@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अंधविश्वास
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बुधवार, 18 मार्च 2026

बंकर महाराज


नगर के मध्य में स्थित 'ज्ञान निकेतन' स्कूल की दीवारों पर अब कालिख और भित्तिचित्रों का कब्जा था. जहाँ कभी गणित के सूत्र गूँजते थे, वहाँ अब भारी पर्दों के पीछे 'चमत्कारों की कार्यशाला' चल रही थी. स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बड़ा बोर्ड लगा था— "तर्क त्यागिए, मोक्ष पाइए."

मंच पर भव्य रेशमी वस्त्रों में लिपटे 'महाराज' विराजमान थे. उनके गले में स्फटिक की मालाएँ थीं, लेकिन आँखों में व्यापारिक धूर्तता और रह-रहकर उभरने वाला एक अनजाना भय था. उनके सामने हजारों की भीड़ मंत्रमुग्ध बैठी थी, पर उस भीड़ की आँखों में भी एक अजीब सा द्वंद्व था—वे मानना तो चाहते थे कि उनके हाथ में हीरा है, पर कोयले की कालिख उनके अंतर्मन को कचोट रही थी.

"भक्तों!" महाराज दहाड़े, "ये स्कूल, ये किताबें, ये सब भ्रम हैं! देखो इस पत्थर को!" उन्होंने हाथ में कोयले का एक काला टुकड़ा उठाया. "तुम्हारी आँखों को यह कोयला दिख रहा होगा, क्योंकि तुम्हारी दृष्टि मैली है. पर वास्तव में यह हीरा है."

भीड़ में से एक युवक खड़ा हुआ. उसके चेहरे पर डर नहीं, एक शांत दृढ़ता थी. "पर महाराज, यह तो कोयला ही है. आप इजाजत दें तो हम इसे जला कर सिद्ध कर देंगे कि यह कोयला है, हीरा नहीं..."

महाराज के माथे पर पसीने की एक बारीक बूंद उभरी. उसके साथ ही मन द्वंद्व से घिर गया. महाराज को लगा कि अगर इस युवक को बोलने दिया गया, तो बरसों से खड़ा किया गया झूठ का यह महल ढह जाएगा. उन्हें उस युवक में अपना 'काल' नजर आया.

"मूर्ख!" महाराज ने उसे बीच में ही काट दिया. उनकी आवाज में अब क्रोध कम और असुरक्षा ज्यादा थी. "तुम परास्त विज्ञानियों के दूत हो! तुम इस युग के विद्रोही हो. सैनिकों, इसे पकड़ो!"

युवक को घसीटते हुए ले जाया गया. भीड़ के कुछ लोग खड़े हुए, फिर सहमकर बैठ गए. उनके भीतर एक युद्ध चल रहा था—सत्य का साथ दें या सुरक्षित झूठ का? अंततः 'सुरक्षा' जीत गई और वे फिर से जय-जयकार करने लगे.

महाराज की भृकुटियाँ तनी रहीं, पर जैसे ही युवक ओझल हुआ, उनके चेहरे पर एक कुटिल सुकून फैल गया. वे पुनः भीड़ से मुखातिब हुए, नेत्रों से बनावटी स्नेह-वर्षा करते हुए बोले, "हमने तर्क के स्कूल बंद कर दिए हैं. बनावटी इतिहास हटा कर इतिहास की पुस्तकों को निर्मल कर दिया है. अब वहाँ हमारा बताया हुआ 'सच्चा' इतिहास पढ़ाया जाएगा. हमारे प्राचीन गौरव की गाथाएँ गूँजेंगी."

मंच के पीछे खड़े वृद्ध शिक्षक ने देखा कि महाराज के हाथ हल्के से काँप रहे थे. पास खड़ा दरबारी हंसा, "देख रहे हो मास्टर जी? महाराज विश्व गुरु बन गए हैं!"

