ उतर गया हो. क्या वाकई हम सिर्फ एक लेबल नहीं हैं?"


शगुन ने सीमा का हाथ थाम लिया. उसी पल दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई. फातिमा खड़ी थी, उसके चेहरे पर भी वैसे ही सवाल थे जो सीमा की आँखों में तैर रहे थे.

"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" फातिमा ने पूछा और सीमा के पास ही शगुन के बिस्तर पर बैठ गई. "आज डॉ. शास्त्री ने जो कहा, उसने मुझे डरा दिया शगुन. अगर 'स्टीरियोटाइप्स' ही हमारी पहचान तय करते हैं, तो क्या फातिमा होना हमेशा एक संदेह के दायरे में रहना ही रहेगा? प्रियंका का आज मेस से भागना... क्या वह भी इसी स्टीरियोटाइप का हिस्सा था कि वह हमारे साथ बैठकर 'अशुद्ध' नहीं होना चाहती?"

वे तीनों फुसफुसा कर बातें कर रही थीं, फिर भी शायद उनकी फुसफुसाहट प्रियंका तक पहुँच गयी थी. उसके शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई, पर वह मुड़ी नहीं.

शगुन ने कहा, “बादल हो रहे हैं उससे यहाँ कमरे में उमस हो रही है, क्यों न हम बाहर टैरेस पर चल कर बैठें? दोनों समझ गयीं कि शगुन स्वतंत्रता से बातें करना चाहती है. तीनों बाहर टैरेस पर आ गईं और मुंडेर पर बैठ कर बातें करने लगीं.

"देखो फातिमा, सीमा... प्रियंका का भागना असल में उसका डर है. उसे डर है कि अगर उसने हमारी मौलिकता को पहचान लिया, तो उसकी अपनी 'श्रेष्ठता' का महल ढह जाएगा. डॉ. शास्त्री ने आईना दिखाया है, और आईना सबसे पहले उन्हें डराता है जिनके चेहरे पर नकाब होते हैं." शगुन ने कहा.

"मुझे तो डर लगता है शगुन," फातिमा ने लंबी सांस लेते हुए कहा. "यहाँ बनस्थली में खादी के वस्त्रों में भी मुझे अक्सर अपनी पहचान छुपानी पड़ती है जिससे कोई मुझे 'कट्टर' न समझ ले. मैं हर वक्त मुस्कुराती रहती हूँ ताकि कोई मेरे धार्मिक स्टीरियोटाइप से न डरे."

सीमा ने पहली बार फातिमा के कंधे पर हाथ रखा. "फातिमा, हम दोनों अलग-अलग वजहों से एक ही किनारे पर खड़ी हैं. मुझे अपनी जाति छुपानी पड़ती है ताकि कोई मुझे कमतर न समझे, और तुम्हें अपनी पहचान ताकि कोई तुम्हें पराया न समझे. शगुन सही कह रही है, कंडीशनिंग ने हमें दुश्मन नहीं, बल्कि 'कैदी' बना रखा है."

“पर किसी को अपनी आइडेंटिटी छुपाने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? दूसरे उसे उसी रूप में एक इंसान के रूप में स्वीकार क्यों नहीं कर सकते?” फातिमा ने सवाल रख दिया.

“मैं ठीक से नहीं बता सकती, लेकिन मुझे लगता है यह हमारी अपनी कंडीशनिंग के कारण भी है और पूरे समाज की कंडीशनिंग के कारण भी.” शगुन ने उत्तर देने का प्रयास किया. “लेकिन कल की क्लास में डॉ. शास्त्री से पूछने के लिए यह सबसे बेहतर सवाल जरूर है.

अगली सुबह जब वे अपनी क्लास के लिए निकलीं तो रास्ते में सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सामूहिक प्रार्थना के स्वर गूंज रहे थे. जब 'हिंद देश के निवासी...'. शगुन ने गौर किया कि खादी की एक जैसी रंग-योजना वाले वस्त्र पहने पंक्तियों में खड़ी एक सुर में गा रही थीं, पर उन पंक्तियों के बीच भी अदृश्य दीवारें थीं. प्रियंका को प्रार्थना का प्रकरण हमेशा प्रिय लगता. वह कहती भी थी कि आखिर कॉलेज में सुबह सामूहिक प्रार्थना क्यों नहीं होती?

क्लास में डॉ. शास्त्री ने कहा, “कल हमने पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता के बारे में जाना था. आप सभी ने उस पर विचार अवश्य किया होगा. कुछ प्रश्न भी जन्मे होंगे. यदि कोई प्रश्न पूछना चाहे तो पूछे.

शगुन ने रात वाला प्रश्न ही उनके सामने रख दिया. “मैम, हमारे समाज में और यहाँ भी क्यों कुछ लोगों को अपनी जातीय या वर्गीय आइडेंटिटी छुपाने की जरूरत पड़ती है?”

