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सोमवार, 23 जुलाई 2012

श्रमजीवी राज्य के नागरिक भी नहीं?

मारुति सुजुकी इंडिया के डीजल कार बनाने वाले मानेसर कारखाने में पिछले दिनों हुई घटनाओं से सभी अवाक् हैं।   ऐसे समय में जब कि दुनिया भर की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ मंदी से जूझ रही है, भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश को ताक रही है, कोई सोच भी नहीं सकता था कि इस बड़े और कमाऊ उद्योग में ऐसी घटना भी हो सकती है जिस में बड़ी मात्रा में आगजनी हो, अधिकारी और मजदूर घायल हों किसी की जान चली जाए। कारखाने के अधिकारियों, कर्मचारियों और मजदूरों पर अचानक आतंक का साया छा जाए।  मजदूर पलायन कर जाएँ और कारखाने में अस्थाई रूप से ही सही, उत्पादन बंद हो जाए।
 
मारुति उद्योग में प्रबंधन और मजदूरों के बीच विवाद नया नहीं है।  मार्च 2011 में यह खुल कर आ गया जब ठेकेदार मजदूर अपनी यूनियन को मान्यता देने की मांग को लेकर टूल डाउन हड़ताल पर चले गए।   प्रबंधन ठेकेदार मजदूरों को अपना ही नहीं मानता तो वह इस यूनियन को मान्यता कैसे दे सकता था?  इसी मांग और अन्य विवादों के चलते सितंबर 2011 तक तीन बार कारखाने में हड़ताल हुई। सितंबर की हड़ताल में तो मारूति के सभी मजदूरों और अन्य उद्योगों के मजदूरों ने भी उन का साथ दिया।   कुछ अन्य मामलों पर बातचीत और समझौता भी हुआ, लेकिन यूनियन की मान्यता का विवाद बना रहा।  जिस से मजदूरों में बैचेनी और प्रबंधन के विरुद्ध आक्रोश बढ़ता रहा।  मजदूरों का मानना पूरी तरह न्यायोचित है कि संगठन बनाना और सामुहिक सौदेबाजी उन का कानूनी अधिकार है।   लेकिन इस अधिकार को स्वीकार करने के स्थान पर प्रबंधन ने यूनियन के नेता को तोड़ने की घृणित हरकत की।  आग अंदर-अंदर सुलगती रही और एक हिंसक रूप ले कर सामने आई।  अब एक तरफ इस घटना को ले कर प्रबंधन और सरकार की ओर से यह प्रचार किया जा रहा है कि मजदूर हिंसक और हत्यारे हैं, तो दूसरी ओर मजदूरों के पक्ष पर कोई बात नहीं की आ रही है।  एक वातावरण बनाया जा रहा है कि मजदूरों का वर्गीय चरित्र ही हिंसक और हत्यारा है।  उद्योगों के प्रबंधन और राज्य द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली हिंसा को जायज ठहराया जा रहा है।  इस मामले में हुई एक प्रबंधक की मृत्यु को हत्या कहा जा रहा है।

कारखाने में बलवा हुआ, आगजनी हुई और एक व्यक्ति जो आगजनी से बच नहीं सका उस की मृत्यु हो गई। वह प्रबंधन का हिस्सा था, वह कोई मजदूर भी हो सकता था।   इस तथ्य पर जो तमाम सेसरशिप के बाद भी सामने आ गया है किसी का ध्यान नहीं है कि मजदूर को पहले एक सुपरवाइजर ने जातिसूचक गालियाँ दीं, प्रतिक्रिया में मजदूर ने उसे एक थप्पड़ रसीद कर दिया।  इन दो अपराधों में से जातिसूचक गाली देना कानून की नजर में भी अधिक गंभीर अपराध है, लेकिन इस अपराध के अभियुक्त को बचाया गया और थप्पड़ मारने वाले को निलंबित कर दिया गया।  उस के बाद मजदूरों ने सवाल उठाया कि बड़ा अपराध करने वाले को बचाया जा रहा है तो छोटे अपराध के लिए मजदूर को निलंबत क्यों किया जा रहा है?  उन्हों ने उसे बहाल करने की मांग की जिस से उत्पन्न तनाव बाद में बलवे में बदल गया।