शिक्षक ने ठंडी आह भरी, "नायक का अभिनय करना और नायक होना, दो अलग बातें हैं. क्या तुम्हें भागवत पुराण के पात्र पौंड्रक का स्मरण है?? वह भी अपने मुकुट में मोर पंख खोंसकर, हाथ में नकली सुदर्शन चक्र लिए खुद को कृष्ण कहता था. जिसने भी उसकी असलियत उजागर कर खिल्ली उड़ाई, उसे कारागार में डाल दिया या मृत्युदंड दे दिया. भीतर से वह जानता था कि वह नकली है, और यही डर उसे विदूषक-खलनायक बनाता था. ये महाराज भी शेर की खाल ओढ़े सियार हैं. खाल के भीतर का सियार हमेशा काँपता रहता है."

तभी अचानक, बाहर भारी शोर मचा. सीमा पर संकट की घोषणा हुई. भीड़ की नजरें अपने 'रक्षक' पर टिक गईं. उन्हें उम्मीद थी कि अब 'चमत्कार' होगा.

परंतु, जैसे ही खतरे की पदचाप सुनाई दी, महाराज के भीतर का 'सियार' जाग गया. उनका 'वैश्विक नायक' वाला मुखौटा दरकने लगा.

"अंगरक्षकों! जल्दी करो!" वे फुसफुसाए. उनकी आँखों में वही पुरानी कायरता थी जो वे अब तक सत्ता के मुखौटे के पीछे छिपाते आए थे.

"पर महाराज, जनता आपकी वीरता देखना चाहती है!"

"वीरता भी देखेगी जनता, पहले सुरक्षा आवश्यक है." महाराज एक वातानुकूलित अभेद्य बंकर की ओर भागे. जाते-जाते उन्होंने चिल्लाकर वह अंतिम पाखंड किया, "मैं ध्यान मुद्रा में हूँ! सैनिकों की बलवृद्धि और उनकी विजय के लिए साधना-रत हूँ."

भीड़ ने देखा कि उनका 'शेर' बंकर के लोहे के पीछे लुप्त हो गया है. सन्नाटा पसर गया. अब वहाँ केवल धूल थी, धुआँ था और था कोयलों का ढेर, जिसकी कालिख अब सबके चेहरों पर साफ दिखने लगी थी.

वृद्ध शिक्षक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखा:

"यह कोयला युग है. यहाँ नायक के वेश में सियार और लोमड़ विचर रहे हैं. पर याद रहे, इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है."

बुधवार, 19 नवंबर 2014

परम्परा की कँटीली पगडंडी


स बार अकलेरा प्रवास मेरे लिए अत्यन्त विकट रहा। ससुर जी के देहान्त के बाद पाँच मिनट में ही मुझे सूचना मिल गयी थी और घंटे भर बाद मैं अपनी कार से निकल पड़ा। यह एक घंटा भी मेरे साढ़ू भाई की प्रतीक्षा में लगा। उस ने फोन कर दिया था कि वह भी पहुँच ही रहा है। यूँ तो हम सुबह जल्दी निकलते तो भी संस्कार से पर्याप्त समय पहले पहुँच जाते। पर पिता के निधन का समाचार मिलने के बाद शोभा को रात भर अपनी माँ और बहनों से दूर रख पाना मेरे लिए असंभव था। हम रात साढ़े नौ पर अकलेरा पहुँचे। 140 किलोमीटर के रास्ते में वहाँ से पाँच छह बार फोन आ गया कि हम कहाँ तक पहुँचे हैं। हो सकता है वहाँ पहले से मौजूद शोभा के भाई-बहनों को चिन्ता लगी हो कि जीजाजी तुरन्त निकले हैं, रात के समय ठीक से गाड़ी चला भी पा रहे हैं या नहीं। हमारे पहुँचने पर उन्हों ने राहत की साँस ली। लेकिन शोभा को देखते ही घर में रोना पीटना मच गया। हमारे पहुँचने के बाद भी हर आधे घंटे बाद कोई न कोई आता रहा। जब भी उन में कोई स्त्री होती वह दरवाजे के निकट आते ही जोर से रोने लगती और उस का स्वर सुनते ही घर के अन्दर से भी स्त्रियों के रोने की आवाजें शुरू हो जाती। कुछ देर बाद यह बन्द हो जाता, औरतें बातें करने लगतीं। यह सिलसिला आधी रात तक चलता रहा। फिर सुबह जल्दी छह बजे से ही लोग आने लगे, उसी के साथ रोने का सिलसिला तेज हो गया। 

