पिंजरा और पंख-50
लघुकथा श्रृखंला : दिनेशराय द्विवेदी
सघन वृक्षावली के बीच बनस्थली विद्यापीठ कैम्पस को जनवरी के पहले सप्ताह की सुबह ने हमेशा की तरह कड़कड़ाती ठंड और कोहरे की चादर ओढ़ा रखी थी. लेकिन शगुन को इस तेज सर्दी का बिलकुल अहसास नहीं था. वह अपने भीतर एक अलग ही तपिश महसूस कर रही थी. वह और दिनों की अपेक्षा आज जल्दी तैयार होने लगी थी. आज उन सबकी पहली क्लास ग्यारह बज कर दस मिनट से आरंभ होने वाली थीं, लेकिन शगुन को सुबह दस बजे 'टीचिंग असिस्टेंट' (TA) के पद के साक्षात्कार के लिए चयन बोर्ड के सामने उपस्थित होना था. जब दूसरी लड़कियाँ सुबह का नाश्ता करके अभी अलसा रही थी, शगुन सुबह नौ बजे तैयार होकर सबसे बाद नाश्ते के लिए पहुँची. मेस का डाइनिंग हॉल लगभग खाली हो चुका था, दो लड़कियाँ अपना नाश्ता समाप्त कर रही थीं. वह तुरन्त नाश्ता करके अपने रूम में लौटी. अपनी ड्रेस को एक बार फिर जाँचा और जरूरी दस्तावेज चैक करके फोल्डर में रखे. उसकी तीनों रूम मेट ने उसे शुभकामनाएँ दीं कि उसका साक्षात्कार सफल रहे और उसे टी.ए. का यह पद मिले. वे तीनों जानती थीं कि शगुन ने तेजी से पारिवारिक और सामाजिक कंडीशनिंग को समझा है और उनसे छुटकारा पाया है. जबकि वे अभी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पायी हैं.
अपने कमरे से बाहर निकलते ही शगुन को सामने से फातिमा आती दिखाई दी. उसने मुस्कुराते हुए शगुन को एक ताजा सुन्दर गुलाब भेंट किया और कहा, “इंशा अल्लाह, यह पद तुम्हें ही मिले”.
“तो तुमने मुझे भी तुम्हारे अल्लाह के भरोसे छोड़ दिया.” शगुन ने मुस्कुराकर जवाब दिया तो फातिमा ने जोर का ठहाका लगाया, शगुन भी उसमें शामिल हो गयी. ठहाके की आवाज सुन कर पास वाले कमरे के दरवाजे से एक लड़की ने झाँक कर देखा कि ठहाका किसने लगाया.
शगुन ने आज बादामी रंग का खादी का कुर्ता पाजामा और हलके भूरे रंग का ऊनी फुल स्वेटर पहना था. बाल सलीके से बंधे थे. मनोविज्ञान विभाग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसे रामगंजमंडी की उस शगुन की याद आई जिसने बनस्थली विद्यापीठ के इसी कैंपस में तीन साल पहले सहमे हुए अपने कदम रखे थे.
विभागाध्यक्ष के केबिन के बाहर पाँच और उम्मीदवार थीं, सभी एम.एससी. (M.Sc.) अंतिम वर्ष के विद्यार्थी. शगुन अकेली थी जो अभी बी.एससी. (B.Sc.) के आखिरी सेमेस्टर में थी. उसकी धड़कनें तेज़ थीं, पर इरादा स्थिर. एक-एक कर सभी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. शगुन सबसे आखिरी थी.
अंदर पैनल में तीन वरिष्ठ प्रोफेसर बैठे थे. बीच में बैठे प्रोफेसर ने उसकी फाइल बंद करते हुए पूछा, "शगुन, तुम्हारा एकेडमिक रिकॉर्ड शानदार है. लेकिन 'टीचिंग असिस्टेंट' के लिए केवल ज्ञान काफी नहीं है. तुम 'असामान्य मनोविज्ञान' (Abnormal Psychology) की जटिलताओं को उन छात्राओं को कैसे समझाओगी जो खुद किसी मानसिक या पारिवारिक दबाव में हों?"
शगुन ने एक पल के लिए डॉ. शास्त्री की ओर देखा और फिर बोर्ड की ओर मुखातिब हुई. "सर, मनोविज्ञान केवल किताबों का हिस्सा नहीं है. जब हम 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) की बात करते हैं, तो हमें छात्राओं को यह समझाना होगा कि समाज ने उन्हें जो बेड़ियाँ पहनाई हैं, वे उनका स्वभाव नहीं हैं. एक काउंसलर के रूप में मेरा काम उन्हें यह अहसास दिलाना होगा कि उनकी 'ना' कहना सीखने की क्षमता ही उनका सबसे बड़ा मानसिक उपचार है."