क्या प्रबंधन के 500 व्यक्ति कारखाने के अंदर संरक्षित और विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति हैं?  वे शेष 1500 स्थाई और 2500 ठेकेदार मजदूरों के प्रति कोई भी अपराध करें, सब मुआफ हैं, एक मजदूर किसी तरह की शिकायत नहीं कर सकता।  करे तो उस पर न तो प्रबंधन कोई कार्यवाही करे और न ही पुलिस प्रशासन।  मजदूर किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिए सचेत लोग नहीं, जो इरादतन काम करते हों।  लगातार दमन किसी न किसी दिन ऐसा क्रोध उत्पन्न कर ही देता है जो भविष्य के प्रति सोच को नेपथ्य में पहुँचा दे।  ऐसा क्रोध जब एक पूरे समूह में फूट पड़े तब इस तरह की घटना अस्वाभाविक नहीं, अपितु राज्य प्रबंधन की असफलता है।  मजदूर मनुष्य हैं, कोई काल्पनिक देवता नहीं, इस तरह निर्मित की गई परिस्थितियों में उन का गुस्सा फूट पड़ा तो इस की जिम्मेदारी मजदूरों पर कदापि नहीं थोपी जा सकती।  इस के लिए सदैव ही प्रबंधन जिम्मेदार होता है, जो ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है।   क्यों किसी इलाके में दंगा हो जाने पर उस इलाके के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान को अपना कर्तव्य नहीं निभाने का दोषी माना जाता है?

इस हादसे में जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई है उस की एकल जिम्मेदारी से कारखाने का प्रबंधन और सरकार नहीं बच सकती।  लेकिन बचाव का उद्देश्य मीडिया के माध्यम से प्रचार कर के घटना की जिम्मेदारी मजदूरों पर मत्थे मढ़ कर पूरा किया जा रहा है।  कारखाने के ठेकदार मजदूरों की यूनियन दो वर्ष से मान्यता के लिए लड़ रही है, लेकिन उस से कहा जा रहा है कि उन का प्रतिनिधित्व गुड़गाँव के दूसरे कारखाने की यूनियन ही करेगी।  कारखाने में स्टाफ और मजदूरों की दो अलग अलग यूनियनें हो सकती हैं, तो ठेकेदार मजदूरों की यूनियन स्थाई मजदूरों की यूनियन से अलग क्यों नहीं हो सकती?   लेकिन कारखाना प्रबंधन तो ठेकेदार मजदूरों को उद्योग का कर्मचारी ही नहीं मानता।  लगातार कामगारों के जनतांत्रिक अधिकारों की अवहेलना का परिणाम किसी दिन तो सामने आना था।  इन परिणामों को अस्वाभाविक और अपराधिक नहीं कहा जा सकता।   एक जनतांत्रिक राज्य केवल धन संपत्ति की सुरक्षा करने के लिए नहीं हो सकता।  उस का सब से महत्वपूर्ण  कर्तव्य नागरिकों के जनतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना भी है।  यदि राज्य अपने इस कर्तव्य को नहीं निभाए तो  श्रमजीवियों का यह मानना गलत नहीं कि राज्य उन्हें अपना नागरिक ही नहीं मानता।   इस मामले में राज्य अपना जनतांत्रिक कर्तव्य निभाने में पूरी तरह से असफल रहा है।  मानेसर दुर्घटना पूरी तरह से उसी का नतीजा है।

