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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

खादी का खोल

 पिंजरा और पंख-32

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
रामगंजमंडी से वनस्थली विद्यापीठ तक का सड़क दुरुस्त थी. बूंदी से बनस्थली तक कुछ बरसात भी हो चुकी थी. गुप्ताजी की कार को बनस्थली विद्यापीठ के गेट से अंदर पहुँची तब शाम के 5 बजने को थे. शगुन कार का गेट खोल कर नीचे उतरी तो बाहर की गर्म हवा महसूस की. यह रामगंजमंडी की बंदिशों से अलग थी, पर क्या वाकई आज़ाद थी? वह गेट ऑफिस पर प्रवेश दर्ज कराने के लिए बढ़ी तभी एक आटो रिक्शा आकर रुका और उससे किरण, उसकी माँ और पिता मंगलसिंह उतरे.


उतरते ही मंगलसिंह ने गेट ऑफिस के पास सहायक मैनेजर गुप्ताजी को देखा और अपना भारी बैग कंधे पर लटकाए लपककर पास आए. उनके चेहरे पर वही 'दफ्तर वाली विनम्रता' चिपकी थी.

"साहब, आप भी आ गए! हमें लगा आप कल निकलेंगे," मंगलसिंह ने झुककर अभिवादन किया. गुप्ताजी ने हमेशा की तरह अपनी 'साहब वाली गरिमा' बनाए रखते हुए सिर हिलाया. "हाँ, सोचा कि भीड़भाड़ से पहले बिटिया को छोड़ आएँ. आप भी ठीक समय पर आ गए. वापसी का तो तय है न? बस में क्यों धक्के खाना, हमारी कार में पर्याप्त जगह रहेगी."

शगुन ने एक नज़र किरण की ओर देखा. किरण अपनी माँ का हाथ पकड़कर खड़ी थी, उसकी आँखें ज़मीन पर गड़ी थीं. वह अपने पिता की उस "साहब-साहब" वाली रट से भीतर तक छिल रही थी. उसे लग रहा था जैसे उसके पिता की 'जीहुज़ूरी' उसके अपने वजूद को छोटा कर रही है. जब गुप्ताजी ने वापसी में उन्हें कार में बिठाने की पेशकश की, तो किरण के चेहरे पर एक क्षण के लिए नफरत की लकीर उभरी और फिर गायब हो गई. वह जानती थी कि उसके स्वाभिमानी क्षत्रिय होने के दावों के बीच उसके पिता की यह मजबूरी एक ऐसी गांठ थी जिसे वह चाहकर भी नहीं खोल सकती थी.

शाम के धुंधलके में जब शगुन ने रूम नंबर 106 का दरवाजा खोला, तो पुरानी परिचित गंध ने उसका स्वागत किया—मिट्टी, पुरानी किताबों और अगरबत्ती की मिली-जुली महक. कमरे में प्रियंका पहले ही पहुँच चुकी थी और अपनी 'शुद्धिकरण' की रस्म में व्यस्त थी.

"शगुन! आ गई तू? देख, इस बार मैंने मेज का मुख एकदम सटीक पूर्व की ओर रखा है. पिछले साल मुझे लगा कि वास्तु ठीक नहीं था, इसलिए शायद मनोविज्ञान के कुछ सिद्धांत समझ नहीं आ रहे थे," प्रियंका ने अपनी विशेष 'पंडिताइन' वाली मुस्कान के साथ कहा. उसके लिए शिक्षा भी धर्म के चश्मे से ही होकर गुज़रती थी. वह गंगाजल की एक बोतल साथ लाई थी और कमरे के हर कोने में उसका छिड़काव कर रही थी.

सीमा, जो हमेशा की तरह एक कोने में चुपचाप बैठी अपनी अलमारी ठीक कर रही थी, प्रियंका की इस हरकत पर बस एक फीकी नज़र डालकर रह गई. दलित समुदाय से आने वाली सीमा, इस कमरे की सबसे बड़ी 'खामोश गवाह' थी. वह जानती थी कि प्रियंका का यह गंगाजल दरअसल एक अदृश्य बाड़ थी, जो उसे और उसकी पहचान को बाकी सबसे अलग रखती थी.

तभी तमतमाई हुई किरण ने कमरे में प्रवेश किया. अपना बैग ज़ोर से मेज पर पटका. "प्रियंका, बंद कर यह पानी छिड़कना. हम यहाँ पढ़ने आए हैं या शुद्धि करने? और वैसे भी, बाहर जो 'अशुद्धि' मेरे स्वाभिमान के साथ हो रही है, उसे तेरा यह गंगाजल नहीं धो सकता."

अभी किरण की बात पूरी ही हुई थी कि फातिमा ने कमरे में कदम रखा. "सलाम! क्या बहस हो रही है पहले ही दिन?" फातिमा के हाथ में एक टिफिन था. "मैं घर से सेवइयाँ लाई हूँ, माँ ने सबके लिए भेजी हैं."

प्रियंका ने तुरंत अपनी पूजा की थाली को हाथ से ढँक लिया. "फातिमा, देख... बुरा मत मानना, पर अभी-अभी शुद्धि की है. और वैसे भी, हम ब्राह्मण सावन के महीने में बाहर का खाना..." प्रियंका की बात अधूरी रह गई, पर उसका संदेश साफ़ था.

किरण, जिसे अपना गुस्सा निकालने के लिए बस एक माध्यम चाहिए था, फातिमा की ओर मुड़ी. "फातिमा, तू भी क्यों अपनी पहचान हर जगह ले आती है? क्या ज़रूरी है कि हम हर बार खाने और धर्म के नाम पर ही मिलें? और तू प्रियंका, तेरी यह 'पंडिताई' तब कहाँ जाती है जब तू परीक्षा में नकल करने के लिए किसी की भी मदद लेने को तैयार रहती है?"

कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर गया. सीमा ने पहली बार अपनी किताबें छोड़ीं और सिर उठाकर सबको देखा. "हम सब एक ही कमरे में हैं," सीमा की आवाज़ धीमी पर स्पष्ट थी, "पर हम सब अपनी-अपनी खिड़कियों से अलग-अलग दुनिया देख रहे हैं. किरण को अपने पिता की नौकरी की शर्म है, प्रियंका को अपनी जाति का अहंकार, और फातिमा को अपनी पहचान साबित करने की ज़रूरत. और मैं... मैं बस यह सोच रही हूँ कि क्या इस कमरे में कोई ऐसा कोना है जहाँ मैं सिर्फ 'सीमा' रह सकूँ, बिना किसी लेबल के?"

शगुन खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई. बाहर जून की शाम अब धीरे-धीरे काली पड़ रही थी. उसने महसूस किया कि वनस्थली के खादी-वस्त्र भ्रम मात्र हैं. इस खादी के नीचे वही पुराने घाव, उसी पुरानी श्रेष्ठता और हीनता के भाव छिपे थे.

