@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: लाल समंदर

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

लाल समंदर

देहरी के पार, कड़ी - 38
अंधेरी ईस्ट के चकाला औद्योगिक क्षेत्र की सड़कों पर आज सन्नाटा नहीं था. सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे, लेकिन रोशनी की पहली किरणों के साथ ही सड़कों पर मजदूर और लाल झंडों की हलचल दिखाई देने लगी थी. ईसीआई के मजदूरों पर उद्योग बंदी की तलवार लटकी थी. उनका साथ देने की गरज से चकाला क्षेत्र की लाल झंडे वाली मजदूर यूनियनों ने तय किया था कि इस बार पहली मई को मजदूर दिवस का जलसा ईसीआई फैक्ट्री गेट से ही आरंभ होगा. ईसीआई के गेट पर मजदूरों का जमावड़ा लगने लगा था. प्रिया व उसके तीनों साथी, जो अब तक केवल ऑफिस की फाइलों और विधिक बारीकियों तक सीमित थे—आज इस श्रमिक उत्सव का हिस्सा बनने के लिए समय से पहले ही वहाँ पहुँच गए थे. कुछ देर बाद ही प्रशांत बाबू और रामजी भी पहुँच गए.

ईसीआई फैक्ट्री के मुख्य द्वार से बायीं ओर हट कर जहाँ यूनियन का झंडा साल भर लहराता था. वहाँ का पुराना झंडा उतार दिया गया था. उसके स्थान पर एक नया झंडा चढ़ा दिया गया था, बस उसे लहराना शेष था. सूरज पूरब से झाँकने लगा था. कुछ देर बाद ठीक सवा छह बजे यूनियन के अध्यक्ष ने प्रशांत बाबू को आगे आने को कहा, उन्होंने आगे बढ़ कर झंडा लहरा दिया. तभी पास खड़े रामजी आगे आए और ‘इंटरनेशनल गान’ गाने लगे --- ‘उठ जाग ओ भूखे बंदी अब खींच लाल तलवार, कब तक सहोगे तुम जालिम का अत्याचार ......” रामजी एक पंक्ति गाते थे, उसके बाद सभी उसे दोहराते थे. गान खत्म होते ही यूनियन सेक्रेटरी ने नारे लगाना शुरू किया, मजदूर जवाब देने. ‘इंकलाब-जिन्दाबाद’, ‘दुनिया भर के मजदूरों एक हो’, ‘हमारे हक-ले के रहेंगे. ‘इंटरनेशनल गान’ के दौरान प्रिया के रोंगटे खड़े हो गए. उसने देखा कि जो मजदूर कल तक एएसएल के सामने झुकी कमर के साथ खड़े थे, आज एक नई ऊर्जा से लबरेज थे.

झंडा फहराने के बाद, फैक्ट्री गेट पर ही प्रबंधन के विरुद्ध एक जोरदार प्रदर्शन हुआ. "ट्रक सिस्टम बंद करो", "मैलाफाइड क्लोजर वापस लो" के नारों से पूरा औद्योगिक क्षेत्र गूँज उठा. उसके बाद सारे मजदूरों ने इस क्षेत्र की सड़कों पर प्रभावशाली जलूस निकाला. वे क्षेत्र के हर उद्योग के सामने से गुजरे. हर उद्योग के मजदूर अपने उद्योग पहुँचकर जलूस छोड़कर अपने कार्यक्रम के लिए रुक जाते थे.

जलूस वापस ईसीआई के गेट पर पहुँचा, तब उसमें केवल ईसीआई के ही मजदूर शेष रह गए थे. यहाँ उनकी एक आमसभा होनी थी. उससे पहले मजदूर बैठकर सुस्ताने लगे. सुस्ताते हुए मजदूरों में आपस में चर्चा होने लगी. प्रिया ने सुना कि कल शाम ही सुपरवाइजरों ने कुछ कमजोर कड़ियों को 'स्पेशल पैकेज' और 'कमीशन' का लालच दिया था. मैनेजमेंट का वह 'चारा' अभी भी उनके दिमाग में घूम रहा था.

कुछ देर बाद आमसभा शुरू हो गई. एक अधेड़ श्रमिक ने बोलना शुरू किया. उसने फैक्ट्री में सुपराइजरों और मैनेजरों द्वारा फैलाई जाने वाली भ्रामक बातों का उल्लेख करते हुए कहा, "साथियों, जब मालिक तुम्हें 'सेटलमेंट' का लालच दे, तो समझ लेना कि वह डर गया है. वह तुम्हारी एकता को खरीदना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि कानून की मेज पर वह हार चुका है. हमें इस तरह जो चंद रुपयों का लालच दिया जा रहा है वह हमारे स्वाभिमान और आने वाली पीढ़ियों के हक की कीमत है. क्या हम में से कोई बिकने को तैयार है?"