कहा जा रहा है कि इस घटना के पीछे किसी तरह का षड़यंत्र नहीं है।  यदि ऐसा है तो फिर इस तथ्य को सामने आना ही चाहिए कि मजदूर समुदाय में इतना क्रोध कहाँ से पैदा हुआ था?  उस का कारण क्या था?  यदि मजदूर वर्ग को हत्‍यारा समुदाय करार दिया जाता है तो उस का केवल एक अर्थ लिया जा सकता है कि जाँच व न्याय तंत्र निर्णय पहले ही ले चुका है और अब केवल निर्णय के पक्ष में सबूत जुटाए जा रहे हैं।   इस घटना में किसी षड़यंत्र के देखे जाने पर षड़यंत्र का एक मात्र उद्देश्य यही हो सकता है कि कारखाने को हरियाणा से गुजरात स्थानान्तरित करने का बहाना तैयार किया जा रहा है।  ऐसा होने पर तो उद्योग का प्रबंधन और गुजरात सरकार ही षड़यंत्रकारी सिद्ध होंगे।  फिर यह नतीजा भी निकाला जा सकता है कि षड़यंत्र के आरोप से बचने के लिए प्रबंधन बार बार घोषणा कर रहा है कि उस का इरादा कारखाने को बंद करने या उसे गुजरात स्थानान्तरित करने का नहीं है।  किन्तु जब उद्योग की एक इकाई गुजरात में स्थापित करने का निर्णय उद्योग के प्रबंधक कर चुके हैं तो इस संभावना से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि निकट भविष्य में गुजरात में इकाई स्थापित होने और उस से बाजार की मांग पूरा करना संभव हो जाए तो हिंसा और श्रमिक असंतोष का बहाना बना कर हरियाणा की इकाइयों को एक-एक कर बंद कर दिया जाए। 

शुक्रवार, 22 जून 2012

कचरा दरोगा सप्लाई ठेका

लोग कहते हैं। देश कचरे से परेशान है। जिधर जाओ कचरा दिखाई देता है। कोई स्थान इस से अछूता नहीं है। मियाँ जी बेड रूम में लेटे लेटे टीवी देख रहे हैं, अचानक जेब से पाउच निकाला, गुटखा खाया और पाउच वहीं फर्श पर सरका दिया। बीवी नाराज हो तो हो, उस से क्या फर्क पड़ता है? आखिर कचरा उठाना उस की ड्यूटी है। उधर बीवी कौन कम है? वह घर बुहारती है और कचरा सड़क पर। न डाले तो नगर निगम का सफाई वाला क्या करे? अक्सर नगर निगम के पास सफाई वाले कम पड़ते हैं। निगम नगर की बस्तियों के हिसाब से सफाई वाले रखने की योजना बनाता है। फिर भर्ती शुरू होती है, भर्ती पर मुकदमा होता है, स्टे आ जाता है। अब स्टे हटे तो भर्ती हो। स्टे हटता है, भर्ती होती है। जब तक नई भर्ती सफाई करने पहुँचती है, नगर में बस्तियाँ बढ़ जाती हैं। नगर निगम का क्या कसूर?

भर्ती होने वालों में से अनेक निगम के अफसरों के घर काम पर हैं। वे वहाँ न हों तो काम अफसर जी करें या उन की बीवी जी, फिर अफसरी कौन करे। अफसरानी जी करें तो अफसरजी को अफसरजी कौन कहे। कुछ नेताओं के घरों पर काम पर हैं। अब नगर की सफाई हो तो कैसे? पर नगर निगम नागरिकों की चिन्ता करता है। ठेके पर कर्मचारी लगाता है। इस से ठेकेदार को रोजगार मिलता है और अफसरों को नजराना। आठ की जगह चार से कर्मचारी लगते हैं, चार से पार्षदों का खर्चा निकलता है। जो चार लगते हैं वे आधे दिन काम करते हैं और आधी तनखा पाते हैं। आधी तनखा से ठेकेदार का खर्च चलता है और सरकार को सेवाकर मिलता है। ठेका तो न्यूनतम वेतन की दर पर होता है। देखा¡ कचरा न हो तो इतने लोग क्या करें?  क्या कमाएँ और क्या खाएँ?

