लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
अगस्त की उमस भरी दोपहर थी. बादल घुमड़ते थे लेकिन बरसते न थे, धूप निकल आती थी. 'संबल कोचिंग' के नोटिस बोर्ड पर मंथली टेस्ट की रैंकिंग लिस्ट चस्पा कर दी गई थी. आयुष भीड़ से थोड़ा दूर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था. उसके दिल की धड़कनें उसके कानों में साफ़ सुनाई दे रही थीं. जैसे ही भीड़ छंटी, उसने अपनी उंगली लिस्ट पर दौड़ाई.
रैंक
101’ ... .................
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104’ ... .................
105' ... आयुष गुप्ता
उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. टॉप-100 रैंक वालों का जो 'एलिट' क्लब बन गया था, वह उससे मात्र पांच कदम दूर रह गया. तभी पीछे से रोहित की आवाज़ आई, "अरे यार आयुष, तू तो 'बॉर्डर-लाइनर' निकला. 105? भाई, कोटा में 100 के बाहर होने का मतलब है 'एवरेज'. और एवरेज लोगों को यहाँ कोई याद नहीं रखता. वे बस भीड़ का हिस्सा होते हैं."
रोहित का वह 'एवरेज' शब्द आयुष को तीर सा चुभा. उसने मुड़ कर रोहित की आँखों में देखा. वह उसका मखौल उड़ा रहा था. वह बिना कुछ बोले अपने रूम पर आ गया. मेज पर रखी फिजिक्स की मोटी किताबें उसे चिढ़ाने लगीं. उसने पंखे की ओर देखा, जो एक अजीब सी घरघराहट के साथ घूम रहा था—ठीक वैसी ही जैसी उसके दिमाग में चल रही थी. कमरे की दीवारों पर चिपके 'फॉर्मूला चार्ट' उसे अपनी ही असफलताओं के विज्ञापन जैसे लगने लगे. दिन मुश्किल से गुजरा.
शाम को उसने भारी मन से शगुन को फोन लगाया.
"दीदी... मेरी रैंक 105 आई है," आयुष की आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था.
"आयुष, 105 कोई बुरी रैंक नहीं है! हज़ारों बच्चों में तुम यहाँ तक पहुँचे हो," शगुन ने उसे दिलासा देने की कोशिश की.
"नहीं दीदी, यहाँ सब कहते हैं कि जो टॉप-100 में नहीं, वह रेस से बाहर है. रोहित कह रहा था कि मैं 'एवरेज' हूँ. क्या वाकई मैं बस एक औसत लड़का हूँ? क्या मेरी पहचान सिर्फ इस रैंक से तय होगी?" आयुष का गला भर आया.
शगुन को तुरंत डॉ. शास्त्री की क्लास याद आ गई. उसने गहरी सांस ली और कहा, "आयुष, मेरी क्लास में 'स्टीरियोटाइपिंग' के बारे में पढ़ाया गया था. कोटा के उस सिस्टम ने तुम पर एक 'एवरेज' होने का लेबल लगा दिया है. यह एक मानसिक साँचा है, जिसमें वे हर उस बच्चे को डाल देते हैं जो उनकी उम्मीदों के मुताबिक 'मशीन' नहीं बन पाता. तुम औसत नहीं हो आयुष, तुम बस एक इंसान हो जिसे इस वक्त रैंक की नहीं, चैन की ज़रूरत है."
"पर दीदी, यहाँ तो चैन भी रैंक से ही मिलता है," आयुष बुदबुदाया.
