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शनिवार, 6 सितंबर 2025

भारतीय समाज में जाति, भाषा और राष्ट्रीयता का सवाल : दिनेशराय द्विवेदी

जोधपुर में हो रही आरएसएस की समन्वय बैठक में आरएसएस ने देश में जाति, भाषा, प्रांत और पंथ के नाम पर भेदभाव पैदा करने के षड्यंत्रों पर चिंता जताई। आरएसएस ने कहा कि देश में एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली शक्तियां लगातार सक्रिय हैं, जो देश के लिए हितकारी नहीं हैं। इस तरह उनका मानना है कि जाति, भाषा, स्थानीय राष्ट्रीयता (प्रान्तीयता) और धर्म (पंथ) का उद्भव भारत की ऐतिहासिक परिस्थितियों से नहीं उपजा है बल्कि यह कृत्रिम है और इन सब भेदों के जनक तथाकथित षडयंत्रकारी शक्तियाँ हैं। इन षडयंत्रकारी शक्तियों से उनका तात्पर्य मुस्लिमों, ईसाइयों, सिख आतंकवादियों, सेक्युलर लोगों और कम्युनिटों से है। यही कुल मिला कर भारत में विपक्ष का निर्माण करते हैं। यदि ये सब षडयंत्र कर रहे हैं तो उससे उनका सीधा अर्थ यह है कि राज्य को उनका दमन करने का अधिकार है।


असल में संघ की यह दृष्टि ही एक कृत्रिम दृष्टि है। उसके नजरिए का आधार यह मिथ्या धारणा प्राचीन भारत एक हिन्दू राष्ट्र है, उस पर इतिहास में बहुत दमन हुए और अब यह वक्त उस दमन का बदला लेने का है और उसे फिर से हिन्दू राष्ट्र बनना चाहिए। संघ का यह दृष्टिकोण ही उसे एक खतरनाक फासीवादी संगठन बना देता है। भारतीय समाज की संरचना ऐतिहासिक रूप से जटिल और बहुआयामी रही है। जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीय पहचानों के अंतर्संबंधों ने एक ऐसा सामाजिक ताना-बाना बुना है जिसकी व्याख्या बिना वर्गीय विश्लेषण के अधूरी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा "हिन्दू राष्ट्र" की परिकल्पना और जाति, भाषा व प्रान्तीयता को "षड्यंत्र" के रूप में प्रस्तुत करना, एक प्रतिक्रियावादी परियोजना है जो सामाजिक यथास्थिति को बनाए रखने का काम करती है।


यथार्थ तो यह है कि जाति और भाषाई राष्ट्रीयताओं का उदय और विकास एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है, न कि कोई "षड्यंत्र"। ये पहचानें भारत में उत्पादन के खास तरीकों और सामाजिक संबंधों की उपज हैं। जाति व्यवस्था, जो मूल रूप से श्रम के विभाजन का एक रूप थी, शोषण के एक सुदृढ़ तंत्र में तब्दील हो गई। यह सामंती और पूर्व-सामंती उत्पादन प्रणालियों का अभिन्न अंग बन गई, जहाँ शासक वर्गों ने श्रमिक जनता के शोषण और दमन के लिए इन्हें एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।


इसी तरह, भाषाई और क्षेत्रीय पहचानें लंबे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास की परिणति हैं। पंजाबी, बंगाली, तमिल आदि राष्ट्रीयताओं का अस्तित्व एक सामाजिक यथार्थ है। इन्हें "उभारा" नहीं जा रहा, बल्कि ये पहले से मौजूद हैं। सवाल यह है कि इन पहचानों के साथ किस तरह का राजनीतिक-सामाजिक व्यवहार किया जाए।


