@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: टीम खुशबू

सोमवार, 30 मार्च 2026

टीम खुशबू

देहरी के पार, कड़ी - 11

प्रशांत बाबू से बातचीत के बाद प्रिया के अशांत मन को बहुत राहत मिली. उसे जल्दी ही नींद आ गई. सुबह आँखें खुली, वह बिस्तर से नीचे भी न उतरी थी कि अलार्म बजने लगा. वह मन ही मन मुस्कुरा उठी कि आज उसके शरीर की घड़ी ठीक काम कर रही थी. थकान पूरी तरह गायब थी, मन का भारीपन भी जाता रहा था, जिससे वह पिछले कई दिनों से परेशान थी. उसने आईने में खुद को देखा—आज अक्स साफ़ था. प्रशांत बाबू ने सही कहा था, डर केवल एक पुरानी आवाज है जिसे हम अनजाने में अपना मान लेते हैं.

ऑफिस पहुँचते ही प्रिया ने अपनी टीम की एक अनौपचारिक मीटिंग बुलाई. कॉन्फ्रेंस रूम का माहौल हमेशा की तरह थोड़ा औपचारिक और थका हुआ था. प्रिया ने अपनी डायरी मेज पर रखी और मुस्कुराते हुए शुरू किया.

"साथियों, कल तक मैं आप पर एक 'डेडलाइन' का दबाव डाल रही थी, लेकिन कल शाम मुझे अहसास हुआ कि मैं गलत थी. यह प्रोजेक्ट सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है, यह हम सबकी साझी विरासत है."

वह अपनी टीम के एक-एक सदस्य का नाम लेकर बोलने लगी. "आदित्य, तुम्हारे कोडिंग के लॉजिक ने हमारा हफ़्तों का समय बचाया है. स्नेहा, तुम्हारा डिजाइन क्लाइंट की उम्मीदों से कहीं ऊपर है. राहुल, तुम्हारी टेस्टिंग की बारीकियों ने हमें बड़े खतरों से बचाया है."

प्रिया ने महसूस किया कि जैसे-जैसे वह उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उनकी प्रशंसा कर रही थी, कमरे की हवा बदल रही थी. लोगों के कंधों का तनाव कम हो रहा था और उनकी आँखों में एक चमक लौट रही थी. उसने अंत में कहा, "मैं यहाँ आपकी बॉस नहीं हूँ, आपकी साथी हूँ. मैं भी टीम का वैसा ही हिस्सा हूँ जैसे आप सब हैं. बस कंपनी ने मुझे टीम की लीड बना दिया है. पर मेरी भूमिका क्या है? हम सब मिलकर काम कर रहे हैं. सबका प्रोजेक्ट में समान योगदान है. मैं एक माध्यम भर हूँ जिससे हमारी कंपनी का प्रबंधन और कंपनी का क्लाइंट हमारी टीम के साथ कम्युनिकेट करते हैं. यह वैसे ही है जैसे किसी खास मैच के लिए टीम में से एक खिलाड़ी को कप्तान बना दिया जाता है. हम सब ठान लें तो इस प्रोजेक्ट को समय से पहले पूरा कर सकते हैं, और हम करेंगे. इसलिए नहीं कि हमें डर है, बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारी सामूहिक काबिलीयत का सबूत होगा."

प्रिया के इन चंद वाक्यों ने सबके मन पर से प्रोजेक्ट का दबाव हटा दिया. सब खुश नजर आ रहे थे.

तभी राहुल ने कहा, “प्रिया, हमें रोज सुबह एक मीटिंग करनी चाहिए, इससे हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचने में बहुत मदद मिलेगी.”

राहुल से ‘प्रिया’ संबोधन सुनकर एक क्षण के लिए वह चौंकी. राहुल हमेशा उसे मैम कहता था. आज उसने उसके नाम से संबोधित किया. लेकिन अगले ही क्षण वह मुस्कुरा उठी. यह टीम में समानता की भावना का आरंभ था. प्रिया ने कहा, “हाँ, हम रोज दिन के आरंभ में मीटिंग करेंगे और उसके बाद कैंटीन चल कर एक साथ कॉफी पीकर ताजगी हासिल करेंगे और फिर काम में जुट जाएंगे. अब हम कॉफी के लिए कैंटीन चल सकते हैं.”