अगले बीस मिनट तक शगुन ने 'सांख्यिकी' (Statistics) और 'संगठनात्मक व्यवहार' (Organizational Behavior) के उन कठिन सवालों के जवाब दिए जो आमतौर पर पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर पूछे जाते हैं. उसकी आवाज़ में एक ऐसी स्पष्टता थी जो केवल अनुभव और संघर्ष से आती है.
साक्षात्कार पूरा हुआ तब एक बज चुका था. उसे भूख लगने लगी थी. मैस के भोजन का वक्त भी था. वह होस्टल पहुँची और कपड़े बदल कर सीधे डाइनिंग हॉल. प्रियंका, किरन, सीमा और फातिमा चारों वहीं थीं. उन्होंने उसे घेर लिया. पूछने लगीं, “इंटरव्यू कैसा रहा?”
“इंटरव्यू ठीक रहा. लेकिन चयन हो ही जाएगा, नहीं कह सकती. वहाँ मेरे अलावा सभी एम.एस.सी. फाइनल की लड़कियाँ थीं. हो सकता है उनमें से किसी का इंटरव्यू मुझसे बेहतर रहा हो.” शगुन ने सहजता से कहा.
“नहीं, तेरा ही होगा, मैंने तुझे अल्लाह को जो सौंप रखा है. वे तेरे साथ गलत नहीं करेंगे.” इतना कह कर फातिमा फिर हँस पड़ी. उसकी हँसी में बाकी चारों भी हँसने लगीं. तीन बजे से उनकी क्लासेज थीं. कुछ देर लड़कियों ने अपने होस्टल रूम में आराम किया फिर सभी क्लासेज के लिए निकल लीं.
आखिरी क्लास समाप्त होने के पहले परिचारिका क्लास में आई और बताया कि विभागाध्यक्ष ने क्लास के बाद शगुन को बुलाया है. क्लास के बाद जब सब लड़कियाँ होस्टल जा रही थीं. तब वह विभागाध्यक्ष के आफिस पहुँची
"शगुन, तुम्हारी समझ और परिपक्वता ने चयन समिति को प्रभावित किया है. हमने तुम्हें इस पद के लिए चुन लिया है. इस वर्ष तुम्हारा ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा. उसके बाद अगला सत्र 27 जून से आरंभ हो रहा है. उस दिन तुम्हें कार्यभार संभालना होगा, बस तुम्हें एक सप्ताह में यह अंडरटेंकिंग देनी होगी की पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स बनस्थली विद्यापीठ से ही करोगी. तुम्हें बधाई. तुम्हारा नियुक्ति पत्र एक दो दिन में तुम्हें मिल जाएगा."
हॉस्टल लौटने के पहले शगुन विभाग के कंप्यूटर रूम गयी और आयुष को मेल लिखा-
"प्रिय आयुष, आज मेरा चयन 'टीचिंग असिस्टेंट' के पद पर हो गया है. यह सफलता मेरी जितनी है, उतनी ही तुम्हारी भी. उस दिन तुमने पापा को फोन करके चाचा के 'धावे' को नहीं रुकवाया होता, तो शायद आज मैं इस चयन बोर्ड के सामने इतनी मजबूती से खड़ी नहीं हो पाती. तुम्हारे हस्तक्षेप ने मुझे वह 'समय' दिया आज मैं स्वावलंबी होने के मुहाने पर खड़ी हूँ. इस मई में जब हम घर पर होंगे, तो वहाँ मेरी अपनी एक नई स्वतंत्र पहचान होगी. इस पहचान में तुम्हारे योगदान के लिए थैंक्यू, मेरे संबल!"
उस रात शगुन ने अपनी पुरानी 'संबल' नोटबुक निकाली. उसमें लिखे 'पितृसत्ता' के सिद्धांतों के नीचे आज उसने एक नई लाइन जोड़ी— "जब ज्ञान स्वावलंबन तक पहुँच जाता है, तो भविष्य के मार्ग खुद-ब-खुद बनने लगते हैं."
खिड़की के बाहर गहराती रात अब उसे चुनौती नहीं, बल्कि एक नया अवसर दे रही थी.
... क्रमशः
1 टिप्पणी:
शानदार
शुभकामनाएं
सादर
एक टिप्पणी भेजें