“यह बेहतर सवाल है. लेकिन इसका उत्तर मैं अभी नहीं दूंगी. आज मैं आप सबको एक असाइनमेंट दे रही हूँ, नोट कीजिए. आपको अपने स्वयं के तीन ऐसे पूर्वाग्रह (Prejudices) पहचानने हैं जो आपको अपने परिवार या समाज से मिले हैं, और उन पर एक ईमानदार रिपोर्ट लिखनी है. यह रिपोर्ट गुप्त रहेगी. इससे मुझे यह समझने में मदद मिलेगी कि हमें आगे की क्लासेज में किन चीजों पर अधिक ध्यान देना है."

शगुन ने प्रियंका की ओर देखा. उसने अपनी नोटबुक में खाली पृष्ठ पर सबसे ऊपर ऊँ लिखा. फिर नीचे ही जैसे वह तीन पूर्वाग्रह लिखने लगी उसके हाथ में पकड़ा हुआ पेन काँपने लगा. यह प्रोजेक्ट उसके लिए अपनी आत्मा के उन कोनों में झाँकने जैसा था जहाँ उसने 'अशुद्धता' और 'श्रेष्ठता' के भूत पाल रखे थे.

शगुन ने अपनी कॉपी में पहला वाक्य लिखा— "कंडीशनिंग को पहचानना ही उसे तोड़ने का पहला कदम है. मुझे अपने पूर्वाग्रहों की कोई जानकारी नहीं, जिनकी हुई उन्हें मैंने त्याग दिया. फिर भी मैं अपने तीन पूर्वाग्रह तलाश करूंगी और उन पर रिपोर्ट लिखूंगी."
... क्रमशः

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पूर्वाग्रह

 पिंजरा और पंख-34

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली विद्यापीठ में सत्र 2005-06 आरंभ हुआ. तीन जुलाई को द्वितीय वर्ष बीएससी (मनोविज्ञान) की पहली क्लास लगी. हॉल में करीब तीस-पैंतीस लड़कियां खादी के परिधान में अनुशासित बैठीं. खादी के इन लिबासों के नीचे छिपे उनके संस्कार और पूर्वाग्रह उतने ही विविध थे जितनी उनकी पृष्ठभूमि.

प्रोफेसर डॉ. नीलम शास्त्री ने क्लास में प्रवेश किया. उनकी आँखों में वह चमक थी जो केवल किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार की गहरी समझ से आती है. उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा— 'पूर्वाग्रह' (Prejudice) और 'रूढ़िवादिता' (Stereotypes).

"पूर्वाग्रह क्या है?" उन्होंने क्लास की ओर देखते हुए पूछा.

शगुन ने हाथ उठाया, "मैम, बिना किसी ठोस आधार या अनुभव के किसी व्यक्ति या समूह के बारे में पहले से ही कोई धारणा बना लेना ही पूर्वाग्रह है."

"बिल्कुल," डॉ. शास्त्री ने आगे बढ़ते हुए कहा, "पर पूर्वाग्रह से पहले जन्म लेता है— 'Stereotypes' अर्थात रूढ़िवादिता. रूढ़िवादिता वह 'मानसिक साँचा' है जिसमें हम पूरी की पूरी कम्युनिटी को फिट कर देते हैं. जैसे ही हम कहते हैं कि 'सारे बनिए कंजूस होते हैं' या 'सारे क्षत्रिय गुस्सैल होते हैं' या 'मुस्लिम कट्टर होते हैं', हम पूरे एक समुदाय की स्टीरियोटाइपिंग कर रहे होते हैं. हम उस समूह के हर व्यक्ति की मौलिकता छीनकर उस पर एक जनरल 'लेबल' लगा देते हैं."

क्लास में सन्नाटा गहरा गया. किरण ने टोका, "पर मैम, बहादुर होना तो अच्छी बात है न? अगर हम कहें कि 'राजपूत वीर होते हैं', तो इसमें गलत क्या है?"

प्रोफेसर शास्त्री मुस्कुराईं, "इसमें गलत यह है किरण, कि यह स्टीरियोटाइपिंग उस राजपूत लड़के पर 'वीर' दिखने का इतना दबाव डाल देता है कि वह अपनी कमजोरी या डर ज़ाहिर नहीं कर पाता. वह खुद को चोट पहुँचाता है ताकि समाज की उस छवि में फिट हो सके. स्टीरियोटाइपिंग चाहे सकारात्मक दिखे, वह अंततः पूरे समुदाय के लिए 'मानसिक जेल' बन जाती है."

तभी अपनी 'पंडिताई' के लिए प्रसिद्ध प्रियंका बोल पड़ी, "पर मैम, कुछ बातें तो हमारे पूर्वजों के अनुभवों पर आधारित होती हैं न? जैसे शुद्धता और खान-पान के नियम. क्या उन्हें भी आप पूर्वाग्रह कहेंगी?"