आदित्य ने हलकी आवाज में नारा लगाया, “हिप हिप हुर्रे.”

सबने उसका जवाब दिया, प्रिया भी उनमें शामिल थी.

उस दिन उनकी टीम के काम में एक जादुई ऊर्जा थी. लंच ब्रेक में भी उसका असर दिखा. टीम के सब लोग एक साथ खाने बैठे. सबने एक दूसरे से खाना शेयर किया. खाते हुए भी वे चर्चा करते रहे. खाने के बाद भी सुस्ती सिरे से गायब थी. शाम को प्रिया ने देखा कि जिस काम के लिए अनुमान था कि वह तीन दिन का समय तो लेगा. लेकिन उसका आधे से अधिक शाम के पहले ही पूरा हो चुका था. प्रशांत बाबू का 'टीम लीडर बनाम सुपरवाइजर' वाले सूत्र ने वाकई चमत्कार कर दिखाया था.

उधर कोटा की 'मोहन विला' में सन्नाटा था. पर यह एक बड़े बदलाव की आहट थी. ब्रज मोहनजी की चुप्पी ने विक्रांत को और ज्यादा हिंसक बना दिया था. वह सुबह-सुबह पहुँच गया और चिल्लाते हुए व्यापारिक साख की दुहाई देने लगा.

तभी मयंक कमरे में दाखिल हुआ. उसके हाथ में कुछ दस्तावेज़ थे. "विक्रांत भाई, अब बहुत हुआ. ये उन व्यापारियों की लिस्ट है जिनसे आपने हमारे नाम पर झूठे वादे किए थे. मैंने उनसे बात कर ली है. कोटा की मंडी अब आपकी धमकियों से नहीं डरेगी."

विक्रांत गुस्से से तमतमा उठा. उसने ब्रज मोहनजी की ओर देखा, पर उन्होंने अपनी नज़रें फेर लीं. मयंक ने आगे बढ़कर कहा, "हम आपकी बातों में नहीं आएंगे. हमने आपसे प्रिया के रिश्ते की बात करके ही गलती की थी. आप एक जीती जागती इंसान को अपनी संपत्ति ही समझने लगे. मुम्बई पुलिस की एफआईआर आपके लिए एक चेतावनी है कि सुधर जाओ."

अपनी जड़ें हिलते देख विक्रांत वहाँ से पैर पटकता हुआ निकल गया. उसकी आँखों में खतरनाक चमक थी. उसे समझ आ गया था कि कोटा की ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी है, अब उसे मुम्बई जाकर ही आखिरी दांव खेलना होगा.

रात नौ बजे विक्रांत मुम्बई जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस में था. उसने तय किया था कि अब वह मुम्बई का कारोबार संभालेगा, और  प्रिया को भी सबक सिखाएगा.

शाम के आठ बजे प्रिया ऑफिस से सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' पहुँची. रामजी काउंटर पर थे, प्रशांत बाबू अभी नहीं आए थे.

"काका, आज चमत्कार हो गया. टीम ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लग रहा था," प्रिया ने उत्साह से कहा.

रामजी ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया. "प्रशांत बाबू कहते हैं कि जब इंसान खुद को छोटा समझना बंद कर देता है, तो पहाड़ भी हिला सकता है. आज उनकी एसोसिएशन की मीटिंग है, वे देर से आएंगे."

प्रिया ने बाहर सड़क की ओर देखा. भीड़ भाग रही थी. अब उसे कोई डर नहीं था. उसने महसूस किया कि उसका अक्स अब आईने से बाहर आकर खुशबू हो रहा था. 

... क्रमशः

2 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 02 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

Bharti Das ने कहा…

बहुत सुंदर