"हम मनोविज्ञान के छात्र हैं," शगुन ने बिना पीछे मुड़े कहा. "परसों 3 जुलाई को जब हम क्लास में बैठेंगे, तो प्रोफेसर साहब हमें 'प्रेजुडिस' (पूर्वाग्रह) और 'स्टीरियोटाइप्स' के बारे में पढ़ाएंगे. वे बताएंगे कि कैसे समाज हमारी सोच को कंडीशन्ड करता है. पर क्या हममें इतनी हिम्मत होगी कि हम आईने में खुद को देख सकें? किरण, तेरा गुस्सा तेरे पिता की मजबूरी से है, प्रियंका तेरा डर तेरी शुद्धता से है. हम यहाँ शिक्षा लेने आए हैं, पर हम अपने साथ वही गाँवों और छोटे शहरों की सँकरी गलियां ले आए हैं."

रात को डायरी लिखते समय शगुन की कलम रुक-रुक कर चली— "आज मेरे और किरण के माता-पिता गेस्ट हाउस में होंगे. वहाँ क्या उनके बीच संवाद हुआ होगा. ऐसे संवाद क्या इस देश की असलियत हैं. और यहाँ रूम नंबर 106 में, हम चार लड़कियां चार अलग-अलग धाराओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. खादी का खोल शरीर पर चढ़ाना आसान है, मन पर, शायद नामुमकिन."

  ... क्रमशः

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

विदा होती गूंज

 पिंजरा और पंख-31

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

 जून का आखिरी सप्ताह में एक दिन अचानक देसी घी में बेसन सेकने की खुशबू घर में फैल गयी. सबको अहसास हो गया कि अब शगुन के बनस्थली जाने का वक्त आ गया है. तीन जुलाई से उसका सत्र आरंभ होने वाला था और उसे दो दिन पहले तीस जून को ही जाना था. जिससे वह दो दिन में खादी का कपड़ा खरीद कर विद्यापीठ में पहनने के लिए कुछ सूट सिलवा ले. आयुष के जाने के बाद शगुन अपने कमरे में अकेली थी. वह जानती थी कि उसके जाने के बाद यदि घर में कोई मेहमान आएगा तो उस के ठहरने के लिए इस कमरे की जरूरत पड़ेगी. इसलिए वह चाहती थी कि दीवार पर लगी तस्वीरों के अलावा शेष सामानों को अलमारी में संभाल कर रख रही थी. इस कमरे में रहते हुए उसने और आयुष ने मिल कर घर में कुछ बदलने की कोशिश की थी. उसे आशंका थी कि उसके जाने के बाद कहीं फिर से यह घर उसी पुराने ढर्रे पर न लौट आए.


अगले दिन दोपहर में, जब घर के लोग सुस्ता रहे थे, शगुन ने देखा कि चाचा बरामदे में अकेले बैठे तम्बाकू के साथ खाने के लिए सुपारी काट रहे थे. शगुन ने मन कड़ा किया और उनके पास जाकर बैठ गई.

"चाचा, दो-तीन दिन में मैं बनस्थली चली जाउंगी," शगुन ने स्वर को बहुत सहज और नरम रखते हुए कहा.

चाचा ने सुपारी का एक टुकड़ा मुहँ में डाला और चश्मा उतारकर शगुन की ओर देखा. उनके चेहरे पर एक कृत्रिम, चाशनी भरी ममता उभरी, "हाँ बेटा, तेरे जाने के बाद घर फिर सूना हो जाएगा. आयुष गया तो लगा कि हाथ कट गया, अब तुम भी चली जाओगी. मन तो नहीं है कि तुम्हें इतनी दूर भेजा जाए, पर पढ़ाई करना भी तो जरूरी है. आजकल उसके बिना लड़कियों को अच्छे वर कहाँ मिलते हैं."

"चाचा, मन तो मेरा भी नहीं है," शगुन ने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा, "पर मैं चाहती हूँ कि मेरे पीछे घर में सब खुश रहें. खासकर चाची. उनकी सेहत अभी बहुत नाजुक है, उनकी बहुत देखभाल करनी होगी. और मैं देखती हूँ कि वे अक्सर तनाव में रहती हैं. हमें उन्हें थोड़ा और खुलापन देना चाहिए, जिससे वे तनाव मुक्त रहें. आखिर वे एक इंसान हैं, कोई अमानत नहीं जिसे ताले में सहेजकर रखा जाए."

चाचा ने एक लंबी आह भरी, जैसे शगुन की बात ने उन्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई हो. "बेटा, तुम अभी छोटी हो. तुम जिसे 'खुलापन' कहती हो, वह हमारे खानदान में 'मर्यादा' का उल्लंघन माना जाता है. खैर, तुम कह रही हो तो मैं ध्यान रखूँगा. अब मैं इतना भी पत्थर-दिल नहीं हूँ जितना तुम मुझे समझती हो. नीतू का ध्यान तो तुमसे ज्यादा मुझे है, आखिर हमारे वंश की बेल उसी के सहारे आगे बढ़ेगी. मेरा वंश तो उसी से आरंभ होने वाला है."

शगुन को उनके 'वंश' शब्द से कोफ्त हुई, पर उसने खुद को काबू में रखा. वह जानती थी कि यह 'समझने और न समझने' का नाटक मात्र है.

शाम को उसने मम्मी और पापा को अपने कमरे में बुलाया. पापा के चेहरे पर दरा घाटी वाला वह वादा अब भी एक झिझक बनकर टिका हुआ था.

"पापा, मैं जा रही हूँ, पर मेरा मन चाची में अटका रहेगा," शगुन ने पापा का हाथ थामते हुए कहा. "मैंने कल चाचा से बात की थी और कहा था कि वे चाची को कुछ खुलापन दें. उन्होंने हाँ तो कहा, लेकिन जैसी उनकी सोच बन चुकी है, वह इतनी आसानी से नहीं पिघल सकती. वे अभी मुझ से बात करते हुए नरम बन रहे थे और उसके बाद भी, पर मेरे जाने के बाद वे फिर से अपनी खुराफात शुरू करेंगे. मम्मा, आप कम से कम इतना तो कर सकती हैं कि जब चाचा उन पर दबाव डालें, तो आप चाची के साथ खड़ी हों. और पापा, आपने कहा था कि आप अब चाचा को 'प्रोत्साहन' नहीं देंगे. याद रखिएगा, आपकी चुप्पी ही चाचा की ताकत है."

पापा ने एक गहरी सांस ली और शगुन के सिर पर हाथ रखा, "तू बेफिक्र होकर पढ़ाई कर बेटा. मैंने अनिल से कह दिया है कि अब हर बात में उसकी जिद नहीं चलेगी. नीतू को कोई तकलीफ नहीं होगी."

शगुन बहुत अधिक तो नहीं पर थोड़ी तो आश्वस्त हुई. आखिर उसने कोशिश तो की थी. इससे उसे भी संतोष मिला.

विदाई की सुबह अजीब थी. चाचा सबसे ज्यादा सक्रिय थे. जब शगुन के बैग तैयार हुए और गुप्ताजी उन्हें मारुति 800 की डिक्की में रखने के लिए उठाने लगे तो चाचा दौड़ कर आए और शगुन के बैग उठा लिए. कहने लगे, "अरे भैया, आप रहने दो, मैं रख देता हूँ. बिटिया हमारी शान है, इसे कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए." वे ऐसा जता रहे थे जैसे वे ही शगुन के सबसे बड़े रक्षक और शुभचिंतक हैं.

