देहरी के पार, कड़ी - 57
जब आकाश का फोन आया था, तब डेटा फीड करने का काम लगभग समाप्त हो चुका था. कणिका ने डेटा देखकर कहा, “प्रिया, लगता है ये नतीजे तुम्हारे रैंडम सर्वे से बहुत अलग नहीं होंगे. तुमने जो औचक सर्वे किया था वह भी काफी बढ़िया था, तुमने भी वैज्ञानिक और सांख्यिकीय सिद्धांतों का बखूबी इस्तेमाल किया था.”
“नहीं, मैं इन सिद्धांतों के बारे में अधिक कुछ नहीं जानती. पर बचपन से सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए पढ़ने की आदत पड़ गयी और जब से इंटरनेट और सर्च इंजन हत्थे चढ़े हैं, जिज्ञासा को मैं दबाती नहीं. मुझे तुरंत उत्तर चाहिए. वहाँ मिली जानकारी जीवन का हिस्सा बन जाती है. वह सर्वे भी हमने अपनी जिज्ञासावश ही किया था.” प्रिया ने कहा.
“खैर, इस सर्वे को पूरा होने दो. इस बीच हम मिलते रहेंगे. तुम्हारी जिज्ञासाएँ तुम्हें बहुत कुछ सिखाएंगी और मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”
“वह तो है. साथ काम करते हैं तो एक दूसरे से सीखते ही हैं.” प्रिया ने कणिका से सहमति जताई.
उधर सोफे पर बैठे कुलकर्णी जी से बात करते हुए प्रशांत बाबू कह रहे थे. “देखो कॉमरेड, इन दोनों लड़कियों को देखकर लगता ही नहीं कि ये कल पहली बार मिली थीं. ऐसे बातें कर रही हैं जैसे कई महीनों से एक दूसरे को जानती हैं.”
“कॉमरेड प्रशांत, यही बात है, जब दो या अधिक व्यक्ति एक समान उद्देश्य के लिए साथ काम करते हैं तो उनमें जानकारियों का आदान प्रदान होता है और वे तेजी से नजदीक आते हैं. रक्त संबंध हमें जन्म से मिलते हैं. लेकिन उनके बाद साथ मिलकर काम करने का रिश्ता ही सबसे अधिक मजबूत होता है....” वे बात कर ही रहे थे कि तभी डोरबेल बज उठी.
प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.
“आप आकाश ही हैं न? प्रिया ने बताया था कि आपने आज ही फ्लैट में सामान रखा है. आपको फ्लैट प्रवेश की बहुत बधाई.”
“मैं गलती नहीं कर रहा हूँ तो आप प्रशांत बाबू हैं.”
“जी, मैं ही हूँ. आपने ठीक ही पहचाना.”
“नमस्ते सर, प्रिया ने आपके बारे में मुझे अनेक बार बताया है. वह अक्सर कहती है कि मुंबई में आप और रामजी काका ही उसके गार्जियन हैं. आज से मैं भी आपका वार्ड हूँ. और सर, ये ‘आप’ के स्थान पर मुझे ‘तुम’ कहें तो मुझे अच्छा लगेगा.”
“आकाश! ऐसा लगता है प्रिया ने तुमसे मेरी कुछ अधिक की तारीफ कर दी है. मैं उसका गार्जियन नहीं, एक अच्छा साथी जरूर हूँ, और हम एक दूसरे की परवाह करते हैं. आज से तुम भी हमारे साथी हुए.” प्रशांत बाबू की इस आत्मीयता ने आकाश की सारी झिझक को पल भर में दूर कर दिया. 'एमबी' में खाना पैक करवाने के बाद जब रामजी ने उसके दाम लेने से इन्कार करते हुए कहा कि यह खाना मेरे घर ही जा रहा है, तब वह चौंका था कि उन्हें कैसे खबर थी कि खाना कहाँ जा रहा है. रामजी ने बताया था कि प्रशांत बाबू का फोन आया था.
डाइनिंग टेबल से सर्वे के कागज़ात और लैपटॉप को हटाकर जल्दी से खाना लगा दिया गया. भोजन के दौरान माहौल पूरी तरह अनौपचारिक और पारिवारिक हो गया. कॉमरेड कुलकर्णी और कणिका ने आकाश से उसके नए फ्लैट और विक्रोली के ऑफिस के काम के बारे में बहुत सहजता से बातें कीं. आकाश चुपचाप उनके चेहरों को देख रहा था. कॉर्पोरेट जगत में उसने अब तक केवल नफा-नुकसान की भाषा सुनी थी, लेकिन यहाँ बैठे ये लोगों के बारे में उसके मन में केवल 'कट्टर मज़दूर नेता' की छवि थी. आज उसे पहली बार अहसास हुआ कि वे भीतर से कितने संवेदनशील, आत्मीय और सहृदय थे और क्यों प्रिया उनकी इतनी तारीफ करती थी. खाना टेबल पर लगा देने के बाद प्रिया ने आकाश को कणिका का परिचय दिया और बताया कि वह भी उससे कल ही मिली है.
