@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: सत्य दस्तावेज

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सत्य दस्तावेज

देहरी के पार, कड़ी - 34
फोन की घंटी की आवाज से प्रिया की नींद खुली, वह उठ बैठी. देसाई साहब का फोन था. बोल रहे थे आज राइट 11 बजे ऑफिस पहुँचना है. उसकी टीम के बनाए सॉफ्टवेयर सोल्यूशन में कोई गड़बड़ी आई थी और क्लाइंट तुरंत समाधान चाहता था. क्लाइंट सही था. उसके अनेक काम रुके पड़े होंगे तो जल्दी तो करेगा. अब वह एएसएल के ऑफिस में होने वाली सुनवाई में नहीं जा सकती थी. उसने घड़ी देखी, सुबह के साढ़े नौ बजे थे. वह पाँच घंटे सो चुकी थी. फौरन तैयार होकर वह ठीक सवा दस बजे चव्हाण साहब के ऑफिस में थी. उन्हें बताया कि वह सुनवाई में साथ नहीं रह सकेगी. उसने और उसके साथियों ने रात इंटरनेट पर खोजकर जिन जरूरी दस्तावेजों के प्रिंट निकाले थे वे उन्हें सौंपे और उनकी अहमियत बतायी. वह ऑफिस में अपनी सीट पर पहुँची तो ठीक 11 बजे थे.

एएसएल (ASL) के इजलास में आज सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई थी, प्रबंधन के लिए साक्ष्य (Evidence) पेश करने का आखिरी मौका था. फिर भी मजदूरों की उपस्थिति बहुत कम थी. फैक्ट्री चालू हो जाने से ज्यादातर मजदूर ड्यूटी पर थे. चव्हाण साहब और यूनियन चाहती थी कि आज जिरह हो और अगली पेशी यूनियन की साक्ष्य के लिए नियत हो जाए. जिससे उन्हें डिफेंस करने का पर्याप्त अवसर मिले और एएसएल समय पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट कर सके.

सवा ग्यारह बज चुके थे. यूनियन की ओर से वकील चव्हाण प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष-सचिव ग्यारह बजे के पहले से मौजूद थे. लेकिन नियोजक पक्ष लापता था. प्रशांत बाबू ने रीडर को कहा कि ‘आज नियोजक की साक्ष्य का अंतिम अवसर है और वह अभी तक नहीं पहुँचा है, यह डिले टेक्टिक्स है.’

तभी प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने अपने सहायकों सहित इजलास में प्रवेश किया. उन्होंने रीडर को बताया कि फैक्ट्री कई दिन बाद शुरू हुई है. काम शुरू होने में समस्या आने से जीएम साहब को देरी हो गई है. लेकिन वे बारह बजे के पहले हर हालत में पहुँच जाएंगे. रीडर ने एएसएल के चैम्बर में जाकर उन्हें सूचना दी. कुछ देर बाद वे इजलास में थे.

एएसएल ने आते ही पूछा जीएम साहब को देरी हो रही है तो आप अपने दूसरे गवाह को जिरह के लिए प्रस्तुत करें, आपके दूसरे गवाह कहाँ हैं?

“हूजूर, हमारे सभी दस्तावेज जीएम साहब प्रूव करेंगे. इस कारण और समय बचाने के लिए हमने तय किया कि हम जीएम साहब के अलावा कोई और गवाह प्रस्तुत नहीं करेंगे. और जीएम साहब 12 बजे तक अवश्य आ जाएंगे.” वकील मनोज भट्ट ने कहा.

“अब अदालत साढ़े बारह बजे बैठेगी, उस वक्त आपके गवाह हाजिर रहें, वरना आपकी साक्ष्य बंद कर दी जाएगी. आज दोपहर डेढ़ बजे मध्यान्ह अवकाश नहीं होगा और अदालत जब तक जिरह होगी बैठेगी.” इतना कहकर एएसएल साहब फिर से अपने चैम्बर में चले गए.

अब सुनवाई में समय था. चव्हाण साहब, प्रशांत बाबू और उनके साथी मध्यान्ह की चाय के लिए कैंटीन आ गए.

ठीक साढ़े बारह बजे एएसएल साहब ने इजलास में कदम रखा. अपनी सीट पर बैठते ही. आदेश दिया: मिस्टर भट्ट, आपके गवाह को कठघरे में भेजें, जिरह शुरू की जाए. जीएम साहब उठे और चुपचाप कठघरे में जा खड़े हुए. इजलास में एसी चल रहे थे, फिर भी जीएम के माथे पर पसीने की बूंदें उनकी घबराहट बयाँ कर रही थीं.

वकील मनोज भट्ट ने कार्यवाही शुरू करते हुए कहा, "हुज़ूर, जीएम साहब ने अपने शपथ-पत्र में स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए भी वर्किंग कैपिटल नहीं है. बैंकों ने हाथ खींच लिए हैं. क्लोजर ही एकमात्र रास्ता है."

वकील रमेश चव्हाण मुस्कुराए और धीरे से अपनी जगह से उठे और जिरह के लिए कठघरे के नजदीक जा खड़े हुए. "हुज़ूर! प्रबंधन कह रहा है कि वे कंगाल हैं. लेकिन मेरे पास ईसीआई के पिछले तीन महीनों के डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट है." चव्हाण साहब की आवाज़ में गूँज थी.