जब शगुन चाची के पैर छूने झुकी, तो चाची ने उसे गले लगा लिया और कान में धीरे से फुसफुसाया, "तूने जो हिम्मत दी है, उसे मैं संभाल कर रखूँगी शगुन. तू अपनी चिंता करना, मेरी नहीं."

गाड़ी स्टार्ट हुई. चाचा खिड़की के पास आकर खड़े हो गए, "शगुन बेटा, वहाँ पहुँचकर फोन करना. और हाँ, कुछ भी चाहिए हो तो अपने इस चाचा को याद करना. तुरन्त किसी से भी भिजवा देंगे. हम हैं न!" उनके स्वर में एक ऐसी 'ओवर-एक्टिंग' थी जो शगुन को भीतर तक चुभी, फिर भी उनकी इस हरकत पर हँसी आयी, पर वह मुस्कुराकर रह गयी.

“हाँ चाचा, आप सक्षम हैं, बस आप चाची का ख्याल रखना.” शगुन ने कहा.

जैसे ही कार चली, शगुन ने पीछे मुड़कर उस पुराने घर को देखा. उसे लगा कि वह वहां से हारकर नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक चिंगारी' छोड़कर जा रही है. अब वहां 'अनुमान' और 'मर्यादा' के नाम पर होने वाले जुल्मों को एक 'प्रत्यक्ष' चुनौती मिलने वाली थी.

  ... क्रमशः

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

वैचारिक आग

पिंजरा और पंख-30
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष के जाने के बाद कमरा अचानक बड़ा लगने लगा. कल तक यह कमरा दो दोस्तों की वैचारिक दुनिया था, जहाँ वे चाचा के पुराने ख्यालों का मजाक उड़ाते थे और अपने सपने बुनते थे. अब वहां सिर्फ सन्नाटा था, जिसे नीचे लिविंग रूम से आती चाचा की ऊँची आवाज बार-बार तोड़ रही थी.

लिविंग रूम में फिर से 'पवित्रता' और 'अनुमान' लौटने लगे थे. चाचा किसी पंडित से फोन पर बात कर रहे थे, "हाँ महाराज, पितृदोष है तो क्या हुआ? आप तो बस उपाय बताइए जिससे कुल का वारिस सुरक्षित रहे. पिछली बार की गलती नहीं दोहरानी है."

शगुन के कान खड़े हो गए. 'पिछली बार की गलती'—चाचा का मतलब साफ था कि वे लड़कियों के जन्म को 'गलती' मानते थे. उसके मन में कड़वाहट उभर आई. वह अपनी किताब बंद की कर बाहर निकल आई.

रसोई में चाची को आज फिर एक विशेष काढ़ा पिलाया जा रहा था. मम्मी पास खड़ी थीं, उनकी आँखों में दुविधा थी पर वे कुछ बोल नहीं रही थीं.


"चाची, यह क्या है?" शगुन ने पास आकर पूछा.

"बेटा, तेरे चाचा लाए हैं. कहते हैं इसे पीने से गर्भ पुष्ट रहता है और... संतान तेजस्वी होती है," चाची ने बुझे हुए स्वर में कहा.

शगुन ने प्याले की गंध सूंघी. वह किसी जड़ी-बूटी जैसा तीखा और अजीब था. "चाचा, आप बिना किसी डॉक्टरी सलाह के यह क्या पिला रहे हैं?"

रसोई की दहलीज पर खड़े चाचा अपनी भौंहें सिकोड़कर बोले, "शगुन, हर चीज डॉक्टर की सलाह से नहीं चलती. यह पीढ़ियों का तजुरबा है. तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, घरेलू मामलों में दखल मत दो."

"घरेलू मामला या अंधविश्वास, चाचा?" शगुन का स्वर ऊंचा हो गया. "आप चाची की सेहत के साथ खेल रहे हैं सिर्फ इसलिए कि आपको 'दीपक' चाहिए? अगर इस काढ़े से चाची को कुछ हो गया तो?"

चाचा ने गुस्से में लिविंग रूम में अखबार पढ़ रहे बड़े भाई की ओर देखा. "भाई साहब, देखिए शगुन को! कैसे जुबान लड़ा रही है? कल तक ठीक थी, आयुष को कोटा छोड़कर आने के बाद से इसके तेवर ही बदल गए हैं. आप चुप क्यों हैं?"

गुप्ताजी ने अखबार नीचे किया. शगुन को लगा कि शायद वे फिर 'घर की शांति' वाला राग अलापेंगे. लेकिन दरा में किया वादा उनके भीतर कहीं जाग रहा था. उन्होंने चश्मा उतारा और शांत स्वर में कहा, "अनिल, शगुन ने सही कहा. बिना डॉक्टर से पूछे ऐसी चीजें देना ठीक नहीं है. नीतू को आराम की जरूरत है, इन सब प्रपंचों की नहीं."

रसोई में सन्नाटा छा गया. यह पहली बार था जब गुप्ताजी ने अनिल चाचा की 'विशेषज्ञता' को नकारा था. चाचा का चेहरा तमतमा उठा. उन्हें लगा जैसे उनके किले की एक ईंट खिसक गई हो. वे बिना कुछ कहे जूते पहनकर पैर पटकते हुए घर के बाहर निकल गए. उनके जूतों की आवाज घर के तनाव को बयान कर रही थी.

चाचा के जाने के बाद दीवार से लगकर खड़ी मम्मा काँपते हाथों से आटा ढँकने लगी. उनकी आँखों में गहरा डर था. चाची उनके कमरे में चली गईं. मम्मा शगुन खींचकर एक कोने में ले गयीं.

"यह क्या किया तूने शगुन? क्यों बात को इतना बढ़ा दिया?" उनकी आवाज़ दबी हुई थी, जैसे दीवारें भी सुन रही हों.

शगुन ने हैरानी से माँ को देखा, "माँ, आप देख रही थीं कि वे चाची को बिना डॉक्टरी सलाह के क्या पिला रहे थे. क्या आप चाहती थीं कि मैं चुप रहूँ?"

"अरे बेटा, घर-गृहस्थी में इतना तो चलता है," सरोज ने माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए कहा. "तू तो अगले महीने बनस्थली चली जाएगी. आज चाचा के अहंकार को चोट लगी है. वे इसका बदला चाची पर निकालेंगे. उन्हें ताने देंगे, उन्हें तंग करेंगे. तेरे जाने के बाद यहाँ शांति नहीं, एक अंतहीन क्लेश बचेगा."

सरोज का यह 'भीरु तर्क' शगुन के भीतर तेजाब की तरह उतरा. उसे समझ आया कि इस घर में अन्याय केवल चाचा नहीं कर रहे थे, बल्कि माँ की 'मौन सहमति' और 'डर' भी उस अन्याय को से रहा था.

शगुन माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर दृढ़ता से बोली, "माँ, ऐसी 'शांति' कुछ नहीं बदलेगा. चाचा तो अभी भी चाची को कर रहे हैं—मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से. बस फर्क इतना है कि चाची अकेली सह रही थीं, अब उन्हें पता है कि कोई उनके हक के लिए खड़ा हो सकता है."