डॉ. शास्त्री प्रियंका की मेज के पास जाकर रुक गईं. "प्रियंका, जब तुम्हारा 'शुद्धता का नियम' तुम्हें किसी दूसरे इंसान से हाथ मिलाने या उसके साथ बैठने से रोकता है, तो वह संस्कार नहीं, बल्कि 'डिस्क्रिमिनेशन' यानी भेदभाव है. पूर्वाग्रह (मानसिक धारणा), स्टीरियोटाइपिंग (दिमाग में छवि) और डिस्क्रिमिनेशन (व्यवहार में भेदभाव)—ये तीनों एक ही सिक्के के पहलू हैं."

कोने में बैठी सीमा की आँखों में एक अजीब सी चमक थी. वह दलित समुदाय से थी और उसने जब से पैदा हुई तब से इन 'लेबल्स' को झेला था.

डॉ. शास्त्री ने आगे कहा, "एक और स्टीरियोटाइप लीजिए—लड़कों पर लदा 'सफलता' का बोझ. समाज ने सांचा बना दिया है कि 'लड़के रोते नहीं' और 'सफल वही है जो आईआईटी जाए' इंजीनियर या डाक्टर बने. क्या यह स्टीरियोटाइप उस लड़के की जान नहीं ले लेता जो शायद संगीतज्ञ बनना चाहता था?"

शगुन को तुरंत कल रात की आयुष से हुई बात याद आ गई. उसने खड़े होकर कहा, "मैम, क्या ये स्टीरियोटाइप्स इतने गहरे होते हैं कि इंसान अपनी संवेदना भी खो देता है? मेरा भाई कल बता रहा था कि कोटा में आईआईटी जी और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे लड़कों के होस्टलों में उनके कमरों से रातों को रोने की सिसकियां आती हैं, पर दिन में उनमें से हर कोई 'मजबूत' होने का नाटक करता है."

"हाँ शगुन," शास्त्री मैम ने गंभीर होकर कहा, "क्योंकि स्टीरियोटाइपिंग हमें सोचने की मेहनत से बचा लेती हैं. हमें लगता है कि हमने किसी को 'लेबल' दे दिया, तो हम उसे जान गए. लेबल लगा देना सबसे आसान है, इंसान को समझना सबसे मुश्किल. याद रखिए, जब आप किसी को उसकी जाति, धर्म या जेंडर के चश्मे से देखते हैं, तो आप उसे नहीं, बल्कि अपनी खुद की 'कंडीशनिंग' को देख रहे होते हैं."

क्लास खत्म होने के बाद जब वे सब मेस की ओर बढ़ रही थीं, तो प्रियंका का तमतमाया हुआ उसकी नाराजगी को उजागर कर रहा था. "मैम तो हमारे संस्कारों को ही बीमारी बता रही हैं," वह बुदबुदाई.

शगुन ने रुककर उसे देखा, "संस्कार बीमार नहीं होते प्रियंका, पर जब वे किसी को इंसान समझने से रोकें, तो वे ज़हर ज़रूर बन जाते हैं. कल मेस में हम सबने फातिमा के लाए खाने से परहेज किया था, आज क्लास में उसे 'प्रेजुडिस' और 'स्टीरियोटाइप' का नाम मिल गया है. अब तय हमें करना है कि हम यहाँ कुछ सीख रहे हैं या सिर्फ किताबों के पन्ने पलट रहे हैं."

रात के खाने के लिए चारों अपने रूम से साथ निकलीं. लेकिन मेस पहुँचते ही अचानक प्रियंका यह कह कर वापस चल दी कि, “मैं अपना फोन भूल आई हूँ, लेकर आती हूँ. हो सकता है इस बीच माँ का फोन आ जाए.” फिर वह तब तक नहीं लौटी जब तक कि वे तीनों भोजन करके मैस से बाहर नहीं आ गयीं. जब वे अपने रूम की ओर लौट रही थीं, तब प्रियंका उन्हें रास्ते में मैस की ओर तेजी से जाती मिली. किरण के पूछने पर कहने लगी, माँ का फोन आ ही गया था, बात करने में लेट हो गयी.”

प्रियंका का इस तरह मैस के ठीक बाहर से फोन के बहाने लौट जाना और उनके भोजन के बाद बाहर आने तक न लौटना सबको अजीब लगा था. सब समझ रहे थे कि वह जानबूझकर उनके साथ खाने पर साथ नहीं थी. शायद इसलिए कि कहीं उसकी रूम मेट ही उसके अपने पूर्वाग्रहों पर कोई मजाक न बनाने लगें.

शाम को डायरी में शगुन ने लिखा— "आज डॉ. शास्त्री ने हमारे दिमागों की सालों से बंद खिड़कियों पर दस्तक दी. किरण की असहजता, सीमा की आँखों की वह चमक और प्रियंका की चिढ़ और शाम को सबके साथ भोजन करने से बचने की उसकी कोशिश बता रही है कि द्वंद्व शुरू हो चुका है—किताबों के बीच नहीं, बल्कि हमारी अपनी पुरानी आदतों और नई चेतना के बीच."
... क्रमशः