उन्होंने जीएम की ओर रुख किया, "मिस्टर जीएम, आप पहले शपथ ले लें, कि आप यहाँ अदालत के सामने जो भी कहेंगे सच कहेंगे, सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे.”

जीएम ने शपथ ली, फिर उनकी जिरह आरंभ हुई. जीएम के शपथ पत्रों में दिए गए तथ्यों के बारे में सवाल पूछने के बाद चव्हाण साहब ने प्रिया और उसके साथियों द्वारा रात भर जागकर निकाली गई डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट अपनी मेज से उठाई. उसकी एक प्रति अदालत के सामने रखी, दूसरी वकील भट्ट को दी. तीसरी प्रति गवाह को दिखा कर सवाल पूछने लगे.

“देखिए यह आपकी कंपनी द्वारा किए गए भुगतान का सही-सही रिकार्ड है. इस रिकॉर्ड को देखिए. क्या आप यहाँ शपथ पर यह कह सकते हैं कि पिछले महीने आपकी कंपनी ने सिंगापुर की 'ईस्टर्न कंसल्टेंसी' को 2 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया? और क्या यह सच नहीं है कि उस कंसल्टेंसी कंपनी का डायरेक्टर आपकी कंपनी के एमडी का ही सगा साला है?"

अदालत में सन्नाटा छा गया. जीएम के हाथ कांपने लगे. उन्होंने पानी की बोतल की ओर देखा, पर वह खाली थी.

प्रबंधन का वकील भट्ट आगे आया और उसने स्थिति संभालने की कोशिश की, "हुज़ूर, यह कंपनी के एमडी के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोप हैं. उनके पीछे से ऐसे आरोप पर सवाल नहीं पूछा जा सकता. हम इस सवाल का जवाब देने के लिए एमडी साहब को अगली पेशी पर पेश कर सकते हैं. इसलिए इनसे यह सवाल पूछने के बजाय दूसरे सवाल पूछ लिए जाएँ.

चव्हाण साहब तुरंत गरजे, "नहीं सर! यह नहीं हो सकता. आज प्रबंधन की गवाही के लिए अंतिम अवसर है. जो गवाह आज उपस्थित है उससे जिरह के बाद प्रबंधन की साक्ष्य बन्द होगी. यह कोई आम मुकदमा नहीं बल्कि एक उद्योग को बंद करने की परमिशन देने और न देने का मामला है, एक दम टाइम बाउंड. 60 दिनों में सरकार को अपना निर्णय देना ही नहीं, प्रबंधन को कम्युनिकेट भी करना है. प्रबंधन तो यही चाहता है कि ये दिन निकल जाएँ और वे (Deemed Permission) मानकर उद्योग को ताला लगा दें. सर, हम आज ही अपनी जिरह खत्म कर देंगे. हम न्याय की मांग करते हैं, तारीख की नहीं!"

एएसएल ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा. उनकी नज़रें सीधे वकील भट्ट से मिलीं. "देखिए, मिस्टर भट्ट, मैनेजमेंट ने इस अदालत का वक्त बर्बाद किया है. 80% प्रोसेस लॉस का तर्क और यह सिंगापुर ट्रांजैक्शन—'मेलाफाइड इंटेंशन' (Mala fide intention) साफ दिखाई देता है. यदि गवाह जवाब नहीं देना चाहता है तो मैं समझूंगा कि पूछा गया तथ्य सही है.”

“नहीं हुजूर, जिरह जारी रखिए.” मनोज भट्ट ने कहा और अपनी सीट पर बैठ गया. आगे की जिरह में जीएम ने दो करोड़ के ट्रांजैक्शन को ही नहीं पूरी ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट रिपोर्ट’ को सही स्वीकार कर लिया.

एएसएल ने प्रबंधन साक्ष्य बंद (Close) करके आदेश दिया, "यूनियन अपनी साक्ष्य के शपथ पत्र सोमवार तक हर हालत में पेश करे. अगले मंगलवार 30 अप्रैल 2019 को सुबह 11 बजे यूनियन अपने गवाह हाजिर रखे और प्रबंधन उनसे जिरह के लिए तैयार रहे.

इजलास से बाहर निकलने के बाद आज मजदूरों ने 'इंकलाब-जिन्दाबाद' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे की आँखों में देखा. आज पहली बार उन्हें लगा कि कानून की देवी केवल अंधी नहीं है, वह सच देख भी सकती है.
... क्रमशः

2 टिप्‍पणियां:

Admin ने कहा…

आपने कहानी बहुत आसान और साफ तरीके से बताई, इसलिए सब कुछ समझ में आता है। प्रिया और उसकी टीम ने रात भर मेहनत की, उसी मेहनत ने पूरा मामला पलट दिया। मुझे ये बात अच्छी लगी कि सच सामने लाने के लिए तैयारी जरूरी होती है। चव्हाण साहब ने सीधे सवाल पूछे और घबराए नहीं, इसलिए सच्चाई बाहर आई।

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

@Admin आपका आभार, आप जब भी आते हैं कहानी का बेहतरीन विश्लेषण करते है.