कचरा न हो तो कचरे में काम की चीजें बीनने वाले क्या करें?  वे सुबह बोरे ले कर निकलते हैं, कचरे से काम की चीजें बीनते हैं। इस से चीजें बेकार नहीं जाती। देश की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है, मजबूती बनी रहती है, वह ग्रीस की तरह नहीं होती। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। कचरा बीनने वालों को प्रोत्साहन देने के लिए कुछ करना चाहिए। पद्म विभूषण और पद्म श्री के  अवार्डों में एक कैटेगरी कचरा सैक्टर की भी होनी चाहिए। आखिर कचरा बीनना खेलों से कम महत्वपूर्ण तो नहीं? उस के लिए भारत रत्न भी  होना चाहिए।  उस में कुछ मुश्किल हो तो कम से कम राज्यसभा की सदस्यता तो अवश्य दी जा सकती है। आखिर वह खेलों की अपेक्षा कम सामाजिक नहीं।

इधर राजनीति में कचरे के बिना काम नहीं चलता, वहाँ भी कचरा करने वाले कम नहीं। नए राष्ट्रपति के लिए मीडिया वालों ने बहुत नाम उछाले, इतने कि कचरा हो गया। यूपीए वाले कचरा साफ कर के एक नाम पर सहमति बनाने चले तो दीदी को पसंद नहीं आया। वे दिल्ली गईं और एयरपोर्ट से सीधे मुलायम के घर पहुँच कर बोली -आओ भाई कचरा करें। मुलायम को तजवीज पसंद आई।  दोनों ज्वाइंट प्रेस कान्फ्रेंस कर के बोले -हम मिल कर कचरा करेंगे। यूपीए में खलबली मच गई। मुलायम को संदेश गया -हम को जीतना नहीं आता तो क्या, कचरा करना तो आता है, यूपी में कर देंगे।  मुलायम क्या करते? उन्हों ने दीदी के प्लान का कचरा कर दिया।  

इधर मुम्बई नगर निगम ने वर्ली सी-फेस को खूबसूरत बनाया। लोग टहलने जाने लगे। सीनियर हिन्दी ब्लागर घुघूती जी भी जाने लगीं। वे खुश थीं, वहाँ कचरा नहीं।  दूसरे लोगों को पता लगा तो भीड़ होने लगी।  फेरी वाले आ गए, उन के साथ कागज, पॉलीथीन, प्लास्टिक/पेपर कप, गिलास, चम्मचें व भु्ट्टे भी आए। वर्ली सी फेस की सड़क विशुद्ध भारतीय सड़क हो गई।   वे फिजूल दुखी हैं। भारतीय सड़क के भारतीय होने पर कैसा दुःख?  वे बता रही हैं कि अमरीका में नोट हाथ से छिटक कर सड़क पर गिर जाए तो जुर्माना होता है। यहाँ भी कचरा करने पर जुर्माना होना चाहिए। वे भूल गईं, भारत में जुर्माने को जुर्माना करने वाला तक नहीं गाँठता, कचरा करने वाला क्या गाँठेगा? पुलिस में दरोगा वैसे ही कम हैं। अब कचरा दरोगा कहाँ से लाए जाएँ? मैं ने सुझाव दिया है कि चीन के बेयरफुट डाक्टर की तरह यहाँ बेयरवेतन कचरा दरोगा भर्ती करने चाहिए जिन्हें वेतन की जगह जुर्माने का परसेन्टेज मिले। सौदा कतई घाटे का नहीं रहेगा। सरकार चाहे तो टोल-टेक्स के ठेके की तरह वेस्ट-फाइन ठेका भी कर सकती है। उस में एक और फायदा है। अफसर-नेताओं की पूर्ति भी  होती रहेगी और पार्टी को चुनाव के लिए चंदा भी कम न पड़ेगा। नेताजी फख़्र से कह सकेंगे कि वर्ली सी फेस हांगकांग से कम नहीं।