सूरज की तपिश जब झालरापाटन के सात सहेलियों के मंदिर की प्राचीन इमारतों के बारिश में भीगे पत्थरों से टकराती है, तो हवा में एक अजीब सी सोंधी गंध फैल जाती है. नई बन रही एक सरकारी कॉलोनी में 23 साल का सलीम, बन रही दीवार के लिए बनाए गए पेड़े पर खड़ा ईंटों पर सूत बाँध रहा था. वह मनोहरथाना के निकट के एक छोटे से गाँव से यहाँ राजमिस्त्री का काम करने आया था. जबकि नीचे से 19 साल की सपना नीचे बनाए हुए मसाले को तगाती में भरकर उसे ऊपर पकड़ा रही थी.
सपना का परिवार डग कस्बे के पास के गाँव से मजदूरी के लिए यहाँ डेरा डाले हुए था. कोरी परिवार की वह दुबली-पतली लड़की, जिसके हाथों की चूड़ियाँ सीमेंट की धूल से सफेद पड़ी हुई थीं.
"सपना, हाथ थोड़ा बचा के. मसाला तेज़ है, खाल काट देगा," सलीम ने दीवार से झुककर कहा.
सपना ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और उसे देखकर मुस्कुरा दी. "तुझे दीवार की पड़ी है, या मेरे हाथों की? जल्दी काम निबटाओ, अभी ठेकेदार आता होगा."
उनके बीच का यह रिश्ता किसी 'डेट' या 'कॉफी' का मोहताज नहीं था. वह दोपहर की तपती धूप में एक ही पेड़ की छाँव में बैठकर आधी-आधी रोटी बाँटने और काम के बीच आँखों ही आँखों में मुस्कुरा लेने से बना था. सलीम ने सपना के लिए शहर के मेले से एक बार हरे कांच की चूड़ियाँ लाकर दी थीं, जिन्हें वह काम के वक्त अपनी ओढ़नी के नीचे छिपाकर रखती थी. दोनों के बीच नेह का एक अदृश्य धागा बनने लगा था, जिसका शायद खुद उन्हें भी अहसास नहीं था. यह धागा उनके बीच किस रिश्ते को आकार देने वाला था यह उन्हें भी पता नहीं था.
लेकिन बन रही सरकारी इमारत की अधबनी दीवारों के भी कान थे.
सलीम का 'मियां' होना और सपना का 'कोरी' होना, पास के चाय के खोखे पर बैठने वाले कुछ 'स्थानीय रक्षकों' की आँखों में खटकने लगा था. उनके लिए यह दो मज़दूरों का साथ काम करना नहीं, बल्कि 'जनसांख्यिकीय हमला' था.
एक दोपहर, जब सलीम और सपना निर्माणाधीन छत के नीचे बैठकर गुड़-रोटी खा रहे थे, तभी तीन-चार मोटर साइकिलें धूल उड़ाती हुई वहाँ रुकीं. अगुआ विक्रम था, जो इलाके में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में अक्सर 'मुद्दों' की तलाश में रहता था.
"ओए मिस्त्री! नीचे उतर!" विक्रम की आवाज़ में नफ़रत का उबाल था.
सलीम घबराकर नीचे आया. "जी भाई साब, क्या हुआ?"
"क्या हुआ? ये लड़की कौन है? इसके साथ बैठ के क्या खिचड़ी पका रहा है?" विक्रम ने पास पड़ी एक ईंट को लात मारकर गिरा दिया.
"ये सपना है भाई साब, हमारे साथ कुली का काम करती है..." सलीम की आवाज़ धीमी पड़ गई.
"नाम पता है हमें! तेरा भी और इसका भी. मनोहरथाना से यहाँ मजदूरी करने आए हो या हमारी लड़कियों को बहलाने?" भीड़ में से एक ने सपना की तरफ इशारा किया, जो सहमी हुई एक कोने में खड़ी थी.
"भाई साब, हम तो गरीब लोग हैं, काम से काम रखते हैं..." सपना ने हिम्मत जुटाकर बोलना चाहा.
"चुप रह! तुझे समझ नहीं आता ये तुझे फँसा रहा है? कल को ये तेरा धरम बदलवा देगा, तब अक्ल आएगी?" विक्रम ने चिल्लाकर पास खड़े एक लड़के से कहा, "फोटो खींच इसकी और डाल ग्रुप पे. लिख दे कि झालावाड़ में भी 'वही' खेल शुरू हो गया है."
शाम होते-होते झालावाड़ जिले के व्हाट्सएप ग्रुपों में एक फोटो वायरल हो गई. फोटो में सलीम और सपना एक साथ बैठे थे, और नीचे कैप्शन था— "जिहाद का नया ठिकाना: मज़दूरी की आड़ में शिकार."
तनाव फैल गया. सपना के पिता को डराया-धमकाया गया. उसे काम पर आने से रोक दिया गया और समाज की 'इज्जत' का वास्ता देकर घर में कैद कर दिया गया. सलीम को ठेकेदार ने उसी रात हिसाब करके भाग जाने को कह दिया— "भाई, मुझे काम करना है, दंगा नहीं करवाना. तू निकल यहाँ से."
अगली सुबह, सलीम अपना झोला उठाकर बस स्टैंड की तरफ जा रहा था. उसके झोले में अब भी वो हरे कांच की चूड़ियाँ थीं जो वह सपना को देने वाला था क्योंकि पुरानी टूट गई थीं. उसने मुड़कर उस अधूरी दीवार को देखा जिसे उसने और सपना ने मिलकर उठाया था.
वह दीवार खड़ी थी, लेकिन वह नहीं जानता था कि उस पर चिपकाया गया 'नफ़रत का पलस्तर' अब न जाने कितने बरस वहाँ से नहीं उखड़ने वाला था.
दो युवाओं की पसंद, उनकी मर्जी और उनके पेट की भूख को एक 'राजनीतिक लेबल' ने कुचल दिया था. सलीम बस में बैठ गया, और सपना अपने घर की कोठरी में बैठी उस सीमेंट की धूल को देख रही थी जो अब उसकी चूड़ियों से उतर चुकी थी, लेकिन उसकी किस्मत पर जम गई थी.
सात सहेलियों के सूर्य मंदिर के पत्थरों का रंग वैसा ही था, पर उनके निकट ही कहीं बनता नेह का वह महीन धागा टूट कर वहीं कहीं बिखरे मसाले में विलीन हो चुका था.
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