"तू नहीं समझेगी. हम औरतें ससुराल में अपनी मर्जी से नहीं, अपनी किस्मत से आती हैं. और किस्मत से लड़ना महंगा पड़ता है."

"माँ, किस्मत से नहीं, हम उस सोच से लड़ रहे हैं जो खुद को बेबस मानने पर मजबूर करती हैं," शगुन ने अंतिम वार किया. "मैं बनस्थली जाने से पहले चाची को इतना मजबूत बनाकर जाऊँगी कि वे खुद अपने लिए खड़ी हो सकें. लड़ना महंगा पड़ता है माँ, लेकिन घुट-घुट कर जीना उससे भी ज्यादा महंगा है."

सरोज चुप हो गई, उसके पास शगुन के इस 'प्रत्यक्ष' तर्क का कोई उत्तर नहीं था. उसे लगा जैसे उसकी अपनी बेटी उससे कई साल बड़ी हो गई है. शगुन ऊपर चली गई, पर उसने महसूस किया कि उसकी अनुपस्थिति में चाची का कवच और भी मजबूत होना चाहिए.

शगुन चाची को लेकर अपने कमरे में आई. उन्हें बिस्तर पर बैठाया, उनकी आँखों में आंसू थे.

"शगुन, तू क्यों लड़ती है इनसे? ये नहीं बदलेंगे," चाची ने सिसकते हुए कहा.

शगुन ने चाची के हाथ थाम लिए. "बदलना तो पड़ेगा चाची. अगर आज हम नहीं बोले, तो आने वाली संतान भी इसी घुटन में पैदा होगी. अगर वह लड़की हुई, तो उसे जन्म से पहले ही 'गलती' मान लिया जाएगा, और अगर लड़का हुआ, तो उसे 'मर्दानगी' के पिंजरे में कैद कर दिया जाएगा. मैं नहीं चाहती कि आयुष की तरह कोई और बच्चा भी सिर्फ 'वारिस' बनने के लिए जिए."

चाची ने शगुन को गौर से देखा. उन्हें लगा जैसे उनके सामने शगुन नहीं, बल्कि वह हिम्मत खड़ी है जो वे खुद कभी नहीं जुटा पाईं.

रात को जब शगुन सोने के लिए लेटी, तो उसे महसूस हुआ कि अब वह अकेली नहीं है. पापा का साथ मिलना एक छोटी जीत थी, लेकिन वह जानती थी कि असली लड़ाई अभी बाकी है. रात गहरा गयी थी, और उस पुराने घर की दीवारों में अब 'मर्यादा' के पहरों के खिलाफ एक वैचारिक आग सुलगने लगी थी.
 ... क्रमशः

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

पापा से बात

पिंजरा और पंख-29
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
सुबह हवा में एक अजीब सा भारीपन था. 10 बज गए थे. घर के सामने, गुप्ता परिवार की मध्यमवर्गीय प्रतिष्ठा और उनकी सीमाओं की प्रतीक कोरल रेड रंग की मारुति 800 खड़ी थी. गुप्ताजी ने डिक्की का दरवाजा सावधानी से बंद किया, जिसमें आयुष का भविष्य—एक बड़ा सा सूटकेस और किताबों से ठसाठस भरा कार्टन था.

श्रीमती गुप्ता ने दही-चीनी का कटोरा हाथ में ले रखा था. आयुष को चम्मच भर खिलाते हुए उनकी आँखों में ममता कम और 'निवेश' के असुरक्षित होने का डर ज्यादा दिख रहा था.

चाचा बरामदे में खड़े होकर आयुष को निर्देश दे रहे थे, ध्यान रहे, कोटा की भीड़ में खोना नहीं है. तुम्हें वहाँ मर्द बनना है, रैंक दुरुस्त हो जिससे आईआईटी में अच्छी ब्रांच मिले. आयुष ने सिर झुका लिया. उसे महसूस हुआ कि वह कोटा नहीं जा रहा, बल्कि उसे एक ऐसे कारखाने में भेजा जा रहा है जहाँ उसे एक 'ब्रांडेड प्रोडक्ट' बनना है.


शगुन पीछे की सीट पर बैठी थी. चाची ने खिड़की के रास्ते उसका हाथ थामा. दोनों की निगाहें मिलीं—बिना कुछ कहे चाची ने शगुन को बहुत कुछ कह दिया. गुप्ताजी ने जैसे ही कार स्टार्ट की, चाचा ने कहा, भाई साहब, गाड़ी आराम से चलाना, खास तौर से दरा घाटी में. गुप्ताजी ने बिना कोई उत्तर दिए गाड़ी आगे बढ़ा दी.

पापा पूरी एकाग्रता से स्टीयरिंग थामे थे. उनके लिए यह सफर केवल एक बच्चे को छोड़ने जाना नहीं था, बल्कि अपनी जमा-पूंजी को एक ऐसे दांव पर लगाना था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था.

श्रीमती गुप्ता ने पीछे मुड़कर देखा, "आयुष, वह जो ताबीज चाची ने दिया था, वह बैग में रख लिया है न? पंडित जी ने कहा था कि पढ़ाई में मन लगा रहेगा."

आयुष ने खिड़की के बाहर भागते हुए सूखे पेड़ों को देखते हुए कहा, "जी मम्मी, रख लिया है."

शगुन ने टोका, "मम्मी, पढ़ाई के लिए ताबीज से ज्यादा दिमाग और सुकून चाहिए. घर में जो माहौल है, उसमें तो किसी का भी मन उचट जाए."

पापा ने रियर-व्यू मिरर में शगुन को देखा. उनकी 'ढुलमुल' प्रवृत्ति यहाँ भी दिखी. उन्होंने बस इतना ही कहा, "शगुन, अब पुरानी बातें छोड़ो. आज आयुष का दिन है. घर की बातें घर पर ठीक लगती हैं."

दोपहर होते-होते कोटा की बहुमंजिला इमारतों और बड़े-बड़े होर्डिंग्स ने उनका स्वागत किया. हर होर्डिंग पर किसी न किसी छात्र की तस्वीर थी, जिसके नीचे उसके 'रैंक' लिखे थे. शगुन को लगा जैसे यह कोई मंडी है जहाँ इंसानों की नहीं, उनके नंबरों की बोली लगती है.

विज्ञान नगर के उसके पिछले साल वाले होस्टल के कमरे में सामान रखते समय शगुन ने देखा कि आयुष का चेहरा उतरा हुआ है. मम्मा-पापा होस्टल मैनेजर से नए साल की फीस और मेस के खाने के बारे में बात करने नीचे गए , तब शगुन आयुष से कहने लगी. "तुम यहाँ आ गए, अब घर में चाचा अपना प्रवचन किसे सुनाएंगे?" शगुन ने मजाक करने की कोशिश की.

आयुष ने धीमे से कहा, "शगुन, मुझे डर लग रहा है. यहाँ सब एक जैसे दिख रहे हैं—हाथ में मॉड्यूल और आँखों में थकान. और घर पर... चाचा की वह 'वंशज' वाली बात मुझे सोने नहीं देगी."

शगुन ने उसका हाथ दबाया, "तुम यहाँ अपने लिए पढ़ना, उनके 'वंश' के लिए नहीं. घर की फिक्र मत करना."