काकाजी और ब्रिजेश पिछली बार जब कोटा आए थे

मैं रात को पहुँचा तब तक काकाजी (मेरे श्वसुर डॉ. हीरालाल त्रिवेदी को अकलेरा का बच्चा, जवान और बूढ़ा इसी नाम से संबोधित करता था) की क्लिनिक का फर्नीचर हटा, गद्दे-चादर बिछा कर उसे पुरुषों की बैठक बना दिया गया था। कुछ पुरुष वहाँ बैठे बतिया रहे थे। मैं उन के बीच जा बैठा। आरंभिक औपचारिक बातें जल्दी ही चुक गईं। तब छोटे साले ब्रिजेश के दोस्तों ने मुझ से पूछा अस्थिचयन कब करेंगे? मैं ने उन से स्थानीय परंपरा के बारे में पूछा तो उन का कहना था कि यहाँ तो अन्तिम संस्कार के तीसरे दिन करते हैं। संस्कार मृत्यु के अगले दिन हो तो कोई-कोई संस्कार के अगले दिन भी कर लेते हैं। वे यह सब इस कारण पूछ रहे थे कि अखबार में छपने के लिए जाने वाली सूचना में अस्थिचयन, शुद्ध स्नान और द्वादशा की तिथियाँ भी लिखनी थीं। मैं ने उन्हें कहा- कुछ और लोगों को आने दो तब तय करेंगे। इस तरह अब संस्कार के बाकी के दिनों की तिथियाँ अन्तिम रूप से तय करने की ड्यूटी स्वतः ही मुझे मिल गई थी। जो भी आता मैं उस की राय जानने की कोशिश करता। उस की राय जानने के बाद मैं उस के सामने विपरीत राय प्रकट करता और उस के पक्ष में कुछ तर्क देता तो वह विपरीत राय पर भी सहमत हो जाता। कुल मिला कर स्थिति यह थी कि कुछ भी तय किया जा सकता था, दोनों तरह की परंपराएँ थीं।

अगले दिन सुबह भी मैं लोगों से राय करता रहा। किसी का कहना था कि रविवार और बुधवार के दिनों को देहान्त और अस्थिचयन के बीच नहीं लेते। कोई कहता रविवार बुधवार को अस्थिचयन नहीं होना चाहिए। मैं उस का कारण पूछता तो लोग कहते हम यह तो नहीं बता सकते पर हमारे यहाँ ऐसी परंपरा है इसलिए कहते हैं। एक सज्जन ग्रहों आदि का अच्छा ज्ञान रखते थे, वे बताने लगे कि रविवार और बुधवार को क्यों ऐसा नहीं करते। इस बहाने लोगों को पता लग गया कि वहाँ उपस्थित सब लोगों में उन का ज्योतिष ज्ञान सब से बेहतर है।

मैं ने परिस्थितियों पर विचार किया तो पाया कि आज बहुत लोग आ चुके हैं। उन में से अस्थिचयन में बहुत नहीं आएंगे। जो सूचना न मिलने, देरी से मिलने या किसी कारणवश संस्कार में आज शामिल नहीं हो सके हैं वे जरूर आएंगे, लेकिन जो निकट के संबंधी संस्कार में शामिल हो गए हैं वे जरूर अस्थिचयन में उपस्थित रहना चाहेंगे। उन्हें या तो एक दिन अधिक रुकना पड़ेगा, या जा कर फिर से आना पड़ेगा। जब तक अस्थिचयन न हो जाए तब तक किसी न किसी का आना-जाना जारी रहेगा। पहले ही एक रात घर की महिलाएँ परंपरा कँटीली पगडंडी का कष्ट उठा चुकी थीं। संस्कार के तीसरे दिन अस्थिचयन होने पर उन्हें दो रातें और उसी कँटीली पगडण्डी पर गुजारनी होती। बेहतर यही था कि अस्थिचयन अगले दिन हो जाए जिस से उन का कष्ट कुछ तो कम किया जा सकता था। मैं ने संस्कार में आए लोगों में से चुन चुन कर लोगों की राय जानने की कोशिश की तो अधिकांश लोगों की राय मेरे पक्ष में थी।