बातचीत जब ईसीआई कारखाने और 'ट्रक सिस्टम' पर पहुँची, तो एक प्रोफेशनल के नाते आकाश ने अपना नज़रिया रखा कि कैसे आज के दौर में कोई भी मैनेजमेंट बिना आर्थिक संतुलन के उद्योग नहीं चला सकता. प्रशांत बाबू ने उसकी बात को काटा नहीं, बल्कि बहुत धीरज से उसे मज़दूरों के उस मानवीय यथार्थ से जोड़कर समझाया जो आज के सर्वे में सामने आया था. आकाश के लिए यह बातचीत एक नई वैचारिक खिड़की खोलने जैसा था. प्रिया खाना खाते हुए चुपचाप उन्हें देख रही थी, उसकी आँखों में आकाश के प्रति एक गहरा आदर और गर्व साफ़ झलक रहा था. भोजन के बाद प्रशांत बाबू, कुलकर्णी जी और कणिका ने आत्मीयता से विदा ली. थोड़ी देर प्रिया से बातचीत करने के बाद प्रिया आकाश को छोड़ने नीचे सड़क तक आई. वहाँ दोनों ने एक साथ आइसक्रीम खाने के बाद एक दूसरे को विदा किया.
अगले तीन दिन यूनियन और प्रिया दोनों के लिए बेहद व्यस्तता भरे रहे. कार्यकर्ताओं ने पूरी लगन से कारखाने के भीतर और बाहर चाय की दुकानों, बस्तियों और चालों में जाकर सर्वे किया. मज़दूरों का डर अब पूरी तरह खत्म हो चुका था, और वे खुद आगे बढ़कर फार्म भरवा रहे थे. तीन सौ बयालीस फार्म पूरी तरह और सही-सही भरे जा चुके थे. केवल चार-पाँच मजदूर ही रह गए थे जिन्होंने फार्म नहीं भरा था. यहाँ तक कि कुछ सुपरवाइजरों ने भी बदले हुए नामों से फार्म भर दिया था.
प्रिया का रोज़ को यूनियन ऑफिस से भरे हुए फार्म लेती हुई घर लौटती. कपड़े बदलकर तुरंत लैपटॉप खोलकर बैठ जाती और एक-एक मज़दूर का डेटा, उनकी बीमारी, साहूकारों का कर्ज़ और ट्रक सिस्टम से हुए नुकसान के आंकड़े दर्ज करती जाती.
गुरुवार रात पूरी डेटा शीट तैयार हो चुकी थी. शुक्रवार को कणिका के विश्लेषण के बाद जब उन्होंने परिणाम देखे तो चौंकाने वाले सांख्यिकीय आंकड़े सामने आए. साफ़ था कि 92 फीसदी मज़दूर इस कारखाने के नारकीय माहौल से इस कदर टूट चुके थे कि वे तुरंत यह नौकरी छोड़ना चाहते थे, बशर्ते उन्हें एक सम्मानजनक और बेहतर 'गोल्डन हैंडशेक' (मुआवजा) मिले. इसके अलावा, 78 फीसदी मज़दूर अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में डूबे हुए थे.
प्रशांत बाबू ने रिपोर्ट की समरी देखी तो उनकी आँखों में एक विजयी चमक तैर गई. उन्होंने बेहद संतुष्ट स्वर में कहा, "अद्भुत! तुम दोनों ने कमाल कर दिया है. अब इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में मैनेजमेंट के झूठ और कपट को बेनकाब करने के लिए एक अकाट्य और वैज्ञानिक हथियार है. मैं कल ही रिपोर्ट के साथ चव्हाण साहब से मिलता हूँ.
उस रात खाना खाने के बाद प्रिया ने खिड़की खोलकर बाहर झाँक कर देखा. मुंबई की रात रोशनियों से भरपूर थी. शीतल समुद्री हवा चल रही थी. वह सोच रही थी कि रिसर्च से प्राप्त ये आँकड़े क्या मज़दूरों के जीवन की दिशा बदल सकेंगे?
... क्रमशः
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