आयुष होस्टल में सेट करके वहाँ से निकलने में कोई दो घंटे लग गए. जब तीनों वापस कार में बैठे, तो सूटकेस वाली जगह खाली थी, पर वह खालीपन भारी लग रहा था. श्रीमती गुप्ता खामोश थीं, शगुन खिड़की के बाहर देख रही थी कि कैसे हर साल कुछ न कुछ बदलता रहता है.

गुप्ताजी ने अचानक कहा, "चलो, आयुष को तो छोड़ दिया, अगले महीने शगुन को भी छोड़ने जाना होगा. उसके बाद अनिल की उम्मीदें भी पूरी हो जाएं तो घर में खुशहाली आए."

शगुन की कड़वाहट अब जुबान पर आ गई, "पापा, आप 'खुशहाली' किसे कह रहे हैं? चाची को 'कीमती संदूक' समझकर कमरे में बंद रखने को या आने वाले बच्चे पर अभी से 'दीपक' होने का लेबल चिपकाने को? क्या आप नहीं देख रहे कि चाचा किस तरह को तर्कों का ढोंग करके सबको नचा रहे हैं?"

पापा ने गाड़ी की रफ्तार थोड़ी बढ़ाई, जैसे वे शगुन के सवालों से दूर भागना चाहते हों. "शगुन, समाज में रहना है तो कुछ चीजें माननी पड़ती हैं. अनिल छोटा भाई है, उसकी अपनी सोच है."

"समाज या प्रिविलेज?" शगुन ने तीखा सवाल किया. "आप सिर्फ इसलिए चुप हैं क्योंकि आप भी उसी सत्ता का हिस्सा बने हुए हैं जिसे हिलाने की हिम्मत आपमें नहीं है."

दरा में गुप्ताजी ने गाड़ी लालाजी की दुकान पर रोकी और उतरते हुए बोले, “सरोज जी, आपकी इजाजत हो तो यहाँ चाय पी लें और घर के लिए यहाँ के पेड़े भी ले लेते हैं. चाय पीने बैठे तो गर्म निकलते समोसे भी मंगवा लिये. टेबल पर एक शगुन और मम्मी थी दूसरी तरफ गुप्ता जी. समोसा खाते हुए शगुन बोली, “पापा, आप चाचा को नाराज नहीं करना चाहते, नाराज तो उन्हें मैं भी नहीं करना चाहती. आप पर मेरा और आयुष की पढ़ाई का खर्च भी है और चाचा का घर में आर्थिक योगदान है. लेकिन आप की बातों से उन्हें प्रोत्साहन मिलता है, चाची दबाव में आ जाती हैं. कम से कम उन्हें प्रोत्साहन तो मत दीजिए.”

शगुन की बात सुन कर थोड़ी देर चुप रह कर गुप्ता जी बोले, “शगुन तू एक साल में इतनी समझदार हो जाएगी सोचा न था. अब से मैं अनिल को प्रोत्साहन नहीं दूंगा.”

मंडी पहुँचते-पहुँचते सूरज ढल चुका था और धूल के बरबूले शांत होकर जमीन पर बैठ गए थे. शगुन को अहसास हुआ कि अब घर में आयुष नहीं होगा, सिर्फ वह होगी और घर-शहर का सामंती ढाँचा होगा.

घर पहुँचते ही चाचा ने पहला सवाल किया, "छोड़ आए कुल दीपक को? अब बस एक और 'दीपक' आ जाए तो तसल्ली हो."

शगुन ने उनकी आँखों में आँखें डालकर देखा. उसने जवाब नहीं दिया, पर उसकी खामोशी में एक ऐसी आग थी जो बता रही थी कि अब इस घर में 'अनुमान' नहीं, 'प्रत्यक्ष' उत्तर मिलेगा.
... क्रमशः

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

वंशज

पिंजरा और पंख-28
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
रामगंजमंडी की दोपहर अब और भी बोझिल होने लगी थी. सूरज तपने लगा था. दिन में कई बार धूल के बरबूले चक्कर काटते हुए निकल जाते, पीछे धूल और बहुत सारी गंदगी छोड़ जाते. रविवार था, लेकिन किसी की हिम्मत दिन भर घर से बाहर जाने की न हुई थी. घर में एक अजीब सी उत्तेजना और सावधानी का माहौल था. चाची, जो अब तक घर के कामकाज में एक मशीन की तरह जुटी रहती थीं, अब सबकी विशेष निगरानी में थीं. कारण केवल यह नहीं था कि वह गर्भवती थीं, बल्कि कारण वह 'उम्मीद' थी जिसे अनिल चाचा, मम्मी और पापा ने अपने मन में पाल रखा था.

ड्राइंग रूम में चाचा अपने किसी मित्र से फोन पर बात कर रहे थे, "हाँ भाई, इस बार पक्का उम्मीद है कि वंश आगे बढ़ेगा. पिछली बार तो... खैर, इस बार मैंने ज्योतिषी से भी सलाह ली है."

बैठक में गुप्ता जी अखबार के पीछे छिपे थे. वे जानते थे कि अनिल जो कह रहा है, वह घर की शांति के लिए मानना पड़ेगा. छोटे भाई की फोन पर कही बात पर उन्होंने चश्मा उतारकर बस इतना ही कहा, 'अनिल, संतान तो ईश्वर की देन है, चाहे जो भी हो, उसे बस अपना प्यार और सही संस्कार मिलें.' चाचा ने तुरंत टोकते हुए कहा, 'भाई साहब, संस्कार तो ठीक हैं, पर समाज में सर उठाकर चलने के लिए कुल का दीपक भी तो चाहिए.'"

रसोई की दहलीज पर खड़ी शगुन ने यह सुना और उसके चेहरे पर एक कड़वाहट तैर गई. 'पिछली बार' से चाचा का मतलब शायद उन उम्मीदों से था जो कभी पूरी नहीं हुईं, या शायद वह शगुन के अस्तित्व को ही एक 'अधूरी उम्मीद' मान रहे थे.

शगुन रसोई में गई, जहाँ चाची धीरे-धीरे सब्जियाँ काट रही थीं. उनके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक अजीब सी शांति.

"चाची, आप आराम क्यों नहीं करतीं? मैं कर दूंगी यह सब," शगुन ने उनके हाथ से चाकू लेते हुए कहा.

चाची मुस्कुराई, "अरे बेटा, काम करते रहने से शरीर चलता रहता है. और वैसे भी, अब तो सबकी नज़रें मुझ पर टिकी हैं. जैसे मैं कोई इंसान नहीं, कोई कीमती संदूक हूँ जिसके अंदर का सामान सबको देखना है."

शगुन पास ही रखे स्टूल पर बैठ गई. "चाची, सब लोग 'लड़का-लड़का' क्यों कर रहे हैं? क्या अगर लड़की हुई तो वह आपकी या चाचा की संतान नहीं होगी? आयुष और मैं भी तो यही बात कर रहे थे कि लोग पहले से ही पूर्वाग्रह क्यों पाल लेते हैं?"

