देहरी के पार कड़ी : 3
आकाश की कार ने चंबल के पुल को पार कर महाराणा प्रताप की प्रतिमा वाले गोल चक्कर से आगे जयपुर रोड पर बढ़ गयी थी. प्रिया खिड़की से बाहर देखती रही. बहुमंजिला इमारतें हर तरफ उग रही थीं. शहर कितना विस्तार कर गया था. बड़गाँव बावड़ी तक बस्तियाँ हो गई थीं. यहाँ से बूंदी जिला आरंभ हुआ और कार हाईवे पर आ गई और उसके साथ ही उसकी गति भी बढ़ गई. प्रिया ने मुड़कर एक बार अपने शहर को देखा. यहीं पैदा हुई, यहीं सारी पढ़ाई हुई, बस एमसीए करने के लिए उसे तीन वर्ष इंदौर में रहना पड़ा था. इस शहर ने उसे पाला-पोसा, लेकिन अंत में वही उसका सौदा करने पर आमादा हो गया. चंबल का पानी शांत था, पर प्रिया के मन में समंदर उमड़ रहा था.
अगले चार घंटे खामोशी और बीच-बीच में आकाश से कंपनी के कामों से संबंधित हुई बातों के बीच निकल गए. टोंक पहुँचे तो दोनों को कुछ भूख सी महसूस हुई. आकाश न प्रिया से पूछ कर सड़क किनारे एक रेस्टोरेंट पर कार खड़ी कर दी. वे नाश्ता और चाय पीकर उठे तो प्रिया को कुछ दूर नया सिम बेचने वाले सड़क पर ही स्टाल लगाए दिख गए. उसने अपने लिए दो सिम ले लिए और अपने फोन के सिम बदल कर उसने फोन चालू किया. अपना फोन उसने घर से निकलने के बाद ऋचा से बात होते ही बंद कर दिया था. "अब कम से कम लोकेशन ट्रेस नहीं होगी," उसने एक लंबी सांस लेते हुए कहा.
रात के आठ बजे, कार जयपुर के गोपालपुरा बाईपास के निकट एक शांत कॉलोनी 'सिद्धार्थ नगर' में रुकी. आकाश ने कार बाहर साइड में खड़ी की. घर का गेट खोला, गेट खुलने की आवाज सुन कर ही आकाश के माता-पिता और उसकी छोटी बहन, तान्या बाहर बरामदे में निकल आए, जैसे वे तीनों बहुत देर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हों. तीनों ने प्रिया का स्वागत किया. आकाश के मम्मी-पापा उसके साथ ही ड्राइंगरूम में बैठ गए, उससे बातें करने लगे. आकाश फ्रेश होने चला गया. थोड़ी देर में तान्या चाय बनाकर कुकीज़ के साथ ले आई. चाय पर आकाश के मम्मी पापा प्रिया से उसकी पढ़ाई, और कैरियर सम्बन्धी बातें करते रहे. एक बार भी उसके अचानक घर छोड़ने और विवाह से संबंधित बातों का उल्लेख तक नहीं किया. प्रिया को लगा कि आकाश के परिवार का माहौल बेहतर है, उसके मम्मी पापा बच्चों की असहजता के बारे में सजग रहते हैं.
चाय आने के कुछ देर बाद आकाश भी फ्रेश होकर आ गया. आते ही उसने कहा कि मैंने मुम्बई ऑफिस सूचित कर दिया है कि मैं प्रिया का लैपटॉप प्रिया सहित जयपुर ले आया हूँ. यह भी बता दिया है कि तुम कल सुबह जयपुर से लॉग-इन करोगी.
चाय खत्म हुई. प्रिया ने कहा, तुम मुझे होटल छोड़ने को तैयार हो जाओ मैं बाथरूम हो कर आती हूँ. होटल की बात सुनते ही. आकाश की माँ ने उसका अपने हाथ में ले लिया.