आखिर में मैं ने अपने बड़े साले से राय की तो उस ने निर्णय का भार पंडितजी पर छोड़ दिया। पंडित जी वही पुरोहित थे जिन्हों ने मेरे और शोभा के विवाह समेत काकाजी की सभी लड़कियों के ब्याह कराए थे। मुझे पता था कि वे अपने किसी नियम पर दृढ़ नहीं रहते। अपितु यजमान की इच्छा भाँप कर अपना फैसला देते हैं, आखिर दक्षिणा तो यजमान से ही मिलती है। मैं ने उन से तब बात की जब कोई नजदीक न था। उन्हों ने परम्परा की बात करते हुए संस्कार से तीसरे दिन की बात की तो मैं ने उन के सामने रवि-बुध का पेंच पेश कर दिया। आगे शुद्ध स्नान और द्वादशा की तिथियों की जटिलता भी बताई। उन्होंने गेंद को मेरे बड़े साले के पाले में फेंकना चाहा। तब मैं ने जब उन्हें बताया कि उस ने तो सब कुछ आप पर छोड़ दिया है, तो वे असमंजस में पड़ गए। मैं ने उन्हें कहा कि जो लोग आज आए हैं और अस्थिचयन के लिए रुकना चाहते हैं उन्हें दो दिन रुकना पड़ेगा या जा कर वापस आना पड़ेगा। इस परिस्थिति में यदि खुद काकाजी होते तो क्या कहते, और आप क्या करते?

इस पर पंडित जी ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में काकाजी तो कल ही रखते और मुझ से भी कहलवा लेते। मैं ने उन्हें उन का यही निर्णय सब को बताने को कहा और वे मान गए। पंचलकड़ी देने के उपरान्त कोई और बोले उस के पहले ही मैं ने अगले दिन अस्थिचयन की सूचना सब को दे दी। एक-दो ने मंद स्वर में कहा भी कि, परसों नहीं? मैं ने जोर से कहा नहीं, कल ही। इस तरह अस्थिचयन की तिथि तय हो गई। (क्रमशः)

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

ज्ञान का, और अन्धविश्वासों का सूत्रपात




मानव सदा अपनी आदिम अवस्था में नहीं रह सकता था, सदा प्रकृति और गोचर जगत की नाल से जुड़ा नहीं रह सकता था।  पशु ही ऐसा है जो प्रकृति से कभी अनमेल या बेसुरेपन का अनुभव नहीं करता, किन्तु मानव? न केवल बाह्य प्रकृति से, वरन् स्वयं अपने से भी उस का द्वंद्व चलता रहता है।  यह असंगति इसे झनझनाती  और व्यथित करती है, और यह व्यथा उसे सदा आगे बढ़ने को प्रेरित करती है।  कभी कभी ऐसा होता है कि प्रकृति के साथ यह वैमनस्य, यह अंतर्विरोध इतना भयानक रूप ले लेता है कि मानव सत्य की टोह छोड़ कर ऑथेलो की भाँति अन्धी झुंझलाहट और क्षोभ से त्रस्त किसी भुलावे को पकड़ने के लिए, यहाँ तक कि एकदम औघड़ जादू-टोनों तक में पड़ने के लिए विकल हो उठता है।  यह जैसे भी हो, उस जानलेवा द्वंद्व को भूलना और उस से निकल भागना चाहता है¡  ... यहीं से ज्ञान का, और अन्धविश्वासों का भी सूत्रपात होता है...¡

- अलेक्सान्द्र इवानोविच हर्ज़न (1812-1870)