चाची ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के बाहर देखा, जहाँ चिलचिलाती धूप में नीम का पेड़ खड़ा था. "शगुन, इस घर में सबके दिमाग फिरे हुए हैं, हर किसी को वंश बढ़ाने की फिक्र लगी है. ये घर क्या पूरे शहर में जिधर भी जाओ सब ऐसी ही बात करेंगे. हर कोई यही सोचता है कि बेटा होगा तो बुढ़ापे की लाठी बनेगा और बेटी होगी तो पराया धन. लेकिन सच पूछो तो...; चाची की आवाज़ धीमी हो गई, जैसे वह कोई राज बता रही हों, "मैं तो चाहती हूँ कि पहली संतान लड़की ही हो."

शगुन चौंक गई. "सच में?"

"हाँ," चाची ने शगुन के सिर पर हाथ फेरा. "मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी वह सब करे जो मैं नहीं कर पाई. मैं उसे तुम्हारे जैसा निडर बनाना चाहती हूँ. पर डरती हूँ कि क्या यह समाज और यह घर उसे उड़ने देगा? या फिर उसे भी मेरी तरह इसी रसोई और मर्यादा के पिंजरे में सजा दिया जाएगा?"

"रसोई के दूसरे कोने में शगुन की माँ खामोशी से आटा गूँथ रही थीं. उन्होंने चाची और शगुन की बातें सुनीं तो उनके हाथ ठिठक गए. उन्होंने शगुन की ओर देखा, उनकी आँखों में एक धुंधली सी याद तैर गई—जब शगुन पैदा हुई थी, तो घर में वैसी खुशियाँ नहीं मनाई गई थीं जैसी आयुष के जन्म पर दिखी थीं. उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, 'शगुन, तेरी चाची सही कह रही है. हम औरतें इस घर में अपनी मर्जी से नहीं, अपनी किस्मत से आती हैं. लेकिन तू और आयुष हम से अलग हो. कम से कम तुम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे रखना.'"

आयुष सीढ़ियों पर बैठा कोई किताब पढ़ रहा था., पर उसका ध्यान चाचा की बातों पर था. उसे याद आया कि जब वह छोटा था, तो उसे 'मजबूत' बनने के लिए कहा जाता था और शगुन को 'सलीकेदार'. क्या आने वाले बच्चे पर भी जन्म से पहले ही ये लेबल चिपका दिए जाएंगे?

तभी चाचा लिविंग से रसोई की ओर आए "शगुन, तुम्हारी चाची यहाँ क्या कर रही हैं? डाक्टर ने उन्हें आराम के लिए कहा है और वे यहाँ आ लगीं. उन्हें कहो कि वे अपने कमरे में जा कर आराम करें. उन्हें इस परिवार को वंशज देना है.”

इतना कह कर चाचा अपने कमरे में जाने लगे तो देखा आयुष सीढ़ियों पर बैठा है. “हद हो गयी आयुष, ये लड़कियों की तरह सीढ़ियों पर बैठ कर बातें सुन रहे हो. कमरे में जाओ या नीचे लिविंग में."

“हाँ चाचा, जा ही रहा हूँ”, यह कह कर वह लिविंग में आ गया.

नीचे आ कर आयुष ने शगुन की ओर देखा. दोनों की आँखों में एक ही सवाल था—क्या इस घर में कभी कोई बच्चा बिना किसी 'शर्त' के पैदा हो पाएगा? क्या पंखों को फैलने से पहले ही काट दिया जाना ही देस की रीत है?

शाम को जब सूरज ढल रहा था, आयुष और शगुन छत पर मिले. "चाची भी लड़की चाहती हैं, आयुष," शगुन ने कहा. "पर चाचा को 'वारिस' चाहिए," आयुष ने मुंडेर पर हाथ रखते हुए कहा. "2006 आ गया है, पर सोच अब भी 1906 में अटकी पड़ी है. हम कुछ बनने के लिए कोटा और बनस्थली जा रहे हैं, पर क्या हम वाकई इस पिंजरे से बाहर निकल पाएंगे?"

रात के सन्नाटे में, रामगंजमंडी के उस घर में तीन लोग जाग रहे थे—एक जो अपनी पहचान ढूंढ रहा था, एक जो उड़ान की तैयारी में थी, और एक जो अपने गर्भ में पल रही नन्ही जान के लिए एक बेहतर दुनिया का सपना देख रही थी.
                                                                                                                                               ... क्रमशः

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

हम लड़ेंगे

पिंजरा और पंख-27
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
ट्रेन धीमी हुई, आयुष खिड़की से बाहर झाँका. रामगंजमंडी का प्लेटफॉर्म निकट आता जा रहा था. वह अपना पिट्ठू बैग कंधे पर टांगे कोच के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ. जैसे ही ट्रेन रुकी वह उतर गया.

स्टेशन से बाहर निकलते ही सब्जी की ठेली वाले रामसहाय मिल गए, “आ गए आयुष बेटा! रोज सब्जी देने जाता हूँ तो भाभी मिलती हैं. उन्हें बहुत उम्मीद है. कहती हैं, “आयुष आईआईटी जरूर जाएगा."

आयुष मुस्कुराया और आगे बढ़ गया.

पंद्रह मिनट में घर सामने था. दरवाजा खुला था. अंदर गया—माँ रसोई में थीं. आयुष को देख खुश हो गई. "आ गया बेटा? जा तेरा बैग रख आ अपने कमरे में. चाची ने कल ही साफ करके सजा दिया है, कह रही थी, आयुष-शगुन आने वाले हैं, उन्हें सब चकाचक मिलना चाहिए."

आयुष ऊपर अपने कमरे में गया. वही कमरा जो दस महीने पहले तक शगुन के साथ साझा था. दोनों के बिस्तरों पर एकदम नयी चादरें बिछी थीं. दीवार पर शगुन और उसकी साझा तस्वीर अभी भी टंगी थी. मेज पर मेजपोश नया था. खिड़की में एक ‘गुलदस्ता’ था, गुलाब- मोगरे के फूलों से सजा. जिनकी भीनी खुशबू महक रही थी.

उसने अलमारी खोल कर अपना बैग रखा. तभी नीचे से माँ की आवाज आ गई.

“चाय बन गयी है, आयुष¡ चाची को बुलाते आना.”

उसे आश्चर्य हुआ कि शाम की चाय माँ बना रही है, और चाची उन्हें बुलाने को कह रही है.

- - -

अगले दिन. शाम पाँच बजे. शगुन की ट्रेन स्टेशन पर रुकी. उसने अपना सूटकेस उठाया और डिब्बे से उतरी. प्लेटफॉर्म पर देखा तो अनिल चाचा खड़े थे, और आयुष भी साथ था.

"लो शगुन आ गई?" चाचा ने सूटकेस ले लिया. उसकी आँखें आयुष से मिलीं. और उसने आयुष को गले लगा लिया.

प्लेटफॉर्म से बाहर निकले तो पापा की कार दिखाई दी.

"चाचा, आप कार लेकर आए? घर तो पास ही है."

"भाई साहब का आदेश था— कार ले जाना, शगुन थकी हुई होगी. बेटी को कार से ही लाना. थकी हुई होगी."

तीनों कार में बैठे. कार स्टेशन से निकली. जल्दी से घर पहुँच गयी.