"बेटे, इस शहर में तुम अकेली होटल में रहोगी, यह हमें मंज़ूर नहीं. मैं जानती हूँ, आकाश तुम्हें जो होटल बताएगा, वह सुरक्षित ही होगा. लेकिन जिस परिस्थिति में तुम्हें घर छोड़ना पड़ा है, उसमें होटल में ठहरना किसी तरह सुरक्षित नहीं है. यहाँ तुम हर तरह सुरक्षित हो, घर में तुम्हारे सिवा चार और लोग हैं. आज रात तुम तान्या के साथ उसके कमरे में सो जाओ. ऊपर एक कमरा खाली है, कल सफाई करवाकर उसे पेइंग गेस्ट की तरह तैयार कर देंगे. तुम यहीं रहकर अपना 'वर्क फ्रॉम होम' कर सकती हो," माँ के शब्दों में वैसी ममता थी जैसी प्रिया अपनी सगी माँ से इस समय उम्मीद कर रही थी. प्रिया इस निस्वार्थ आग्रह को टाल न सकी. प्रिया को होटल जाने का इरादा छोड़ना पड़ा . तान्या उसे अपने कमरे में ले गयी. कमरा करीने से सजा हुआ था जिसमें एक वर्किंग टेबल और एक डबल बेड था जिसे दो अलग-अलग बिस्तरों के रूप में भी उपयोग में लिया जा सकता था.
“दीदी वैसे तो हम दोनों इस डबल बेड पर सो सकते हैं. लेकिन आपको अच्छा न लगे तो मैं इसके दोनों हिस्सों को अलग करके उन पर सिंगल बेड चादर लगा दूंगी.”
“नहीं, तान्या, उसकी जरूरत नहीं. हम दोनों साथ सो लेंगे. हमें दोस्ती भी तो करनी है.”
कुछ देर बाद तान्या प्रिया को खाने के लिए डाइनिंग में ले आई. आकाश और उसके पापा टेबल पर थे; आकाश की माँ किचन में चपातियाँ उतारने की तैयारी कर रही थी. प्रिया टेबल पर बैठने के बजाय किचन में चली गई.
“माँ मैं आपके साथ खाना खाऊंगी, पहले इन तीनों को खा लेने दें.” माँ ने प्रिया को बहुत कहा कि वह भी सब के साथ बैठ जाए. लेकिन वह नहीं बैठी. तान्या ने फुर्ती से खाना खाया और हाथ धोकर रसोई में पहुँच गई.
“माँ, आप और प्रिया दीदी भी खाना खाइए, मैं गर्म चपातियाँ लाती हूँ.”
खाने में रात के करीब 11 बज गए. सभी ड्राइंग रूम में बैठ कर बातें कर रहे थे. तभी आकाश के फोन की स्क्रीन जगमगा उठी. एक अनजान नंबर था. आकाश ने फोन उठाया, "हेलो?"
"सुन बे आकाश!" दूसरी तरफ से एक भारी और अहंकार से भरी आवाज़ गूंजी. वह प्रिया का मंगेतर, विक्रांत था. "हमें पता है प्रिया को तू जयपुर ले गया है. गुप्ता जी भले ही सीधे आदमी हों, पर मैं नहीं हूँ. उसे समझा दे कि अपनी मर्ज़ी से कोटा लौट आए, वरना जयपुर ज्यादा दूर नहीं है. और तू... पराई अमानत पर हाथ डालने की कोशिश मत कर, वरना नौकरी और सलामती दोनों खतरे में पड़ जाएंगे."
आकाश ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया, पर उसके चेहरे पर तनाव की लकीरें उभर आईं. प्रिया ने शायद सब सुन लिया था.
"वह मुझे अपनी 'अमानत' समझता है, "प्रिया की आवाज़ में कंपन था, पर इरादा चट्टान जैसा. "उसे लगता है कि वह डराकर मुझे वापस ले जाएगा."
आकाश ने दृढ़ता से कहा, "उसे गलतफहमी है प्रिया. कल सुबह लॉग-इन करते ही हम सबसे पहले तुम्हारी मुम्बई शिफ्टिंग की बात पक्की करेंगे. और जब तक तुम यहाँ हो, यह घर तुम्हारा किला है." ... क्रमशः
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