आरएसएस की "हिन्दू राष्ट्र" की परिकल्पना एक अवैज्ञानिक, प्रतिक्रियावादी और जनविरोधी परियोजना है। यह परियोजना भारत की वास्तविक, भौतिक समस्याओं—जैसे आर्थिक असमानता, शोषण, बेरोजगारी, गरीबी—से ध्यान भटकाने का काम करती है। एक कृत्रिम "हिन्दू" एकता का निर्माण करके, यह सामंती और पूंजीवादी ताकतों के हितों की रक्षा करती है, जिनके लिए जातिगत, धार्मिक और भाषाई विभाजन शोषण की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

सरसंघचालक का यह कहना कि जाति और भाषा के भेद एक "षड्यंत्र" हैं, वास्तव में इन गहरी जड़ें जमाए सामाजिक विभाजनों और शोषण के इतिहास को नकारना है। यह बयानबाजी शासक वर्गों के हित में है, क्योंकि यह मेहनतकश जनता की वास्तविक एकता—जो कि जाति, धर्म और भाषा की दीवारों को तोड़कर ही संभव है—को रोकती है। इसका उद्देश्य शोषितों और दलितों को एक ऐसी काल्पनिक एकता में बाँधना है जो वास्तव में शोषकों के वर्चस्व को ही मजबूत करती है।

आज हम जाति, भाषा या क्षेत्रीय पहचानों के अस्तित्व को नकारता नहीं सकते। बल्कि इन पहचानों के आधार पर होने वाले उत्पीड़न और शोषण का अंत करने के लिए इन्हें मान्यता देना और इनके खिलाफ संघर्ष करना जरूरी है। जाति और भाषाई उत्पीड़न, वर्गीय शोषण से अलग नहीं हैं, बल्कि उसी के विशेष रूप हैं। समाधान इन पहचानों के "दमन" में नहीं, बल्कि इनके आधार पर होने वाले भेदभाव और शोषण के उन्मूलन में निहित है। इसके लिए आवश्यक है कि जाति व्यवस्था, जो श्रम के विभाजन और शोषण का एक साधन है, का पूर्ण उन्मूलन जरूरी है। यह केवल सामाजिक जागरूकता और एक जनवादी और समाजवादी क्रांति से ही संभव है।

राष्ट्रीयताओं (प्रान्तीयताओं) और भाषा के अधिकार को सम्मान देना आवश्यक है। भाषाई और सांस्कृतिक राष्ट्रीयताओं की स्वायत्तता के अधिकार को मान्यता देना और उसे बढ़ावा देना आवश्यक है। एक स्वैच्छिक और वास्तविक संघ ही विभिन्न राष्ट्रीयताओं की एकता को मजबूत कर सकता है।

अंततः, सभी शोषितों—चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, भाषा या प्रांत के हों—की वर्गीय एकता ही सामंती-पूंजीवादी शोषण के खिलाफ संघर्ष में जीत दिला सकती है। "हिन्दू राष्ट्र" का भ्रम इस वर्गीय एकता को तोड़ने का काम करता है।

आरएसएस की "हिन्दू राष्ट्र" की परियोजना और जाति-भाषा के भेद को "षड्यंत्र" बताने की कोशिश, भारत के शोषक वर्गों की एक राजनीतिक चाल है। इसका उद्देश्य जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं—पूंजीवादी शोषण, सामंती अवशेष, और साम्राज्यवादी नियंत्रण—से हटाकर काल्पनिक दुश्मनों की ओर मोड़ना है। एक यथार्थवादी दृष्टिकोण इन विभाजनों को नकारता नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक और भौतिक आधार को समझते हुए, शोषण के इन सभी रूपों के खिलाफ मेहनतकश जनता की वर्गीय एकता को मजबूत करने पर जोर देता है।