वह कार से उतर कर सीधे अंदर आ गयी. पापा लिविंग में बैठे थे. उनके पैर छू कर वह रसोई की तरफ बढ़ी. चाची और मम्मा दोनों वहीं मिलीं. माँ ने उसका माथा चूम लिया और चाची ने उसे गले लगा कर अपने अंक में भींच लिया. दोनों अलग हुईँ तो दोनों की आँखें नम थीं.

“तुम लिविंग में चलो. मैंने अभी पकौड़ियाँ तली हैं. लेकर आती हूँ. जब तक इन्हें खाओगी. चाय भी तैयार हो जाएगी.” चाची बोली.

शगुन ने देखा पकोड़ियों की प्लेट सजी हुई थी. “चाची तुम चाय बनाओ मैं इन्हें लेकर जाती हूँ.” वह पकौड़ियाँ ले कर लिविंग में आ गयी. तब तक चाचा और आयुष भी वहीं आ बैठे थे.

कुछ देर बाद मम्मा चाय लेकर आईं. चाय की ट्रे टेबल पर रखते हुए कहा. “खुशखबरी, है चाची को तीसरा महीना है, तुम एक बार फिर दीदी बनने वाली हो.”

सुनते ही आयुष चाचा से बोला. “चाचा ये बेईमानी है, बाप बनने वाले हो और हमें मीठे की जगह पकौड़ियाँ खानी पड़ रही हैं.”

“तसल्ली रखो, रात के खाने में मीठा होगा. मैंने तुम्हारी चाची को खास केसरिया खीर बनाने को कहा है.”

"हाँ बेटा, तुम्हारे चाचा बेटे के बाप बनेंगे. देख लेना बेटा ही होगा. मेरी माँ कहती थी, सुबह-सुबह जी मिचलाने लगे तो लड़का ही होता है. चाची को भी सप्ताह भर से ऐसा ही हो रहा है." माँ ने बोला.

गुप्ताजी की आँखें खुशी से चमक उठीं. "वाह! बहुत अच्छी खबर है! भगवान करे लड़का हो"

आयुष और शगुन ने एक-दूसरे की ओर देखा. बिना कुछ कहे, दोनों ने एक ही सवाल पूछा—क्यों?

माँ को कुछ समझ नहीं आया. वह शगुन से बोलीं, “तुम कुछ साँवली दिख रही हो. क्या बनस्थली में धूप में ज्यादा रहना पड़ता है?”

“नहीं मम्मा¡ ऐसा कुछ नहीं है. बहुत दिनों में आयी हूँ न तो आपको ऐसा लग रहा है.”

फिर कुछ रुक कर बोली, “माँ, मैं अपने कमरे में जाती हूँ, थोड़ी देर आराम करूंगी. सफर बहुत लंबा था.” इतना कहकर वह उठ गयी.

शगुन आधे घंटे लेटी होगी कि कमरे का दरवाजा खुला. उसने देखा चाची थीं. वह उठ बैठी.

दोनों बातें करने लगीं. थोड़ी देर बाद चाची नीचे चली गयीं.

- - -

शाम गर्म थी. कमरे का कूलर राहत नहीं दे रहा था. शगुन छत पर गई तो आयुष वहाँ पहले से टहल रहा था.

"तुम यहाँ हो," शगुन ने कहा.

आयुष ने देखा. "हाँ... यहाँ शांति है."

शगुन मुंडेर पर बैठ गई.

आयुष भी टहलना छोड़ उसके नजदीक मुंडेर पर आ बैठा.

"तुम्हारा पेपर कैसा रहा?" शगुन ने पूछा.

"ठीक था... पर शायद पापा की उम्मीदों पर शायद खरा न उतर सकूँ."

"क्यों?"

"मैंने... रट्टा न लगाया. सब कुछ समझ कर पढ़ा, जो समझा वही लिखा."

"और इससे क्या हुआ?"

"इससे अंक कम आ सकते हैं. और पापा... पापा समझेंगे नहीं."

एक क्षण की चुप्पी. फिर शगुन बोली, "मैंने भी अपने पेपर में वही लिखा जो सही लगा."

"तुम समझती हो. अच्छा "चाची के लिए क्या सोचती हो?" आयुष ने पूछा.

शगुन ने गहरी साँस ली. "मुझे लगता है... हम सब इतने कंडीशन्ड हैं कि लड़की की कल्पना भी नहीं कर पाते."

"हाँ... मैंने भी यही सोचा."

"क्या तुम्हें लगता है... हम भी कंडीशन्ड हैं?" शगुन ने पूछा.

आयुष ने आकाश की ओर देखा. "हाँ... हम भी. मैं कंडीशन्ड हूँ कि मुझे आईआईटी में जाना है. तुम कंडीशन्ड हो कि तुम्हें अच्छे दूल्हे से शादी करनी है."

"और अगर हम ऐसा नहीं करना चाहें तो?"

"तो हमें लड़ना पड़ेगा," आयुष ने कहा. "खुद से, परिवार से."

"क्या तुम लड़ोगे?"

"मैं कोशिश करूँगा. और तुम?"

शगुन मुस्कुराई. "मैं भी."

नीचे से आवाज आई—"आयुष! शगुन! नीचे आओ, खाना तैयार है!"

दोनों उठे और सीढ़ियाँ उतरने लगे.

- - -

रात.

शगुन अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी. आयुष सो चुका था.

उसने सोचा—आयुष की दुनिया में आईआईटी थी, उसकी दुनिया में शादी.

पर आज उन्होंने एक-दूसरे से कहा था—"हम लड़ेंगे."

शायद यही पहली जीत थी.                                                                          

... क्रमशः

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

अलग अलग दुर्ग

पिंजरा और पंख-26
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
होस्टल नं. 7 शांता निकेतन का कमरा नं. 7. शगुन की आँखें खुलीं. आज दूसरे सेमेस्टर का पहला पेपर था, जैविक मनोविज्ञान (Biological Psychology). कमरे में एक अजीब सी शांति थी, जैसे तूफान से पहले की खामोशी. उसने देखा पंडिताइन

हमेशा की तरह अपने बिस्तर पर बैठी, आँखें बंद किए, मन ही मन मंत्र पढ़ रही थी. उसकी उँगलियाँ माला फेर रही थीं. अब प्रियंका को सभी रूममेट इसी नाम से पुकारने लगी थीं.

किरण शीशे के सामने खड़ी अपने वस्त्र ठीक कर रही थी. "तुम लोग इतनी गंभीर क्यों हो?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "यह तो बस एक परीक्षा है" हो जाएगी.

सीमा चुपचाप अपनी किताब के अंतिम पन्ने गहरी एकाग्रता से दोहरा रही थी. उसके लिए हर परीक्षा एक मौका थी—खुद को साबित करने का, आगे बढ़ने का. वह दिखा देना चाहती थी कि दलितों में दम है.

शगुन ने रात को ही अपनी अंतिम तैयारी कर ली थी. परीक्षा के दिन वह तैयारी से मुक्त और सहज रहना चाहती थी. उसने देखा कि चारों रूममेट की तैयारियाँ भी चार तरह की थीं. परीक्षा एक ही थी, लेकिन सबके लिए अलग-अलग.