पूरे मैदान से एक स्वर में आवाज़ आई— "नहीं!" प्रिया ने देखा कि ईसीआई के वे मजदूर जो कल तक संशय में थे, अब मुट्ठियां भींचकर खड़े थे. मैनेजमेंट का वह 'समझौते का चारा' आज उस विराट एकता के सामने बौना साबित हो गया था.

आमसभा जल्दी ही खत्म हो गई. प्रशांत बाबू, रामजी काका, प्रिया और उसके तीनों साथियों ने पहले से तय कार्यक्रम के तहत अंधेरी स्टेशन का रुख किया.

अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़कर २८ किलोमीटर का सफर तय कर वे चर्चगेट स्टेशन उतरे. वहाँ से आजाद मैदान पहुँचने में उन्हें दस मिनट लगे. यहाँ अलग ही दृश्य था. यहाँ पूरे मुंबई और महाराष्ट्र से आए लाखों कामगारों का सैलाब था. चारों ओर लाल झंडों का एक ऐसा समंदर था लहरा रहा था जैसे अभी वह दुनिया के सारे सरमाए को निगल लेगा.

प्रिया ने पहली बार महसूस किया कि ईसीआई की लड़ाई कितनी बड़ी जंग का एक छोटा सा हिस्सा है. रामजी काका ने भीड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, "बिटिया, अंधेरी में हमने अपनी जमीन पर हक माँगा, लेकिन यहाँ हम यह बताने आए हैं कि यह पूरी दुनिया हमारे पसीने से चलती है. यहाँ पूंजीपतियों और उनके एजेंटों को यह अहसास कराया जाता है कि मजदूर अकेले नहीं हैं."

प्रिया के तीनों साथी—जो अब तक ईसीआई के बंदीकरण के मुकदमे को केवल एक 'असाइनमेंट' की तरह देख रहे थे—आज दंग थे. उन्होंने देखा कि कैसे एक अनपढ़ मजदूर भी विधिक अधिकारों और वर्ग-चेतना की बात कर रहा है. प्रिया को अहसास हुआ कि कानून की किताबों से बाहर भी एक बड़ी अदालत है—'जनता की अदालत'.

उसने प्रशांत बाबू से कहा, "अब तक मैं केवल विधिक रिपोर्टों की चिंता कर रही थी, लेकिन आज समझ आया कि असली ताकत इन मजदूरों का अपनी एकता पर भरोसा है. अगर हम सचिवालय में फाइल ट्रैक कर रहे हैं, तो हमें इन संघर्षरत मजदूरों की एकता और उनके जमीर की भी रक्षा करनी होगी."

शाम ढलते-ढलते जब वे वापस अंधेरी की ओर लौटने लगे, तब दिन भर की थकान के बावजूद, लेकिन उनमें से हर कोई अपने भीतर एक फौलादी संकल्प लिए हुए था. प्रिया ने मुड़कर पीछे छूटते आजाद मैदान को देखा. उसने आज सीखा था कि 'ट्रक सिस्टम' से आजादी की लड़ाई केवल कोर्ट-रूम में नहीं, बल्कि मजदूरों के एकजुटता से जीती जाएगी.

अंधेरी स्टेशन उतरते समय रात हो चुकी थी. प्रशांत बाबू को तो डिनर के लिए मेवाड़ भोजनालय ही जाना था. रामजी काका ने प्रिया और उनके साथियों को भी डिनर के लिए न्यौत दिया, “प्रिया तुम सब अब इतना थक चुके हो कि यदि सीधे घर चले गए तो कोई भी खाना नहीं बनाएगा. बेहतर है कि तुम भी एमबी पर ही डिनर कर लो. चारों ने एक दूसरे की ओर देखा, फिर आँखों ही आँखों में तय कर लिया कि न्यौता ठुकराना ठीक नहीं.

डिनर के बाद घर लौटते वक्त प्रिया की आँखों में एक नई चमक थी. वह जान चुकी थी कि अब वह केवल एक सहायक नहीं रह गयी है, बल्कि मजदूर वर्ग के संघर्षों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.
... क्रमशः

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