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

अपनी राजनीति खुद करनी होगी

दिन भर अदालत में रहना होता है। लगभग रोज ही जलूस कलेक्ट्री पर प्रदर्शन करने आते हैं। पर उन में अधिकतर बनावटी होते हैं।  उस रोज बहुत दिनों के बाद एक सच्चा जलूस देखा। वे सेमटेल कलर ट्यूब उद्योग के श्रमिक थे। ठीक दीवाली के पहले उन के कारखाने को प्रबंधन छोड़ कर भाग गया। श्रमिक उसे कुछ दिन चलाते रहे। लेकिन कच्चा माल और बिजली और गैस कनेक्शन कट जाने से कारखाना बंद हो गया। कारखाना अब श्रमिकों के कब्जे में है उद्योगपति कोटा आने से डर रहा है। कहता है वह अब उद्योग को चलाने की स्थिति में नहीं है। अर्थात उद्योग सदैव के लिए बंद हो गया है। कानून में प्रावधान है कि उद्योग बंद हो तो कंपनी या उद्योग का स्वामी श्रमिकों को बकाया वेतन, मुआवजा. ग्रेच्चूटी आदि का भुगतान करे और उन के भविष्य निधि खातों का निपटान करे। लेकिन उद्योगपति की नीयत ठीक नहीं है। इसे श्रमिक, सरकार और नगर के बहुत से लोग जानते हैं। उद्योगपति कहता है उसे कारखाने में पड़ा माल बेच लेने दिया जाए फिर वह श्रमिकों को बकाया दे देगा। लेकिन बहुत से उद्योगपति श्रमिकों का बकाया चुकाए बिना कारखाना बंद कर भाग चुके हैं और श्रमिक लड़ते रह गए।

श्रमिकों को बकाया दिलाने की जिम्मेदारी सरकार की है। पर सरकार तो खुद पूंजीपतियों की है। उस का कहना है कोई कानून नहीं है जो कि श्रमिकों को उन का बकाया दिला सके। लेकिन सरकार के पास अध्यादेश जारी करने की शक्ति है। वह चाहे तो उद्योग की संपत्ति कुर्क कर के कब्जा कर सकती है। करोड़ों रुपए कथित जनहित कामों में लुटा कर ठेकेदारो को अमीर बनाने वाली सरकार चाहे तो श्रमिकों का बकाया अपने पास से चुका कर उद्योग की संपत्ति कुर्क और नीलाम कर के उसे वसूल कर सकती है। बिना अनुमति कोई उद्योगपति कारखाने को बंद नहीं कर सकता, यह अपराध है। चाहे तो सरकार उद्योगपति के विरुद्ध अपराधिक मुकदमा चला सकती है। इस अपराध को संज्ञेय और अजमानतीय बना दिया जाए तो उन्हें गिरफ्तार भी कर सकती है। पर वह अपने ही आकाओं के खिलाफ ऐसा क्यों करने लगी?


उद्योग बंद होने का कारण स्पष्ट है। बाजार में कलर पिक्चर ट्यूबों का स्थान एलईडी आदि ने ले लिया है उन की मांग कम होती जा रही है, मुनाफा कम हो गया है। उद्योगपति को मुनाफा चाहिए। वह इस उद्योग से पूंजी निकाल चुका है। बाकी को निकालने में सरकार उस की मदद करेगी। लेकिन मजदूरों की नहीं।


मजदूर समझने लगे हैं कि उन की किसी को परवाह नहीं। कभी साथ लगते भी हैं तो इलाके के छोटे किसान उन का साथ देते हैं जो उन के स्वाभाविक परिजन हैं। उन्हें अपने जीवन सुधारने हैं तो खुद ही कुछ करना होगा। यह सब वे अपनी एकता के बल पर ही कर सकते हैं। उन्हें खुद अपनी एकता का निर्माण करना होगा और फिर किसानों की। उन्हें अपने नेता खुद बनाने होंगे जो उन के साथ दगा न करें। बिना मजदूर किसानों की एकता का निर्माण कर सत्ता पर कब्जा किेए वे अपने जीवन में तिल मात्र सुधार नहीं ला सकते। उन्हें खुद अपनी राजनीति खुद करनी होगी।