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आज ही आयुष का भी फिजिक्स पेपर था. वह जाग चुका था. उसने अपने डेस्क पर रखे पोस्ट-इट को देखा: "मेरा सपना क्या है?"

कल रात वह इसका जवाब ढूँढ चुका. उसका सपना था—ईमानदारी से सीखना. चाहे अंक कम ही क्यों न आएँ.

दरवाज़े की घंटी बजी. रोहित खड़ा था. "चलो, टाइम है."

रास्ते में रोहित बोला, "मैंने सभी फॉर्मूले याद कर लिए हैं. 90% तो पक्के हैं."

आयुष ने उसकी ओर देखा. आत्मविश्वास. वह आत्मविश्वास जो उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता था.

परीक्षा केंद्र के बाहर, विशाल मिला. उसका चेहरा पीला था. "मैं... मैं तैयार नहीं हूँ," उसने फुसफुसाया.

आयुष ने उसके कंधे पर हाथ रखा. "बस ईमानदारी से देना. बाकी... बाद में देखेंगे."

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शगुन ने प्रश्न-पत्र उठाया. पहला प्रश्न: "फ्रायड के मनोलैंगिक विकास के सिद्धांत की व्याख्या करें."

उसने पेन उठाया, फिर रुक गई. क्या वह सिर्फ फ्रायड के सिद्धांत को रटकर लिख देगी? या फिर उसमें अपने अनुभव जोड़ेगी?

उसने देखा—पास बैठी प्रियंका माथे पर पसीना पोंछ रही थी. सामने बैठी सीमा शांतिपूर्वक लिख रही थी. दूर किरण आत्मविश्वास से भरी थी.

शगुन ने लिखना शुरू किया: "फ्रायड का सिद्धान्त मानव विकास की जटिलताओं को दर्शाता है, जैसे कि बनस्थली में हमारा अपना विकास..."

वह जानती थी—यह उत्तर शायद पूरे अंक नहीं दिलाएगा. पर यह सच्चा होगा. उसका अपना होगा.

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आयुष ने प्रश्न-पत्र देखा. प्रश्न 15: "न्यूटन के गति के तीसरे नियम की व्याख्या करते हुए, दैनिक जीवन के दो उदाहरण दें."

उसने सोचा—क्रिया-प्रतिक्रिया. जैसे उसके पिता का दबाव और उसका प्रतिरोध. जैसे शगुन का सवाल और उसकी खोज.

तभी उसने देखा—विशाल ने उसकी ओर देखा. एक मौन इशारा. नकल का आमंत्रण.

आयुष का दिल धड़का. पिता के शब्द कानों में गूँजे: "अंक के बिना कोई तुम्हारी समझ नहीं पूछेगा."

फिर अपने ही शब्द याद आए: "मेरा सपना—ईमानदारी से सीखना."

उसने विशाल की ओर देखा और सिर हिलाया—नहीं.

विशाल की आँखों में निराशा थी. पर आयुष जानता था—यही सही था.

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पेपर देकर चारों अपने कमरे में लौटीं.

"कैसा रहा पेपर” किरण ने पूछा.

प्रियंका ने गहरी साँस ली, "ठीक-ठाक. पर कुछ प्रश्न कठिन थे."

सीमा मुस्कुराई, "मैंने वही लिखा जो आता था."

शगुन ने कहा, "मैंने... अपने अनुभव लिखे."

प्रियंका ने हैरानी से देखा, "पर उसमें अंक कम मिलेंगे!"

"शायद," शगुन ने कहा, "पर वे मेरे होंगे."

तभी फातिमा कमरे में आई. "अलहमदुलिल्लाह, ठीक रहा," उसने कहा.

शगुन ने सोचा—चार तरह की प्रतिक्रियाएँ. पर क्या कोई पूछ रहा था: "तुमने क्या सीखा?" सब पूछ रहे थे: "तुमने कैसा किया?"

- - -

स्कूल से बाहर निकलते ही रोहित मिला "मैंने सब कुछ लिख दिया!" वह उत्साहित था.

विशाल चुपचाप बाहर निकला और उनके साथ शामिल हो गया. आयुष ने पूछा, "कैसा रहा?"

"बुरा," विशाल ने कहा, "मैंने... नकल नहीं की."

आयुष ने मुस्कुराया, "तुमने सही किया."

"पर मैं फेल हो जाऊँगा!"

"शायद," आयुष ने कहा, "पर तुम ईमानदार रहे. यही मायने रखता है."

रोहित ने कहा, "अंक मायने रखते हैं, आयुष. दुनिया अंक ही देखती है."

आयुष ने सोचा—शायद रोहित सही था. शायद नहीं. पर एक बात तय थी—वह अब वह आयुष नहीं था जो सिर्फ अंकों के पीछे भागता था.

- - -

शगुन ने अपनी नोटबुक खोली और लिखा.
मार्च 15, 2006 | पहले पेपर के बाद

आज समझा; परीक्षा एक ही नहीं होती.
एक परीक्षा काग़ज़ पर होती है—
जहाँ सवाल तय होते हैं
और उत्तर भी, वे भी निश्चित.

दूसरी परीक्षा होती है— मन के भीतर
जहाँ कोई सिलेबस नहीं,
और सवाल हम खुद से पूछते हैं.

प्रियंका ने वही लिखा, जो याद रहा.
मैंने लिखा, जो मैंने महसूस किया.
किरण ने आत्मविश्वास से लिखा,
सीमा ने संघर्ष और मेहनत लिखी.

पेपर सबका एक,
पर परीक्षा हरेक की अलग.
शायद शिक्षा यही है—
कि हर कोई अपनी जगह,
अपनी तरह से ढूँढता है.

जब यह समझ आती है,
तो परीक्षा डर नहीं रहती,
वह खुद को परखने का मौका बन जाती है.

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आयुष ने अपनी नोटबुक में लिखा.
फिजिक्स पेपर के बाद

आज मैंने फैसला किया.
परीक्षा पूरी ईमानदारी से

चाहे अंक आएँ.

मैं जानना चाहता हूँ
कि मैं खुद कितना जानता हूँ.”

रोहित ने कहा,
“दुनिया अंक देखती है.”
शायद वह सही है.
पर क्या हमें भी
खुद को सिर्फ अंकों से देखना चाहिए?

शगुन ने लिखा था—
“वस्त्रों के नीचे, भेद के रंग.”
आज लगा,
परीक्षा भी कुछ वैसी ही है.
ऊपर से सबके लिए एक जैसी,
पर भीतर हर किसी की अलग कहानी.

- - -

दो शहर.
दो संस्थान.
एक ही रात.

दो युवा,
अपनी-अपनी नोटबुक में
लगभग एक ही सवाल लिखते हुए.

शायद शिक्षा का मतलब यही है—
कि हम अलग रास्तों पर चलते हुए भी
खुद को समझने की कोशिश करते हैं.

तब परीक्षा
सिर्फ एक पड़ाव रह जाती है.
ज़िंदगी की तरह—
जहाँ हम सब विद्यार्थी हैं,
अलग-अलग दुर्गों में,
एक ही आकाश के नीचे.
... क्रमशः