"सुन आयुष," शगुन ने स्वर कोमल करते हुए कहा, "हमें एक असाइनमेंट मिला था—अपने भीतर के पूर्वाग्रहों को पहचानने के लिए. इस असाइनमेंट का उद्देश्य यही था कि छात्राएँ अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना सीखें और उन्हें नष्ट करने की कोशिश करें. मैं पूरी ईमानदारी से यह किया और कर रही हूँ. ये पूर्वाग्रह हमें हमारे परिवार, समाज, यहाँ तक कि स्कूल-कॉलेज भी सिखाते हैं. बेहतर और योग्य इंसान बनने के लिए इनसे मुक्त होना जरूरी है. तुम्हें भी पूर्वाग्रह सिखाए जा रहे हैं, ‘जो टॉप 100 में नहीं है वह एवरेज है’, जो कहता है कि मेरा भाई सिर्फ तभी सफल है जब वह आईआईटी जाए. तू सुन रहा है न? तू आईआईटी न भी जाए, तो भी तू मेरा वही प्यारा आयुष रहेगा. तू कोई अंक (Digit) नहीं है."
“पर दीदी,...”
“तू टॉप 100 में भी आएगा, तू अपने सब्जेक्ट्स के नियमों सिद्धान्तों को समझने की कोशिश कर. विज्ञान सचाई की निरन्तर खोज है, विज्ञान के नियम सचाई हैं, अनेकानेक प्रयोगों ने उन्हें बारंबार सिद्ध किया है, उन्हें हमें सचाई के रूप में अंगीकार करना होगा, केवल परीक्षा के लिए रटना नहीं. एक बार वे समझ आ जाते हैं तो सब आसान होता जाता है, इतना आसान कि तू रोहित को भी पछाड़ सकता है. लेकिन उससे, या किसी और से कंपीटीशन कर के यह नहीं कर सकता. यह खुद को बेहतर बनाकर होगा. तुम्हें खुद पता नहीं लगेगा, तुम कब उससे आगे निकल गए हो.”
“बात तुम्हारी सही लगती है दीदी. पर यहाँ कोचिंग में तो रटने के तरीके खूब सिखाए जाते हैं.”
“वह ठीक है, डाटा रटने पड़ते हैं, पर नियम और सिद्धांत निर्देश हैं और अंगीकार करने से आते हैं. वे सोच का स्थायी अंग बन जाते हैं.
“समझ गया, दीदी यही करता हूँ. अब रखता हूँ.
फोन रखने के बाद आयुष देर तक खिड़की के बाहर देखता रहा. शगुन की बातों ने उसके भीतर के घाव पर मरहम ही नहीं लगाया था बल्कि, उसे एक नयी बात सिखा दी थी, “विज्ञान सत्य है, अनेकानेक प्रयोगों से बारंबार परखा हुआ. उसे सचाई के रूप में स्वीकार करो, परीक्षा के लिए रटो मत.”
उसने अपनी रफ कॉपी उठाई और गणित के सवालों के बीच, एक खाली पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा—
"मैं कोई रैंक नहीं, बल्कि इंसान हूँ. मेरा लक्ष्य बेहतर और योग्य इंसान बनना है, विज्ञान एक सचाई है, बारंबार परखी हूई, मुझे उसे रटना नहीं, समझना है. सचाइयों को अंगीकार करना है."
लिखने के बाद, आयुष कुछ देर सोचता रहा. खिड़की के बाहर आसमान में बादल दिखाई दे रहे थे. एक दिशा में धीरे-धीरे सरकते हुए. फिर बादलों के बीच एक बड़ा सा सूराख आया, और चांद दिखने लगा. वह आधा था. उसे पूरा होने में अभी सात-आठ दिन थे. सात-आठ दिन बाद तो रक्षाबंधन का त्यौहार है. रामगंजमंडी में हमेशा शगुन उसे राखी बांध कर मिठाई मुहँ में रख देती थी. उसे लगा कि दीदी ने यह मिठाई आज ही उसके मुहँ में रख दी है. एक दो दिनों में उसे दीदी की भेजी राखी मिल जाएगी. मम्मा दीदी को देने को हमेशा सौ का नोट उसे देती थी. यहाँ वह क्या देगा? फिर उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी. इस सात दिनों में वह विज्ञान के सच को अंगीकार करने की कोशिश करेगा. तब तक जितने भी सच वह अंगीकार करेगा. वही दीदी के लिए उपहार होंगे.
... क्रमशः
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